बारिश की हल्की फुहारें पड़ रही थीं। सुबह का समय था और सोसायटी के गार्ड रूम के सामने पानी की छोटी-छोटी धाराएँ बन रही थीं। शालू मेहता ने खिड़की से देखा तो एक दुबली-सी लड़की गेट के पास खड़ी थी—कपड़े पुराने थे, बाल बिखरे हुए, पर आँखों में एक अजीब-सी दृढ़ता थी। उसकी पीठ पर कपड़े में बंधा एक नन्हा-सा बच्चा था, जो शायद अभी कुछ ही दिनों का रहा होगा। बच्चा नींद में भी रोने जैसा चेहरा बना रहा था, मानो दुनिया की ठंडक उसके भीतर उतर रही हो।
शालू ने दरवाज़ा खोलकर पूछा, “किससे मिलना है?”
लड़की ने हाथ जोड़ दिए। “मैडम… मेरा नाम गीता है। मुझे… काम चाहिए।”
शालू का चेहरा पहले तो सख्त हुआ। अपार्टमेंट में रोज़ कोई न कोई मदद मांगने आ जाता था। उसने ऊँचे स्वर में कह दिया, “काम? इतने सुबह? और ये बच्चा… किसका है? कहीं से उठा तो नहीं लाई?”
गीता की आँखें चमक गईं, जैसे अपमान का तीर लगा हो, पर उसने आवाज़ गिराकर कहा, “मैडम, ये मेरा बेटा है। मैं कोई चोरी-चकारी नहीं करती। बस… घर से भागी हूँ।”
“क्यों?” शालू ने बिना नरमी के पूछा, पर भीतर कहीं जिज्ञासा जाग चुकी थी।
“क्योंकि… मैं वहीं रहती तो मैं मर जाती,” गीता ने धीरे से कहा। फिर जैसे अपने शब्दों को पकड़कर आगे बढ़ाती गई, “मुझे दया नहीं चाहिए। बस काम चाहिए। मैं खाना बना लेती हूँ, साफ-सफाई कर लेती हूँ, बच्चों को पढ़ा भी सकती हूँ। बस… कुछ ऐसा दे दीजिए जिससे मैं अपने बच्चे को ज़िंदा रख सकूँ।”
शालू के भीतर कुछ हिला। उसका अपना घर बड़ा था, सुविधाओं से भरा, पर पिछले कई महीनों से उसमें एक खालीपन पसरा रहता था। पति विदेश में, बेटा हॉस्टल में, और वह खुद अपने एनजीओ की मीटिंग्स में उलझी। उसने गीता को ऊपर-नीचे देखा। लड़की थकी हुई थी, लेकिन उसके शब्दों में भीख की गंध नहीं थी—इज्जत की मांग थी।
“ठीक है,” शालू ने लंबी सांस लेकर कहा। “अभी अंदर आओ। पहले बच्चे को कुछ गर्म दूध दिलवाती हूँ। फिर बात करेंगे।”
गीता की आंखों में राहत उतर आई। वह भीतर आई तो शालू ने उसे किचन के पास वाले छोटे कमरे में बैठा दिया, गरम पानी और बिस्कुट रख दिए। बच्चा जागा, कमजोर-सी आवाज़ में रोया। गीता ने उसे सीने से लगाया, जैसे दुनिया के हर शोर को अपने शरीर से रोक देना चाहती हो।
“कहाँ से आई हो?” शालू ने पूछा।
गीता ने नजरें उठाईं। “पास के ही… हरदोई तरफ़ का एक गाँव है। मेरे मायके से नहीं, ससुराल से भागी हूँ।”
शालू ने चौंककर कहा, “ससुराल छोड़कर? पति…?”
