आँगन में रंग-बिरंगे काग़ज़ी फूलों की लड़ियाँ लटक रही थीं। हल्दी की खुशबू और पकवानों की महक मिलकर ऐसा माहौल बना रही थी, जैसे पूरा घर मुस्कुरा रहा हो। शादी की तैयारियों में हर कोई व्यस्त था—कोई कुर्सियाँ सजा रहा था, कोई मिठाइयों की पेटियाँ गिन रहा था, तो कोई मेहमानों के स्वागत की व्यवस्था देख रहा था।
रेणु खिड़की से बाहर झाँकते हुए बार-बार सड़क की ओर नज़र दौड़ा रही थी। उसे अपने भाई-भाभी का इंतज़ार था। बचपन से ही भाई उसके लिए सबसे बड़ा सहारा रहा था, भले ही हालात ने उसे कभी बहुत आगे बढ़ने का मौका न दिया हो। पढ़ाई बीच में छूट गई, छोटी-सी नौकरी और सीमित आमदनी—इन्हीं के बीच उसने अपनी दुनिया बसा ली थी। भाभी ने भी घर-गृहस्थी और बच्चों की ज़िम्मेदारी में खुद को समेट लिया था।
रेणु की ज़िंदगी अलग दिशा में चली गई थी। शादी के बाद किस्मत ने साथ दिया, पति का कारोबार चला और देखते ही देखते घर की आर्थिक हालत मजबूत हो गई। बड़े घर, आरामदायक जीवन, समाज में सम्मान—सब कुछ था। लेकिन एक चीज़ जो कभी नहीं बदली, वह था भाई के प्रति उसका अपनापन।
आज उसकी बेटी की शादी थी। रस्मों का क्रम चल रहा था, और “भात” की रस्म का समय नज़दीक आ रहा था। मेहमानों की भीड़ बढ़ती जा रही थी, लेकिन रेणु की निगाहें बस एक ही चेहरा ढूँढ रही थीं।
तभी गली के मोड़ पर एक पुरानी-सी कार आकर रुकी। रेणु की आँखें चमक उठीं।
“आ गए!” वह खुशी से बोली और जल्दी से बाहर की ओर बढ़ी।
भाई और भाभी कार से उतरे। उनके चेहरे पर संकोच साफ़ झलक रहा था। हाथ में एक थैला और एक छोटा-सा लिफ़ाफ़ा था। रेणु ने आगे बढ़कर दोनों को गले लगा लिया।
“इतनी देर लगा दी,” उसने हँसते हुए कहा, “कब से इंतज़ार कर रही थी।”
भाभी की आँखें भर आईं।
“दीदी, देर नहीं करना चाहते थे… बस…”
वाक्य अधूरा रह गया।
अंदर कमरे में सब बैठ गए। भाभी ने थैले से एक साड़ी निकाली—साधारण, लेकिन सलीके से चुनी हुई। फिर लिफ़ाफ़े से एक पतली-सी सोने की चेन।
“दीदी, इससे ज़्यादा हमारी हैसियत नहीं,” उन्होंने धीमे स्वर में कहा।
फिर जेब से पाँच सौ रुपये निकालकर रेणु की ओर बढ़ा दिए।
कमरे में एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। रेणु ने बिना किसी झिझक के साड़ी और चेन हाथ में ली। उसके चेहरे पर कोई बनावटी मुस्कान नहीं थी, बल्कि सच्ची खुशी थी।
“कितना सुंदर है,” उसने कहा, “तुम दोनों ने तो मुझे खुश कर दिया।”
भाई ने राहत की साँस ली।
“डर था कहीं तुम्हें बुरा न लगे,” उसने कहा।
रेणु ने तुरंत सिर हिलाया।
“बुरा? अरे पगले, तुम्हारा आना ही मेरे लिए सबसे बड़ी बात है।”
इतने में उसकी बेटी, अनन्या, कमरे में आ गई। उसने साड़ी और चेन देखी, फिर खुशी से उछल पड़ी।
“मामा, ये साड़ी तो बहुत प्यारी है! मैं फेरे इसी में लूँगी। और ये चेन… ये भी पहनूँगी।”
भाई की आँखों में चमक आ गई।
“सच?”
