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ये नौकरी मेरी जरूरत है

 “हाँ बाऊजी, मैं सामने वाली रेखा दीदी के यहाँ जा रही हूँ। उन्होंने बताया था कि आज फिर पैकिंग के लिए औरतों की ज़रूरत है। मैंने सुबह बात की तो उन्होंने हाँ कर दी। दोपहर का खाना बना दिया है। आप ले लीजिएगा। बच्चे स्कूल से आएँगे तो उन्हें भी समझा दूँगी… मैं शाम पाँच बजे तक लौट आऊँगी।”

सीमा की बात सुनते ही नाश्ते की प्लेट उठाते हुए विक्रम का हाथ हवा में ही रुक गया। और वहीं चौकी पर बैठी उसकी माँ धापूबाई की आँखों में जैसे लाल अंगार जल उठे।

“किससे पूछकर तूने ये तय किया?” धापूबाई की आवाज़ में आदेश था, सवाल नहीं।

सीमा ने बैग की पट्टी कंधे पर खींचते हुए शांत स्वर में कहा, “पूछना क्या है, बाऊजी? घर की ज़रूरत है। बच्चों की फीस, दवा, राशन… सब बढ़ गया है। और दुकान… आप भी जानती हैं, ये ठीक से खुलती नहीं।”

धापूबाई ने तुरंत बेटे की तरफ देखा, “देख विक्रम, ये क्या बोल रही है? मुझे पसंद नहीं कि घर की बहू बाहर कमाए। और ये जाएगी तो घर का काम कौन करेगा? मुझसे अब ये सब नहीं होता।”

कुछ महीने पहले तक विक्रम भी वही कह देता जो माँ चाहती। पर पिछले दिनों उसके चेहरे पर चुप-चुप थकान जम गई थी। उसने धीरे-धीरे प्लेट रखी और पहली बार माँ की आँख में आँख डालकर बोला, “बाऊजी… मुझे कोई आपत्ति नहीं। अगर सीमा दो पैसे कमाना चाहती है तो जाने दीजिए। घर हम दोनों मिलकर संभाल लेंगे।”

धापूबाई का चेहरा तमतमा उठा। “बेटा… तू भी इसके साथ बोलने लगा? कल को ये सिर पर चढ़ जाएगी।”

विक्रम की आवाज़ दब गई, पर शब्द साफ थे, “सिर पर नहीं चढ़ेगी, बाऊजी… वो मेरे साथ चलेगी। और मुझे भी थोड़ा सहारा लगेगा।”

इतना कहकर वह दुकान के लिए निकला। सीमा भी बाहर बढ़ी तो धापूबाई उसकी राह में आ खड़ी हुईं, “खबरदार! मेरे जीते जी घर के बाहर कदम रखा तो!”

सीमा का भीतर का बाँध टूट चुका था। वह ठिठकी, फिर पलटी। “क्यों नहीं जाऊँगी, बाऊजी? आपकी बेटी और दामाद के लिए दुकान बंद करके इनको हर दूसरे दिन गाँव जाना पड़ता है। अगर नहीं जाएँ तो आप ही उनको चैन से जीने नहीं देतीं। ऊपर से अब मायरा का नया तमाशा…”

धापूबाई ने ताना उछाला, “अच्छा! तो अब मेरी बेटी-दमाद तुझे चुभने लगे? अरे तेरे पति ने अपने पिता की पगड़ी बाँधी है। जिम्मेदारी भी उसी की होगी। और ऐसा क्या मांग लिया मेरी बेटी ने? भूल मत… इस मकान में मेरी बेटी का भी हक है।”

सीमा को लगा जैसे कोई पत्थर उसके सीने पर रख दिया गया हो। उसके होंठ काँपे, फिर शब्द तीखे निकल आए, “हक है तो आप अपने हाथ से उसके नाम कर दीजिए! हमें कोई लालच नहीं। पर भगवान के लिए हमें साँस तो लेने दीजिए। आपको बेटी का डर है, बेटे का नहीं। बेटे की अपनी गृहस्थी है, उसके बच्चे हैं। वो मशीन नहीं है सिर्फ पैसा निकालने वाली।”

धापूबाई कुछ पल चुप रहीं। शायद पहली बार उन्हें बहू की आँखों में डर से ज़्यादा थकान दिखी। फिर भी आदतें आसानी से कहाँ हारती हैं।

“लोग क्या कहेंगे?” उन्होंने धीमे स्वर में वही पुराना हथियार चलाया।

सीमा ने हाथ जोड़ दिए, लेकिन आँखों में आग थी, “लोग? कल रात आपके बेटे की आँखों से आँसू गिरे थे, क्या आपने देखे? वो दुकान चलाता है, बच्चों की फीस देता है, आपके इलाज का खर्च उठाता है… और फिर भी उसे रोज़ साबित करना पड़ता है कि वह अच्छा बेटा है। बाऊजी… अगर कल को उसे कुछ हो गया तो ये ‘लोग’ आपके पास आएँगे? मेरे बच्चों को कौन संभालेगा? आपकी बेटी?”

