कमरे के कोने में रखी पुरानी अलमारी के शीशे में अपना चेहरा देखते हुए शैलजा ने चुपचाप बाल बाँध लिए। माथे की बीच वाली लट आज कुछ ज्यादा ही जिद्दी थी; बार-बार आँखों पर गिरती, और वह उसे झुंझलाकर पीछे कर देती। उसकी यह छोटी-सी झुंझलाहट भी उसे बेवजह भारी लग रही थी। पिछले कुछ हफ्तों से वह हर बात पर जल्दी चिढ़ जाती थी—कभी पानी का ग्लास उल्टा रह जाए, कभी टीवी का वॉल्यूम तेज हो जाए, कभी कोई बिना बताए उसके कमरे में घुस जाए। और सबसे ज्यादा… जब किसी की नजर उसके होने पर पड़ती ही नहीं।
आँगन में हल्की धूप उतर रही थी। दादीजी की कुर्सी हमेशा की तरह तुलसी के पास थी, पर दादीजी अब थीं नहीं। उनके जाने के बाद घर में जगहें थीं, पर आवाजें कम हो गई थीं। और आवाजों के कम होने से कहीं ज़्यादा, शैलजा को अपना ‘अदृश्य’ होना चुभता था—जैसे वह घर का हिस्सा नहीं, किसी पुराने सामान की तरह हो, जिसे बस रख दिया गया हो।
वह रसोई में आई। भाभी—दीप्ति—गैस पर परांठे सेंक रही थी। उसके हाथों में फुर्ती थी, चेहरे पर थकान, मगर आँखों में वही तेज़ व्यावहारिक चमक, जो हर सुबह के साथ फिर से लौट आती थी। शैलजा ने सोचा, एक पल को भाभी से कह दे—“आज मेरा मन ठीक नहीं है”—पर शब्दों को अपने भीतर ही दबा लिया। इन दिनों बात कहना भी जोखिम लगता था; जवाब में कोई व्यंग्य, कोई उलटा सवाल या फिर वही जादुई वाक्य—“इतना क्यों सोचती हो?”—मिल जाता।
दीप्ति ने बिना देखे कहा, “चाय रखी है… गरम है, संभलकर।”
शैलजा ने “हूं” किया। फिर नल के पास जाकर पानी पिया। पानी गले से उतर गया, पर मन में अटका कुछ भी नहीं उतरा।
ड्राइंगरूम से हंसी की आवाज आई। उसका भतीजा—अर्पित—अपने पिता के साथ मोबाइल पर कोई वीडियो देख रहा था। उसके भाई—विक्रम—कभी बीच में कुछ बोलते, कभी हंसते, कभी दो उंगलियों से स्क्रीन आगे बढ़ा देते। शैलजा को देखकर भी उन्होंने बस सिर उठाकर “गुड मॉर्निंग” कहा और फिर उसी दुनिया में लौट गए।
शैलजा ने खुद को समझाया—“काम में होंगे, तनाव होगा, जिम्मेदारियाँ होंगी।”
पर मन ने तुरंत जवाब दिया—“और मेरा क्या? मेरा होना, मेरा दिन, मेरी सांसें… ये सब किस जिम्मेदारी में गिना जाता है?”
