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पिता का साया अनमोल होता है,

 शाम का वक्त था। ड्रॉइंग रूम में हल्की पीली रोशनी फैली हुई थी। सोफे पर बैठी अन्वी बार-बार मोबाइल देख रही थी, जैसे किसी फैसले का इंतज़ार कर रही हो। कॉलेज से लौटते ही उसने बैग एक तरफ़ फेंका और सीधे पिता के सामने आकर खड़ी हो गई।

“पापा, मुझे स्कूटर चाहिए… और वो भी इसी महीने,” उसने बिना भूमिका बाँधे कहा।

पिता समीर अख़बार से नज़र उठाकर मुस्कुरा दिए।
“इतनी जल्दी? अभी तो पिछले महीने ही नया मोबाइल लिया था।”

माँ कविता रसोई से निकल आईं।
“हर बात में हाँ मत कर दिया करो। पढ़ाई पूरी होने दो, नौकरी लगने दो, तब देखेंगे।”

अन्वी चुपचाप मुँह फुलाकर खिड़की के पास जा बैठी। यह उसका पुराना तरीका था—जब मन की बात न मानी जाए तो खामोश हो जाना।

समीर ने बेटी की तरफ़ देखा और हँसते हुए बोले,
“अरे छोड़ो कविता, लड़की की छोटी-छोटी ख़्वाहिशें पूरी नहीं करेंगे तो कौन करेगा? मेरी बेटी है, उसे किसी चीज़ की कमी नहीं होनी चाहिए।”

कविता ने गहरी साँस ली।
“आज आप पिता हैं, इसलिए सब आसान लगता है। कल जब ये किसी और के घर जाएगी, तब क्या? क्या वहाँ भी हर बात ऐसे ही मानी जाएगी?”

समीर ने ठहाका लगाया।
“मैं अपनी बेटी के लिए ऐसा घर ढूँढूँगा जहाँ इसे सिर आँखों पर बैठाया जाएगा। इसका पति इसे मुझसे भी ज़्यादा प्यार करेगा।”

कविता कुछ नहीं बोली। बस रसोई की ओर मुड़ गई। लेकिन उसके मन में उथल-पुथल मच गई थी।
वह भी कभी अपने पिता की लाडली रही थी। हर ज़िद पूरी होती थी। पर शादी के बाद… पिता और पति के प्यार में कितना फर्क होता है, यह उसने धीरे-धीरे जाना था। पति बुरा नहीं था, पर पिता जैसा भी नहीं।

रसोई में सब्ज़ी काटते हुए उसकी आँखों के सामने अतीत घूम गया—वह खुद, अपने पिता के घर में निश्चिंत, और फिर ससुराल में धीरे-धीरे सीखती हुई कि हर इच्छा बोलकर नहीं माँगी जाती।

उसी रात, कविता देर तक सो नहीं पाई। उसे डर था—कहीं अन्वी भी उसी भ्रम में न जीने लगे कि पिता का स्नेह हर जगह उसी रूप में मिलेगा।


कुछ साल बाद वही डर हक़ीक़त बनकर सामने खड़ा था।

दिल्ली के एक साधारण से घर में कविता और समीर बेसुध बैठे थे। फोन उनके हाथ से छूट चुका था। आवाज़ कानों में गूँज रही थी—
“एक्सीडेंट हो गया है… आपकी बेटी… नहीं रही…”

जिस बेटी को उन्होंने पालकों पर बैठाकर विदा किया था, आज उसे अंतिम विदाई देनी थी।

किसी तरह दोनों मुंबई पहुँचे। बेटी का ससुराल शोक में डूबा हुआ था। रोते-बिलखते रिश्तेदार, सहमे हुए दो छोटे बच्चे—उनके नाती-नातिन—एक कोने में चुपचाप बैठे थे, जैसे समझ ही न पा रहे हों कि माँ अब कभी लौटकर नहीं आएगी।

कविता ने दोनों बच्चों को सीने से लगा लिया।
“अब मैं हूँ… नानी हूँ ना,” वह बुदबुदाई।

