सुबह की पहली ट्रेन की सीटी के साथ ही स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर हलचल बढ़ जाती थी। चायवालों की आवाज़, कुलियों की पुकार और अख़बार बेचने वालों की हड़बड़ी—सबके बीच एक लड़की रोज़ चुपचाप खड़ी रहती थी। उसका नाम था सृष्टि। न कोई जल्दी, न कोई शिकायत। बस आँखों में एक ठहराव, जैसे वह हर रोज़ इस भीड़ में खुद को ढूँढने आती हो।
सृष्टि की उम्र ज़्यादा नहीं थी, लेकिन ज़िंदगी ने उसे उम्र से पहले समझदार बना दिया था। उसके पिता रेलवे में क्लर्क थे। ईमानदार, सीधे-सादे, मगर ज़रा-सी भी ऊँची आवाज़ सुनते तो चुप हो जाते। माँ गृहिणी थीं—संवेदनशील, पर कमजोर। सृष्टि इकलौती संतान थी, इसलिए घर की हर उम्मीद, हर डर, हर चिंता उसी के इर्द-गिर्द घूमती थी।
पिता की अचानक हार्ट अटैक से मृत्यु हुई तो घर की दुनिया ही पलट गई। जो घर पहले सुरक्षित लगता था, वही घर अब माँ-बेटी के लिए बोझ बन गया। रिश्तेदारों की आवाजाही बढ़ी, और साथ ही बढ़ने लगीं फुसफुसाहटें—
“अब अकेली औरत कैसे संभालेगी?”
“लड़की बड़ी हो रही है, ज़्यादा पढ़ा-लिखा दिया तो सिर पर चढ़ जाएगी।”
“किसी तरह शादी कर दो, यही ठीक रहेगा।”
माँ हर बात पर चुप रहतीं। सृष्टि उनकी चुप्पी समझती थी, मगर स्वीकार नहीं कर पाती थी। वह जानती थी कि अगर वह भी चुप हो गई, तो उसकी ज़िंदगी भी किसी और के फैसलों में सिमट जाएगी।
पिता की मौत के बाद सबसे पहले जिस चीज़ पर कैंची चली, वह थी सृष्टि की पढ़ाई। शहर के अच्छे कॉलेज की जगह उसे पास के साधारण कॉलेज में डाल दिया गया। वजह साफ थी—खर्च कम हो जाएगा। सृष्टि ने विरोध किया, मगर माँ ने बस इतना कहा,
“बेटा, हालात को समझो। अभी यही ठीक है।”
हालात समझना सृष्टि को आता था, लेकिन सपनों का क्या?
वह पढ़ाई में तेज़ थी, खासकर अकाउंट्स और मैनेजमेंट में। कॉलेज के प्रोफेसर भी उसकी तारीफ करते नहीं थकते थे। मगर घर लौटते ही वही सवाल—
“इतना पढ़कर क्या करेगी?”
“लड़की को नौकरी की क्या जरूरत?”
“घर-गृहस्थी ही तो संभालनी है।”
धीरे-धीरे रिश्तेदारों ने माँ के कान भरने शुरू कर दिए। एक रिश्ता तय किया गया—अभय। लड़का ठीक-ठाक नौकरी करता था, परिवार साधारण था। सबको यही लगा कि यही सबसे सुरक्षित रास्ता है। सृष्टि से पूछा गया, मगर असल में पूछा नहीं गया—बस बताया गया।
सृष्टि ने पहली बार खुलकर कहा,
“माँ, मैं अभी शादी नहीं करना चाहती।”
माँ घबरा गईं,
“लोग क्या कहेंगे?”