“हाँ!” अनन्या ने ज़ोर देकर कहा, “मुझे मामा-चाची की पसंद बहुत अच्छी लगती है।”
रेणु ने बाहर खड़े ढोल वालों को आवाज़ दी।
“अरे, ढोल बजाओ! मेरे भाई-भाभी मेरी बेटी का भात भरने आए हैं।”
ढोल की तेज़ आवाज़ से पूरा आँगन गूँज उठा। मेहमानों की नज़रें उधर घूम गईं। कोई फुसफुसाया—
“देखो, कितने सादे लोग हैं।”
तो किसी ने कहा—
“पर दिल के बहुत बड़े हैं।”
ढोल की थाप के बीच भाई और रेणु एक-दूसरे के गले लग गए। बचपन की यादें आँखों के सामने तैरने लगीं—वही छोटा-सा घर, माँ की डाँट, पिता का साया, और एक-दूसरे का साथ। पैसों की तंगी थी, पर रिश्तों की कमी कभी नहीं रही।
भाभी एक कोने में खड़ी यह दृश्य देख रही थीं। उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे, पर वे आँसू दुख के नहीं, सुकून के थे।
“दीदी,” उन्होंने कहा, “आज मन बहुत हल्का हो गया।”
रेणु ने उनका हाथ थाम लिया।
“भाभी, तुम दोनों ने जो दिया है, वो किसी भी महँगे गहने से बढ़कर है।”
रस्में आगे बढ़ती रहीं। अनन्या सचमुच वही साड़ी पहनकर आई। चेन उसके गले में चमक रही थी। कई मेहमानों ने तारीफ़ की।
“बहुत सुंदर लग रही हो,” किसी ने कहा।
अनन्या मुस्कुराई और बोली,
“ये मेरे मामा-चाची की दी हुई है।”
भाई ने यह सुना तो उसकी छाती गर्व से भर गई। उसे लगा, जैसे उसकी सारी झिझक, सारी कमी, सब धुल गई हो।
शाम ढलने लगी। रस्मों के बाद सब बैठकर चाय पी रहे थे। भाई ने धीरे से रेणु से कहा,
“तुम्हें पता है, आज के ज़माने में लोग रिश्तों को पैसों से तौलते हैं।”
रेणु ने मुस्कुराकर जवाब दिया,
“और इसी वजह से सच्चे रिश्ते कम होते जा रहे हैं।”
उसने भाई की ओर देखा।
“पर हम खुशकिस्मत हैं। हमारे लिए आज भी पैसा नहीं, इंसान मायने रखता है।”
भाई ने सिर हिला दिया।
“माँ होतीं तो बहुत खुश होतीं।”
रेणु की आँखें नम हो गईं।
“हाँ… कहतीं—बच्चे अगर एक-दूसरे के साथ खड़े रहें, तो वही सबसे बड़ी दौलत है।”
रात को जब भाई-भाभी विदा लेने लगे, रेणु ने उनके हाथ में ज़बरदस्ती एक लिफ़ाफ़ा थमा दिया।
“ये रख लो,” उसने कहा।
भाई ने तुरंत मना कर दिया।
“नहीं, दीदी।”
रेणु ने मुस्कुराकर कहा,
“ये भात का पैसा नहीं है। ये मेरी तरफ़ से प्यार है। और प्यार लेने में कोई छोटा-बड़ा नहीं होता।”
भाभी ने लिफ़ाफ़ा थाम लिया।
“आप हमेशा दिल से देती हो,” उन्होंने कहा।
कार आगे बढ़ गई। रेणु देर तक खड़ी उसे देखती रही। उसके चेहरे पर संतोष था। वह जानती थी कि आज उसने कोई दिखावा नहीं किया, बस रिश्ते निभाए थे।
घर के भीतर लौटते हुए उसने सोचा—
ऐसे रिश्ते हर घर में नहीं होते।
जहाँ देने और लेने में हिसाब न हो,
जहाँ प्यार पैसों से बड़ा हो,
और जहाँ भाई-बहन आज भी गले लगकर यह कह सकें—
“तू है, तो सब है।”
यही रिश्ते असली होते हैं।
लेखक : अज्ञात
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