उसने कमरे में जाकर मोबाइल उठाया। स्क्रीन पर कोई नया मैसेज नहीं था। कोई “कैसी हो?” नहीं। कोई “आज जल्दी लौटेंगे” नहीं। कोई “चलो बाहर चलते हैं” नहीं। और सबसे बुरा—उसके भीतर जो एक तारीख का काँटा चुभ रहा था, उसका नाम किसी के होंठ पर नहीं था।
शैलजा ने कैलेंडर की तरफ देखा। तारीख लाल घेरे में नहीं थी, पर उसके मन में लाल हो चुकी थी—आज उसके नौकरी से रिटायर होने को ठीक एक साल हुआ था।
किसी ने उस दिन भी कुछ खास नहीं किया था। बस शाम को दीप्ति ने कहा था, “अब आराम करना, दीदी।” और विक्रम ने जोड़ा था, “अब टेंशन मत लेना, सब हम संभाल लेंगे।”
“हम संभाल लेंगे”—यह वाक्य सुनने में कितना अच्छा लगता था, और जीने में कितना खाली।
उसकी सहेली—रेवा—का फोन तब आया, जब शैलजा लगभग तय कर चुकी थी कि आज किसी से नहीं बोलेगी।
“ओए, आज खाली है क्या? मैं स्टेशन के पास आई हूँ, एक पुराना काम है… और तुझे भी मिलना था।”
शैलजा ने फोन कान से लगाए-लगाए ही आँखें बंद कर लीं। रेवा की आवाज़ में अपनापन था, लेकिन आज उसे अपनापन भी कम और औपचारिकता ज्यादा लग रही थी।
“तू क्यों आई है?” शैलजा ने तीखेपन से पूछा।
“अरे! क्या हुआ? तू इतनी रूखी क्यों है?”
“कुछ नहीं। मुझे बस… अकेला छोड़ दे।”
“छोड़ दूँ? वाह! ये तो भारी डायलॉग है। सुन, मैं सच में आ रही हूँ। तैयार रह। आधे घंटे में।”
रेवा ने फोन काट दिया। शैलजा ने मोबाइल पलंग पर पटक दिया, जैसे दोष उसी का हो। फिर शीशे में अपना चेहरा देखा। आँखें थोड़ी सूजी थीं। नाक के पास हल्का-सा लालपन था। वह खुद ही अपने चेहरे से चिढ़ गई—“इतनी भी कमज़ोर नहीं हूँ।”
वह तैयार होकर बाहर निकली। दीप्ति ने पूछा, “कहाँ जा रही हो?”
शैलजा ने बिना सोचे कह दिया, “जहाँ दिल करेगा।”
दीप्ति ने पल भर उसे देखा, फिर चुप रहकर परांठा पलट दिया।
उस चुप्पी ने शैलजा को और चुभा दिया, जैसे कोई कह रहा हो—“जाओ, हमें क्या।”
वह बाहर निकल गई। ऑटो में बैठी तो ऑटोवाले ने पूछा, “कहाँ, मैडम?”
उसने रेवा का पता बताया। रास्ते भर खिड़की से बाहर देखती रही। सड़कें भाग रही थीं, लोग भाग रहे थे, और उसे लगा—शायद वह भी भाग रही है, बस दिशा नहीं पता।
रेवा के घर पहुँचते ही उसने दरवाजा खोला और मुस्कुराई। “आ गई मैडम नाराज़गी!”
शैलजा ने अंदर कदम रखते ही जैसे अपने भीतर का गुबार उगल दिया।
“अब किसी को मेरी जरूरत नहीं है, रेवा। मैं बस… घर में एक खाली कुर्सी हूँ।”
रेवा ने उसकी ओर कुर्सी खिसकाई। “बैठ। पहले पानी पी। फिर बोल।”
शैलजा ने पानी लिया, घूंट भरा—और फिर जैसे बाँध टूट गया।
“मैंने पूरे पच्चीस साल नौकरी की। घर चलाया। विक्रम को पढ़ाया। उसकी शादी में अपनी जमा-पूंजी लगा दी। अर्पित की फीस… दीप्ति के मायके में कोई दिक्कत हो तो मदद… सब किया। कभी कहा नहीं। कभी जताया नहीं। और अब… मैं बस एक ‘फ्री’ इंसान हूँ—जिससे कोई पूछता तक नहीं कि उसका दिन कैसा है।”
रेवा ने उसे ध्यान से सुना। फिर बहुत साधारण-सी आवाज़ में बोली, “तू चाहती है वे लोग तुझे रोज़ धन्यवाद दें?”
“नहीं। बस… महसूस करें।”
“और तूने कभी उन्हें बताया कि तू क्या महसूस करती है?”
