“अरे… फिर से नेटवर्क चला गया!”
रिया ने मोबाइल को कान से हटाकर स्क्रीन पर घूरा। ऑफिस की मीटिंग अभी-अभी खत्म हुई थी, दिमाग थका हुआ था, और बैग में रखा चार्जर पता नहीं कहाँ रह गया था। उसने जल्दी से चार्जिंग पॉइंट ढूँढा, लेकिन कॉरिडोर में भीड़ थी। सामने से HR की मैम आती दिखीं, तो वह वहीं रुक गई।
रिया के माथे पर शिकन इसलिए नहीं थी कि फोन बंद होने वाला था—शिकन इसलिए थी कि आज उसके ससुर का रिटायरमेंट डे था। घर वालों ने सुबह से ही परिवार के ग्रुप में फोटो, बधाई संदेश और “सरप्राइज़ डिनर प्लान” की बौछार कर रखी थी। उसके पति, समीर ने तो बाकायदा सुबह ही अपने पिता के साथ पुरानी तस्वीर डालकर लंबा-सा कैप्शन लिख दिया था—“मेरी प्रेरणा, मेरा गर्व, मेरे सुपरहीरो।”
और रिया?
रिया ने दिनभर क्लाइंट कॉल्स, एक्सेल शीट्स, डेडलाइन और ऑफिस की राजनीति के बीच बस इतना सोचा था—“शाम को घर जाकर अच्छे से बोल दूँगी।”
पर अब मोबाइल की बैटरी 2% थी, और उसे याद आया कि सुबह समीर ने जाते-जाते कहा था—“आज भूलना मत, पापा बहुत इमोशनल हैं।”
रिया का मन खिन्न हो गया।
उसे यह सब दिखावा लगता था। वह किसी दिन को मानती ही नहीं थी। उसके लिए रिश्ते पोस्ट से नहीं, व्यवहार से बनते थे। लेकिन इस घर में व्यवहार से ज्यादा “रिस्पॉन्स” और “रिएक्शन” का हिसाब रखा जाता था। कौन कितने प्यार से लिखता है, कौन कितने इमोजी लगाता है, किसने कब कमेंट किया—यह सब मानो परिवार की नई भाषा थी।
ऑफिस से निकलते ही वह मेट्रो स्टेशन की ओर भागी। भीड़, धक्का, धुँधली साँझ—सब कुछ आज उसे भारी लग रहा था। मेट्रो में बैठकर उसने फोन ऑन रखा, पर बैटरी ने जवाब दे दिया। स्क्रीन काली।
“बस यही बाकी था,” उसने बुदबुदाकर बैग कसकर पकड़ लिया।
घर पहुँची तो ड्राइंग रूम में अजीब-सी खामोशी थी। टीवी चालू था, पर कोई देख नहीं रहा था। समीर सोफे पर बैठा था—अखबार उल्टा पकड़े, चेहरे पर कठोरता। सास—उमा जी—रसोई में थीं, लेकिन खड़खड़ाहट में भी नाराज़गी की आवाज़ थी। ससुर—रघुवीर जी—अपने कमरे में थे।
रिया ने चुपचाप जूते उतारे। मन में आया कि सीधे जाकर ससुर के पैर छू ले, बात खत्म हो जाए। लेकिन वह जानती थी—यह “बात” अब पैर छूने से खत्म नहीं होगी।
वह कमरे में गई, हाथ-मुँह धोया, कपड़े बदले और फिर रसोई में आकर सब्ज़ी काटने लगी। उसे लगा, काम करते-करते माहौल नरम हो जाएगा। पर पीछे से समीर की आवाज़ आई—
“तुम्हें कुछ याद रहता है या नहीं?”
रिया ने बिना पलटे कहा, “क्या?”
समीर झुँझला गया। “आज क्या था?”
“आज… बुधवार,” रिया ने सामान्य-सा कहा, जैसे उसने सच में कुछ खास याद नहीं किया।
समीर की आवाज़ तेज़ हुई। “दिन नहीं पूछ रहा हूँ, रिया! आज पापा का रिटायरमेंट डे था। पूरा घर सुबह से तैयारी कर रहा था। सबने मैसेज किया, पोस्ट किया, फोटो डाली… और तुम? तुमने एक लाइन भी नहीं लिखी!”
रिया ने चाकू रोक दिया। उसकी उंगलियाँ ठंडी हो गईं।
“मेरा फोन… बैटरी… और ऑफिस…”
“ऑफिस का बहाना मत दो,” समीर कटाक्ष में बोला। “तुम्हें अगर सच में सम्मान होता, तो तुम किसी भी तरह मैसेज कर देती। स्टेटस नहीं डालना तुम्हें पसंद नहीं है—ठीक है। लेकिन इस घर में कुछ बातों की इज़्ज़त होती है।”
रिया ने धीरे से सांस ली। वह लड़ना नहीं चाहती थी। “मैं अभी पापा जी से मिलकर—”
“मिलकर क्या?” समीर ने बीच में ही काट दिया। “बस बोल दोगी? रिटायरमेंट के दिन उन्हें सबके सामने क्या दिखेगा? कि बेटे की पत्नी को याद ही नहीं!”
