दोपहर का समय था। आंगन में धूप तिरछी होकर गिर रही थी और घर के अंदर मोबाइल की तेज़ रिंग बार-बार हवा में चुभ रही थी। शालिनी ने कपड़े की टोकरी एक तरफ रखी और फोन उठाते ही ठिठक गई। स्क्रीन पर लिखा था—“थाना, महिला हेल्प डेस्क।”
उसका हाथ अपने आप काँपने लगा। मन में पहला ख्याल बिजली की तरह आया—“कहीं आदविक…?”
दूसरा ख्याल उससे भी तेज़—“हे भगवान, मेरे बेटे ने क्या कर दिया?”
उधर से स्वर औपचारिक था, “मैडम, आप शालिनी वर्मा बोल रही हैं?”
“जी…” शालिनी की आवाज़ सूखी पड़ गई।
“आपको शाम छह बजे स्कूल में बुलाया गया है। एक मामला है… माता-पिता की मौजूदगी ज़रूरी है।”
कॉल कटते ही शालिनी कुछ पल तक फोन को घूरती रही। रसोई में खौलती दाल की सीटी बज गई, पर उसके कानों में अब सिर्फ़ वही वाक्य बज रहा था—“एक मामला है…”
उसी समय दरवाज़े की कुंडी खटकी। उसका पति, नीरज, ऑफिस से लौट आया था। नीरज की चाल में हमेशा एक जल्दी होती थी—जैसे दुनिया को समय पर पकड़ना उसकी जिम्मेदारी हो।
“क्या हुआ? चेहरा इतना सफ़ेद क्यों?” उसने पूछा।
शालिनी ने फोन उसके हाथ में थमा दिया, “थाने से कॉल आया है… स्कूल बुला रहे हैं।”
नीरज की भौंहें सिकुड़ गईं, “आदविक ने कुछ किया है क्या?”
शालिनी का गला भर आया, “पता नहीं… पर बुलाया है तो… कुछ तो है।”
आदविक उनके घर का सबसे शांत हिस्सा था। चौदह साल का, दुबला-पतला, आँखों में किताबों-सा ठहराव। वह न गली में लड़ता, न घर में चीखता। बस कभी-कभी अचानक चुप हो जाता, जैसे मन के भीतर कोई दरवाज़ा बंद कर लेता हो।
शाम तक घर में एक अजीब-सी बेचैनी छा गई। नीरज बार-बार घड़ी देखता, शालिनी बार-बार आदविक को देखती।
“तूने स्कूल में कुछ किया है?” उसने धीरे से पूछा।
आदविक ने नज़रें झुका लीं, “कुछ नहीं, मम्मा…।”
“तो पुलिस क्यों बुलाएगी?” शालिनी का स्वर काँप गया।
“मुझे नहीं पता…” वह बस इतना कहकर अपने कमरे में चला गया।
नीरज का सब्र टूटने लगा, “मैंने कहा था तुम्हें, इस उम्र के बच्चों को मोबाइल नहीं देना चाहिए। बाहर क्या देख रहा है, किससे बात कर रहा है—कुछ पता नहीं चलता!”
शालिनी ने पहली बार तीखी नज़र से देखा, “नीरज, अभी आरोप मत लगाओ। पहले सुन लेते हैं कि हुआ क्या है।”
स्कूल का कॉरिडोर शाम के वक्त भी शोर से भरा था, पर उस दिन शोर उन्हें काट रहा था। प्रिंसिपल के कमरे के बाहर दो परिवार खड़े थे—एक तरफ़ शालिनी-नीरज, दूसरी तरफ़ एक सख्त चेहरे वाले दंपति, जिनका लड़का, हर्षित, अपनी माँ के पीछे आधा छुपा हुआ था। पास ही महिला काउंसलर और एक पुलिस अधिकारी भी मौजूद थीं। शालिनी की हथेलियाँ ठंडी पड़ गईं।
प्रिंसिपल ने भीतर बुलाया।
“बैठिए,” उनकी आवाज़ भारी थी, “मामला संवेदनशील है। हमें सावधानी से बात करनी होगी।”
नीरज ने सीधे पूछा, “हमारे बेटे ने क्या किया है?”
प्रिंसिपल ने फ़ाइल खोली, “आपके बेटे आदविक ने आज एक ग्रुप चैट के स्क्रीनशॉट और कुछ रिकॉर्डिंग दी हैं। यह सामग्री स्कूल के कुछ लड़कों द्वारा एक लड़की के बारे में बनाई गई आपत्तिजनक चीज़ों से जुड़ी है।”
शालिनी का सिर घूम गया। “क…किस लड़की के बारे में?”