गीता ने होंठ काटे। “पति है। पर… पति होने से क्या होता है, मैडम, जब इंसान की सोच नहीं होती।”
शालू कुछ कह न पाई। गीता ने कहानी जैसे बोझ की तरह उतारी। वह किसी बड़े किसान परिवार में ब्याही गई थी। घर में पैसे की कमी नहीं थी, पर औरत की आवाज़ की कीमत नहीं थी। शादी के बाद जब उसे पता चला कि वह गर्भवती है, तो घर में “वारिस” के नाम पर खुशी मनाई गई। हर दवा, हर फल, हर पूजा—सब हुआ। मगर बच्चे के जन्म के बाद जब दाई ने कहा, “लड़का नहीं… बेटी है,” तो खुशी एक पल में ठंडी राख बन गई। उसी रात घर के पुरुषों ने तय किया कि बच्ची “कमज़ोर पैदा हुई” बताकर दफना दी जाएगी। गीता ने रो-रोकर हाथ जोड़े, पर किसी ने नहीं सुना। उसने मौका देखकर बच्ची को लेकर भागने की कोशिश की, पर लोग जाग गए। धक्का-मुक्की हुई, गीता गिर पड़ी, और उसी अफरातफरी में बच्ची की सांस रुक गई।
कहते-कहते गीता की आवाज़ टूट गई। “मैडम, मैं उस दिन पागल हो गई थी। मुझे लगा मैं भी मर जाऊँ। पर फिर… कुछ महीनों बाद… पता चला कि मैं फिर से माँ बनने वाली हूँ। मैं डर गई। मैंने अपने पेट पर हाथ रखकर कहा—‘इस बार मैं किसी को नहीं छीनने दूँगी।’”
शालू ने धीमे से पूछा, “फिर?”
गीता ने आंखें पोंछीं। “इस बार बेटा हुआ। पर मेरे घरवालों ने कहा—‘अब ये बेटा हमारा है।’ मुझे कहा गया कि मैं उसे दूध पिलाकर अलग हो जाऊँ। क्योंकि… मेरे मायके में दहेज नहीं था, मेरी औकात नहीं थी। मैडम, मुझे अपने ही बच्चे से दूर किया जा रहा था। मैं रात में चुपचाप निकली और बस पकड़कर यहाँ आ गई। मैं चाहती हूँ मेरा बेटा किसी ‘वारिस’ की तरह नहीं, इंसान की तरह बड़ा हो।”
शालू के गले में कुछ अटक गया। यह कहानी पहले वाली जैसी नहीं थी। इसमें बेटी बची नहीं, बेटे को बचाना था—पर असल में बचाना था माँ का अधिकार, उसका अस्तित्व। शालू ने गीता को उसी दिन काम पर रख लिया। उसे घर के पीछे बने स्टोर रूम से लगा एक छोटा सा कमरा दिया, जहाँ खिड़की से धूप आती थी। और सबसे ज़रूरी—उससे कहा, “यहाँ तुम और तुम्हारा बच्चा सुरक्षित हो।”
गीता ने अगले ही दिन से काम शुरू कर दिया। वह फुर्तीली थी, पर काम में जल्दबाज़ नहीं। सब चीज़ें सलीके से करती—सब्ज़ी काटते वक्त भी हाथ की गति में अनुशासन होता। शालू को वह अच्छी लगी, लेकिन एक बात वह रोज़ नोटिस करती—रात के ग्यारह बजे तक गीता के कमरे में लाइट जलती रहती। कभी-कभी शालू छत से लौटते हुए उस खिड़की के पास से गुजरती तो भीतर से पन्ने पलटने की आवाज़ आती।
एक रात शालू ने खुद को रोक नहीं पाया। वह चुपचाप कमरे के पास पहुँची और हल्की दस्तक दे दी। गीता ने दरवाज़ा खोला तो घबरा गई। “मैडम, कुछ चाहिए?”
“नहीं,” शालू ने भीतर झाँकते हुए कहा, “बस… मैं देख रही थी कि तुम देर तक जागती रहती हो। क्या कर रही थीं?”
गीता ने एक पल को छुपाने की कोशिश की, फिर हारकर बोली, “मैडम, मैं पढ़ रही थी।”
शालू की नजर टेबल पर रखी किताबों पर गई—वो कोई कहानी की किताबें नहीं थीं। मोटी-मोटी नोटबुक, पुराने पेपर, और एक गाइड बुक—“UPSC/State PSC – General Studies.” साथ में एक लैपटॉप, जिसकी स्क्रीन पर अंग्रेजी के कुछ पैराग्राफ खुले थे।
शालू हैरान रह गई। “तुम… ये सब?”
गीता ने सिर झुका लिया। “मैडम, मैं बी.एड. कर चुकी हूँ। गांव के स्कूल में पढ़ाती थी। फिर शादी हो गई। पढ़ाई और नौकरी—सब बंद। लेकिन मैं… कोशिश करती रही। यहाँ आकर लगा कि अब फिर से शुरू कर सकती हूँ। मैं रात में पढ़ती हूँ क्योंकि दिन में काम होता है।”
शालू ने कुर्सी खींचकर बैठते हुए कहा, “तुमने मुझे पहले क्यों नहीं बताया?”