रिया का मन हुआ कह दे—“रिटायरमेंट याद रखने से नहीं, साथ देने से सम्मान होता है।”
पर उसने शब्दों को निगल लिया। वह बहस के लिए नहीं बनी थी।
खाना बनाते हुए उसने सोचा—“ठीक है, अभी जाकर पापा जी को विश कर देती हूँ।”
पर जब वह उनके कमरे के पास पहुँची, अंदर से हल्की खाँसी और कुर्सी खिसकने की आवाज़ आई। वह दरवाज़ा खटखटाने ही वाली थी कि सास की आवाज़ पीछे से आई—
“रहने दे, अभी नहीं। तुम्हें दिनभर फुर्सत नहीं थी, अब क्या याद आया?”
रिया का गला सूख गया। वह वापस रसोई में आ गई।
रात को खाना खाया गया, पर जैसे सबने बस पेट भरने के लिए खाया हो। समीर ने मोबाइल उठाया और स्क्रीन दिखाकर कहा—
“देखो, नेहा भाभी ने पापा के लिए क्या लिखा है… और तुमने तो कुछ भी नहीं।”
रिया ने पहली बार आँख उठाकर कहा, “समीर, नेहा भाभी मुंबई में हैं। वो रोज़ पापा को चाय बनाकर नहीं देतीं। मैं देती हूँ।”
समीर चुप हो गया, लेकिन उसका चेहरा और सख्त हो गया।
“तुम हर बात में हिसाब क्यों लगाने लगती हो?”
रिया ने धीरे से प्लेट रख दी। “क्योंकि आज मुझे हिसाब में ही परखा जा रहा है।”
उस रात रिया को नींद नहीं आई। उसे लगा वह किसी अजीब प्रतियोगिता में फँस गई है—जहाँ इमोजी और कैप्शन रिश्तों की गवाही बन गए हैं।
सुबह उठकर उसने चुपचाप अपने ससुर के लिए चाय बनाई, उनके कमरे में गई, कप सामने रखा और धीरे से कहा—
“पापा जी… कल मैं… ऑफिस में फँस गई थी। हैप्पी रिटायरमेंट। आप मेरे लिए बहुत… बहुत महत्वपूर्ण हैं।”
रघुवीर जी ने चाय की तरफ देखा, फिर रिया की तरफ। उनके चेहरे पर कोई गुस्सा नहीं था, बस थकान थी।
उन्होंने धीमे से पूछा, “इतना डर क्यों रही हो बेटी?”
रिया की आँखें भर आईं। “डर… इसलिए कि यहां मेरी नीयत कम, मेरा पोस्ट ज़्यादा देखा जाता है।”
रघुवीर जी कुछ क्षण चुप रहे। फिर बोले, “मैंने भी कल वही सोचा… कि मैं तो जीवनभर काम करता रहा, अब रिटायर हो गया… और आज मेरे रिश्ते मोबाइल की स्क्रीन पर टिक गए।”
रिया चौंक गई। उसे पहली बार लगा कि ससुर उसे समझते हैं—बिना कहे भी।
इसी बीच सास उमा जी कमरे में आईं। “आप चाय पी लीजिए… और आज शाम को हमारे रिश्तेदार भी आने वाले हैं। सब कह रहे हैं, रिटायरमेंट पार्टी रखो।”
रघुवीर जी ने चाय का कप उठाया, धीरे से बोले, “पार्टी रखेंगे… पर शोर नहीं।”
उमा जी ने तुरंत कहा, “तो फिर ग्रुप में सबको बता दूँ? स्टेटस डाल दूँ?”
रघुवीर जी ने कप नीचे रख दिया। “उमा, बस… एक दिन के लिए फोन से बाहर निकलो।”
उमा जी जैसे सुनकर भी नहीं सुन पाईं। “पर लोग क्या सोचेंगे?”
रिया ने मन में सोचा—“यही तो…”
दोपहर को रिया ऑफिस चली गई। शाम को लौटते वक्त उसे समीर का मैसेज मिला—
“आज घर जल्दी आ जाना। कुछ लोग आ रहे हैं। तुम पापा के लिए एक पोस्ट जरूर डाल देना। कम से कम आज तो…”
रिया ने मैसेज पढ़कर फोन लॉक कर दिया।
उसके भीतर कुछ टूटने लगा था।
घर पहुँची तो देखा, सास रसोई में तैयारी कर रही थीं। समीर हॉल में कुर्सियाँ सजा रहा था। और रघुवीर जी अपने कमरे में चुपचाप बैठे थे—पुरानी फाइलें, पुराने कार्ड्स, रिटायरमेंट का लेटर… सब सामने रखा था।
रिया उनके पास गई। “पापा जी… सब लोग आपके लिए पार्टी रख रहे हैं।”
रघुवीर जी ने फीकी मुस्कान के साथ कहा, “पार्टी नहीं बेटी, प्रदर्शन। सबको दिखाना है कि हमने कितना किया।”
रिया ने धीमे से कहा, “मैं पोस्ट नहीं डालूंगी।”
रघुवीर जी ने उसकी तरफ देखा। “डरती हो?”