काउंसलर ने कहा, “दसवीं की छात्रा—समीरा। उसका नाम और तस्वीरें लेकर कुछ लड़कों ने मज़ाक, अफवाहें और अपमानजनक मैसेज बनाए। और… एक लड़के ने दावा किया कि उसके पास ‘कुछ’ वीडियो है।”
शालिनी ने अपनी सांस रोक ली।
नीरज का चेहरा सख्त हो गया, “और इसमें आदविक…?”
प्रिंसिपल ने आदविक की तरफ देखा। आदविक अब भी सिर झुकाए बैठा था। “आदविक ने यह सब देखकर चुप नहीं रहा। उसने सबूत इकट्ठा किए, चैट के स्क्रीनशॉट लिए, और हमारे पास आकर दिया।”
शालिनी की आँखों में एक पल को राहत उतरी, पर तुरंत दूसरा डर उठा—“फिर पुलिस क्यों?”
पुलिस अधिकारी ने शांत स्वर में कहा, “मैडम, क्योंकि ऑनलाइन उत्पीड़न और किसी नाबालिग के खिलाफ आपत्तिजनक सामग्री का मामला कानूनन गंभीर है। स्कूल ने सही किया कि हमें सूचना दी।”
नीरज ने हर्षित के पिता की तरफ देखा, “आपका लड़का शामिल था?”
दूसरी तरफ़ का आदमी तमतमा गया, “हमारा बेटा फँसाया गया है। ये सब बच्चे मज़ाक करते हैं। अब ये आपका बेटा हीरो बन रहा है—सबको फँसाने चला है!”
शालिनी को जैसे किसी ने भीतर से झकझोर दिया। उसने पहली बार आदविक की तरफ देखा—उसकी उंगलियाँ कांप रही थीं, पर उसकी पीठ सीधी थी।
काउंसलर ने नरमी से पूछा, “आदविक, तुमने ये सब क्यों किया? डर नहीं लगा?”
आदविक ने धीरे से सिर उठाया। उसकी आँखों में पानी नहीं था, पर दर्द साफ था।
“डर लगा था… बहुत,” उसने कहा, “पर उससे ज़्यादा गुस्सा आया।”
प्रिंसिपल ने पूछा, “गुस्सा किस बात पर?”
आदविक ने एक साँस ली, “क्योंकि वो सब हँस रहे थे। जैसे किसी की इज़्ज़त खिलौना हो। और अगर मैं चुप रहता… तो मैं भी उन्हीं जैसा बन जाता।”
शालिनी की छाती में कुछ टूट-सा गया। उसे अपने बेटे पर गर्व भी हुआ और डर भी—गर्व उसकी हिम्मत का, डर इस दुनिया का।
फिर प्रिंसिपल ने एक टैबलेट आगे बढ़ाया, “हमने आईटी स्टाफ की मदद से ग्रुप का डेटा निकाला है। यह देखिए।”
स्क्रीन पर चैट खुली थी। एक के बाद एक मैसेज… नामों के आगे हँसने वाले इमोजी… और सबसे नीचे एक लाइन—“वो वीडियो मेरे पास है, चाहो तो दिखा दूँ।”
पुलिस अधिकारी ने पूछा, “यह किसने लिखा?”
हर्षित की माँ ने घबराकर कहा, “ये… ये तो… बच्चों की बात है!”
नीरज की आवाज़ अचानक ऊँची हो गई, “बात? ये बात नहीं है, ये अपराध है!”
शालिनी ने नीरज की तरफ देखा। पहली बार उसने उसके चेहरे पर सिर्फ़ गुस्सा नहीं, एक असली डर देखा—अपने बेटे को लेकर नहीं, अपने समाज को लेकर।
पुलिस अधिकारी ने अगला सवाल किया, “आदविक, तुम्हें ये सब कैसे मिला?”
आदविक ने धीरे से कहा, “वो लोग स्कूल में खुद को बहुत स्मार्ट समझते थे। ग्रुप में मुझे इसलिए रखा गया था क्योंकि मैं चुप रहता हूँ। उन्हें लगा मैं कुछ कहूँगा नहीं। पर… मैं देख रहा था।”
काउंसलर ने पूछा, “तुमने सीधे टीचर को क्यों नहीं बताया?”
