पापा मैने लड़की पसंद कर ली है पिछले एक साल से हम एक दूसरे को डेट कर रहै और अब शादी करने का फैसला कर लिया है।
आज शाम रिद्धि के पैरेंट्स घर पर आप लोगों से मिलने आने वाले है उम्मीद करता हूँ आप लोगों को कोई एतराज नहीं होगा इस रिश्ते से।राजीव ने अपने पिता श्यामसुंदरजी को जिस तरह से बताया उससे बताना कम और ऑर्डर ज्यादा लग रहा था।
बेटे के फरमान के आगे कर भी क्या सकते थे। इकलौता बेटा था बहुत नाज नखरों से पाल पोष कर बड़ा किया जिसका नतीजा था कि आज बेटा बाप को भी फरमान सुनाने लगा था।
इसमे गलती राजीव कि नहीं थी समय ही कुछ ऐसा आ गया कि बच्चे अब मां बाप के सामने अपने फैसले सुनाने से नहीं डरते और ना ही शर्माते।
आज अपनी पसंद का हमसफर चुनना कितना आसान हो गया किसी बात का डर नहीं ।रिश्ते नाते,जात पात सब पीछे छूट गया।
श्यामसुंदर जी सब सोचते सोचते याद करने लगे एक उनका जमाना था जब सच्चे प्यार को पाना किसी सीमा पर होने वाली जंग से कम नहीं था ।
उस पर भी कोई गारंटी नहीं कि प्यार आपको मिल ही जाये।सब कुछ जानते हुए भी युवा होते शरीर मे दिल की धड़कने भी ज्यादा धडकने लगती है ।
अहसास तब पहली बार हुआ जब मौहल्ले मे सामने वाले घर मे एक लड़की फर पड़ी।नजर क्या पड़ी बस यूँ समझो वही ठहर गयी तो हटने का नाम ना ले,।
दिमाग जोर डाल रहा था कि काका काकी के तो दो लड़के ही तो यह कौन है कहां छुपा रखा था इस ईद के चांद को।ईद के चांद जैसी सुन्दर लम्बी कमर पर झूलती चोटी ऐसे लग.रही थी मानो कोई नागिन लहरा कर चल रही हो उस पर आंखों मे लगाया गया तीखा तीखा सुरमा तो साक्षात कामदेव को घायल कर दे तो भला श्यामसुंदरजी कहां बच पाते उसके नैनो के तीर से ।
बड़ी मुश्किल से अपने घायल दिल को सम्भालते हुए घर आकर अपनी छोटी बहन से पूछने पर पता चला कि काकी की बहन की बेटी है शहर से कुछ दिन गांव मे रहने आई है अपनी मौसी के पास।
अब तो मन मे ठान लिया था कि शहर की मैम को गांव की गौरी बनाकर ही रहेंगे। जब भी मौका मिलता निकल जाते काका के घर।वहां सब बड़े मानते थे क्योंकि पढाई मे बचपन से ही अच्छे थे और उस पर मैट्रिक परीक्षा मे तो पूरे जिले मे प्रथम आये थे ,तब से हर कोई श्यामसुंदरजी को बड़ी ईज्जत और प्यार मिलता था।बस उनकी यही बात से शहर वाली मैम सविता भी प्रभावित हुए बिना ना रह सकी।
बातों का सिलसिला पढाई से शुरू होते होते कब प्यार की दहलीज पर बैठ गया पता ही नहीं चला ।दिन रात सपनो की दुनिया मे खोये हुए प्यार के कैनवास पर रंग भरते रहते।आंखों की आंख मिचौली आखिर कितने दिन लोगों की नजरों से छिप पाती।
जैसे ही पता लगा हंगामा मच गया दोनों परिवारों मे।
श्यामसुंदरजी को घर मे बंद कर दिया गया तो सविता को वापिस शहर भेज दिया गया उसके माता पिता के पास।
जहां पहुँचना तो श्यामसुंदरजी के लिए कतई आसान नहीं था क्योंकि उसके पिता बड़े ओहदे पर नौकरी करते थे।घर के बाहर हर समय पहरेदार बैठे होते ऐसा सविता ने बताया था,फिर शहर जाने भी कौन देता ?
आखिरी मुलाकात भी नही कर पाये थे अपने प्यार से दिल का दर्द दिल मे ही दब कर रह गया।समय के साथ उम्र बढती रही पर प्यार कम नहीं हुआ।
जब शादी की उम्र होने पर घरवालों ने लड़की देखना शुरू कि तो श्यामसुंदरजी ने डरते हुए अपने मन कि बात कही भी लेकिन प्रेम विवाह को तो जुर्म की नजरों से देखा जाता था तो भला श्यामसुंदरजी को कैसे यह करने देते।
आखिर सबकी पसंद से श्यामसुंदरजी शादी करके अपनी गृहस्थी की गाड़ी को संवारने मे व्यस्त हो गये।
आज जब खुद के बेटे ने अपने प्रेम विवाह की बात कही तो बस यही ख्याल आ रहा था वाकई जमाना बहुत बदल गया है । वही विचारों की स्वतंत्रता ने बच्चों को आत्मनिर्भर और आत्मविश्वासी बना दिया है ,जहाँ अब निर्णय लेने और सुनाने में संकोच और झिझक नहीं होती।
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