पाँच साल बीत गए थे, लेकिन मीरा के जीवन में वह दिन अब भी ताज़ा था जब उसने अपने मन की सुनी थी और अपने परिवार की नहीं। उसने अन्तरजातीय विवाह किया था—अपनी पसंद से, अपने भरोसे से, और उस विश्वास के साथ कि समय सबको समझा देगा। मगर समय हर बार वैसा नहीं करता जैसा हम सोचते हैं। शादी के बाद मीरा का मायका जैसे उसके लिए खुला तो रहा, पर भीतर कदम रखते ही उसे यह एहसास हो जाता कि वह अब “पहले वाली बेटी” नहीं रही।
त्योहारों पर जाना होता तो उसे बुलावा आ जाता। तीज, करवाचौथ, दीवाली—इन मौकों पर वह जाती, माता-पिता के पैर छूती, माँ से कुछ देर बातें करती, भाई-भाभी को मिठाई दे देती और फिर लौट आती। संबंध निभ तो रहे थे, पर बस औपचारिकता के धागे से। घर की दहलीज़ पर खड़े होकर वह हर बार यही सोचती—“क्या मैं सचमुच इस घर की बेटी हूँ, या बस एक रिश्ते का नाम?”
उसका पिता, शिवनाथ, पुराने विचारों वाले, कड़क स्वभाव के आदमी थे। उनके लिए समाज की “इज्जत” बहुत बड़ी थी। उनके आसपास का माहौल भी ऐसा था—“लोग क्या कहेंगे” वाली सोच से भरा। मीरा के विवाह ने उन्हें भीतर तक तोड़ दिया था, पर वे टूटने को कमजोरी मानते थे, इसलिए उन्होंने अपनी नाराज़गी को कठोरता का रूप दे दिया। उन्होंने बात कम कर दी, नजरें फेर लीं, और धीरे-धीरे अपने मन में यह फैसला भी कर लिया कि जिसने घर की मर्यादा तोड़ी, वह संपत्ति की हकदार नहीं। किसी को पता नहीं चला, पर उन्होंने वसीयत में मीरा को बेदखल कर दिया था।
मीरा को इस बात का अंदाज़ा नहीं था। और सच कहें, तो उसे ऐसी चीजों में रुचि भी नहीं थी। उसके लिए मायके का मतलब था—माँ की गोद, पिता का साया, बचपन की यादें, और वह अपनापन जिसकी कमी शादी के बाद हर बेटी महसूस करती है। वह बस चाहती थी कि पिता उसे फिर से बेटी की तरह देख लें।
इधर उसका भाई, नीरज, घर में पिता का सबसे बड़ा सहारा माना जाता था। नीरज की पत्नी, तनु, तेज दिमाग वाली और अवसर पहचानने वाली स्त्री थी। उसे लगता था कि घर की जायदाद पर पहला अधिकार उसी का है, क्योंकि वह “घर संभाल रही है।” मीरा की मौजूदगी उसे शुरुआत से ही चुभती थी, लेकिन मीरा के अन्तरजातीय विवाह के बाद उसे एक बहाना मिल गया। उसने धीरे-धीरे नीरज को भड़काया—“देखो, पिता जी का दिल बहुत साफ है। लेकिन तुम्हें सख्त रहना होगा। बहन अगर वापस घर में जगह बना लेगी, तो कल को हिस्सेदारी भी मांगेगी।”
नीरज भी उस समय पिता की नाराज़गी को ही सही मान बैठा था। उसे लगा, “मीरा ने अपनी मर्जी की, तो अब उसे परिणाम भी भुगतने चाहिए।” इस सोच के पीछे भाई का ‘अधिकार’ भी छुपा था और भाभी की चालाकी भी। उन्होंने मिलकर पिता के मन में मीरा के खिलाफ कई बातें भर दीं—“वो अब पराई हो गई है,” “उसके आने से समाज में बातें बनती हैं,” “वो अब हमारे घर की नहीं रही।” पिता के भीतर जो चोट थी, उन बातों ने उसे और गहरा कर दिया।
लेकिन जीवन ने अचानक करवट ली।
