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यादों की डायरी

 डायरी का पन्ना बंद करते ही मेरी हथेलियों में एक अजीब-सी गर्माहट भर गई। जैसे मां ने सचमुच मेरे सिर पर हाथ फेर दिया हो। मैं देर तक उसी सोफे पर बैठी रही—एक तरफ रसोई में बचे बर्तनों की खनक, दूसरी तरफ बालकनी से आती बच्चों की हंसी, और मेरे अंदर चलती बातें… जो किसी को सुनाई नहीं देतीं।

मैंने डायरी को कपड़े के कवर में लपेटकर अलमारी की ऊपर वाली शेल्फ में रख दिया। ठीक वैसे ही, जैसे मां अपने गहनों को कपड़े में बांधकर रखती थीं—सहेजकर, प्यार से, सावधानी से। तभी स्कूल से लौटे मेरे दोनों बेटे आरव और अर्णव दरवाजे पर शोर मचाते हुए घुस आए—“मम्मा! आज स्पोर्ट्स पीरियड में—” और बाकी की बात उनके जूते, बैग और पानी की बोतल के गिरने की आवाज़ में कहीं खो गई।

मैं अपने आप मुस्कुरा दी। बच्चों के साथ व्यस्त होना मेरे लिए नया नहीं था। नया था—उनके शोर में भी मन का शांत रह जाना। पर वह शांति टिकाऊ नहीं थी। शाम होते-होते वही पुरानी बेचैनी लौट आई, क्योंकि आज पार्क में चर्चा का विषय वही था जो पिछले कुछ दिनों से मेरे कानों में गूंज रहा था—“आत्मनिर्भर औरतें।”

हमारी सोसायटी का पार्क, अपने आप में एक छोटा सा समाज था। दिन में बच्चों का मैदान, शाम को महिलाओं की संसद। हँसी, गपशप, बच्चों की दौड़, बुजुर्गों की धीमी चाल, और बीच में बैठी महिलाओं की आवाज़ें—कभी मीठी, कभी तेज़।

आज सबसे ऊंची आवाज़ मृणाल की थी। वह हमेशा अपनी बात ऐसे कहती थी जैसे सामने वाले को सुधारने का ठेका उसी ने लिया हो। जैसे ही मैं बैठी, उसने तिरछी नजर से मुझे देखा और बोली,
“आजकल घर बैठना मतलब खुद को जंजीर में बांध लेना। औरत को घर-गृहस्थी तक सीमित नहीं रहना चाहिए।”

कुछ महिलाएं तुरंत “हां-हां” करने लगीं। कोई बोली, “बिल्कुल सही।” कोई बोली, “कैरियर ही पहचान है।”
मैं चुप रही। क्योंकि जब भी मैं बोलती, मृणाल को लगता—मैं अपनी सफाई दे रही हूं। और मैं सफाई नहीं देना चाहती थी, पर भीतर कहीं एक टीस थी—क्या सचमुच मैं पीछे रह गई हूं?

तभी पास खड़ी रितिका, जो कुछ महीने पहले ही अपने छह महीने के बच्चे के लिए नौकरी छोड़ चुकी थी, धीरे से बोली,
“मृणाल, बात सही है, लेकिन घर-परिवार भी जरूरी है। घर संभालना कोई छोटी बात नहीं। हम जब घर में होते हैं, तब भी हम बहुत बड़ा काम कर रहे होते हैं।”

मृणाल हंस पड़ी—एक ऐसी हंसी जिसमें “तुम भोली हो” वाला भाव छिपा था।
“घर-परिवार संभालना काम? ये तो हर कोई कर लेता है। देखो मीरा को—इतनी पढ़ी-लिखी, होशियार—और खुद को रसोई, स्कूल, कपड़े, सफाई में उलझा लिया। ये जिंदगी भी कोई जिंदगी है?”

उसने “मीरा” कहा, पर मुझे लगा उसने मेरा नाम नहीं, मेरा अस्तित्व ही निचोड़ दिया हो। मैं कुछ कह नहीं सकी। मेरे शब्द भीतर ही भीतर टूटते रहे। मैं चुपचाप उठी, बच्चों को बुलाया और घर आ गई।

घर आते ही अजीब हुआ। वही रसोई, वही कपड़े, वही खिलौने—पर सब जैसे मेरे खिलाफ गवाही दे रहे हों।
मेरा मन हुआ—सब छोड़ दूं। सबको दिखा दूं कि मैं भी “कुछ” कर सकती हूं।
पर अगले ही पल मेरे दिमाग में मां की डायरी के शब्द चमके—“जो करना, अपने सुकून के लिए करना।”

