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वासना की तलवार

 उसे नारी देह बहुत पसंद थी, वह भी बिना कपड़ों के हर दिन उसे खेलने के लिए एक नया गोश्त चाहिए था, आज भी वह गोश्त की दुकान की सीढ़ियां चढ़ रहा था।

रोज की तरह कई जिस्म देखे फिर एक सबसे कम उम्र

की देह उसे पसंद आई। उम्र उसकी कम थी पर हाव भाव से और इशारों से वह काफी समझदार लग रही थी वह उसे लेकर कमरे की तरफ चल दिया, पेमेंट पहले ही कर दी थी। कमरा भी ऐशो-आराम वाला था क्योंकि उसके पास पैसों की कमी नहीं थी।

वह लड़की से बोला - "तुम्हें आज पहली बार देख रहा हूं.."

"हां साहब कल ही मेरा सेठ मुझे यहां लाया है, अब देर मत करो साहब दिन में 10 कस्टमरों का कोटा पूरा करना है"

यह कहकर उसने अपने शरीर से दीवार बन रहे कपड़ों को अलग कर दिया वह किसी भूखे कुत्ते की तरह झपट पड़ा जैसे उसकी आत्मा वासना के गंदे सागर में मिलने के लिए बेताब थी, थोड़ी देर में उसने अपनी मृगतृष्णा शांत कर ली थी।

जब उसकी आंखों से वासना का खुमार कम हुआ तो कमरे में भी नजर दौड़ाई पलंग के बराबर टेबल पर एक फोटो देखते ही उसके पैरों से जमीन खिसक गई, वह जड़ा सा उस फोटो को देखता रह गया।

उस फोटो में उसकी बेटी और उस घर में काम करने वाली आयी की फोटो था जो 10 साल पहले उसकी बेटी को घर से उठा कर भाग गई थी।

घरवालों ने बहुत दिन तक उसे ढूंढ रहा था लेकिन वह नहीं मिली थी, उसने टूटते हुए थरथराते शब्दों में पूछा -

"ये... ये... यह फोटो किसकी है"

"मेरी और मेरी मां की है साहब जो अब इस दुनिया में नहीं है इसलिए मैं उसकी फोटो साथ रखती हूं..."

"क क क्या तुम्हें याद है पहले तुम कहां रहती थी ?"

"नहीं साहब होश संभाला तो यही कलकत्ते में हूं यह फोटो तो बहुत पुरानी है पर तुम क्यों पूछ रहे हो साहब..."

"ना ना नहीं कुछ नहीं"

उसकी आवाज गले में अटक गई थी वासना का नशा फर्श पर गिरकर चित्कार कर रहा था वह कपड़े पहनने के बाद भी अपने आप को नंगा महसूस कर रहा था।

आज उसे दुनिया की हर लड़की जिसे वह अपना खिलौना बना चुका था उसमे आज उसकी अपनी बेटी भी खड़ी दिख रही थी, सैलाब उत्तर जाने के बाद अब वहां सिर्फ कीचड़ ही कीचड़ थी।

अब कुछ नहीं हो सकता था वासना की तलवार रिश्तो का गला काट चुकी थी। वह अपना क्रत्य किसी को बता नहीं सकता था अब वह भारी कदमों से वही सीढ़ियां उतर रहा था जिन पर वह उड़ कर गया था।..........

मजबुरी का फायेदा उठाने से अच्छा हैं मजबुर व्यक्ति का

साथ देना ....!!


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