एक दिन पिता शिवनाथ की तबीयत बिगड़ गई। पहले-पहल तो सामान्य कमजोरी लगी, फिर डॉक्टरों के चक्कर बढ़े, दवाइयाँ बढ़ीं, और धीरे-धीरे यह स्पष्ट हुआ कि बीमारी गंभीर है। घर का माहौल बदल गया। पिता पहले जैसे मजबूत नहीं रहे। उनकी आँखों में थकान उतर आई, चाल धीमी हो गई। माँ घबरा गईं। नीरज ऑफिस के काम में उलझा रहता, तनु घर चलाने में व्यस्त दिखती, पर पिता की सेवा के लिए उसके पास धैर्य कम था।
जब मीरा को यह खबर मिली, उसके भीतर कुछ टूटकर पिघल गया। वह बिना देर किए मायके पहुँची। किसी ने उसे बुलाया नहीं था, पर उसे बुलावे की जरूरत भी नहीं थी। पिता बीमार थे—बस यही उसके लिए पर्याप्त था।
पहली बार जब वह पिता के कमरे में गई, पिता ने आँखें मोड़ लीं। उनके चेहरे पर वही पुरानी कठोरता थी, पर शरीर में वह ताकत नहीं बची थी जो पहले थी। मीरा ने कोई शिकायत नहीं की। उसने बस उनकी दवा उठाई, पानी रखा, और चुपचाप उनके पास बैठ गई। उसकी माँ की आँखें भर आईं।
उस दिन के बाद मीरा हफ्ते में एक-दो बार आने लगी। कभी सुबह-सुबह, कभी शाम को। वह पिता को समय पर दवा देती, उनकी पट्टी बदलती, उनके लिए हल्का-सा सूप बनाती, डॉक्टर के पास ले जाने में मदद करती। माँ को भी सहारा मिलता। पिता कभी कुछ कहते नहीं, पर उनकी चुप्पी में धीरे-धीरे एक बदलाव आने लगा।
एक दिन पिता को तेज दर्द हुआ। मीरा ने घबराकर उनका हाथ पकड़ लिया। पिता ने हाथ छुड़ाया नहीं। बस आँखें बंद कर लीं। मीरा समझ गई—यह पत्थर थोड़ा-सा पिघला है।
समय के साथ पिता की नजर में मीरा का स्थान बदलने लगा। अब वे उसे पराया नहीं, अपना मानने लगे थे—बिना कहे, बिना स्वीकार किए, बस भीतर-भीतर। बीमार शरीर के साथ मन भी नरम होता है, और जब सामने अपनी बेटी की सेवा दिखती है, तो अहंकार भी थक जाता है।
एक दिन जब घर में कोई नहीं था, पिता ने वकील को बुलाया। मीरा उस समय मौजूद नहीं थी। माँ कमरे में थीं। पिता ने धीमे, पर स्पष्ट शब्दों में कहा—“मैं वसीयत बदलना चाहता हूँ।”
माँ चौंक गईं।
पिता ने आगे कहा—“मेरी बेटी का हक मैंने अपने गुस्से में छीन लिया था। पर बेटी… बेटी ही होती है। अब उसे उसका हिस्सा मिलेगा।”
किसी को पता ही नहीं चला और वसीयत बदल गई।
कुछ दिनों बाद नीरज को इसकी भनक लग गई—शायद वकील के किसी क्लर्क की बात से, या कागज़ों के हेरफेर से। जिस दिन उसे पता चला, उसके अंदर एक जलन-सी उठी। उसे लगा, जैसे उसके हिस्से से कुछ छिन गया हो। तनु ने तो जैसे आग में घी डाल दिया।
एक शाम नीरज अपने कमरे में परेशान होकर आया। उसने तनु से कहा, “सुनो, ये सब हो क्या रहा है? हमने तो इतनी कोशिशें करके पापा से मीरा के संबंध तुड़वाए थे… और अब सब गड़बड़ हो गया।”
तनु की आँखों में गुस्सा और हार का डर दोनों थे। वह हारे हुए जुआरी की तरह बोली, “अब तो सब खत्म हो गया। तुम देखते ही रहे, पापा ने बिटिया रानी को जायदाद में हिस्सा दे दिया।” फिर ऊँचे स्वर में बोली, “ये सब तुम्हारी गलती है! बहन का आना-जाना रोकना चाहिए था!”