“डर… नहीं,” रिया ने कहा, “थक गई हूँ। मैं रिश्ते निभाती हूँ, पर हर बार मुझे साबित करना पड़ता है कि मैं निभा रही हूँ।”
रघुवीर जी ने लंबी सांस ली। “आज… तुम मेरे साथ बैठो।”
शाम को रिश्तेदार आ गए। हँसी, फोटो, सेल्फी, केक—सब हुआ। सास बार-बार पूछती रहीं—“रिया, पोस्ट डाल दी?”
समीर भी आँखों से इशारा करता रहा।
रिया शांत रही।
केक कटने के समय अचानक रघुवीर जी ने सबको रोक दिया।
“एक बात कहनी है,” उन्होंने शांत आवाज़ में कहा।
सब चुप हो गए।
उन्होंने समीर की तरफ देखा। “बेटा, तुमने सुबह जो पोस्ट डाली, बहुत सुंदर थी। तुम्हारी भावना का सम्मान करता हूँ।”
फिर उन्होंने उमा जी की तरफ देखा। “और उमा, तुमने भी सबको बुलाकर अच्छा किया।”
सबने राहत की सांस ली—अब शायद भाषण खत्म होगा।
पर रघुवीर जी ने आगे कहा, “लेकिन आज मैं एक बात साफ करना चाहता हूँ। मेरे रिटायर होने का मतलब यह नहीं कि मेरे रिश्ते भी ‘अपडेट’ होकर चलें। मैं अपनी बहू को इस बात पर नहीं परखूंगा कि उसने स्टेटस डाला या नहीं। मैं उसे इस बात पर देखूंगा कि उसने घर में क्या दिया—समय, सम्मान और साथ।”
सास का चेहरा उतर गया। समीर को जैसे किसी ने चुप्पी का झटका दे दिया।
रघुवीर जी ने रिया का हाथ पकड़कर कहा, “रिया, तुमने रोज़ मेरी चाय बनाई, मेरे घुटनों की दवा याद रखी, मेरी फाइलें संभालीं, और कई बार बिना बोले मेरा मूड समझा। तुमने जो किया, वो किसी स्टेटस से बड़ा है।”
रिया की आंखें छलक आईं।
समीर ने धीरे से कहा, “पापा… लेकिन सब लोग…”
रघुवीर जी ने शांत होकर जवाब दिया, “सब लोग कल भूल जाएंगे। लेकिन घर में अगर हर दिन यह डर बना रहेगा कि किसने क्या पोस्ट किया… तो हम एक-दूसरे से दूर हो जाएंगे। रिश्ते स्क्रीन पर नहीं, आँखों में दिखते हैं।”
सन्नाटा छा गया।
फिर उमा जी ने धीरे से कहा, “मैं… मैंने रिया को कल बहुत कुछ कहा। मुझे लगा… बहू का प्यार दिखना चाहिए।”
रिया ने पहली बार बिना कांपते हुए कहा, “मम्मी जी, प्यार दिखता है… पर आपका ‘दिखाने’ का तरीका मुझे चोट पहुंचाता है।”
उमा जी ने उसकी तरफ देखा। शायद पहली बार उन्हें समझ आया कि बहू को उपदेश देकर नहीं, अपनाकर रखा जाता है।
उन्होंने धीरे से रिया के माथे पर हाथ रखा। “बेटी… माफ कर दो। मैं भी… आदतों की कैदी हूँ।”
समीर का चेहरा झुका हुआ था। उसने रिया की तरफ देखा, आवाज़ नरम हुई—“मैंने कल तुम्हें गलत समझा।”
रिया ने कोई बड़ा जवाब नहीं दिया। बस इतना कहा, “अब समझना ही काफी है।”
उस रात जब मेहमान चले गए, रिया रसोई समेट रही थी। समीर पीछे आया, धीरे से बोला, “तुम चाहो तो अब पोस्ट डाल दो…”
उसने आधा मजाक, आधा संकोच में कहा।
रिया मुस्कुराई। “आज नहीं। आज मैंने असली बात कही है।”
समीर ने उसका हाथ पकड़कर कहा, “और मैं… अब कोशिश करूँगा कि तुम्हें साबित न करना पड़े।”
अगली सुबह सास ने अपने फोन पर परिवार के ग्रुप में एक छोटा सा मैसेज भेजा—
“कल से हमने एक नियम बनाया है: घर में रिश्तों की कीमत पोस्ट से नहीं, व्यवहार से होगी।”
रिया ने मैसेज देखा और पहली बार उसे लगा कि उसके ससुराल में भी कुछ बदल सकता है—धीरे-धीरे, सच्चाई से।
और मोबाइल का स्टेटस—अब सिर्फ़ स्क्रीन पर नहीं, दिल के भीतर भी सही जगह पर आ गया था।
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