अदालत की सीढ़ियाँ उतरते ही हवा में एक अजीब-सी ठंडक थी। दिसंबर की धूप सामने फैली थी, लेकिन भीतर कुछ ऐसा जमे हुए था जिसे सूरज भी पिघला नहीं पा रहा था। अनन्या के हाथ में फाइल थी—कागज़ों का एक छोटा-सा पुलिंदा, जिसमें “समझौता” लिखा था, पर असल में उसमें वर्षों का थकान-भरा हिसाब छुपा हुआ था। दूसरी तरफ़, कुछ कदम की दूरी पर विवेक खड़ा था—कंधे पर बैग लटका, आंखों में वही पुराना ठहराव, जो कभी उसे भरोसा लगता था और अब दूरी।
दोनों ने एक साथ नहीं देखा, पर एक ही दिशा में चल पड़े—गेट की तरफ़। बाहर ऑटो, वकीलों की आवाज़ें, चाय का भाप उठता ठेला, सब अपनी जगह वैसे ही थे जैसे हर दिन होते हैं। फर्क बस इतना था कि आज दोनों की ज़िंदगी में “हमें” नाम की चीज़ आधिकारिक तौर पर खत्म हो चुकी थी।
“टैक्सी कर लेते हैं?” विवेक ने धीमे से पूछा।
अनन्या ने सिर हिलाया, “नहीं… मैं मेट्रो से चली जाऊँगी।”
विवेक कुछ पल चुप रहा, फिर बोला, “ठीक है… मैं भी।”
यह भी एक संयोग था कि मेट्रो स्टेशन तक जाने के रास्ते में सड़क खोदी हुई थी और ट्रैफिक रोक दिया गया था। भीड़ को साइड वाले गली-मोहल्ले से मोड़ा जा रहा था। वही गली दोनों को एक पुराने छोटे से कैफ़े के सामने ले आई—ज्यादा बड़ा नहीं, बस दो मेज़ें बाहर, चार अंदर, और एक पुराना बोर्ड जिस पर चॉक से लिखा था—“आज स्पेशल: अदरक वाली चाय, समोसा।”
अनन्या के कदम वहीं रुक गए।
“यहाँ बैठ लेते हैं,” विवेक ने कहा, जैसे यह सुझाव नहीं, एक कमज़ोर-सी प्रार्थना हो। “भीड़ कम हो जाएगी तो निकल चलेंगे।”
अनन्या ने कोई जवाब नहीं दिया, बस अंदर जाकर खिड़की वाली कुर्सी पर बैठ गई। विवेक सामने वाली कुर्सी पर बैठा। बीच में मेज़ छोटी थी, पर दूरी बहुत बड़ी।
कैफ़े वाले ने पूछा, “चाय?”
विवेक ने अनन्या की तरफ देखा।
अनन्या ने हल्का सिर हिलाया।
“दो चाय,” विवेक ने कहा।
चाय आते-आते उनके बीच चुप्पी और गाढ़ी हो गई। बाहर ऑटो के हॉर्न, अंदर चम्मच की खनखनाहट, और दोनों के भीतर सालों की अनकही बातें—सब एक साथ मौजूद थे।
विवेक ने फाइल की तरफ देखा, “तो… हो गया।”
अनन्या ने बिना भाव बदले कहा, “हाँ… हो गया।”
विवेक ने सूखे होंठों पर जीभ फेरी, “अच्छा ही है।”
अनन्या की हँसी, हँसी जैसी नहीं थी, “अच्छा… किसके लिए?”
विवेक ने जवाब नहीं दिया। उसने चाय का कप उठाया, फिर रख दिया। जैसे हाथ में कप नहीं, कोई भारी बात हो।
“तुम्हें याद है,” अनन्या ने अचानक कहा, “हमने शादी के पहले कौन सा वादा किया था?”