मैंने अपने आप से पूछा—मुझे सच में क्या चाहिए?
और जवाब बहुत धीरे आया—मुझे सम्मान चाहिए। अपने काम का भी, अपने सपने का भी।

अगले दिन बच्चों के स्कूल जाते ही, पति समीर ऑफिस निकल गया। घर में अचानक खामोशी छा गई—ऐसी खामोशी जिसमें घर की घड़ी भी ज्यादा तेज़ टिक-टिक करती लगती है। मैंने वही “मी टाइम” चुना जो कभी सुकून होता था, और अब उलझन बन गया था। मैं अलमारी के पास गई, डायरी निकाली। पर इस बार मैं केवल मां की बात पढ़ने नहीं बैठी थी—मैं अपने अंदर के झगड़े का फैसला सुनने बैठी थी।

मैंने पन्ने पलटे। पुराने शब्दों की स्याही में मां की आवाज़ थी। इस बार तारीख़ अलग थी—और बात भी।

तारीख़—12 जून, 2012
“आज मैंने पहली बार देखा कि हमारी पड़ोसन कनक अपने पति से छुप-छुपकर सिलाई के पैसे जोड़ रही है। वह चाहती है कि अपने पैरों पर खड़ी हो, पर डरती है कि लोग क्या कहेंगे। मैंने उससे कहा—‘कमाना अच्छा है, पर छुपकर मत कमाओ। अपने काम को शर्म मत बनाओ।’
औरत का आत्मसम्मान उसके मन में होता है, लोगों की जुबान में नहीं।”

मैंने पन्ना पढ़ते-पढ़ते आंखें बंद कर लीं। मां बिल्कुल यही तो चाहती थीं—कि मैं खुद को किसी के तराजू पर न तौलूं। पर मेरा तराजू तो रोज़ पार्क में टंग जाता था, और मैं रोज़ खुद को हल्का महसूस करती थी।

मैंने डायरी का अगला पन्ना पलटा—

तारीख़—03 अगस्त, 2018
“आज मेरी बेटी श्रेया ने फोन पर रोते हुए कहा—‘मां, मैं कुछ नहीं कर रही। मुझे लगता है मैं पीछे छूट रही हूं।’
मैंने उससे कहा—‘बेटी, तुम जो कर रही हो, वही तुम्हारा वर्तमान है। पीछे वही छूटता है जो बोझ होता है। तुम अपने दिन को बोझ मत बनाओ।’
मैंने उसे यह भी कहा—‘अगर तुम घर में हो, तो घर को “कम” मत समझो। अगर तुम बाहर जाना चाहती हो, तो बाहर भी जाओ—पर खुद को नीचा समझकर नहीं, अपनी खुशी के लिए।’”

मेरी सांसें हल्की होने लगीं। जैसे कोई कसाव ढीला हो रहा हो।
लेकिन मन अब भी पूरी तरह शांत नहीं था। मेरे भीतर एक सवाल और था—अगर मैं खुश रहना चाहूं, तो क्या मुझे कुछ नया शुरू करना चाहिए? और अगर हां, तो क्या?

उसी शाम, मैं फिर पार्क गई। इस बार बच्चों को झूले पर चढ़ाकर मैं अपनी जगह बैठी रही, पर मन में तैयारी थी। मृणाल फिर वही चर्चा छेड़ रही थी। उसने किसी नई ऐप, नए कोर्स, नए करियर की बातें शुरू कर दीं। सब महिलाएं उसे ध्यान से सुन रही थीं।

मैंने पहली बार बीच में अपनी आवाज़ रखी।
“मृणाल, आत्मनिर्भर होना अच्छा है, लेकिन आत्मनिर्भर होने का मतलब सिर्फ कमाना नहीं होता। आत्मनिर्भर होने का मतलब है—अपने फैसले खुद लेना और अपने काम को सम्मान देना।”

वह थोड़ी चौंकी। शायद उसने मुझसे जवाब की उम्मीद नहीं की थी।
मैंने आगे कहा, “और घर का काम… अगर यह काम आसान है, तो इसे ‘हर कोई’ क्यों नहीं कर लेता? मैं भी चाहती हूं कि महिलाएं आगे बढ़ें। पर मैं यह नहीं चाहती कि एक औरत दूसरी औरत को नीचा दिखाकर आगे बढ़े।”

रितिका ने मुस्कुरा कर मेरी ओर देखा। बाकी महिलाएं भी थोड़ी देर चुप रहीं।
मृणाल ने तुरंत व्यंग्य किया, “तो फिर तुम क्या करोगी? घर ही?”