“लोग हमेशा कुछ न कुछ कहते रहेंगे,” सृष्टि ने शांत स्वर में कहा, “पर मेरी ज़िंदगी मुझे जीने दो।”
यह बात रिश्तेदारों तक पहुँची तो हंगामा मच गया। किसी ने कहा—
“आजकल की लड़कियाँ बिगड़ गई हैं।”
किसी ने ताना मारा—
“पढ़ाई ने दिमाग खराब कर दिया है।”
माँ दो पाटों के बीच पिस रही थीं। एक तरफ समाज का डर, दूसरी तरफ बेटी की ज़िद। आखिरकार उन्होंने बीच का रास्ता चुना—
“ठीक है, एक साल की मोहलत। अगर इस एक साल में तुम कुछ कर दिखाओ, तो मैं तुम्हारे साथ खड़ी रहूँगी।”
सृष्टि ने यह वाक्य ऐसे पकड़ा, जैसे कोई डूबता तिनके को पकड़ ले।
उसने उसी दिन तय कर लिया—यह एक साल उसकी ज़िंदगी बदल देगा।
उसने पार्ट-टाइम काम ढूँढना शुरू किया। पहले एक कोचिंग सेंटर में अकाउंट्स पढ़ाने लगी। फिर ऑनलाइन फ्रीलांस काम मिलने लगा—डेटा एनालिसिस, रिपोर्ट्स बनाना, छोटे प्रोजेक्ट्स। दिन-रात मेहनत करती रही। माँ को लगता था कि बेटी थक जाएगी, टूट जाएगी, मगर सृष्टि के भीतर जैसे कोई आग जल रही थी।
छह महीने बीते। सृष्टि ने न सिर्फ खुद का खर्च निकालना शुरू किया, बल्कि घर के खर्च में भी हाथ बँटाने लगी। माँ को पहली बार अहसास हुआ कि बेटी बोझ नहीं, सहारा बन सकती है।
इसी दौरान सृष्टि को एक बड़ा मौका मिला। एक मल्टीनेशनल कंपनी में इंटरव्यू का बुलावा आया—मैनेजमेंट ट्रेनी के लिए। पैकेज अच्छा था, शहर बदलना पड़ता, लेकिन भविष्य साफ दिख रहा था।
जब उसने माँ को बताया, माँ चुप हो गईं। बहुत देर तक कुछ नहीं बोलीं। फिर धीरे से पूछा,
“बहुत दूर है?”
“हाँ, माँ। लेकिन… मैं खुद को साबित कर सकती हूँ।”
माँ की आँखें भर आईं। उन्हें डर लग रहा था—अकेले रह जाने का, समाज की बातों का, अनजान शहर का। मगर उन्हें बेटी की आँखों में वही चमक दिखी, जो कभी उसके पिता की आँखों में हुआ करती थी।
“जा,” माँ ने भारी आवाज़ में कहा, “पर वादा कर कि खुद को कभी कम नहीं समझेगी।”
उस दिन सृष्टि ने महसूस किया कि असली आज़ादी बाहर जाने में नहीं, भीतर से समर्थन मिलने में होती है।
नई नौकरी, नया शहर, नया घर—सब कुछ नया था। शुरू में मुश्किलें आईं। अकेलापन, काम का दबाव, अजनबी लोग। कई बार रात को तकिये में मुँह दबाकर रोई भी। मगर हर सुबह उठकर खुद से कहती—
“मैं यहाँ तक पहुँची हूँ, आगे भी जाऊँगी।”
ऑफिस में वह धीरे-धीरे अपनी जगह बनाने लगी। मेहनत, ईमानदारी और समझदारी—तीनों ने उसका साथ दिया। एक साल के भीतर ही उसे प्रमोशन मिला। पहली बार उसने अपनी कमाई से माँ के लिए एक अच्छी साड़ी खरीदी और कुरियर से भेजी।
माँ ने फोन पर रोते हुए कहा,
“लोग पूछते हैं—तुम्हारी बेटी क्या करती है?”
“और मैं गर्व से कहती हूँ—मेरी बेटी अपना रास्ता खुद बनाती है।”
समय बदला। वही रिश्तेदार, जो कभी ताने देते थे, अब सलाह लेने लगे। वही अभय का रिश्ता कहीं और तय हो गया। किसी ने फिर शादी की बात छेड़ी, मगर इस बार माँ ने खुद कहा—
“मेरी बेटी जब चाहेगी, तब करेगी।”
सृष्टि समझ गई थी—संघर्ष सिर्फ बाहर से नहीं होता, भीतर से भी होता है। डर, अपराधबोध, समाज की आवाज़—इन सबसे लड़ना पड़ता है।
एक दिन स्टेशन से गुजरते हुए उसने खुद को फिर प्लेटफॉर्म पर खड़ा पाया। वही शोर, वही भीड़। मगर आज वह लड़की चुप नहीं थी, डरी नहीं थी। आज उसके हाथ में टिकट नहीं, एक पहचान थी।
वह मुस्कराई और मन ही मन बोली—
“भागना गलती नहीं होता, अगर आप डर से नहीं, अपने सपनों की ओर भाग रहे हों।”
और भीड़ में कदम बढ़ाते हुए उसे यकीन था—हर लड़की, जिसे कभी रोका गया, अगर खुद पर भरोसा कर ले, तो उसकी कहानी भी बदली जा सकती है।
लेखिका : रमा मिश्रा
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