मंदिर की घंटी की आवाज़ जब सुबह-सुबह हवा में घुलती, तो उसके साथ एक और चीज़ भी जाग उठती—पुरानी हवेली के पीछे वाले आँगन में रखा मिट्टी का घड़ा और उस घड़े के पास बैठी एक लड़की की आँखों में चमक। उसका नाम था इरा। गाँव वाले उसे “अजीब” कहते थे, क्योंकि वह बाकी लड़कियों की तरह चूड़ियाँ चुनने या मेहंदी के डिज़ाइन पर बहस करने के बजाय मिट्टी को उँगलियों से पढ़ती थी—जैसे मिट्टी कोई किताब हो और वह उसके अक्षर पहचानती हो।
इरा का घर हवेली नहीं था, हवेली के पास बनी छोटी-सी कोठरी थी। पिता हरिदत्त पुराने ज़माने के कुम्हार थे; उनके हाथ में मिट्टी आती तो फूल बन जाती, और उनके चेहरे पर गरीबी आती तो भी मुस्कान बनकर टिक जाती। माँ ललिता हर काम में इरा की पीठ थपथपाती रहतीं, मगर उनकी चिंता एक ही रहती—“बेटी, इतना मिट्टी-मिट्टी मत करती रह… हाथ खुरदरे हो जाएंगे, लोग क्या कहेंगे?”
इरा हँस देती, “लोग कहेंगे तो क्या, माँ? मिट्टी तो मेरे हाथ में भी बोलती है।”
उस दिन भी दोपहर की धूप चाक पर गिर रही थी। इरा ने पानी की कटोरी पास रखी, दोनों हथेलियाँ भिगोईं और चाक घुमाया। मिट्टी ऊपर उठी, उसकी उँगलियों के साथ घूमी और धीरे-धीरे एक छोटी-सी दीपक-आकृति लेने लगी। इरा की सांसें एक लय में थीं—जैसे वह कोई गीत गा रही हो, मगर शब्दों के बिना।
तभी बाहर से आवाज़ आई, “इरा, जल्दी आ! स्कूल से चिट्ठी आई है!”
इरा के लिए “चिट्ठी” मतलब अक्सर फीस का नोटिस या किसी प्रतियोगिता की सूचना। वह बाहर दौड़ी। दुपट्टा कंधे पर सँभालते हुए उसने देखा—गाँव के प्रधान जी के घर से आए लड़के ने एक काग़ज़ पकड़ा रखा था। उस पर शहर का नाम चमक रहा था—“राज्य हस्तकला परिषद”।
कागज़ में लिखा था कि जिले के कारीगरों और नवाचार करने वालों के लिए एक प्रदर्शनी होने जा रही है, और चुने हुए लोगों को शहर में अपने काम का स्टॉल लगाने का मौका मिलेगा। हरिदत्त की आँखें पढ़ते-पढ़ते भर आईं। “बेटी… ये तो… हमारे लिए है।”
इरा ने खुशी से माँ की ओर देखा। माँ ने भी भीतर-ही-भीतर मुस्कराने की कोशिश की, मगर उनके माथे की रेखाएँ नहीं खुलीं। “शहर… अकेली… औरतों के बीच… प्रदर्शनी… पता नहीं।”
इरा ने पिता का हाथ पकड़ा, “बाबा, मैं जाऊँगी। मैं अपने हाथों से जवाब दूँगी।”
“किसको?” पिता ने धीरे से पूछा।
“सबको,” इरा ने कहा, “जो कहते हैं कि हमारे जैसे लोग बस गुज़ारा करते हैं, कुछ बना नहीं सकते।”