मैंने बहुत सामान्य अंदाज़ में कहा, “मैं घर भी करूंगी। और अपने लिए भी कुछ शुरू करूंगी। पर किसी को जवाब देने के लिए नहीं… अपने सुकून के लिए।”

उस दिन घर लौटते वक्त मेरे कदम हल्के थे। पर असली बदलाव अगले हफ्ते आया।

मैंने एक पुराना डिब्बा निकाला, जिसमें मेरी कॉलेज के दिनों की कुछ पेंटिंग्स और स्केच पड़े थे। मैंने उन्हें निकालकर देखा। रंग फीके पड़ चुके थे, पर अंदर का आनंद अभी भी वहीं था। मैंने कागज, ब्रश और रंग खरीदे—और सुबह के खाली समय में आधा घंटा चित्र बनाना शुरू कर दिया। बस आधा घंटा।

समीर ने एक दिन पूछा, “ये क्या नया शुरू किया है?”
मैंने मुस्कुरा कर कहा, “मेरा सांस लेने का तरीका।”

कुछ दिनों बाद बच्चों ने भी मेरी पेंटिंग्स देखीं। आरव ने कहा, “मम्मा, ये वाला तो स्कूल में लग सकता है!”
अर्णव बोला, “आप हमारी क्लास में आकर बनाओ न!”

मेरे भीतर कुछ खिलने लगा। यह करियर नहीं था, पर यह “मैं” था। और “मैं” लौट रही थी।

एक रविवार को सोसायटी की मीटिंग थी। मैनेजमेंट टीम ने कहा कि बच्चों के लिए एक “क्रिएटिव कॉर्नर” बनाया जाएगा। मैंने उठकर कहा, “मैं बच्चों को पेंटिंग और क्राफ्ट सिखा सकती हूं, हफ्ते में दो दिन।”
सबने तालियां बजाईं। मृणाल ने भी औपचारिक मुस्कान दी। पर मेरी खुशी उससे नहीं, अपने अंदर की साफ़ हवा से थी।

जब पहली क्लास हुई, तो दस बच्चे आए। अगली बार बीस। और फिर धीरे-धीरे माताएं भी रुककर देखने लगीं। किसी ने कहा, “आप बहुत अच्छा सिखाती हैं।” किसी ने कहा, “मेरी बेटी को ये बहुत पसंद आया।”

उस रात मैंने मां की डायरी फिर खोली। आखिरी पन्ने पर वही हस्ताक्षर थे—
“तुम्हारी मां…”

मैंने पहली बार डायरी के खाली पन्ने पर अपनी तरफ से कुछ लिखा। तारीख़ भी डाली, नाम भी—पर नाम बदला हुआ नहीं था। क्योंकि अब मुझे अपने नाम से डर नहीं लगता था।

“आज मैंने समझा—घर संभालना छोटा नहीं, पर खुद को भूल जाना भी ठीक नहीं।
मैं पत्नी, मां, बहू… सब हूं।
पर सबसे पहले मैं ‘मैं’ हूं।
और मेरे सुकून की जिम्मेदारी भी मेरी है।”

मैंने पेन रखा। और पहली बार रसोई का काम मुझे शूल नहीं लगा। क्योंकि अब वह “मजबूरी” नहीं था—वह मेरी जिंदगी का एक हिस्सा था, पूरा नहीं।

अगले दिन पार्क में मृणाल ने फिर कुछ कहा—पर मैंने मन में गांठ नहीं बांधी। मैं जान गई थी—किसी की बात अगर आपको चोट दे रही है, तो शायद वह चोट आपके भीतर की अनसुनी आवाज़ है। और उसे दबाने से नहीं, सुनने से राहत मिलती है।

शाम को जब बच्चे सो गए और समीर लैपटॉप बंद कर मेरे पास आया, उसने कहा, “आजकल तुम बदली-बदली लगती हो। अच्छा लग रहा है।”

मैंने मुस्कुराकर कहा, “मैं बदली नहीं हूं… मैं वापस आई हूं।”

और उस रात, सोने से पहले मैंने खुद से कहा—
“मैं जो हूं, वह भी जरूरी है।
मैं जो करती हूं, वह भी जरूरी है।
और मैं जो चाहती हूं… वह भी जरूरी है।”

कभी-कभी किसी की लिखी डायरी हमें नई राह नहीं देती—बस हमारी अपनी राह पर रोशनी रख देती है। और रोशनी मिल जाए, तो कदम खुद-ब-खुद चल पड़ते हैं।

लेखिका : संगीता चौबे 


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