शैलजा चुप हो गई।
“देख,” रेवा ने धीमे से कहा, “लोग अक्सर जो देख रहे होते हैं, उसी को सच मान लेते हैं। तू घर में चुपचाप रहती है, काम में हाथ बँटा देती है, शिकायत नहीं करती… तो वे सोचते हैं—दीदी ठीक हैं। तू ठीक दिखती है, तो वे मान लेते हैं—तू सच में ठीक है।”
शैलजा ने कड़वाहट से हँस दिया। “मतलब, मैं दुखी हूँ—ये भी मुझे ही बताना पड़ेगा।”
रेवा ने उसकी हँसी के बीच अपना हाथ उसके हाथ पर रखा। “हाँ। और इसमें शर्म कैसी? तू इंसान है। कोई दीवार नहीं।”
शैलजा ने आँखें पोंछीं। “आज… आज मुझे बहुत अकेलापन लगा। आज रिटायरमेंट की एनिवर्सरी है, रेवा। मुझे लगा… कोई याद करेगा। कोई कहेगा—चलो, बाहर चलते हैं। कोई बोलेगा—दीदी, आपने बहुत किया। पर कुछ नहीं।”
रेवा ने आँखें चौड़ी कीं, फिर अचानक बहुत नाटकीय तरीके से माथा पीटा। “ओह हो! तो ये बात है! रुक, अब तू मुझे विलेन समझेगी।”
“क्यों?”
“क्योंकि आज शाम तुझे वही सब सुनना था, जो तू चाह रही थी। और तू यहाँ आकर रो रही है!” रेवा ने हँसते हुए कहा, “चुप! अब कोई रोना नहीं। चल, तैयार हो जा।”
“कहाँ?”
“एक जगह। और ज्यादा सवाल नहीं।”
“रेवा, मेरी ऊर्जा नहीं है…”
“ऊर्जा मैं दे दूँगी। तू बस चल।”
शैलजा को समझ नहीं आया, पर रेवा ने उसे जबरन खड़ा किया, दुपट्टा ठीक कराया, और बाहर गाड़ी में बिठा दिया। रास्ते में रेवा ने गाने चला दिए। पुराने, धीमे, वही जो कॉलेज के दिनों में सुनते थे। शैलजा को एक पल को लगा—वह फिर से कुछ साल पीछे लौट रही है, जब दुख इतना भारी नहीं था, और उम्मीद इतनी हल्की नहीं थी।
गाड़ी शहर के एक छोटे-से आर्ट कैफे के सामने रुकी। बाहर रंगीन बल्ब लगे थे, अंदर से धीमी-सी हल्की रौशनी आ रही थी।
“यहाँ?” शैलजा ने पूछा।
“हाँ।” रेवा ने उसकी आँखों में देख कर कहा, “और अंदर जाकर चेहरा बनाने की परमिशन नहीं है।”
शैलजा ने कदम रखा।
और अगले ही पल… तालियाँ।
“सरप्राइज़!”
उसके सामने—विक्रम, दीप्ति, अर्पित… और साथ में दो-तीन परिचित चेहरे—उसके ऑफिस की पुरानी साथी, पड़ोस की एक आंटी, यहाँ तक कि उसके कॉलेज की एक जूनियर जो अब शहर में ही थी।
शैलजा के पैर जैसे जमीन में गड़ गए।
उसकी आँखों के सामने धुंध-सी छा गई।
“ये… ये सब?” बस इतना ही निकल पाया।
विक्रम आगे आया। उसके हाथ में एक छोटा-सा बॉक्स था।
“दीदी,” उसने धीरे से कहा, “हम जानते हैं आप नाराज़ हैं। और सच… हम दोषी भी हैं। आपको लगने लगा कि आप अकेली हैं। लेकिन आप अकेली नहीं हैं।”
दीप्ति ने आगे बढ़कर उसका हाथ पकड़ा। “दीदी, मुझे माफ कर दीजिए। मैं काम में इतनी उलझी रहती हूँ कि कभी-कभी… आपका चेहरा पढ़ना भूल जाती हूँ।”
अर्पित ने उछलकर कहा, “बुआ! ये देखो… ये मैंने बनाया है!” और उसने एक कार्ड आगे किया। कार्ड पर टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में लिखा था—
“बुआ, आप मेरी सुपरहीरो हो। आप हँसती हो तो घर अच्छा लगता है।”
शैलजा ने कार्ड पकड़ते ही जैसे अपने अंदर की आखिरी कठोरता पिघलते महसूस की।
उसके गालों पर आँसू बहने लगे, पर इस बार आँसू शिकायत के नहीं थे—हल्केपन के थे।
रेवा ने पीछे से कान में कहा, “अब बोल… ‘सब मुझे भूल गए’!”
