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अनमोल रत्न

 बुजुर्ग बृजमोहन जी अपनी पत्नी के साथ अपनी रिटायर्ड जिंदगी बहुत हंसी खुशी बीता रहे थे.....पेंशन से दोनों पति पत्नी अपनी जीविका से खुश थे .....वैसे तो घर बडा था और उनके तीन बेटे बहुऐ भी थी मगर उनके तीनो बेटे अलग अलग शहरों में अपने अपने परिवारों के साथ व्यस्त थे.....

वैसे उन्होनें नियम बना रखा था....दीपावली हो या कोई अन्य त्यौहार तीनों बेटे सपरिवार उनके पास आएंगे साथ रहेंगे खाएंगे वक्त बिताऐगे......पूरे एक सप्ताह तक....

वो एक सप्ताह कैसे मस्ती में बीत जाता था कुछ पता ही नही चलता था....सारा परिवार खुशी से झूम उठता ....अलग अलग भले ही रहते थे मगर उस एक सप्ताह में पूरी कसर साथ रहने की खत्म हो जाती ...उन सुखद अनुभव और खुशियों के सहारे बृजमोहन जी और सुधा की जिंदगी सुखद थी....

मगर फिर उनकी खुशियो को जैसे नज़र ही लग गई..... अचानक सुधा जी को एक रात दिल का दौरा पडा ...और एक झटके में उनकी सारी खुशियां बिखर गई.....

तीनो बेटे दुखद समाचार पाकर दौड़े आए...

उनके सब क्रियाकर्म के बाद सब शाम को एकत्रित हो गए...

बड़ी बहू ने बात उठाई....बाबूजी... अब आप यहां अकेले कैसे रह पाऐंगे... आप हमारे साथ चलिऐ....

नही बहू.... अभी यही रहने दो...यहां अपनापन लगता है... सुधा की अनेकों यादें है और फिर बच्चों की गृहस्थी में.....कहते कहते वो चुप से हो गए...

बड़ा पोता कुछ बोलने को हुआ...उन्होंने हाथ के इशारे से उसे चुप कर दिया...

"बच्चो.... अब तुम लोगों की मां हम सबको छोड़ कर जा चुकी है.... उसकी कुछ चीजें है....

वो तुम लोग आपस में बांट लो मुझसे अब उनकी साज सम्हाल नही हो पाऐगी....

कहते हुए अलमारी से बृजमोहन जी कुछ निकाल कर लाए....

मखमल के थैले में बहुत सुंदर चांदी का श्रृंगार दान था...

एक बहुत सुंदर सोने के पट्टे वाली पुरानी रिस्टवाच थी...

सब इतनी खूबसूरत चीजों पर लपक से पड़े....

छोटा बेटा जोश में बोला....अरे ये घड़ी ....ये तो अम्मा सरिता को देना चाहती थी....

बृजमोहनजी धीरे से बोले....बच्चों और सब तो मै तुम लोगो को बराबर से दे ही चुका हूं...

इन दो चीजों से उन्हे बहुत लगाव था बेहद चाव से कभी कभी निकाल कर देखती थी.....

लेकिन अब कैसे उनकी दो चीजो को तुम तीनों में बांटू समझ नही आ रहा....

सभी एक दूसरे का मुंह देखने लगे...

तभी मंझला बेटा बड़े संकोच से बोला ये चांदी का श्रृंगार दान छोटे के अनुसार वो मीरा को देने की बात करती थी तो वह ले ले....और सोने के पट्टे वाली रिस्टवाच मंझली बहु को तो वह ले ले.....पर....

पर ऐसे तो समस्या तो बनी ही रहेगी ...

बृजमोहन जी मन में सोच रहे थे.....बड़ी बहू को क्या दूं...

उनके मन के भाव शायद उसने पढ़ लिए....बाबूजी... आप शायद मेरे विषय में सोच रहे है...

आप ये श्रृंगार दाध मीरा को ...

और रिस्टवाच सरिता को दे दीजिए..... अम्मा भी तो यही चाहती थी....

पर नंदिनी....तुम्हें.... तुम्हें क्या दूं.....समझ में नही आ रहा....आखिर तुम भी तो मेरी बहु हो मेरी बेटी .....

बाबूजी.....आपके पास एक और अनमोल रत्न है ...

और वो अम्माजी मुझे ही देना चाहती थी....

बृजमोहन जी की तरह दोनों बेटे बहु भी हैरानी से बडी बहु को देखने लगे... अब कौन सा पिटारा खुलेगा...

और कौनसा वो अनमोल रत्न है जो बडी भाभी चांदी के श्रृंगार दान और सोने के पट्टे वाली रिस्टवाच को छोड उस अनमोल रत्न को पाना चाहती है .....जरूर बेहद कीमती ....या अमूल्य होगा..... हे भगवान शायद हमने जल्दबाजी कर दी....

सबकी हैरानी और परेशानी को भांप कर बड़ी बहू नंदिनी मुस्कुरा कर बोली....वो सबसे अनमोल रत्न तो आप स्वयं हैं बाबूजी....

पिछली बार अम्माजी ने मुझसे कह दिया था...

मेरे बाद बाबूजी की देखरेख तेरे जिम्मे...

बस अब आप उनकी इच्छा का पालन करे और हमारे साथ चलें....

बृजमोहन जी की आँखें खुशी से और कृतज्ञता से भीग गई .....दोस्तों जीवन मे सबसे अनमोल हमारे माता पिता हमारे बुजुर्ग है इनका आशिर्वाद इनके अनुभव इनकी सलाह इनकी छत्रछाया किसी अनमोल रत्न अनमोल धरोहर से कम नही है ....


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