रस्में पूरी होने के बाद कुछ दिन दोनों वहीं रुके। दिन में बेटी के ससुराल, रात में पास के होटल में। हर रात कविता बच्चों का चेहरा याद कर रो पड़ती।

एक शाम उसने हिम्मत करके समधन से कहा,
“अब अन्वी तो नहीं रही… बच्चों को सँभालना आपके लिए भी मुश्किल होगा। अगर आप चाहें तो हम इन्हें अपने साथ दिल्ली ले चलें।”

समधन के चेहरे पर अजीब-सी दृढ़ता आ गई।
“नहीं, ये हमारे घर के वारिस हैं। इन्हें हम कहीं नहीं भेज सकते।”

फिर कुछ पल रुककर बोलीं,
“वैसे हमने एक बात सोची है। क्यों न इनकी मौसी—आपकी छोटी बेटी आराध्या—को इनकी माँ बना दिया जाए।”

कविता जैसे सुन्न हो गई।
“ये आप क्या कह रही हैं? मेरी बेटी को गए अभी कुछ ही दिन हुए हैं।”

समधन ने बेपरवाही से कहा,
“जो चला गया, वो लौटता नहीं। पर बच्चों को माँ चाहिए। और फिर आराध्या की शादी तो करनी ही है। बहन के बच्चों की माँ बन जाए तो क्या बुरा है?”

समीर का चेहरा सख़्त हो गया।
“आप आराध्या की उम्र और इस घर की ज़िम्मेदारियों का अंतर समझती हैं?”

“अरे मर्द की उम्र कौन देखता है,” समधन हँस दीं।
“और आपकी बेटी यहाँ राज करेगी। आपको भी बच्चों से मिलने में कोई रोक नहीं होगी।”

कविता ने समीर की ओर देखा। उसकी आँखों में वही दृढ़ता थी, जो बरसों पहले अन्वी के लिए वादे करते वक्त थी—लेकिन आज उसमें अनुभव भी जुड़ा था।

समीर खड़े हो गए।
“एक बेटी को खोकर मैं दूसरी बेटी के सपनों की बलि नहीं दूँगा। यह बेमेल विवाह नहीं होगा।”

समधन का स्वर तीखा हो गया।
“तो फिर अपने नातियों से मिलने का सपना भी छोड़ दीजिए।”

समीर शांत थे।
“नातियों से मिलना हमारा क़ानूनी हक़ है, और हम उसे लेकर रहेंगे। पर बेटी को सौदे की तरह पेश नहीं करेंगे।”

यह कहकर वह कविता का हाथ थामकर बाहर निकल आए।

होटल के कमरे में कविता देर तक रोती रही।
“मैं डरती थी समीर… मैंने पहले ही कहा था, पिता और पति का प्यार एक-सा नहीं होता।”

समीर ने उसकी ओर देखा।
“शायद हम अन्वी को बहुत ज़्यादा लाड़ में रख गए। पर अब आराध्या के लिए वही गलती नहीं दोहराऊँगा।”


दिल्ली लौटने के बाद समीर और कविता ने अपनी छोटी बेटी आराध्या को पास बिठाया।
“बेटा,” कविता ने कहा,
“तुम्हें ज़िंदगी में जो करना है करो, पर अपनी पहचान खुद बनाना। किसी के लाड़ का सहारा मत बनना।”

आराध्या चुपचाप सुनती रही।

उस दिन समीर ने भी खुद से एक वादा किया—
पिता का प्यार देना है, भ्रम नहीं।
सुरक्षा देनी है, पर सच के साथ।

क्योंकि हर बेटी को यह जानना ज़रूरी है—
पिता का साया अनमोल होता है,
पर ज़िंदगी में हर रिश्ता वैसा नहीं होता।

और हर माँ-बाप का फ़र्ज़ है
बेटियों को सिर्फ़ सपने नहीं,
हक़ीक़त से लड़ने की ताक़त भी देना।

लेखिका : संगीता अग्रवाल


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