“सुना है गुप्ताजी की बहू शादी के छः महीने बाद ही भाग गई (घर छोड़कर चली गई)।”
“हाँ सुना तो मैंने भी है किंतु आजकल यह कौनसी बड़ी बात है। आजकल तलाक फैशन जैसा हो गया है। लड़कियों में सहनशीलता तो बची ही नहीं है।”
“हाँ सही कहती हो तुम। एक हमारा जमाना था पत्थर तक चबाने की हिम्मत रखते थे। आजकल की लड़कियों को तो शहद भी चाटने दो तो वमन कर देती है।”
यह एक वार्तालाप जो हर एक किटी पार्टी या गली नुक्कड़ पर आज आम है। भारत जैसे देश में कुछ वर्ष पहले तक तलाक या वैवाहिक सम्बंध विच्छेद जैसा शब्द ही सुनना मतलब आसमान टूटने जैसा था किंतु आज यह शब्द भी आम है और इसके परिणाम भी। सुनने में तीन अक्षर का यह शब्द सबसे अधिक तीसरे ही व्यक्ति को प्रभावित करता है जिसे संतान के नाम से जान जाता है। अदालत में पूछा जाना वाला एक सवाल-
“तुम्हें मम्मी और पापा दोनों में से किसी एक को चुनना होगा।”
उसकी जिंदगी बदल देता है।
आज हम तलाक के परिणाम के स्थान पर तलाक के कारण पर बात करेंगे। लड़कियों की असहनशीलता, सोशल मिडिया का चलन, नारी शिक्षा, बढती आत्मनिर्भरता आदि को हम बढते तलाक का कारण मानते हैं। हम नारी जाति को ही दोष देते हुए कहते हैं- “स्वाभिमान को अभिमान में बदलने में वक्त नहीं लगता एवं रिश्ते टूट जाते हैं।”
“मैं सही तू गलत”
के सिद्धांत पर चलकर बच्चे अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार लेते हैं।
क्या इसमें पूरी गलती लड़कियों की ही होती है? या मान ले की लड़कों की ही होती है? लड़की की ही होती है। अभिभावक या समाज की कोई गलती नहीं होती?
आज हम इसी पर थोड़ी सी बात करेंगे। केवल उस वर्ग की जहाँ शैक्षणिक स्तर बढा है और तलाक भी।
आज बेटियाँ पढने लगी है। बटे और बेटी की पढाई में कई भेदभाव नहीं किया जाता। दोनों की परवरिश लगभग एक ही तरह से होती है। अचानक बीस वर्ष की उम्र तक आते-आते बेटियों को घर का काम सीखने पर दवाब डाला जाने लगता।
बचपन से आज तक मम्मी या कामवाली कपड़े धोती आई थी किंतु अब उसे कहा जाता है- “कल तुझे ससुराल जाना है वहाँ तो काम खुद को ही करना पड़ेगा।” पच्चीस वर्ष की बेटी कोई काम नहीं करती किंतु वह अगर तेईस वर्ष की उम्र में बहू बन जाए तो वह एक ही दिन में औरत मान ली जाती है। उससे उम्मीद की जाती है कि वह अपनी सास या मम्मी की तरह सुघड़ गृहणी बन जाए। उसे बाहर जाकर कमाई भी करनी है और घर भी सम्भालना है।
वह काम जो कभी गम्भीरता से सीखा ही नहीं है। गणित का एक-एक सूत्र याद करने में घंटों लगाए थे किंतु रोटी बनाने का तो दो दिन भी अभ्यास नहीं किया। जो काम बचपन से किया ही नहीं वह कुछ दिन सीखकर वैसे कैसे किया जा सकता है जैसे सास वर्षों से करती आई है।
बस सास-ससुर बहू के खिलाफ बोलना शुरु करते हैं। अब दूसरी समस्या आती है जो मेरी नजर में बढते तलाक की सबसे बड़ी वजह है।
हमने लड़कियों की परवरिश में तो बदलाव कर दिया, किंतु लड़कों की परवरिश हम आज भी पुराने अंदाज में ही कर रहे हैं। हम उसे कभी यह नहीं सीखाते–
“बेटा जमाना बदल रहा है। अब जो तेरी पत्नी बनकर आयेगी वह भी कमाने के लिए बाहर जायेगी इसलिए घर का काम करने की तुम्हारी भी पूरी जिम्मेदारी रहेगी।” किंतु बेटे से हम झाड़ू लगवाये, बर्तन मजवाये, कपड़े धुलवाये, इस्त्री करवाये, खाना बनवाये................
“राम राम राम....................बबिता यह क्या कह रही हो। ये सभी काम करने के लिए भगवान ने लड़कियों को ही बनाकर भेजा है।” हो सकता है जबाब कुछ इस तरह का ही आए।
किंतु मैं कहना चाहूँगी कि हो सकता है भेजा होगा। किंतु यह सदियों पहले की बात थी। अब जब हम लड़के लड़की को पढ लिखकर अपना भविष्य बनाने के अवसर समान रुप से दे रहे हैं तब हमें उनकी परवरिश भी समान रूप से करनी पड़ेगी। बेटों को सीखाना पड़ेगा कि जैसे तेरी बहन रसोई घर में नहीं जाती, वैसे ही तेरी पत्नी भी मायके में रसोई घर मे बहुत अधिक नहीं गई हुई ही आयेगी। तुम्हें भी उसका हर एक काम में पूरा हाथ बँटाना होगा।
थोड़ा मुश्किल है न यह कहना................. नहीं शायद बहुत मुश्किल है।
किंतु आज नहीं तो कल यह तो करना ही होगा। चुटकी भर सिंदूर माँग में आते ही चुटकी में लड़की तो फिर भी बदल जाए किंतु लड़कों को बदले हालात में जीना हमें बचपन से ही सिखाना होगा।
यह भी कि रोटी-कपड़ा और मकान मूलभूत आवश्यकता है। खाना पकाना, कपड़े धोना और घर साफ सुथरा रखना अर्थात झाङू लगाना ये तीनों काम पढाई जितने ही जरुरी है। बचपन से ही ये बेटे बेटी दोनों को ही सिखाने होंगे। बेटों को सिखाना होगा कि वे अपनी पत्नी की तुलना अपनी माँ से न करे। उसकी दिनचर्या अपनी बहन की दिनचर्या से मिलाये क्योंकि वह घर की बहू तो बनकर आई है किंतु अपने मायके में उसकी बहन की तरह ही पली बढ़ी है।
अगर यह इतना सा बदलाव आज के दिन अभिभावक जन्म के साथ ही शुरु कर दे तो हो सकता है कुछ हद तक बेवजह (एक-दूसरे से विचार न मिलने एवं अहंकार आपस में टकराने पर होने वाले तलाक)) होने वाले तलाकों में कमी आ जाए..........
एक बार सोचियेगा...................
Comments
Post a Comment