सुबह के सात बजे थे। मैं शीशे के सामने टाई बांधने की कोशिश कर रहा था, लेकिन आज हाथ बार-बार फिसल रहे थे। बाहर कोहरा फैला था और हवा में ऐसी ठिठुरन थी कि गर्म पानी भी ठंडा लग रहा था। आज मेरे लिए दिन सामान्य नहीं था—बोर्ड मीटिंग थी। नई डील फाइनल होने वाली थी। और उस डील के पीछे मेरी छह महीने की दौड़ थी। मैं नहीं चाहता था कि किसी भी तरह की चूक हो।
घर से निकलते वक्त मैंने सुकून की एक लंबी सांस ली। गाड़ी स्टार्ट करने लगा तो इंजन ने अजीब-सी आवाज़ की और फिर साइलेंट हो गया। दूसरी बार कोशिश की—कुछ नहीं। तीसरी बार—फिर कुछ नहीं। मैं उतरकर बोनट खोलने लगा, जैसे मुझे सच में कुछ आता हो। तभी ड्राइवर ने फोन पर बताया—“सर, बैटरी डाउन है। सर्विस सेंटर वाले दस बजे के बाद ही आएंगे।”
मेरे भीतर जैसे किसी ने मिर्च घिस दी। मीटिंग नौ बजे। शहर के दूसरे छोर पर। कोहरे में ट्रैफिक अलग। और ऊपर से यह बैटरी!
मैंने झट से फोन उठाकर कैब बुक करनी चाही। ऐप बार-बार “नो कैब्स अवेलेबल” दिखा रहा था। सोसायटी के गेट तक जाकर खड़ा हो गया। सामने सड़क पर चहल-पहल शुरू हो चुकी थी। कुछ लोग मॉर्निंग वॉक से लौट रहे थे, कुछ बच्चे बस के लिए इंतज़ार कर रहे थे। मैं बार-बार घड़ी देख रहा था, जैसे देखने से समय धीमा हो जाएगा।
तभी दूर से एक ई-रिक्शा आता दिखा। उस पर “शहर सेवा” लिखा था। रिक्शा चालक ने ऊनी टोपी पहनी थी, उसके गाल ठंड से लाल थे। उसने धीरे-धीरे रिक्शा मेरे सामने रोका।
मेरे मन में एक पल को झिझक उठी—“मैं… और ई-रिक्शा?”
मैं एक मल्टीनेशनल कंपनी का सीनियर प्रोडक्ट हेड, और रिक्शे में बैठकर बोर्ड मीटिंग में पहुँचूँ? लेकिन आज वक्त प्रतिष्ठा नहीं देखता। आज तो सिर्फ़ घड़ी देखता है।
मैंने गला साफ किया। “सिविक सेंटर जाना है। जल्दी ले चलोगे?”
ड्राइवर ने तुरंत कहा, “जी सर, बैठिए।”
मैं बैठ गया। वह रिक्शा चलाने लगा। हवा चेहरे पर सीधे लग रही थी, लेकिन भीतर का तनाव उससे कहीं ज्यादा तेज़ था। मैंने लैपटॉप बैग कसकर पकड़ा हुआ था, जैसे उसमें सिर्फ़ फाइलें नहीं, मेरी इज़्ज़त बंद हो।
दो मोड़ बाद अचानक रिक्शा धीमा हो गया। मैंने देखा, चालक सड़क के किनारे रुक रहा है। मैं झल्ला उठा। “अरे भाई, रुक क्यों रहे हो? मुझे देर हो रही है!”