चिट्ठी मिलने के दो दिन बाद गाँव में एक और खबर फैल गई। पास के कस्बे से एक बड़ा व्यापारी आया था, नाम था रघुवीर सेठ। वह मिट्टी के बर्तन खरीदकर शहर में महँगे दाम पर बेचता। उसके साथ उसकी पत्नी भानुमति और बेटा नवीन भी आए थे। रघुवीर को हरिदत्त के हाथों का काम पसंद था, मगर उसकी नज़र बार-बार इरा पर टिक जाती—इरा के बनाए दीपक, इरा की चुप्पी, और इरा का आत्मविश्वास।
रघुवीर ने पिता से कहा, “हरिदत्त जी, काम तो बढ़िया है… पर आजकल बाजार में चमक चाहिए। आपकी लड़की को समझाइए, थोड़ा ‘फिनिशिंग’ सीखे। रंग-रोगन, चमक, पैकिंग… शहर में यही बिकता है।”
इरा ने पहली बार बीच में बोल दिया, “चमक मिट्टी में नहीं होती, सेठ जी। चमक तो सोच में होती है।”
भानुमति ने एक तीखी हँसी हँसी, “वाह… बोलती भी है! गाँव की लड़कियाँ ज्यादा बोलने लगें तो घर उलट-पलट हो जाता है।”
इरा ने उनकी ओर देख कर शांत स्वर में कहा, “घर उलटता नहीं, सिर्फ पुराने तख्त बदलते हैं।”
भानुमति को जैसे किसी ने अपमान कर दिया हो। उन्होंने रघुवीर का हाथ खींचा, “चलो जी, हमें कहाँ बहस करनी है।”
जब वे जाने लगे, नवीन पीछे रह गया। उसका चेहरा सीधा-सादा था, आँखों में कुछ जिज्ञासा। उसने इरा के हाथों पर मिट्टी के निशान देखे और बोला, “आपका काम… अच्छा है। आपने कभी शहर की प्रदर्शनी देखी है?”
इरा ने सिर हिलाया, “नहीं। लेकिन मैं दिखाऊँगी।”
नवीन ने मुस्कराकर कहा, “मैं भी वहाँ रहूँगा। मेरे पिता का स्टॉल भी होगा। अगर आपको कुछ मदद चाहिए, तो…” वह वाक्य पूरा नहीं कर पाया, शायद उसे खुद समझ नहीं आया कि वह क्या कह रहा है।
इरा ने बस इतना कहा, “मदद मुझे नहीं चाहिए, बस जगह चाहिए।”
गाँव लौटते ही माँ ने इरा को समझाना शुरू कर दिया। “बेटी, प्रदर्शनी में जाना… ठीक है, पर अकेले नहीं। और ये लोग—सेठ लोग—उनके साथ ज्यादा उलझना नहीं।”
इरा ने माँ की बात सुनकर धीमे से पूछा, “माँ, आप डरती क्यों हो?”
माँ ने जवाब देने के बजाय चूल्हे में लकड़ी सरकाई। आग भड़की, धुआँ उठा। फिर उन्होंने कहा, “क्योंकि मैं जानती हूँ दुनिया कैसी है।”
“और मैं जानती हूँ,” इरा ने कहा, “दुनिया को कैसा बनाया जा सकता है।”
प्रदर्शनी का दिन आया। शहर तक जाने के लिए बस पकड़ी गई। पिता के पास किराया कम था, माँ ने अपनी चाँदी की पायल उतारकर रख दी। “ले जा… बस, लौट आना।”
