आखरी पिरीएड खत्म होते ही शुभदा स्टाफ रूम में आई. उसने अपने नोट्स और किताबें अलमारी में रख कर अलमारी को ताला लगाया और घड़ी की ओर देखा। सव्वा पाँच बज रहे थे।आज रंजू और दीपा नहीं आए इसलिये अकेले ही जाना होगा सोचकर उसका मन थोडा कसैला हुआ।
चलो, चलते हैं शुभदा मैडम.. शुभदा मन ही मन बात करती हुए कॉलेज से बाहर निकली. साडे पाँच बजे की बस छुट ना जाए इसलीये थोड़ी तेज चलने लगी। उसके पास अपना स्कूटर था लेकिन बीच में एक हादसा क्या हो गया तो उसने स्कूटर चलाना ही बंद कर दिया। अब रोज दीपा और रंजू के साथ ही आया जाया करती थी।
मैडम... मैडम.. पीछे से किसी ने पुकारा तो उसकी चलने की गति धीमी हो गई। एक युवक उसके पास आया।
आप शुभदा मॅम हैं ना?
अपनी बस कही छूट ना जाये इसलिये वह जल्दबाजी में बोली
हाँ, मैं शुभदा मैडम हूँ। क्या चाहिये तुम्हें ?
मॅम, क्या आपने मुझे पहचाना?
एक तो बस का समय हो चला था और यह युवक रास्ता रोककर पुछ रहा था मुझे पहचाना क्या? गुस्सा तो खुब आया पर उसका मासूम चेहरा और शरारती आँखे देखकर गुस्सा छूमंतर हो गया.
नहीं रे बेटा नहीं पहचाना..
मॅम नूतन विद्यानिकेतन स्कूल.... कक्षा बारहवीं 'ब' ... सुमित, अनंत, अनिल, केटी राजू ....
एक शिक्षक के रूप में काम करते समय एक तो बहुत होशियार बच्चे या बहुत शैतान बच्चे याद रहते हैं। कक्षा बारहवी 'ब' उनमें से एक थी।
याद आया मॅम? वह उसके सवाल पर मुस्कुराई
हाँ, मुझे याद आया ... उस जैसी मस्तीखोर कक्षा मुझे फिर कभी देखने को नहीं मिली।क्या नाम है तुम्हारा?
मैं सुमित हूं मॅम...आपका शैतान बच्चा।
सुमित... अरे...तुम तो बहुत बदल गए हो.. क्या कर रहे हो आजकल..?
मॅम, अगर आपके पास थोडा समय हो तो कॉफी पी सकते हैं क्या?
शुभदा ने घड़ी देखी,बस तो जा चुकी थी। उसने आज ऑटो से जाने का फैसला किया।
ठीक है,चलो चलते हैं..
दोनों पास के एक होटल में पहुंचे।
मॅम, आप बैठिए, मैं पांच मिनट में आता हूं। वह उसे बिठाकर, कूपन लेने काउंटर पर गया।
उसे नूतन विद्यानिकेतन स्कूल याद आ गया... याद आया कक्षा बारहवी 'ब'... और याद आया सुमित.. सबसे शैतान और होशियार लड़का... मैं उसे शैतान बच्चा कहती थी... और अचानक याद आया वो दिन....
जब मैं बारहवी कक्षा को पढ़ा रही थी..और अचानक क्लास में शोर उठा...मॅम...मॅम...देखो सुमित को क्या हुआ...मैं किताब हाथ में लेकर दौड़ी.. देखा सुमित मेज पर सर रखकर सोया था और उसके मुँह से झाग निकल रहा था। मैं अपनी पूरी ताकत से चिल्लायी इसे उठाओ...और जल्दी से बाहर लाओ ... दो लडकों ने उसे उठाया ... मैं दौड़ती हुई बाहर आयी, स्कूल के बाहर एक ऑटो खड़ा था, मेरे साथ एक शिक्षक भी साथ आए। हम उसे लेकर अस्पताल पहुंचे। डाॅक्टर हाथ लगाने को तैयार नहीं थे क्योंकि पुलिस का मामला था। लेकिन एक डॉक्टर परिचित निकले और उन्होने उसे तुरंत भर्ती कर लिया...