धापूबाई की उँगलियाँ काँप गईं। शायद बहू की आवाज़ में पहली बार उन्होंने अपने बेटे की परछाईं देखी—वही बेटा जो चुपचाप बोझ उठाता गया और कभी शिकायत नहीं की।

सीमा पलटकर चल दी। दरवाज़ा पार करते वक्त उसने बस एक वाक्य और कहा, “मैं काम पर जा रही हूँ। क्योंकि अगर घर बचाना है तो किसी को तो लड़ना पड़ेगा… और मैं अपने बच्चों का घर हारने नहीं दूँगी।”

धापूबाई चौखट पर जैसे पत्थर हो गईं। बाहर सीढ़ियों से उतरती सीमा की चूड़ियों की आवाज़ दूर होती गई, पर धापूबाई के कानों में “विक्रम रो दिया था” वहीँ बजता रहा।

उधर रेखा दीदी का घर—एक बड़े से कमरे में बैठी औरतें निर्यात के लिए कपड़े, पाउच, ड्राई फ्रूट के डिब्बे पैक कर रही थीं। कोई गाना गा रही थी, कोई अपने बच्चों की बातें कर रही थी। सीमा ने पहली बार महसूस किया कि काम सिर्फ थकान नहीं देता—काम आत्मसम्मान भी देता है।

रेखा दीदी ने पूछा, “पहली बार आई हो? घबराओ मत, हाथ जम जाएगा।”

सीमा ने सिर हिलाया। उसके हाथ काँप रहे थे, पर भीतर कुछ मजबूत हो रहा था। उसे लगा, आज वह सिर्फ पैसा नहीं—अपने घर के लिए अपनी आवाज़ भी कमा रही है।

शाम चार बजे तक उसके हाथों में हल्का दर्द था, पर दिल में अजीब-सी शांति। उसने मेहनत की कमाई अपने पर्स में रखी तो उसकी आँखें भर आईं। “मैं कर सकती हूँ,” उसने मन ही मन कहा।

उधर घर में धापूबाई अकेली थीं। दोपहर का खाना पड़ा था, पर उन्होंने हाथ नहीं लगाया। बार-बार उन्हें पुराने दृश्य दिख रहे थे—जब विक्रम के पिता जिंदा थे, और उन्होंने मरते वक्त बेटे के सिर पर पगड़ी रखकर कहा था, “अब तू घर संभालेगा।” उस दिन धापूबाई का सीना गर्व से चौड़ा हुआ था। पर आज समझ आया—पगड़ी सिर्फ सम्मान नहीं, दबाव भी होती है।

शाम को स्कूल से लौटकर बच्चे घर आए। बारह साल का प्रथम बोला, “दादी, मम्मी कहाँ है?”
धापूबाई ने कड़ककर कहने की कोशिश की, “काम पर गई है।”
आठ साल की नयना ने तुरंत कहा, “मम्मी काम पर गई है मतलब पैसे आएँगे! फिर मेरा डांस का ड्रेस आ जाएगा?”
बच्ची की मासूम खुशी ने धापूबाई के भीतर कुछ हिला दिया। उन्हें लगा—यह बहू बाहर गई है तो सिर्फ ज़िद नहीं, मजबूरी है। यह बच्चों के सपनों की कीमत है।

पाँच बजे सीमा लौटी। उसके माथे पर पसीना था, पर चेहरे पर एक अलग चमक। वह अंदर आई तो धापूबाई ने पहली बार उसे रोककर नहीं डाँटा। बस चुप रहीं। वह चुप्पी डाँट से ज्यादा भारी थी।

रात को विक्रम घर लौटा। वह थका हुआ था। दुकान आधे दिन ही खुली थी, क्योंकि बहन का संदेश आया था—“कल फिर आना पड़ेगा, घर में चर्चा है।” विक्रम ने जेब में हाथ डाला तो कुछ सिक्के और दो-तीन नोट ही निकले। उसने मन ही मन सोचा—“मैं कब तक?”