इरा ने पायल को हथेली पर रखा—वह ठंडी थी, मगर उसके अंदर माँ का गर्म भरोसा था। उसने पायल वापस कर दी, “माँ, इसे रहने दो। मैं लौटकर तुमको नई पायल दूँगी।”
माँ ने गुस्से में नहीं, बेबसी में कहा, “नई पायल से क्या होगा, बेटी? लोग… लोग तुम्हें तोलेंगे।”
इरा ने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा, “तोले जाने से डरती नहीं मैं। मैं खुद को जानती हूँ।”
शहर की प्रदर्शनी जगमगा रही थी। बड़े-बड़े स्टॉल, लाइटें, चमकदार बोर्ड, रंगीन कपड़े, लोगों की भीड़, कैमरे। इरा का स्टॉल कोने में था—न छोटा, न बड़ा। उसके पास सिर्फ उसके बनाए बर्तन थे: कुछ दीये, कुछ छोटे-छोटे गुलदान, कुछ खिलौने, और एक खास श्रृंखला—मिट्टी से बने “कहानियों के पात्र”। हर पात्र के चेहरे पर अलग भाव—दुख, हँसी, उम्मीद, अचरज। इरा ने उन्हें रंगों से नहीं, आकृतियों से जिंदा किया था।
भीड़ आगे-आगे बड़े नामों की तरफ जा रही थी। इरा के स्टॉल पर कुछ पल कोई नहीं रुका। उसके हाथ सूख रहे थे, गला भी, मन भी। मगर उसने अपने भीतर वही लय पकड़ ली—जैसे चाक घूमता है और मिट्टी धैर्य रखती है।
तभी एक लड़की आई—शहर की, साधारण कपड़ों में। उसने इरा की एक छोटी मूर्ति उठाई—एक स्त्री का चेहरा, जिसके होंठ पर हल्की मुस्कान थी और आँखों में आँसू। वह लड़की ठिठक गई, “ये… कैसे बनाया?”
इरा ने कहा, “जब कोई मुस्कान रोककर रखता है, तब ऐसा चेहरा बनता है।”
लड़की की आँखें भर आईं। उसने मूर्ति खरीद ली। फिर उसके पीछे-पीछे दो लोग और रुके, फिर चार, फिर आठ। धीरे-धीरे इरा के स्टॉल पर भीड़ बन गई—लेकिन किसी चमक से नहीं, किसी सच्चाई से।
उसी दिन निर्णायक मंडल की टीम भी घूम रही थी। उनके साथ कैमरा और दो सहायक थे। वे बड़े स्टॉल पर फोटो खिंचवा रहे थे। इरा को दूर से देखकर उन्होंने आगे बढ़ने की कोशिश नहीं की। तभी वही शहर की लड़की, जिसने मूर्ति खरीदी थी, जोर से बोली, “सर, यहाँ आइए। यह कला नहीं देखेंगे?”
एक निर्णायक ने अनमनेपन से कदम बढ़ाए। इरा के सामने आकर उसने पूछा, “किस तरह का नवाचार है?”
इरा ने शांत होकर जवाब दिया, “मैं मिट्टी को केवल बर्तन नहीं बनाती। मैं मिट्टी को भाव बनाती हूँ। लोग जिन भावों को बोल नहीं पाते, मैं उन्हें आकार देती हूँ।”
नवीन वहीं खड़ा सुन रहा था। उसके चेहरे पर सचमुच सम्मान था। मगर थोड़ी दूर पर भानुमति ने यह दृश्य देख लिया। वह तेज़ी से आईं, “अरे, ये तो वही लड़की है! मिट्टी-गिट्टी वाली। इसे क्यों इतना सिर पर चढ़ा रहे हैं?”