और खुद ही खिलखिलाकर हँस पड़ी।
विक्रम ने सबको शांत होने का इशारा किया।
“दीदी, आप हमेशा कहती थीं—‘काम करते रहो, तभी मन ठीक रहता है।’ पर सच ये है कि आपने इतनी देर तक काम किया कि आपने अपने लिए जीना ही टाल दिया। आज… हम एक छोटा-सा कदम उठाना चाहते हैं।”
उसने बॉक्स खोला। अंदर एक चाबी और एक छोटा-सा कार्ड था।
“ये क्या है?” शैलजा ने काँपती आवाज़ में पूछा।
दीप्ति ने मुस्कुराकर कहा, “आपको याद है, आप हमेशा कहती थीं—‘एक बार पेंटिंग सीखूँगी…’?”
विक्रम ने कार्ड पढ़कर दिखाया—एक आर्ट स्टूडियो की मेंबरशिप।
“और ये चाबी… आपकी अपनी स्कूटी की। आपकी पुरानी इच्छा थी—स्वतंत्रता। अब आप किसी पर निर्भर नहीं रहेंगी।”
“लेकिन… ये सब…” शैलजा की आवाज़ भर्रा गई।
“दीदी,” विक्रम ने धीरे से कहा, “आपने हमें सब कुछ दिया। अब हमारा नंबर है। और आज से एक नियम—आप अपने मन की बात दबाएँगी नहीं।”
रेवा ने केक की तरफ इशारा किया। केक पर लिखा था—
“नई शुरुआत की सालगिरह।”
शैलजा ने केक के सामने खड़े होकर एक पल आँखें बंद कीं। उसे याद आया, कैसे उसने रिटायरमेंट के बाद खुद को ‘कम’ समझ लिया था। जैसे नौकरी खत्म हुई तो जीवन भी धीमा हो गया। पर इस केक के दो शब्दों ने कुछ और ही कह दिया—नई शुरुआत।
केक काटते समय अर्पित ने फुसफुसाकर कहा, “बुआ, कल आप मेरे स्कूल आओगी? ‘कैरियर डे’ है। मैं सबको बताऊँगा कि मेरी बुआ टीचर थीं और बहुत स्ट्रॉन्ग हैं।”
शैलजा की हँसी और आँसू एक साथ निकल पड़े।
बाहर कैफे की खिड़की से शाम का आसमान दिख रहा था—हल्का गुलाबी, हल्का सुनहरा।
शैलजा ने मन ही मन कहा—“कभी-कभी हम जिसे उपेक्षा समझते हैं, वो दूसरों की असावधानी होती है। और कभी-कभी हमारी चुप्पी… हमें ही अकेला कर देती है।”
उस रात घर लौटते समय ऑटो में बैठी शैलजा को पहली बार लगा—उसके भीतर कोई बोझ नहीं है।
बस एक सीख है—अपनी जगह खुद बनानी पड़ती है, और अपने ‘होने’ की कीमत खुद भी याद रखनी पड़ती है।
गेट पर पहुँचते ही दीप्ति ने कहा, “दीदी, कल सुबह आपके लिए स्पेशल चाय।”
विक्रम ने जोड़ा, “और आप स्कूटी चलाने की प्रैक्टिस कल ही शुरू करेंगी।”
रेवा ने हँसकर कहा, “और अगर फिर कभी रोना आए तो सीधे मेरे पास नहीं… पहले अपने घर में बोलना।”
शैलजा ने सिर हिलाया।
आज उसे लगा—यह घर उसका भी है।
और वह सिर्फ ‘संभालने वाली’ नहीं… जीने वाली भी है।
Comments
Post a Comment