Skip to main content

फैसला

 सुबह के सात बजे थे, लेकिन घर की रसोई में नौ बजे वाली भागदौड़ पहले ही उतर चुकी थी। गैस पर चढ़ा दूध उफान मारने को था, तवे पर पराठे की महक फैल रही थी और बाहर ड्रॉइंग रूम में कुर्सियों की खिसकाहट के साथ “बैठो, बैठो” की आवाज़ें गूंज रही थीं।

अनाया को पता नहीं था कि आज उसके घर में मेहमान आए हैं या जज बैठे हैं। फर्क बस इतना था कि जज की कुर्सी पर वही लोग थे जिन्हें वह रोज़ “अपने” कहकर बुलाती थी।

उसने एक हाथ से आटा गूंथा, दूसरे हाथ से मोबाइल की स्क्रीन पर स्कूल का नोटिस देखा और तीसरे—जो उसके पास था ही नहीं—उसी से वह अपनी थकान पोंछती। बगल में रखा स्टील का डिब्बा खुला पड़ा था, जिसमें बच्चे की दवा रखी थी। उसे याद आया कि रोहन की दवा का समय हो गया है। उसने पानी का ग्लास भरकर दवा दी, फिर जैसे ही तवा खाली हुआ, अगला पराठा डाल दिया।

आसपास सबकुछ ठीक लगता था। बस उसका मन नहीं।

अनाया का नाम तो सुंदर था, पर पिछले कुछ महीनों से उसे लगता था कि उसके नाम की तरह उसका मन अब किसी “आया” पर ठहरता नहीं—बस “ना-या” चलता रहता है।

उसकी शादी को छह साल हुए थे। वह एक निजी हॉस्पिटल में नर्स थी। शिफ्ट कभी सुबह होती, कभी शाम और कभी रात। उसके पति विवेक सरकारी दफ्तर में थे—ठीक-ठाक तनख्वाह, स्थिर नौकरी, और दुनिया की नजर में “सेट” जिंदगी।

विवेक की माँ शकुंतला देवी घर की धुरी थीं। धुरी जैसी ही—जहां चाहें घुमा दें। पिता जी, यानी गंगाधर जी, अधिक बोलते नहीं थे, पर मौन भी कभी-कभी डांट बनकर गिरता है, यह अनाया ने सीखा था।

घर में एक देवर भी था—सुमित, जो प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करता था और “मेहनत” पर रोज़ भाषण देता था। छोटी ननद ऋचा कॉलेज में थी और उसके लिए घर में “स्ट्रेस” एक बहुत बड़ा विषय था—इतना बड़ा कि उससे बर्तन धोना, कमरे की सफाई करना, कपड़े समेटना, सब “मेंटल हेल्थ” के खिलाफ लगता था।

आज सुबह अचानक सब लोग इकट्ठा थे। और इकट्ठे ऐसे, जैसे कोई “आपात बैठक” हो।

अनाया ट्रे में चाय के कप रखकर बाहर लाई तो आवाजें धीमी हो गईं। उसकी उपस्थिति से नहीं—उसके हाथ में चाय होने से।

“यहाँ रख दो,” शकुंतला देवी ने बिना देखे कहा।

अनाया ने चाय रखी और लौटने लगी तो विवेक की आवाज़ आई, “रुको। बैठो। बात करनी है।”

वह पलभर को ठिठकी। उसके मन में पहला विचार आया—“आज मेरी शिफ्ट है, मुझे निकलना है।” दूसरा विचार—“अगर अभी नहीं बैठी, तो इसे भी अपराध बना देंगे।”

वह कुर्सी के किनारे बैठ गई, जैसे किसी की जगह पर कब्जा करने आ गई हो।

शकुंतला देवी ने गला साफ किया, “देखो अनाया, हम तुम्हारे खिलाफ नहीं हैं। पर घर भी कोई चीज़ होती है। हम सबके रूटीन होते हैं। तुम समय पर काम नहीं करती।”

अनाया ने अपनी उंगलियाँ एक-दूसरे में फँसा लीं, ताकि वे कांप न जाएँ।

“कल रात को गैस बंद करना भूल गई थी,” ऋचा तुरंत बोली। “अगर मैं न देखती, तो पता नहीं क्या हो जाता।”

“और मेरे नोट्स?” सुमित ने बात उछाली, “मैंने टेबल पर रखे थे, उन पर पानी गिरा दिया। मेरी तैयारी का नुकसान हुआ।”

“दवा…” शकुंतला देवी ने आँखें सिकोड़ लीं, “मेरी थायरॉइड की दवा सुबह सात बजे होती है। तुमने आठ बजे दी। फिर दवा का क्या मतलब?”