आदविक ने आवाज़ बहुत धीमी कर दी, “क्योंकि जब पहले किसी ने एक लड़की पर कमेंट किया था… टीचर ने कहा था—‘लड़कियां भी तो मुस्कुरा देती हैं।’ सब हँस पड़े थे। मुझे लगा, अगर मैं खाली शिकायत करूँगा तो उल्टा उसी लड़की पर बात जाएगी।”
शालिनी का दिल कस गया। उसने समझ लिया—बच्चे जितने बदल रहे हैं, बड़े उतने ही पीछे छूट रहे हैं।
प्रिंसिपल ने गंभीर स्वर में घोषणा की, “हम स्कूल की तरफ से कठोर कार्रवाई करेंगे। जिन बच्चों ने सामग्री बनाई, साझा की, या धमकी दी—उनकी सस्पेंशन और काउंसलिंग दोनों होगी। और यदि वीडियो जैसी चीज़ का कोई प्रमाण मिला—तो पुलिस प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।”
कमरे में सन्नाटा छा गया। हर्षित के पिता का चेहरा उतर गया।
शालिनी ने आदविक का हाथ पकड़ा। उस हाथ में अब भी हल्की-सी कंपकंपी थी, पर वह हाथ गर्म था—जिंदा, जागता हुआ।
बाहर निकलते समय पुलिस अधिकारी ने शालिनी से कहा, “मैडम, आपने अपने बेटे को सही संस्कार दिए। पर अब आपको उसे सुरक्षा और समर्थन भी देना होगा। ऐसे मामलों में जो बच्चा आवाज़ उठाता है, उसे अकेला करने की कोशिश होती है।”
शालिनी ने सिर हिलाया। उसे अचानक याद आया—पिछले हफ्ते आदविक ने कहा था, “मम्मा, कुछ लड़के बहुत गंदा बोलते हैं।” तब उसने बस इतना कहा था—“तू ध्यान मत दे।”
आज उसे लगा जैसे उसने उस दिन अपने बेटे को अधूरा जवाब दिया था।
कार में बैठते ही नीरज ने एकदम शांत आवाज़ में पूछा, “तूने हमें पहले क्यों नहीं बताया?”
आदविक ने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा, “पापा… आपने हमेशा कहा है कि ‘लड़का हो तो मजबूत बनो।’ मुझे लगा, अगर मैं डर की बात करूँगा तो आप कहेंगे—‘रहने दे, लड़कों की बातें हैं।’”
नीरज की पलकों ने जैसे झपकना भूल गया।
शालिनी ने नीरज की तरफ देखा। उसके चेहरे पर एक ऐसी ग्लानि थी, जो शब्दों से बड़ी होती है।
घर पहुँचकर नीरज ने आदविक को अपने पास बैठाया। बिना ऊँचे स्वर के, बिना आदेश के।
“सुन,” उसने कहा, “आज मुझे समझ आया कि ‘लड़का’ होना कोई छूट नहीं, जिम्मेदारी है। और जिम्मेदारी तुम्हारी नहीं—पहले मेरी।”
आदविक ने पहली बार हल्की-सी राहत की सांस ली।
रात को खाना खाते समय शालिनी ने धीरे से कहा, “हम हमेशा सोचते हैं बेटी को बचाना है। पर बेटों को ‘संभालना’ भी उतना ही जरूरी है। क्योंकि अगर बेटा गलत रास्ते पर गया… तो किसी की बेटी नहीं बचेगी।”
नीरज ने सिर झुकाया, “मैं आज तक यही सोचता रहा कि बेटी वालों की चिंता ज्यादा होती है… पर सच यह है कि बेटों वाली माँ-बाप की जिम्मेदारी अलग और भारी होती है। बेटों को सिर्फ़ करियर नहीं, चरित्र भी सिखाना पड़ता है।”
शालिनी की आँखें नम हो गईं।
“और उन्हें ये भी सिखाना पड़ता है,” उसने धीरे से जोड़ा, “कि किसी लड़की की इज़्ज़त करना एहसान नहीं है… ये इंसान होने की शर्त है।”
उस रात शालिनी देर तक सो नहीं पाई। वह बालकनी में खड़ी थी। दूर कहीं गली में बच्चों की हँसी सुनाई दे रही थी। उसे पहली बार समझ आया कि घर में बेटे का बड़ा होना सिर्फ़ खुशी नहीं—एक परीक्षा भी है।
एक परीक्षा, जिसमें पास होने का मतलब सिर्फ़ अपने बच्चे को अच्छा बनाना नहीं, बल्कि किसी और के बच्चे को सुरक्षित रखना भी है।
सुबह जब आदविक स्कूल जाने के लिए तैयार हुआ, शालिनी ने उसके कंधे पर हाथ रखा और कहा, “डर लगे तो बताना। अकेले मत लड़ना।”
आदविक ने सिर हिलाया, “मम्मा… आज मैं अकेला नहीं हूँ।”
दरवाज़ा बंद हुआ तो नीरज ने धीमे से कहा, “कल से… मैं भी स्कूल की सेफ्टी कमेटी की मीटिंग में जाऊँगा। सिर्फ़ माँएं ही क्यों जाएँ? बेटों वाला बाप भी तो जिम्मेदार है।”
शालिनी मुस्कुरा दी।
उस मुस्कान में राहत थी—और एक नई शुरुआत भी।
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