गीता का स्वर बहुत शांत था। “मैडम, मैंने काम माँगा था। अपनी डिग्री नहीं। मुझे लगा पहले भरोसा बनाऊँ, फिर… बात करूँ।”
उस रात शालू देर तक सोचती रही। अगले दिन उसने अपने एक परिचित से बात की और गीता का इंटरव्यू शहर के एक अच्छे प्राइवेट स्कूल में तय करवा दिया। जब गीता को पता चला, उसकी आँखों में बरसों बाद चमक आई। वह नौकरी पर लग गई—दिन में स्कूल, शाम को शालू के घर का हल्का काम, और रात में पढ़ाई। बच्चा—नमन—धीरे-धीरे बड़ा होने लगा। शालू ने उसके लिए एक क्रेच की व्यवस्था कर दी।
समय गुजरता गया। गीता की आवाज़ में आत्मविश्वास लौट आया। वह बच्चे को गोद में लेकर नहीं, स्ट्रोलर में धकेलकर निकलने लगी। और शालू के घर में भी एक नया रंग घुल गया—बातचीत का, अपनापन का। शालू को लगता जैसे उसके सूने घर में किसी ने रोज़ एक दीया जला दिया हो।
फिर एक दिन स्कूल में हादसा हुआ। नमन खेलते-खेलते गिर गया और उसके सिर में चोट लग गई। खून बहने लगा। गीता घबरा गई। शालू ने बिना देर किए ड्राइवर से कहा—“अस्पताल!”
हॉस्पिटल की इमरजेंसी में अफरा-तफरी थी। डॉक्टरों ने कहा, “ब्लड लॉस ज्यादा है। हमें तुरंत ब्लड चाहिए, पर बच्चे का ग्रुप रेयर है। अभी उपलब्ध नहीं।”
गीता का चेहरा सफेद पड़ गया। “मेरा बच्चा… कुछ नहीं होगा न?”
शालू ने डॉक्टर से पूछा, “कोई और तरीका?”
डॉक्टर ने कहा, “अगर किसी का ब्लड ग्रुप मैच कर जाए तो तुरंत ट्रांसफ्यूजन हो सकता है।”
गीता काँपती उंगलियों से रिपोर्ट देख रही थी। तभी उसकी आँखों में जैसे बिजली चमकी। “मैडम… मेरा भी यही ब्लड ग्रुप है!” वह पल भर में तैयार हो गई। “मेरे से ले लीजिए।”
शालू ने उसे रोका, “तुम कमजोर हो, गीता—”
“मैडम, ये मेरा बच्चा है,” गीता ने दृढ़ता से कहा। “मैं कमजोर नहीं हूँ।”
उसने ब्लड डोनेट किया। नमन की हालत स्थिर होने लगी। गीता बेड के पास बैठकर उसके माथे पर हाथ फेरती रही। शालू को उस दृश्य में माँ की वह ताकत दिख रही थी जो किसी बड़े घर की दीवारों से नहीं आती—सिर्फ़ दिल से आती है।
कुछ देर बाद एक व्यक्ति इमरजेंसी के बाहर खड़ा दिखा। उम्र करीब पचास के आसपास, कपड़े कीमती, चेहरे पर थकान। वह रिसेप्शन पर कुछ पूछ रहा था। फिर उसकी नजर गीता पर पड़ी। वह ठिठक गया—जैसे किसी ने उसे जमीन में गाड़ दिया हो। उसकी आँखें फैल गईं, गला सूख गया। वह दो कदम आगे आया, फिर वापस पीछे हट गया।
शालू ने यह सब देखा। उसकी नजर उस आदमी के चेहरे पर गई—वो चेहरा गीता की आँखों से मिलता था। वही नाक की बनावट, वही भौंहों की लकीर। शालू का मन अचानक सन्न हो गया।
गीता ने भी उसे देख लिया। उसकी आंखें कुछ सेकंड ठहर गईं। फिर वह उठी और नमन के बेड के सामने खड़ी हो गई, जैसे बच्चे को ढाल बनाकर अपनी दुनिया बचा रही हो। आदमी ने भर्राई आवाज़ में कहा, “गीता…?”