सीमा ने चुपचाप उसके आगे पानी रखा। फिर पर्स से आज की कमाई निकालकर टेबल पर रख दी।
विक्रम ने आँख उठाई। “ये?”
“काम किया,” सीमा ने बस इतना कहा।
विक्रम की पलकों में नमी उतर आई। “तुमने… मेरे लिए?”
“हमारे लिए,” सीमा ने जवाब दिया।

धापूबाई यह सब दरवाज़े के पीछे से देख रही थीं। उनके भीतर अचानक एक डर उभरा—अगर मेरा बेटा सच में टूट गया तो? अगर मेरा ‘लोग क्या कहेंगे’ मेरे बेटे की जिंदगी से बड़ा हो गया तो?

उसी रात, सबके सो जाने के बाद धापूबाई ने अपनी बेटी मंजरी को फोन लगाया। मंजरी की आवाज़ में वही पुरानी मांग थी, “अम्मा, मायरा इस बार अच्छे से होना चाहिए। ससुराल में सब देख रहे हैं।”

धापूबाई ने गहरी सांस ली। उनके गले में शब्द अटक रहे थे, पर पहली बार उन्होंने अपनी बेटी के सामने भी माँ बनकर नहीं, इंसान बनकर बात की।

“मंजरी… मायरा हमारी हैसियत के हिसाब से होगा। जितना बन पड़ेगा, उतना करेंगे। तुम्हारे ससुराल की मांग के हिसाब से नहीं।”

उधर से मंजरी भड़क गई, “अम्मा! लोग क्या कहेंगे? भाई की इज्जत…!”

धापूबाई ने धीरे पर दृढ़ स्वर में कहा, “इज्जत के नाम पर मैं अपने बेटे को नहीं जलाऊँगी। वो रो चुका है, मंजरी। तूने कभी नहीं देखा, पर मैंने देख लिया। और अगर मेरे बेटे पर कुछ आ गया, तो तेरे ससुराल वाले नहीं, मैं और उसकी पत्नी और उसके बच्चे टूटेंगे।”

फोन पर सन्नाटा। मंजरी कुछ बोल नहीं पाई। शायद पहली बार माँ की आवाज़ में वह डर था जो सच होता है—खो देने का डर।

धापूबाई ने फोन काटा तो उन्हें लगा जैसे उन्होंने वर्षों पुराना कोई बोझ रख दिया हो। उसी समय उन्हें अपने कमरे में टंगी पति की तस्वीर दिखी। वे तस्वीर के सामने बैठ गईं। आँखों से आँसू बह निकले।

“मैंने क्या किया…” उन्होंने खुद से कहा, “बेटे को पगड़ी पहनाकर मैंने उसे फर्ज का गुलाम बना दिया… और बेटी को मैंने हक के नाम पर आदतें दे दीं।”

अगली सुबह धापूबाई जल्दी उठीं। रसोई में गईं। चूल्हा जला। सीमा उठी तो देखा दाल चढ़ी हुई है और चाय का पानी उबल रहा है।

सीमा चौंकी, “बाऊजी… आप?”
धापूबाई की आँखें झुकी थीं। उन्होंने धीमे स्वर में कहा, “आज… तू काम पर जाएगी। बच्चों का टिफिन मैं बना दूँगी। और… सीमा… कल जो तूने कहा… वो ठीक कहा।”

सीमा का गला भर आया। वह कुछ बोल नहीं पाई। बस उसने धापूबाई के हाथ में अपना हाथ रख दिया। वह स्पर्श दोनों के बीच पहली बार दीवार नहीं, पुल बन गया।

कुछ दिनों में घर की हवा बदलने लगी। विक्रम अब दुकान के साथ-साथ ऑनलाइन ऑर्डर भी देखने लगा। सीमा रोज़ दो-तीन घंटे पैकिंग करती और बच्चों की पढ़ाई में भी ध्यान देती। धापूबाई धीरे-धीरे बच्चों के साथ समय बिताने लगीं। और जब मंजरी फिर मायरा की बात करती, धापूबाई एक ही बात दोहरातीं—“हक बराबर का है, पर बोझ भी बराबर का होना चाहिए।”

एक रविवार को विक्रम ने माँ के सामने हाथ जोड़कर कहा, “बाऊजी… मैं आपकी इज्जत करता हूँ, पर अब मैं अपने परिवार को भी कमजोर नहीं होने दूँगा।”
धापूबाई ने उसकी पीठ थपथपाई, “अब समझ में आया मुझे… बेटा सिर्फ जिम्मेदारी नहीं, दिल भी होता है।”

सीमा ने उस दिन महसूस किया—कभी-कभी घर में बदलाव क्रांति की तरह नहीं आता, वह धीरे-धीरे एक माँ के मन में उतरता है… जब उसे अपने बेटे की चुप्पी में रोना सुनाई देने लगता है।


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