विवेक ने हथेली उठाकर जैसे पंच लाइन रखी, “और सबसे बड़ी बात—तुम्हारा रवैया। तुम जवाब देने लगी हो। पहले नहीं थी ऐसी।”

अनाया की पलकें भारी होने लगीं। उसे लगा जैसे हर आरोप की ईंट उसकी छाती पर रखी जा रही है और वह सांस लेने के लिए जगह खोज रही है।

“हमने सोचा,” विवेक ने ड्रॉइंग रूम की तरफ देखा, जहां उसकी बड़ी बहन-सी रिश्तेदार, यानी उसकी जेठानी भी बैठी थी, “आज सबके सामने बात हो जाए। ताकि कोई यह न कहे कि हम पीछे से कुछ कर रहे हैं।”

अनाया का मन एक पल को हँसा—“वाह, पारदर्शिता!”

और उसी पल उसे याद आया कि उसने अपने मायके से किसी को नहीं बुलाया। न माँ, न पिता, न भाई। सिर्फ क्योंकि वह नहीं चाहती थी कि उसके घर की बातें बाहर जाएँ। लेकिन आज उसके घर की बात उसके ही घर में अदालत बन चुकी थी।

“अब बोलो,” विवेक ने कहा।

अनाया ने सामने रखा पानी का गिलास उठाया। हाथ थोड़े काँपे। उसने गिलास रखा और बहुत धीरे से कहा, “मैं अपनी बात कहूँ?”

“कहो,” शकुंतला देवी ने सिर हिलाया, “पर बहाने मत बनाना।”

बहाने… यह शब्द उसे ऐसा लगा जैसे उसने कोई अपराध किया है और अब सफाई दे रही है।

अनाया ने आँखें उठाईं। पहली बार उसने सबके चेहरों पर ध्यान से देखा। माँ की शिकायती कठोरता, देवर का श्रेष्ठता-भरा चेहरा, ननद का अधिकार, पति की “न्यायाधीश” मुद्रा—और बीच में वह, जो हर सुबह सबसे पहले उठती थी और हर रात सबसे आखिरी सोती थी।

“मैं बहाने नहीं बनाऊँगी,” उसने कहा। “मैं बस सच बोलूँगी।”

कमरे में अजीब-सी चुप्पी उतर गई।

“आप कहते हैं मैं समय पर काम नहीं करती,” अनाया ने शांत स्वर में कहा, “पर किस काम का समय? किसका समय? मेरा समय तो कहीं लिखा ही नहीं है।”

“क्या मतलब?” विवेक ने भौंहें चढ़ाईं।

“मतलब,” अनाया ने धीरे से सांस ली, “मेरी ड्यूटी का टाइम तय है, पर घर का टाइम नहीं। हॉस्पिटल में मरीज की हालत खराब हो जाए तो मैं खाना नहीं खाती, पानी नहीं पीती। वहाँ गलती हो जाए तो जान जा सकती है। और घर में… घर में गलती हो जाए तो मुझे इंसान नहीं, मशीन माना जाता है।”

ऋचा ने तिलमिलाकर कहा, “तो हम क्या करें? हम भी तो घर में हैं!”

अनाया ने उसकी तरफ देखा, “आप घर में हैं, बहन जी। मैं भी घर में हूँ। फर्क यह है कि आप घर में रहती हैं, और मैं घर को ढोती हूँ।”

शकुंतला देवी का चेहरा लाल पड़ गया, “बदतमीज़ी…”

“नहीं मम्मी जी,” अनाया ने बात काटी नहीं, बस पकड़ ली। “बदतमीज़ी नहीं। यह उस चुप्पी की आवाज़ है जो सालों से भीतर जमा थी।”

सुमित ने व्यंग्य किया, “अच्छा, अब हम सब गलत हैं और आप सही?”

