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भरोसा

 रात के करीब साढ़े सात बज रहे थे।

दिसंबर की ठंड दुकान के भीतर तक घुस आई थी।
मैं कैश काउंटर समेट रहा था कि तभी बाहर से बहुत धीमी-सी आवाज़ आई—

“अंकल… सुन रहे हो?”

मैंने सिर उठाया।
दुकान के बाहर सड़क पर पीली स्ट्रीट-लाइट के नीचे एक दुबली-सी परछाईं खड़ी थी।
न उम्र ठीक से समझ आ रही थी, न चेहरे के भाव।

“क्या हुआ बेटा?” मैंने पूछा।

वह दो कदम आगे बढ़ी।
छोटी-सी लड़की थी—नंगे पैर, हाथ में एक पुराना कपड़ा थामे।
कपड़े के भीतर कुछ छुपाया हुआ था।
आवाज़ काँप रही थी—

“अंकल… ये… अगर आप बुरा न मानो तो… आधा किलो चावल दे दोगे?”

मेरे हाथ रुक गए।
“पैसे हैं?”

वह तुरंत सिर हिला गई।
“नहीं… लेकिन मम्मी ने कहा है… अगर कोई दया कर दे, तो उसे भगवान समझकर शुक्रिया कहना।”

मैंने पूछा,
“मम्मी कहाँ हैं?”

उसने कपड़े को थोड़ा खोला।
अंदर एक बहुत छोटा-सा बच्चा था—शायद छह-सात महीने का।
उसकी साँसें तेज़ चल रही थीं।

“बुखार है,” उसने कहा।
“दिन से रो रहा है… दूध नहीं है… इसलिए आज खाना नहीं बनेगा… तो सोचा थोड़ा चावल ले लूँ।”

उसकी बातों में शिकायत नहीं थी, बस मजबूरी थी।

मैंने चावल का थैला निकाला, साथ में दाल और एक दूध का पैकेट भी रख दिया।
उसने दूध देखते ही मना कर दिया—

“नहीं अंकल… इतना ज़्यादा मत दीजिए… बाद में लौटाना पड़ेगा… मैं छोटा हूँ, लेकिन झूठ नहीं बोलूँगी।”

मैं मुस्कुरा दिया।
“ठीक है,” मैंने कहा,
“तो एक काम करना… जब बड़े हो जाओ, तब किसी और बच्चे को ऐसे ही दे देना।”

वह कुछ पल चुप रही।
फिर पहली बार उसकी आँखों में पानी भर आया।
“पक्का?”

मैंने सिर हिलाया।

वह दोनों हाथों से थैला पकड़कर जाने लगी।
दो कदम चलकर रुकी, पीछे मुड़ी और बोली—
“अंकल… अगर मम्मी ठीक हो गईं, तो मैं आपको रोज़ नमस्ते करने आऊँगी।”

अगली सुबह गली में शोर था।
लोग जमा थे।
किसी ने बताया—रात को उस लड़की की माँ नहीं बच पाई।

मैं दौड़कर वहाँ पहुँचा।
झुग्गी के कोने में वही लड़की बैठी थी।
गोद में छोटा बच्चा, आँखें खाली।
पास ही रखा था—वही दूध का पैकेट, जस का तस।

उसने मुझे देखा।
धीरे से बोली—
“अंकल… मैंने कोशिश की थी… सच में…”

उस पल मुझे कुछ भी कहना नहीं सूझा।
बस उसके पास बैठ गया।

आज सात साल बीत चुके हैं।
वह लड़की अब मेरे घर में है।
भाई को गोद में लेकर स्कूल जाती है।
हर शाम दुकान बंद करते वक्त दरवाज़े पर खड़ी होकर कहती है—

“अंकल… आज भी आपने किसी का दिन अच्छा कर दिया।”

और मैं सोचता हूँ—
शायद उस रात मैंने उसे चावल नहीं दिया था…
मैंने उसे भरोसा दे दिया था,
कि दुनिया पूरी तरह निर्दयी नहीं है।


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