नीरज हताश होकर बोला, “अरे, मैं कैसे रोक सकता? बेटी है वो… सेवा करने आती थी। और जीत गई… वैसे भी, माया—मतलब मीरा—हमेशा जीतती आई है। स्कूल में फर्स्ट, डिबेट में फर्स्ट, खेल में फर्स्ट… अब इस खेल में भी जीत गई।”
यहीं गलती हो गई। उन्होंने इसे “खेल” कह दिया।
दरवाज़े के बाहर, हाथ में फल की थैली लिए मीरा खड़ी थी। वह अभी-अभी आई थी और माँ के लिए दवा व फल लेकर आई थी। कमरे के पास से गुजरते हुए उसे शब्द सुनाई दे गए। “हमने कोशिश की,” “संबंध तुड़वाए,” “वसीयत,” “खेल,” “जीत गई…”
मीरा का दिल धक से रह गया। उसकी आँखों में आँसू आ गए। उसे लगा जैसे उसकी सेवा भी शक बन गई हो। उसने पिता के लिए जो किया, उसे भी सौदे की नजर से देखा जा रहा है। पर अगले ही पल उसके भीतर से वही आत्मसम्मान जागा, जिसने उसे पाँच साल पहले भी सच का रास्ता चुने की ताकत दी थी।
वह धीरे से कमरे के अंदर गई। नीरज और तनु दोनों चौंक गए। मीरा का चेहरा नम था, लेकिन आवाज़ में कमजोरी नहीं थी।
वह शांत, दृढ़ स्वर में बोली, “भैया… ये सही है कि मैं हमेशा जीती हूँ। लेकिन ये कोई खेल नहीं है। ये बाप-बेटी का प्यार है। और जीत हमेशा प्यार की होती है… नफरत की नहीं।”
कमरे में एक पल सन्नाटा छा गया। तनु की आँखें झुक गईं। नीरज की नजरें नीचे चली गईं। मीरा ने आगे कहा, “अगर आपको लगता है कि मैं जायदाद के लिए आती हूँ, तो आप गलत समझ रहे हैं। मैंने कभी हिस्सा नहीं मांगा। मैंने तो बस पापा का प्यार वापस चाहा… और आज भी वही चाहती हूँ।”
इतना कहकर वह बाहर निकल गई। माँ के पास गई, उनके पैर छुए, दवा दी, और फिर पिता के कमरे की तरफ बढ़ी। पिता बिस्तर पर लेटे थे। उन्होंने शायद आवाजें सुन ली थीं।
मीरा ने उनके पास बैठकर धीरे से कहा, “पापा… मैं किसी हिस्से के लिए नहीं आई। अगर आपको लगता है कि मेरी वजह से घर में झगड़ा होगा, तो मैं कम आऊँगी… लेकिन मैं आपको अकेला नहीं छोड़ सकती।”
पिता की आँखें भर आईं। उन्होंने धीरे से मीरा का हाथ पकड़ लिया। उनकी आवाज़ थरथराई, “मुझे देर से समझ आया, बेटी… पर समझ आया। तेरा प्यार सबसे बड़ा है। मैंने गुस्से में तुझे दूर किया… पर तू पास आती रही। यही जीत है।”
मीरा रो पड़ी। वर्षों का बोझ जैसे उस एक स्पर्श में उतर गया।
कुछ दिनों बाद पिता ने नीरज को बुलाया। उन्होंने बहुत साफ शब्दों में कहा, “नीरज, जायदाद बाँटने से प्यार कम नहीं होता। बेटी का हक़ देना मेरा कर्तव्य है। और मीरा का प्यार… मेरी कमाई से बड़ा है।”
फिर उन्होंने तनु की तरफ देखा, “घर में फूट डालना आसान है, बेटी… जोड़ना कठिन। मीरा ने जोड़ा है। सीख लो।”
नीरज के भीतर कुछ पिघला। उसने पहली बार समझा कि उसने बहन के साथ अन्याय किया। वह मीरा के पास आया, धीमे से बोला, “मुझे माफ कर दे… मैं गलत था।”
मीरा ने उसकी तरफ देखा। उसकी आँखें अब भी नम थीं, पर चेहरे पर शांति थी। उसने कहा, “भैया, मुझे माफी नहीं चाहिए… मुझे बस इतना चाहिए कि हम फिर से परिवार बन जाएँ। पापा की बीमारी ने हमें तोड़ने नहीं… जोड़ने का मौका दिया है।”
उस दिन के बाद घर की हवा बदलने लगी। मीरा अब पहले की तरह औपचारिक नहीं रही। वह आती, पिता के पास बैठती, माँ के साथ रसोई में बात करती। नीरज भी उसकी सेवा में हाथ बँटाने लगा। तनु की कठोरता भी धीरे-धीरे कम होने लगी, क्योंकि उसे समझ आया कि जायदाद का हिस्सा मिल जाए, तो भी मन का खालीपन नहीं भरता—मन तो रिश्तों से भरता है।
और सच यही है—पाँच साल का समय प्यार को दबा सकता है, मिटा नहीं सकता। नफरत जोर से बोलती है, पर प्यार चुपचाप निभाता है। और अंत में जीत उसी की होती है जो निभाता है, जो सेवा करता है, जो रिश्ते को जिंदा रखता है।
लेखिका : मधु मिश्रा
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