अनाया ने बिना गुस्सा किए कहा, “गलत सही की बात नहीं है। बात जिम्मेदारी की है।”

उसने उंगलियों पर गिनना शुरू किया, जैसे नर्स वार्ड में डोज़ लिखती है—

“सुबह बच्चों की यूनिफॉर्म…
उनका टिफिन…
पापा जी की चाय—जो बिना अदरक के बनती है…
मम्मी जी का नाश्ता—जो बिना तेल के बनता है…
विवेक का लंच—जो ‘टाइम से’ पैक होना चाहिए…
और फिर मेरी शिफ्ट…
शिफ्ट से आकर दाल… सब्ज़ी… होमवर्क… कपड़े…
और बीच-बीच में आप सबके ताने—जो फ्री में मिलते हैं।”

विवेक ने धीमे से कहा, “पर तुम हिसाब क्यों नहीं देती? सैलरी का…”

अनाया की आँखों में चमक आई—आंसू वाली नहीं, आग वाली।

“सैलरी का हिसाब?” उसने दोहराया। “ठीक है। मैं हिसाब देती हूँ।”

वह उठी, रसोई की तरफ गई, अलमारी से एक डायरी उठाई और वापस आकर टेबल पर रख दी।

“यह डायरी मेरे खर्चों की नहीं,” उसने कहा, “मेरी बचाई हुई चीज़ों की है।”

सब चौंक गए।

“जब आपकी सरकारी नौकरी में तीन महीने सैलरी लेट हुई थी, तब घर का राशन मैंने चलाया।
जब सुमित की कोचिंग फीस बढ़ी, तब मैंने अपनी नई साड़ी नहीं खरीदी।
जब ऋचा को नया फोन चाहिए था, तो मैंने अपनी शिफ्ट बढ़ाई।
जब आप सबने कहा कि ‘घर का लोन जल्दी निपटाओ’, तो मैंने हर महीने अपनी सैलरी का बड़ा हिस्सा उस लोन में डाल दिया।”

उसने डायरी खोली, पन्ने पलटे।
“और फिर भी,” उसने धीमे स्वर में कहा, “आज मेरी प्राथमिकता तय करने के लिए मीटिंग है?”

शकुंतला देवी कुछ बोलना चाहती थीं, पर शब्द उनके होंठों तक आते-आते रुक गए।

अनाया ने आगे कहा, “आप सबकी शिकायतें मैं सुन रही हूँ। पर आज मैं भी एक शिकायत करना चाहती हूँ।”

विवेक ने तंज किया, “अब हमें भी सुनाओ।”

“हाँ,” अनाया ने सिर हिलाया। “आप सब मेरे खिलाफ शिकायत रखते हैं—यह ठीक है। पर कोई मेरे पक्ष में जिम्मेदारी क्यों नहीं रखता?”

उसने सबके चेहरे देखे।

“जब मैं रात की ड्यूटी से आती हूँ, तो कोई नहीं कहता—‘सो जाओ, मैं बच्चों को स्कूल छोड़ दूँगा।’
जब मेरा बीपी गिरता है, तो कोई नहीं कहता—‘आज तुम आराम करो, खाना मैं बना लूँगा।’
जब मैं कहती हूँ कि मैं थक गई हूँ, तो जवाब मिलता है—‘हर कोई थकता है।’”

उसका गला भर आया, पर उसने आवाज़ नहीं तोड़ी।
“थकान सबकी होती है, पर सम्मान सबको नहीं मिलता।”

कमरे में एक लंबी चुप्पी फैल गई। वह चुप्पी पहली बार अनाया के लिए भारी नहीं थी। वह चुप्पी उसकी बातों को जगह दे रही थी।

फिर उसने बहुत साफ़ कहा, “अब मेरी प्राथमिकता बदलेगी।”

विवेक ने धीरे से पूछा, “कैसे?”

अनाया ने शांत स्वर में जवाब दिया, “मेरी प्राथमिकता मेरा स्वास्थ्य होगा। मेरे बच्चों का समय होगा। मेरा स्वाभिमान होगा। मैं घर के काम करूंगी, पर नौकरी की तरह नहीं। मैं सेवा करूंगी, पर गुलामी की तरह नहीं। और अगर किसी को मेरी आवाज़ ‘जवाब’ लगे, तो समझ लेना—अब मैं डरकर नहीं जीऊँगी।”

ऋचा ने धीरे से कहा, “तो… आप क्या चाहती हो?”