विवेक ने माथा सिकोड़कर देखा।
अनन्या ने खुद ही कहा, “कि हम कभी घर के झगड़े बाहर नहीं ले जाएंगे। कभी तीसरे को बीच में नहीं आने देंगे।”
विवेक की पलकें झपकीं।
“और फिर,” अनन्या ने उसी सपाट लहजे में जोड़ा, “हमने सबसे पहले वही किया।”
विवेक ने धीमे से कहा, “मैंने… मैंने घर वालों को नहीं रोका।”
अनन्या ने पहली बार उसकी तरफ पूरी तरह देखा, “सिर्फ घर वाले नहीं। मेरे भी… मेरे भी लोग कम नहीं थे।”
विवेक का चेहरा हल्का सा उतर गया।
“हमारे झगड़े में,” अनन्या ने कहा, “हम कम थे… और बाकी लोग ज़्यादा।”
एक पल की चुप्पी के बाद विवेक ने फुसफुसाकर कहा, “तुमने मुझे… बहुत गलत समझा।”
अनन्या ने धीरे से कप घुमाते हुए कहा, “और तुमने मुझे सही समझने की कोशिश ही कब की?”
विवेक ने जैसे अपने भीतर की कोई गांठ खोलने का फैसला किया, “उस दिन… जो हुआ… तुमने प्लेट फेंकी थी। मेरे चेहरे पर… बस हल्की सी लगी। पर मुझे चोट नहीं लगी थी। चोट… मुझे तब लगी जब सबने कहा—‘अब तो इज़्ज़त चली गई।’”
अनन्या ने आंखें झुका लीं, “और मुझे चोट तब लगी… जब तुमने सबके सामने कहा—‘ये औरत मेरे लायक नहीं।’”
विवेक ने तुरंत कहा, “मैंने गुस्से में कहा था…”
अनन्या ने उसी क्षण काट दिया, “गुस्से में कही बात… सबसे सच्ची होती है या सबसे झूठी? मुझे आज तक समझ नहीं आया।”
चाय का पहला घूंट अनन्या ने लिया। चाय गरम थी, पर उसकी आवाज़ ठंडी।
“तुम्हें पता है,” उसने कहा, “मुझे तुम्हारे साथ रहना मुश्किल नहीं था। मुश्किल था… तुम्हारे साथ लोगों को भी रहना।”
विवेक ने सिर झुकाया। “मेरी माँ…”
अनन्या ने थकान भरी मुस्कान से कहा, “तुम्हारी माँ, मेरी माँ, तुम्हारी बहन, मेरा भाई… सबके पास सलाह थी। किसी के पास समय नहीं था।”
विवेक ने अचानक अपनी जेब से एक दवा निकाली—छोटी-सी पट्टी, और उसे बिना देखे अपने हाथ की नसों के पास दबाया।
अनन्या की नज़र उस पर गई, “अब भी माइग्रेन?”
विवेक ने चौंक कर देखा, “तुम्हें याद है?”
अनन्या की आँखों में कुछ पल के लिए नमी तैर गई, “कैसे भूल सकती हूँ… तुम्हारे दर्द का अलार्म तो मैं ही पहचानती थी।”
विवेक ने धीमे से कहा, “तुम्हारी एलर्जी… अब कम है?”
अनन्या ने हल्का सा सिर हिलाया, “हां… दवाइयों से कंट्रोल हो जाती है।”
फिर दोनों फिर चुप हो गए। जैसे अचानक उन्हें यह एहसास हुआ हो कि वे एक-दूसरे के शरीर की भाषा अब भी पढ़ लेते हैं, मगर दिल की भाषा पढ़ना उन्होंने कब का छोड़ दिया।
विवेक ने धीरे से कहा, “हमारे बीच… कुछ खराब नहीं था। खराब… हमारे इर्द-गिर्द था।”
अनन्या ने बिना तैश के कहा, “और हम दोनों ने उसे… अपने घर के अंदर जगह दे दी।”
विवेक ने चाय का कप उठाया, इस बार पिया।
“मैं जब भी तुम्हारे बिना घर जाता था,” उसने कहा, “घर… घर नहीं लगता था। लेकिन… मैं जिद्दी था। मैं समझता रहा कि सही मैं हूँ, गलत तुम। और तुम…”
विवेक रुक गया।
अनन्या ने शांत होकर बात पूरी की, “और मैं समझती रही कि मैं अकेले ही सब संभाल लूंगी। मैं कभी ये नहीं मान पाई कि मुझे भी मदद चाहिए।”
कैफ़े का मालिक अंदर आया, “और कुछ?”