ड्राइवर ने पीछे मुड़कर बड़े सम्मान से कहा, “सर, बस एक मिनट… ये सामने जो आंटी खड़ी हैं, इन्हें थोड़ी दूर छोड़ दूँ। इनके हाथ में भारी बैग है, ठंड भी बहुत है।”
मैंने तेज़ स्वर में कहा, “नहीं! मैंने पूरा रिक्शा बुक किया है। मैं किसी के साथ शेयर नहीं करूंगा। मुझे मीटिंग में पहुँचना है।”
वह शांत रहा, लेकिन उसकी आवाज़ में ठहराव आ गया। “सर, ये आंटी बस सरकारी डिस्पेंसरी तक जाएँगी। आपका रास्ता उसी तरफ़ है। अगर आपको आपत्ति है, तो आप उतर जाइए, मैं पैसे नहीं लूँगा। लेकिन मैं इन्हें छोड़ दूँगा।”
उसका यह कहना मेरे अहंकार पर जैसे हल्का थप्पड़ था। एक पल को मैं कुछ कह ही नहीं पाया। मुझे लगा, ‘ये लोग भी आजकल…’ फिर याद आया, मेरे पास विकल्प है क्या? घड़ी ने फिर से चेतावनी दी।
मैं चुप बैठा रहा। ड्राइवर उतरकर उस महिला के पास गया। वह महिला साधारण-सी थी, पर चेहरे पर थकान की जगह गरिमा थी। उसकी साड़ी पुरानी थी, हाथ में कपड़े का बड़ा थैला। ड्राइवर ने उसका थैला उठाकर आगे रखा और उसे बहुत सावधानी से बिठाया।
महिला ने धीमे से कहा, “बेटा, मैं चल सकती थी।”
ड्राइवर मुस्कुराया। “आंटी, आप चल लेंगी, पर मेरा मन नहीं मानेगा।”
महिला बैठ गई। रिक्शा फिर चल पड़ा। कुछ मिनट तक चुप्पी रही। फिर मेरे अंदर की जिज्ञासा ने हिचकिचाहट को धक्का दे दिया। मैंने ड्राइवर से पूछा, “ये कौन हैं? इन्हें इतनी इज़्ज़त से क्यों बैठा रहे हो?”
ड्राइवर ने आईने में मेरी तरफ़ देखा, जैसे तय कर रहा हो कि बताए या नहीं। फिर बोला, “सर, ये मिस्टर नहीं… मैडम हैं—सुरेखा मैडम। पहले सरकारी स्कूल में हेडमिस्ट्रेस थीं। रिटायर हो गईं। मेरे लिए… बहुत बड़ी हैं।”
“कैसे?” मैंने अनमनेपन से पूछा, पर कान सजग थे।
ड्राइवर ने धीरे-धीरे कहा, “सर, मैं दसवीं में था। पढ़ने में ठीक था, लेकिन अंग्रेजी… बिल्कुल नहीं होती थी। घर में पैसे नहीं थे। पापा का रिक्शा था, उसी से घर चलता। मैं स्कूल के बाद भी पापा के साथ रिक्शा चलाता था। मैडम ने एक दिन मुझे स्टाफरूम बुलाया और बोलीं—‘तू पढ़ना छोड़ देगा तो तेरी जिंदगी भी इसी रिक्शा जितनी रह जाएगी।’”
मैंने हल्का-सा भौंह चढ़ाया। ड्राइवर बोलता गया, “उस दिन मैडम ने मुझे एक पुरानी डिक्शनरी और एक कॉपी दी। कहा—रोज़ दस नए शब्द। उन्होंने खुद मुझे शाम को आधा घंटा पढ़ाया। फीस? कुछ नहीं। बस यही कहा—‘पढ़ाई का कर्ज़ पैसे से नहीं, अच्छे काम से उतरता है।’”
मैं अनचाहे प्रभावित हो रहा था। मेरे भीतर का ‘बड़ा आदमी’ चुप होता जा रहा था।
ड्राइवर ने आगे कहा, “मैडम की वजह से मैंने बारहवीं पास की। फिर आईटीआई किया। फिर मुझे ये ई-रिक्शा मिला। मैं अब रात में ओपन यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन कर रहा हूँ। सर, मैडम का डिस्पेंसरी जाना रोज़ होता है। उनके घुटनों में दर्द है। बेटा-बेटी बाहर रहते हैं। घर में कोई नहीं। तो मैं उन्हें सुबह छोड़ देता हूँ और दोपहर में वापस ले आता हूँ। मेरे लिए… ये सिर्फ़ मदद नहीं। ये… ऋण है।”