अनाया ने उसकी तरफ नरमी से देखा, “मैं चाहती हूँ कि घर ‘घर’ बने। सिर्फ मेरे लिए नहीं, सबके लिए।”

उसने शकुंतला देवी की तरफ देखा, “मम्मी जी, आपको दवा समय पर चाहिए—मैं दूँगी। पर अगर मैं शिफ्ट में हूँ, तो आप खुद भी अलार्म लगा सकती हैं। मैं आपकी बेटी नहीं, पर आपकी बहू हूँ—मेरी भी सीमाएँ हैं।”

सुमित की ओर देखकर बोली, “भैया, आपके नोट्स की जिम्मेदारी आपकी है। मैं आपका कमरा साफ़ करूँगी, पर चीज़ें संभालना आपको भी सीखना होगा।”

विवेक के सामने उसकी आवाज़ थोड़ी रुकी, फिर स्थिर हो गई, “और विवेक… अगर तुम मेरे पति हो, तो मेरा साथ भी तुम्हारी जिम्मेदारी है। सिर्फ मेरे काम की समीक्षा नहीं।”

विवेक पहली बार असहज हो गया। उसने नजरें झुका लीं।

तभी पापा जी, जो अब तक चुप थे, पहली बार बोले। उनकी आवाज़ धीमी थी, पर असरदार।
“बहू… आज तुमने ठीक कहा।”

शकुंतला देवी ने तुरंत कहा, “आप भी इसकी तरफदारी करेंगे?”

गंगाधर जी ने शांत होकर जवाब दिया, “यह तरफदारी नहीं है। यह सच है। हम सब बहू से काम लेते रहे, पर बहू की थकान नहीं देखी।”

शकुंतला देवी कुछ बोलने के लिए होंठ खोल ही रही थीं, पर फिर उन्होंने चाय के कप की तरफ देखा। चाय ठंडी हो चुकी थी।

उसी ठंडे कप के साथ जैसे कमरे का तापमान भी बदल गया। शिकायतों की गर्मी उतरने लगी थी।

अनाया उठी। उसने अपनी डायरी बंद की, ट्रे उठाई और रसोई की तरफ बढ़ गई। इस बार उसकी चाल में झुकाव नहीं था। वह सीधी चल रही थी—अपने लिए भी।

रसोई में आकर उसने खुद के लिए एक कप चाय बनाई। पहली बार, बिना किसी से पूछे।

चाय की पहली चुस्की लेते हुए उसने महसूस किया—आज घर में मीटिंग हुई थी, पर फैसला उसका था।
और फैसले के बाद जो सुकून आया था, वह किसी जीत से कम नहीं था।

उसी वक्त बाहर से विवेक की धीमी आवाज़ आई, “अनाया… एक मिनट…”

उसने पलटकर देखा। विवेक दरवाज़े पर खड़ा था, आवाज़ में वह कठोरता नहीं थी।
“आज… शायद हम गलत थे,” वह बस इतना ही कह पाया।

अनाया ने कोई बड़ा भाषण नहीं दिया। वह सिर्फ मुस्कुरा दी।
क्योंकि कुछ बदलावों की शुरुआत लंबे संवाद से नहीं होती—
एक स्वीकारोक्ति से होती है।