दोनों ने एक साथ “नहीं” कहा। और फिर दोनों को अपने “नहीं” की एक जैसी आवाज़ सुनकर खुद पर हैरानी हुई।
विवेक ने टेबल पर रखे कागज़ों की तरफ देखा। अनन्या की फाइल वहीं थी, किनारे से थोड़ा खुला हुआ पन्ना झांक रहा था।
“अब आगे?” विवेक ने पूछा।
अनन्या ने धीरे से कहा, “आगे… मैं नौकरी ट्रांसफर करवा लूंगी। नई जगह, नई शुरुआत।”
विवेक ने पूछा, “और… जो हमने… बनाया?”
अनन्या ने उसकी तरफ देखा, “क्या?”
विवेक की आवाज़ टूटती हुई थी, “हमारा घर… हमारा रिश्ता… हमारा बच्चा… सब?”
अनन्या की उंगलियाँ कप के किनारे पर थम गईं।
“बच्चा… हमारा है,” उसने बहुत स्पष्ट कहा, “और रहेगा। पर रिश्ता…”
उसने वाक्य पूरा नहीं किया।
विवेक ने सिर झुकाया। कुछ पल बाद उसने बहुत धीरे कहा, “तुम्हें याद है, जब पहली बार तुम्हारे पैर में मोच आई थी… तुम चल नहीं पा रही थी… और मैं तुम्हें गोद में उठाकर डॉक्टर के पास ले गया था?”
अनन्या की आँखें भीग गईं, पर वह रोई नहीं।
“तुम्हें याद है,” वह बोली, “जब तुम्हारी नौकरी में पहली बार तारीफ़ हुई थी और तुम रात को देर से आए थे… मैंने तुम्हारे लिए दूध गरम रखा था… और तुमने कहा था—‘मैं तुमसे हार नहीं सकता।’”
विवेक ने फीकी हँसी हँसी, “फिर हमने… एक-दूसरे को हराने की कोशिश शुरू कर दी।”
अनन्या ने सांस ली, जैसे भीतर से कुछ बाहर आ रहा हो, “विवेक… मैं अब भी… तुम्हें पूरी तरह नफ़रत नहीं कर पाती।”
विवेक ने उसकी तरफ देखा, “और मैं… तुम्हें भूल नहीं पाता।”
कैफ़े के बाहर सड़क पर हलचल कम हो चुकी थी। ट्रैफिक धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा था। पर दोनों के भीतर, कुछ रुका हुआ था, जो चलने का नाम नहीं ले रहा था।
अनन्या ने अचानक कहा, “एक बात बताओ… तुमने कभी सच में चाहा था कि हम अलग हो जाएँ?”
विवेक ने हड़बड़ाकर कहा, “नहीं!”
फिर उसने खुद को समेटा, “मैं… मैं बस चाहता था कि लोग मुझे कमज़ोर न समझें।”
अनन्या ने धीरे से कहा, “और मैं चाहती थी कि लोग मुझे… नौकरानी न समझें।”
विवेक का चेहरा कठोर नहीं रहा।
अनन्या ने बहुत शांत स्वर में कहा, “हम दोनों ने अपने-अपने सम्मान की रक्षा करनी चाही… और उसी में… प्यार घायल हो गया।”
विवेक ने फाइल के ऊपर हाथ रखा, जैसे उसे बंद करना चाहता हो, फिर हाथ वापस खींच लिया।
“तुम्हें पता है,” उसने कहा, “मैंने केस के दौरान तुम्हारे बारे में जो-जो कहा… वो सब…”
वह रुक गया।
अनन्या ने एक लंबी सांस लेकर कहा, “और मैंने भी तुम्हारे बारे में जो कहा… वो सब…।”
दोनों ने एक-दूसरे की तरफ देखा। अब उनके चेहरे पर न विजय थी, न हार। बस थकान थी—और एक छोटी-सी इच्छा कि काश कुछ अलग होता।
विवेक ने धीमे से कहा, “अगर… हम लोग नहीं होते… सिर्फ हम होते… तो?”