उसके शब्दों ने मेरे सीने में कहीं चोट कर दी।
मैंने खिड़की से बाहर देखा। कोहरे के बीच शहर अपनी रफ्तार से भाग रहा था। और मेरे भीतर यादों का एक दरवाज़ा खुलने लगा—बहुत पुराने दिन, जब मैं भी सरकारी स्कूल में पढ़ा था। मेरी अंग्रेजी भी कमजोर थी। मैं भी किताबों के लिए दूसरों पर निर्भर रहता था।
मुझे एक नाम याद आया—“सुरेखा मैडम।”
क्या वही? नहीं… संयोग हो सकता है। पर चेहरे की झलक… मुझे कुछ परिचित-सा लग रहा था।
रिक्शा डिस्पेंसरी के गेट पर रुका। महिला उतरने लगी तो मैंने अनायास कहा, “मैडम…”
वह पलटी। पहली बार उसकी आंखें सीधे मेरी तरफ़ पड़ीं। चश्मे के पीछे से उसने मुझे देखा, जैसे किसी भूले हुए पन्ने को पढ़ रही हो।
मैंने कहा, “आप… पहले के.पी. नगर स्कूल में थीं?”
उसके चेहरे पर हल्की-सी हैरानी आई। “हाँ… तुम…?”
मेरी आवाज़ धीमी हो गई। “मैं… अर्णव। अर्णव श्रीवास्तव। आपने… मुझे सातवीं में स्कॉलरशिप के फॉर्म भरवाए थे। और… मुझे पहली बार इंग्लिश में स्पीच लिखकर दी थी… ‘माय ड्रीम’ वाली…”
कुछ सेकंड वह बस देखती रही। फिर उसकी आंखें भीग गईं। “अरे… अर्णव!”
उसने इतना कहा और उसके होंठ काँप गए।
मैं उसी पल अपने भीतर छोटा हो गया। इतना छोटा कि बोर्ड मीटिंग, डील, पद—सब एक तरफ़। सामने वह महिला थी, जिसने मेरे जैसे अनगिनत बच्चों के लिए रातों की नींद काटी होगी। और मैं… मैं उसे पहचानने में भी देर कर रहा था।
मैंने जल्दी से दरवाज़े वाली तरफ़ झुककर कहा, “मैडम, आप कैसी हैं? आपको कुछ चाहिए तो…”
वह मुस्कुराईं। “मुझे कुछ नहीं चाहिए, बेटा। बस… इतना ही कि तुम ठीक हो।”
ड्राइवर ने बहुत आदर से उनका बैग पकड़ा। “मैडम, मैं दो बजे लेने आ जाऊँगा।”
“नहीं बेटा, आज मत आना… तू अपना काम देख,” उसने प्यार से कहा।
ड्राइवर ने सिर हिला दिया। “मैडम, ये मेरा काम है।”
वह भीतर चली गईं। रिक्शा फिर चल पड़ा।
मैं पीछे की सीट पर बैठा अब पूरी तरह बेचैन था—पर इस बार मीटिंग की वजह से नहीं। एक अजीब शर्म की वजह से। मुझे याद आने लगा, जब कॉलेज और नौकरी के बाद मैंने कभी उस स्कूल के बारे में पूछा भी नहीं। कभी मैडम के बारे में नहीं सोचा। और आज… मैं “छोटे लोगों” पर झुंझला रहा था, जबकि असल छोटेपन की जगह मेरे भीतर थी।
ड्राइवर ने शायद मेरे चेहरे पर कुछ पढ़ लिया। उसने धीरे से कहा, “सर… आप उन्हें जानते थे?”
“हाँ,” मैं बस इतना ही कह पाया।
कुछ देर बाद हम सिविक सेंटर के पास पहुँचे। मीटिंग के लिए मेरे पास मुश्किल से दस मिनट बचे थे। मैंने किराया निकालते हुए कहा, “कितने हुए?”