गीता ने कोई जवाब नहीं दिया। बस उसकी आंखें सख्त होती गईं।
“ये… मेरा बेटा है?” आदमी के शब्द काँप रहे थे।
गीता ने धीमे, पर साफ़ कहा, “आपका नहीं। मेरा।”
“पर… मैं—”
“आप कौन?” गीता ने एकदम ठंडे स्वर में पूछा, जैसे उसने वर्षों के रिश्ते को एक शब्द में काट दिया हो।
आदमी का चेहरा तमतमा गया। “मैं… मैं नमन का पिता हूँ। मैं… तुम चली गई थी। घर में बवाल हुआ था। मैंने ढूंढा… पर…”
गीता ने उसकी बात बीच में ही रोक दी। “उस दिन जब मेरा अधिकार छीना जा रहा था, तब आपने क्या किया था? तब आप कहाँ थे, जब मुझे कहा गया था कि बेटा आपका है और मैं… सिर्फ दूध देने वाली मशीन हूँ?”
आदमी चुप हो गया। उसके भीतर कुछ टूट रहा था।
“मैंने अपने बच्चे को बचाने के लिए घर छोड़ा,” गीता बोली। “आपने घर नहीं छोड़ा। आपने सुविधा नहीं छोड़ी। और अब जब आपका बेटा एक पल के लिए खतरे में आया, तो आप ‘पिता’ बनकर आ गए?”
आदमी की आंखों में पानी भर आया। “गीता, मैं गलत था। पर… मैं उसे देखना चाहता हूँ। बस एक बार।”
गीता ने नमन के माथे को देखा। बच्चा अब सो रहा था। फिर उसने बहुत धीरे से कहा, “देख लीजिए।” उसके स्वर में दया नहीं थी, सिर्फ़ नियम था। “पर याद रखिए—ये मुलाकात आपके प्रायश्चित की शुरुआत हो सकती है, मेरे जीवन की नहीं। मेरे जीवन में आपको जगह चाहिए तो पहले… अपनी गलती का सामना कीजिए। अदालत में। कागज़ पर। जिम्मेदारी में।”
शालू की सांस रुकी हुई थी। उसने महसूस किया कि यह किसी फिल्म का दृश्य नहीं, असल जिंदगी की लड़ाई है—जहाँ एक औरत को अपने ही बच्चे के लिए भी सबूत देना पड़ता है कि वह माँ है।
आदमी रो पड़ा। वह कुछ कह नहीं पाया। बस बाहर निकलते हुए उसने शालू की तरफ देखा—मानो मदद मांग रहा हो। शालू ने शांत होकर कहा, “अगर सच में बदलना है, तो दिखाइए। वर्ना यहाँ खड़े होकर रोना… सिर्फ़ आपके अपराध को हल्का करेगा, उसका दर्द नहीं।”
कुछ दिन बाद गीता ने केस फाइल किया। बच्चे की कस्टडी, गुज़ारा भत्ता, और अपनी सुरक्षा—सब कुछ कानूनी तरीके से। शालू उसके साथ हर पेशी में गई। लोग बात बनाते, सोसायटी में फुसफुसाहट होती, पर शालू ने पहली बार महसूस किया कि समाज की फुसफुसाहटें हमेशा सच नहीं होतीं—कभी-कभी वे सिर्फ़ डर होती हैं, जो किसी और की हिम्मत देखकर जाग जाती है।
एक साल बाद गीता का चयन शिक्षा विभाग की परीक्षा में हो गया। वह सरकारी स्कूल की स्थायी टीचर बन गई। नमन अब बोलने लगा था। वह शालू को “शालू आंटी” नहीं, “मोटी मम्मी” कहकर पुकारता—क्योंकि उसके लिए शालू भी माँ का ही एक रूप थी, जिसने बिना जन्म दिए उसे बचाया था।
जिस दिन गीता की नियुक्ति का पत्र आया, शालू ने उसके कमरे की उसी मेज पर रखा ताबीज़ नहीं, बल्कि एक छोटा सा पौधा रख दिया। “ये तुम्हारी नई शुरुआत का प्रतीक है,” शालू ने कहा।
गीता ने पौधे को छूकर आँखें बंद कर लीं। “मैडम… आप ना होतीं…”
शालू ने उसके कंधे पर हाथ रखा। “मैं सिर्फ़ दरवाज़ा थी। चलना तुमने चुना।”
रात को शालू ने अपनी बालकनी से देखा—गीता अपने कमरे में बैठी नमन को कहानी सुना रही थी। नमन हँस रहा था। उस हँसी में कोई डर नहीं था, कोई छुपाव नहीं था। बस एक सुरक्षित बचपन था—जो कई बार पैसे से नहीं, सही समय पर खुले दरवाज़े से मिलता है।
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