सुमित यहाँ अपने किसी दूर के रिश्तेदार के साथ रहता था. उसकी माॅं गांव में रहती थी. चूंकि उस समय किसी के पास फोन नहीं था, ऐसे में दुविधा यह थी कि उसके घर कैसे खबर करें।
एक घंटे के बाद डॉक्टर बाहर आये और बोले, इस बच्चे ने कोई जहर खा लिया था... जल्दी लेकर आये वर्ना बचाना मुश्किल था।क्या आप पुलिस को सूचना देना चाहते हैं? वैसे वह अब खतरे से बाहर है.. और इतनी कम उम्र में पुलिस के झंझट में इसे डालना ठीक न होगा... बाकी आप जो ठीक समझो.. कहकर डाॅक्टर चले गये।
मैं और मेरे साथ आए शिक्षक दोनों भयभीत थे। स्कूल की प्रधानाध्यापिका मैडम को बताया। उन्होंने कहा कि पुलिस केस दर्ज न करें।
हम सभी हैरान थे कि क्युं इस होशियार लड़के ने इतना बड़ा फैसला लिया होगा।
साथ वाले शिक्षक ने कहा, "मॅडम, आप मनोविज्ञान पढ़ाती हैं। आप उससे पुछना तो।
मैंने कहा, 'वह ठीक तो हो जाए, फिर उससे पुछती हूं ।'
अगले दिन उसे अस्पताल से छुट्टी मिली। मैं उसे अपने घर ले आयी। उसने मुझे जो बताया वह बेहद दुखद था।
बचपन में ही पिता की मृत्यु हो गई थी ।माँ खेत में काम करती थी। सुमित यहां अपने दूर के चाचा के साथ रह रहा था। वह स्कूल के बाद रात दस बजे तक अपने चाचा की किराने की दुकान में काम करता था। घर के भी बहुत काम में हात बँटाता था। फिर भी चाची को वह एक आँख नहीं भाता था| कल चाची ने उस पर पैसे चुराने का आरोप लगाया, उसे बहुत बुराभला कहा और पीटा भी। वो रोने लगा..
मैंने उससे कहा, बेटा तुम्हारी माँ ने अपने कलेजे पर पत्थर रखकर तुम्हें यहाँ कुछ बनने के लिये भेजा है। अगर उन्हें इस बात का पता चला तो वो ये धक्का सहन नहीं कर पायेगी. इसलीये आगे कभी ऐसे बुरे विचार आये तो अपनी माँ का चेहेरा याद करना.. उनकी तकलिफ याद करना... समझे.
फिर हमने उसकी रहने की व्यवस्था पास के छात्रावास में कर दी। वह इतना स्वाभिमानी था कि छोटामोटा काम करके अपना खर्च वहन करता था। बारहवी में उसे 75% मिले। उसके बाद एक बार वह मुझसे तेईस सौ रुपये मांगने आया था। किसी अच्छे कॉलेज में प्रवेश पाने के लिए। उसी साल मुझे यहां एक कॉलेज में नौकरी मिल गई और मैं यहाँ शिफ्ट हो गयी।
मॅम लिजिये, सुमित ने सैंडविच उसके सामने रख दिए।
अरे इसकी क्या जरूरत अभी घर ही जाना है?
मॅम, मुझे बहुत भूख लगी है और अगर मैं आपके सामने अकेले खाने के लिए बैठ जाता, तो आप ही कहती ये शैतान अकेले अकेले खा रहा है? उसने इतनी मासूमियत से कहा की मुझे वहीं पुराना सुमित याद आया।
शैतान बच्चा, तुमने मुझे नहीं बताया तुम क्या करते हो.
मॅम, मैंने बारहवी के बाद पत्रकारिता का कोर्स करने के लिए आपसे तेईससौ रुपये लिए थे। तीन साल बाद मैं पैसे वापस करने आया था लेकिन आपने विद्यानिकेतन छोड़ दिया था। मैंने आपको खोजने की बहुत कोशिश की। लेकिन...।आज मैं यहाँ काम के सिलसिले से आया था तो अचानक आप दिख गये ।
अच्छा तो अब तुम पत्रकार हो..।
पत्रकार नहीं मॅम मैं संपादक हूं।
अरेव्वा बहुत अच्छा शैतान बच्चा बधाई हो।
मॅम, ये सब आप की वजह से कर सका... आपने मुझे मौत के मुँह से बाहर निकाला.. मुझे जीने की नई उम्मीद दी... बिना किसी हिचकिचाहट के मुझे तेईस सौ रुपये दिए। .. मॅम, आज मैं जो कुछ हूं वह आपकी वजह से हूं .. कहते कहते उसका गला रूंध गया और आंखों में आंसू आ गए।
अरे, मैंने कुछ खास नहीं किया बेटा तुम थे ही काबिल।
सुमित उठा और मेरे पैरों पर झुक गया मैंने उसके सिर पर हाथ रखा और कहा, खुश रहो बेटा। ओय शैतान बच्चा तुमने तो कहा था कॉफी पिलाता हूं कहाँ है कॉफी ?
ओह... साॅरी मैम... वो आंखें पोंछता हुआ खड़ा हुआ, अभी लाता हूं मॅम, कहकर काउंटर की तरफ बढ गया।
उसे देखकर शुभदा की आँखे भीग गयी। क्या हुआ अगर मेरे अपने बच्चे नहीं हैं? जो प्यार और स्नेह सुमित जैसे कई विद्यार्थियों से मिलता है वह तो अनमोल है.. कॉफी लेकर आ रहे सुमित को देखते हुए वह सोचने लगी।
वैशाली गोस्वामी
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Good
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