Comments

Popular posts from this blog

दामाज बेटा बन जाता है पर बहू पराये घर की रहती है

  "अरे भाईसाहब (ननदोई) इतनी सुबह सुबह ?" "मम्मी पापा ने बुलाया था.कुछ जरूरी काम है." प्रमोद ने रश्मि को रूखा सा उत्तर दिया. "आ गये बेटे. बहू खड़े खड़े क्या बातें कर रही हो जाओ चाय बना लाओ." "जी मम्मी जी" रश्मि चाय बनाते हुए सोच रही थी ऐसी क्या बात हो सकती है जो भाईसाहब को सुबह बुलाया.कल रात उसे सास ससुर के कमरे से खुसुरफुसुर की आवाजें आ रही थी.मन में उठी किसी अनहोनी की आशंका को झटक कर वह चाय ले कर ड्रॉइंग रूम में गई. "बहू नाश्ता जल्दी बना देना.हमें काम से जाना है." "मम्मी जी कहाँ जाना है ?" "आकर बताते है तुम नाश्ते की तैयारी करो." रश्मि ने सास ससुर और प्रमोद को नाश्ता दिया.कुछ देर में तीनो तैयार हो कर चले गये और रश्मि घर के काम निपटाने लगी. ये थी रश्मि. शर्मा परिवार की इकलौती बहू.रश्मि की शादी रूपेश से हुए एक साल हो गया था.रूपेश की एक बड़ी शादीशुदा बहन कंचन और एक छोटी बहन काजल  जो कॉलेज में पढ़ती है.रूपेश दूसरे शहर में नौकरी करता था.उसकी इच्छा थी कि रश्मि  मम्मी पापा की देखभाल के लिए उनके साथ रहे.रश्मि ने भी रूपेश की इच्...

घर के लक्ष्मी का सम्मान

  "रवि... सुनिए ना... मुझे आपसे कुछ ज़रूरी बात करनी थी। वो मेरे पैरों में बहुत सूजन आ रही है और कमर में भी..." सुमन ने रात के सन्नाटे में, करवट बदलते हुए अपने पति रवि से कहने की कोशिश की। उसकी आवाज़ में एक दबी हुई कराह थी। रवि ने झल्लाहट में अपनी आँखों से बांह हटाई और मोबाइल की स्क्रीन पर समय देखा। रात के साढ़े ग्यारह बज रहे थे। "सुमन, प्लीज यार! अभी ऑफिस की टेंशन कम नहीं है जो तुम घर की रामायण शुरू कर देती हो? सुबह से शाम तक घर पर रहती हो, आराम ही तो करती हो। माँ बता रही थीं कि आजकल तुम दोपहर में दो-तीन घंटे सोती हो। फिर भी थकान? और ये पैरों में सूजन वूजन सब वहम है, थोड़ा वॉक किया करो। अब सोने दो, कल मेरी बहुत बड़ी प्रेजेंटेशन है।" रवि ने कंबल मुंह तक खींच लिया और दूसरी तरफ करवट ले ली। सुमन की आँखों में आए आंसू अँधेरे में ही जज़्ब हो गए। वह क्या बताती कि जिसे उसकी सास 'दोपहर की नींद' कहती हैं, वह असल में छत पर पापड़ और अचार सुखाने की चिलचिलाती धूप वाली मेहनत होती है। रवि को सच सुनना ही नहीं था, क्योंकि उसके लिए माँ का कहा पत्थर की लकीर था। सुमन ने चुपचाप एक दर्द न...

हकीकत

  सुमन के हाथों से शादी की मेहंदी भी नहीं उतरी थी कि उसके साथ सुधा जी ने उसे पूरी तरह से काम में झोंक दिया। सुबह से शाम हो जाती, लेकिन सुधा जी के काम तो मानो पूरे ही नहीं होते थे। जैसे ही सुमन आराम करने के लिए अपने कमरे में जाती, वैसे ही सुधा जी कहतीं, "बहू, जरा मेरे सिर में तेल की मालिश कर दो" या "कपड़े प्रेस कर दो"। कोई न कोई बहाना बनाकर पहले से ही तैयार रखतीं। सुमन कुछ भी नहीं बोल पाती और झट से काम पर लग जाती—आखिर नई-नई बहू जो ठहरी! सुमन के पति रोहित दूसरे शहर में नौकरी करते थे। शादी के लिए भी कम ही छुट्टियाँ मिली थीं, इसलिए शादी के आठ दिन बाद ही अपने काम पर लौट गए। तभी एक दिन… "अरे बहू, कब तक सोती रहेगी? कितना समय हो गया है, आज तुम्हारे ससुर जी ऑफिस के लिए भी निकल गए और तूने चाय तक नहीं बनाई। आगे से ध्यान रखना, समझ गई? ठीक चार बजे उठ जाना, क्योंकि तेरे ससुर जी सुबह छह बजे ही निकल जाते हैं। बहुएं तो काम के लिए ही तो लाई जाती हैं, एक लौटी बहू हो, नहीं बताएंगे तो कैसे सीखोगी? बड़े-बूढ़ों की कदर करना सीखो," सुधा जी नसीहत देतीं। "मुझसे गलती हो गई मांजी...