इरा ने उनकी तरफ देखकर कहा, “मैडम, सिर पर वही चढ़ता है जो हल्का होता है। मेरा काम हल्का नहीं।”
भानुमति हकबका गईं। निर्णायक मंडल ने इरा के काम को ध्यान से देखा। एक सदस्य ने उँगली से एक पात्र के चेहरे की रेखा छुई और बोला, “यह अभिव्यक्ति… असाधारण है।”
फाइनल राउंड में सिर्फ पाँच कारीगर चुने गए। सबसे बड़ा नाम रघुवीर का था। सबको लग रहा था इनाम उसी को मिलेगा—उसके स्टॉल पर भीड़ थी, पैकिंग चमकदार, गाउन पहनी मॉडल्स भी थीं जो सामान दिखा रही थीं। इरा के पास न मॉडल थी, न चमकदार पैकिंग—बस मिट्टी और धैर्य।
शाम को पुरस्कार घोषणा होने लगी। मंच पर माइक चमक रहा था, सामने कुर्सियों की कतारें। हरिदत्त दूर से देखने आए थे, टिकट किसी तरह जुटाया था। माँ गाँव में मंदिर की सीढ़ियों पर बैठकर दीपक जला रही थीं, जैसे प्रदर्शनी का सारा परिणाम उसी ज्योति पर टिका हो।
घोषणा हुई—तीसरा पुरस्कार, दूसरा पुरस्कार… लोग तालियाँ बजा रहे थे। इरा के हाथ काँप रहे थे, मगर उसने उन्हें अपनी हथेलियों में बंद कर लिया। पहला पुरस्कार के लिए मंच पर लिफाफा खोला गया।
“इस वर्ष राज्य हस्तकला परिषद का प्रथम पुरस्कार जाता है—इरा हरिदत्त को।”
कुछ सेकंड इरा को लगा कि वह सुन नहीं रही, बस उसके कानों में किसी चाक की घूमती आवाज़ है। फिर तालियों का शोर, कैमरे, लोगों के “वाह!” और हरिदत्त की आँखों से बहते आँसू—सब एक साथ उमड़ पड़े।
इरा मंच पर पहुँची। उसके माथे पर पसीना था, कपड़े साधारण, पर आँखों में ऐसी रोशनी थी जो शहर की लाइटों से भी तेज़ लग रही थी। निर्णायक ने ट्रॉफी आगे बढ़ाई। तभी इरा ने माइक लिया।
“मैं एक अनुरोध करना चाहती हूँ,” इरा ने कहा, “यह ट्रॉफी… मैं अपने हाथ से नहीं… अपने पिता के हाथ से लेना चाहती हूँ।”
सभी चौंक गए। हरिदत्त को मंच पर बुलाया गया। वह काँपते कदमों से आए, जैसे जीवन की सारी थकान अब मंच की सीढ़ियों में उतर रही हो। इरा ने ट्रॉफी उनके हाथों से ली और फिर उन्हें झुककर प्रणाम किया। पूरा हॉल खड़ा हो गया।
तभी भानुमति की ठंडी आवाज़ पीछे से आई, “हम्म… ड्रामा भी खूब है।”
इरा ने मंच से ही उनकी तरफ देखा। फिर उसने माइक पर कहा, “मेरी एक और बात है। कई लोग सोचते हैं कि कला सिर्फ चमक से बिकती है। और कई लोग सोचते हैं कि कुछ काम—मिट्टी, हाथों की मेहनत—छोटे होते हैं। लेकिन छोटा काम नहीं होता, छोटी सोच होती है।”
हॉल में सन्नाटा हो गया। इरा ने आगे कहा, “आज मैं चाहती हूँ कि इस पुरस्कार के साथ मुझे जो राशि मिली है, उसका एक हिस्सा मैं अपने गाँव में एक प्रशिक्षण केंद्र बनाने में लगाऊँ—जहाँ लड़कियाँ और लड़के दोनों मिट्टी, बुनाई, लकड़ी-काम, सब सीख सकें। क्योंकि अगर एक हाथ आगे बढ़ेगा, तो कई हाथ आगे बढ़ेंगे।”
निर्णायक मंडल ने खुशी से सिर हिलाया। तालियाँ फिर गूँज उठीं। नवीन ने दूर से देखा और उसके चेहरे पर गर्व सा कुछ था—जैसे उसने किसी सच्चे इंसान को पहचान लिया हो।
पुरस्कार के बाद लोग इरा से मिलने लगे। फोटो, इंटरव्यू, प्रस्ताव—सब आ रहे थे। एक पत्रकार ने पूछा, “आपका सपना क्या है?”
इरा ने जवाब दिया, “मेरा सपना यह है कि कोई बच्चा अपने हाथों पर गर्व करने से पहले यह न सोचे कि लोग क्या कहेंगे।”
एक और सवाल आया, “आपके लिए सबसे बड़ा संघर्ष क्या था?”