ड्राइवर ने कहा, “सर, जितना मीटर में आएगा।”
मैंने उससे ज्यादा पैसे उसकी हथेली पर रख दिए। वह घबरा गया। “सर, ये ज्यादा है।”
मैंने पहली बार बिना अहंकार के कहा, “इसे ज्यादा मत समझो। ये… मेरा धन्यवाद है। और एक बात—मैडम को आज दो बजे लेने जरूर आना। और… अगर वो मना करें, तो भी।”
ड्राइवर मुस्कुरा दिया। “सर, वो मना करेंगी, पर मैं जाऊँगा। मैडम की बात मैं सुनता हूँ… पर मानता अपने दिल की हूँ।”
मैं बिल्डिंग में भागता हुआ घुसा। मीटिंग शुरू हो चुकी थी। मैं अपनी सीट पर पहुँचा तो बोर्ड के लोग मेरी तरफ़ देखने लगे। मैं हांफ रहा था, पर मन कहीं और था।
मीटिंग चली। मैं बोलता रहा—डेटा, प्रेजेंटेशन, प्रॉफिट मार्जिन, रोडमैप। सब सही। डील भी फाइनल हो गई। लोग खुश थे। मेरे बॉस ने पीठ थपथपाई। पर मेरे भीतर खुशी का वह उछाल नहीं था, जो हमेशा होता था।
शाम को घर लौटते वक्त मैंने ड्राइवर को कॉल किया—वही ई-रिक्शा वाला। “सुनो, मैडम घर पहुँचीं?”
वह बोला, “जी सर। मैं छोड़ आया। उन्होंने रास्ते भर आपका नाम लिया। बोल रही थीं—‘अर्णव को देख लिया… बस अब भगवान से यही मांगूंगी कि वो अच्छा इंसान बना रहे।’”
मेरे गले में कुछ फंस गया।
उस रात मैं देर तक जागता रहा। और पहली बार मैंने अपनी सफलता की सूची नहीं, अपनी कृतज्ञता की सूची बनाई। अगले दिन मैंने स्कूल का नंबर ढूँढा। प्रिंसिपल से बात की। “मैम, मैं पुराने छात्र के तौर पर स्कूल के लिए कुछ करना चाहता हूँ,” मैंने कहा। “बिना किसी शोर के। बच्चों की किताबें, लाइब्रेरी, स्कॉलरशिप—जो जरूरी हो।”
फोन के उस पार से आवाज़ आई—“सर, ये बहुत अच्छी बात है।”
मैंने धीमे से कहा, “सर मत कहिए। मैं बस… अर्णव हूँ।”
कुछ महीनों बाद जब स्कूल में नई लाइब्रेरी का उद्घाटन हुआ, मैं वहाँ गया। सुरेखा मैडम व्हीलचेयर पर बैठी थीं। उनके चेहरे पर वही शांति थी, जो मैंने कल डिस्पेंसरी के गेट पर देखी थी।
मैंने उनके हाथ पर माथा रख दिया। “मैडम, देर हो गई… पर मैं आया।”
उन्होंने मेरे सिर पर हाथ फेरा। “देर नहीं होती बेटा। कुछ लोग समय पर नहीं, समझ पर लौटते हैं।”
मैं बाहर निकला तो वही ई-रिक्शा वाला ड्राइवर दूर खड़ा था—आज उसने साफ़ कमीज़ पहन रखी थी। उसने मुझे देखकर हँसते हुए कहा, “सर… आज आप बड़े लग रहे हैं।”
मैंने जवाब दिया, “नहीं। आज मैं पहली बार छोटा होने में बड़ा महसूस कर रहा हूँ।”
और उसी पल मुझे समझ आया—छोटे लोग वे नहीं होते जिनके पास साधन कम होते हैं। छोटे लोग वे होते हैं जिनके पास याद रखने का दिल नहीं होता, और ऋण मानने की रीढ़ नहीं होती।
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