अनन्या ने चाय का आख़िरी घूंट लिया। उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी, “तो शायद… हम बच जाते।”
विवेक ने अपने बैग से एक छोटा-सा डिब्बा निकाला। “ये… तुम्हारे लिए नहीं… बिटिया के लिए… मैंने… पिछले महीने लिया था। तुम्हें देने की हिम्मत नहीं हुई।”
अनन्या ने डिब्बा देखा। उस पर एक छोटी-सी किताब थी—रंग भरने वाली।
“वो इसे पसंद करेगी,” अनन्या ने कहा।
विवेक ने आँखें झपकाईं, “तुम्हें अब भी… पता है उसे क्या पसंद है।”
अनन्या ने हल्का सा मुस्कराकर कहा, “माँ हूँ… भूल कैसे सकती हूँ।”
विवेक ने एक पल हिम्मत करके कहा, “क्या… हम… कम से कम… दोस्त…?”
अनन्या ने उसकी तरफ देखा, लंबे समय तक। फिर कहा, “दोस्ती तब होती है… जब भरोसा बचा हो।”
विवेक की आंखें नीचे झुक गईं।
अनन्या ने उसी वाक्य में एक और लाइन जोड़ दी, “लेकिन… भरोसा… बनाया भी तो जा सकता है।”
विवेक ने जैसे सांस रोक ली हो, “मतलब?”
अनन्या ने फाइल उठाई, उसे अपने बैग में रखा, “मतलब… आज जो हुआ, वही सच है। कागज़ का फैसला हो गया। लेकिन… इंसान का फैसला… कभी-कभी बाद में होता है।”
विवेक ने धीरे से पूछा, “तो…?”
अनन्या ने बाहर की ओर देखा—जहाँ सड़क पर लोग आगे बढ़ रहे थे।
“तो,” उसने कहा, “बिटिया के लिए… हम एक-दूसरे को इंसान की तरह देखें। आरोप की तरह नहीं।”
फिर उसने सीधे विवेक की तरफ देखा, “और अगर कभी… तुम्हें सच में लगे कि तुम्हें माफी माँगनी है… तो माफी सिर्फ शब्दों से नहीं… आदतों से माँगी जाती है।”
विवेक ने सिर हिलाया, “मैं… कोशिश करूँगा।”
अनन्या ने बिना भावुक हुए कहा, “मैं भी।”
दोनों उठे। कैफ़े के बाहर धूप अब थोड़ी नरम हो चुकी थी।
उन्होंने साथ चलना शुरू किया—कंधे से कंधा मिलाकर नहीं, पर एक ही दिशा में। जैसे दो अलग रास्तों के लोग, एक मोड़ तक साथ आते हैं।
स्टेशन की सीढ़ियों पर पहुँचकर विवेक रुका।
अनन्या भी रुकी।
विवेक ने बहुत धीरे कहा, “आज… पहली बार लगा… कि मैंने कुछ खो दिया… और वो खोना… जीत नहीं है।”
अनन्या की आँखें फिर सजल हुईं, “और मुझे पहली बार लगा… कि मैं अकेली नहीं थी… मैंने खुद को अकेला बना लिया था।”
मेट्रो आई। अनन्या अंदर चली गई। दरवाज़े बंद होने से पहले उसने बस एक बार पीछे देखा। विवेक वहीं खड़ा था—हाथ में वही छोटा-सा डिब्बा नहीं, अब खाली हाथ। पर चेहरे पर कुछ नया था—शायद पछतावे की शुरुआत, शायद सुधार का इरादा।
ट्रेन आगे बढ़ गई।
और अनन्या सोचती रही—कभी-कभी रिश्तों का अंत कागज़ पर लिखा जाता है, लेकिन मन में… वह कहानी तब भी चलती रहती है। फर्क बस इतना होता है कि अब वह कहानी लड़ाई नहीं, सीख बन जाए—तो शायद किसी दिन, किसी मोड़ पर, वही सीख एक नई शुरुआत का रास्ता भी खोल दे।
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