इरा ने हल्के से मुस्कराकर कहा, “संघर्ष वह नहीं जो बाहर था। संघर्ष वह था जो लोगों ने मेरे भीतर डालने की कोशिश की—कि मैं कम हूँ। और मैं रोज़ उसे मिट्टी की तरह गूँथकर नया आकार देती रही।”
शहर से लौटते समय बस की खिड़की से बाहर अंधेरा फैल रहा था। हरिदत्त चुप थे, मगर उनकी चुप्पी में सालों का संतोष था। इरा ने माँ के लिए पायल खरीदी थी—बहुत साधारण नहीं, बहुत महँगी नहीं—बस ऐसी जो चलने पर मधुर आवाज़ करे, जैसे भरोसे की आवाज़।
गाँव पहुँची तो माँ दौड़कर आईं। इरा ने उनकी हथेली में पायल रखी। माँ ने पायल पहनी, फिर इरा के माथे पर हाथ रखा। “बेटी… मैं डरती थी… अब नहीं डरूँगी।”
इरा ने माँ के हाथों को चूमकर कहा, “डरना बुरा नहीं, माँ। डर के आगे चलना जरूरी है।”
अगली सुबह गाँव के चौराहे पर लोग इकट्ठा थे। प्रधान जी बोले, “इरा ने गाँव का नाम रोशन कर दिया है!”
कुछ लोग मुस्करा रहे थे, कुछ जल रहे थे। रघुवीर सेठ भी आए। उनकी आवाज़ में अब वह पुरानी अकड़ नहीं थी। “इरा… तुम्हें बधाई। अगर तुम चाहो तो मेरे साथ काम कर सकती हो। बहुत बड़ा ब्रांड बना देंगे।”
इरा ने नम्रता से कहा, “सेठ जी, ब्रांड से पहले मैं इंसान बनाना चाहती हूँ। अगर आप साथ चलना चाहें तो—इंसान बनाने में चलिए।”
भानुमति ने पीछे से ताना मारा, “अब तो हवा में उड़ने लगी है!”
इरा ने उनकी ओर बिना गुस्सा किए बस इतना कहा, “हवा में वही उड़ता है जिसकी जड़ें मजबूत हों। और मेरी जड़ें मिट्टी में हैं।”
गाँव में प्रशिक्षण केंद्र बना। एक कमरा, एक चाक, कुछ औजार—और कई आँखों में नए सपने। इरा बच्चों को सिखाती—“मिट्टी डरती नहीं। उसे डराया जाता है। तुम मिट्टी को समझो, तो अपने भीतर का डर भी समझ जाओगे।”
एक दिन वही शहर की लड़की आई, जिसने पहली मूर्ति खरीदी थी। उसने कहा, “मैंने वह मूर्ति अपने कमरे में रखी है। जब भी टूटती हूँ, उसे देखकर जुड़ जाती हूँ।”
इरा ने मुस्कराकर कहा, “मिट्टी का काम यही है—टूटना भी, जुड़ना भी।”
और उस शाम मंदिर की घंटी के साथ आँगन में फिर चाक घूम रहा था। धूप कम थी, मगर रोशनी ज्यादा। इरा की उँगलियों में अब सिर्फ कला नहीं थी—एक रास्ता था। और उस रास्ते पर गाँव के कितने ही बच्चे चलने लगे थे, अपने हाथों पर, अपनी मेहनत पर, और अपनी पहचान पर गर्व लेकर।
किसी ने अब इरा को “अजीब” नहीं कहा। लोग उसे “गुरु” कहने लगे। पर इरा को ये नाम भी बहुत बड़ा लगता था। वह बस इतना कहती—
“मैं तो वही हूँ, जो मिट्टी से दोस्ती करती है।”
लेखिका : मितलेश वर्मा
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