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माथे की शिकन

 “ए सुनते हो… इस बार बारिश कुछ ज़्यादा ही हो रही है,” मृदुला ने खिड़की से गिरती बूंदों को देखते हुए कहा, “छत की टंकी के पास वाली दीवार फिर से सीलन पकड़ रही है। कल मज़दूर बुला लो, वरना पूरा कोना खराब हो जाएगा।”

विजय ने अख़बार से आँखें उठाईं। बाहर बरसात, भीतर खर्चों की सूची—दोनों साथ-साथ गिर रहे थे। उसने धीमे से कहा, “बुला लेंगे… देखेंगे।”

“देखेंगे नहीं,” मृदुला की आवाज़ में चिंता का कसाव था, “हर बार ‘देखेंगे’ कहते-कहते घर की आधी चीज़ें ‘हो गया’ बन जाती हैं।”

विजय मुस्कुराने की कोशिश कर रहा था, पर उसके चेहरे की रेखाएँ साफ़ कह रही थीं कि मन कहीं और है। मृदुला उसे पहचानती थी। पच्चीस साल साथ रहकर किसी के माथे की शिकन भी शब्द बन जाती है।

“फिर सोच में खो गए?” उसने धीरे से पूछा, “क्या बात है?”

विजय ने अख़बार मोड़ा, जैसे वह किसी खबर को नहीं, अपने दिल के बोझ को तह कर रहा हो। कुछ पल चुप रहने के बाद उसने कहा, “सोच रहा था… अरे नहीं… बस यूँ ही।”

“यूँ ही कुछ नहीं होता, विजय,” मृदुला ने चूल्हे से चाय उतारते हुए कहा, “कब से देख रही हूँ, रात-रात भर जागते हो। तुम्हारी आँखों के नीचे ये काले घेरे ‘यूँ ही’ नहीं आए।”

विजय ने चाय का प्याला लिया, फिर भी होंठों तक नहीं ले गया। “तुम्हें याद है… हमारी वह दुकान?”

मृदुला के हाथ रुक गए। पुरानी बातें अक्सर ऐसे ही लौटती हैं—किसी धूल भरे कोने से अचानक निकलकर सामने खड़ी हो जाती हैं। “कौन-सी? वो जो स्टेशन के पास थी?”

“हाँ,” विजय की आवाज़ धीमी थी, “वही। जहाँ पिताजी के जाने के बाद मैंने नौकरी छोड़कर दुकान संभाली थी। फिर एक गलती… एक गलत साझेदार… और सब…”

वह आगे नहीं बोल पाया। शब्द उसके गले में अटक गए। उस दिन की बेइज्जती, वह कर्ज़ के कागज़, बैंक की नोटिस, घर की चीज़ें बिकते देखना—सब कुछ उसकी आँखों में तैर आया।

मृदुला ने पास बैठकर उसका कंधा थाम लिया। “पुरानी चोटें याद करके क्या होगा?”

विजय ने नजरें झुका लीं। “होगा। क्योंकि वही चोट… आज भी हर महीने के आखिरी हफ्ते में जागती है। बच्चों की फीस, तुम्हारी दवाइयाँ, घर की मरम्मत… और ऊपर से… एक और चिंता।”

“किसकी?” मृदुला का स्वर सतर्क हो गया। उसे अंदेशा था, पर नाम सुनना चाहती थी।

“अयान,” विजय ने जैसे किसी भारी पत्थर को मेज़ पर रख दिया। “लड़का अब बड़ा हो गया है। कॉलेज खत्म, अब नौकरी ढूँढ़ रहा है। जितना हो सकता था किया मैंने। पर उस बच्चे की आँखों में जो सपने हैं, वे मेरे बजट की सीमा नहीं देखते।”

मृदुला ने हल्का सा साँस लिया। “अयान ने कभी तुमसे कुछ माँगा है क्या?”

“माँगा नहीं,” विजय ने कहा, “यही तो दुख है। माँगता तो शायद आसान होता। वह तो… सब समझकर भी चुप रहता है। और मैं… मैं बाप होकर भी… हर बार अपने हाथ खाली पाता हूँ।”

मृदुला कुछ कह पाती, उससे पहले दरवाज़े की घंटी बज गई। बरसात में घंटी की आवाज़ भी भीगी-सी लगती है। मृदुला ने दरवाज़ा खोला तो सामने अयान खड़ा था—भीगा हुआ, बालों से पानी टपकता, लेकिन चेहरे पर वही आदत वाली मुस्कान।

“मम्मी, छाता टूट गया,” उसने हँसकर कहा, “और ऑटोवाला… वैसे ही बारिश देखकर किराया बढ़ा देता है।”

विजय ने उसे ऊपर से नीचे देखा। “ठीक है, अंदर आ जा। पहले कपड़े बदल।”

अयान अंदर आया तो उसके हाथ में एक फाइल थी। वह उसे अपने सीने से ऐसे चिपकाए था जैसे यह कागज नहीं, कोई नाजुक चीज़ हो।

“क्या है?” मृदुला ने पूछ लिया।

अयान ने एक पल को फाइल पीछे किया, फिर बोला, “कुछ नहीं… बस… डॉक्यूमेंट्स।”

विजय ने भांप लिया। “इधर दे।”

अयान ने फाइल आगे बढ़ाई, पर उसके हाथ में हल्का सा कंपन था। विजय ने फाइल खोली। ऊपर एक लेटर था—एक कंपनी का ऑफर लेटर।

विजय की आँखें चौड़ी हो गईं। “ये… नौकरी?”

अयान ने हाँ में सिर हिलाया। “हाँ, पापा।”

मृदुला के चेहरे पर खुशी की चमक फैल गई। “अरे वाह! कब… कैसे… कहाँ?”

अयान ने गीला बैग नीचे रखा, तौलिया लेते हुए कहा, “एक स्टार्टअप है, लेकिन काम अच्छा है। ट्रेनिंग तीन महीने की। और… सैलरी भी… ठीक-ठाक है।”

विजय ने लेटर को फिर से देखा, जैसे भरोसा नहीं हो रहा हो कि यह शब्द सच हैं। उसका गला भर आया। “तूने… कब इंटरव्यू दिया?”

अयान ने हँसकर कहा, “काफी पहले। आपको बताया नहीं… क्योंकि जब तक पक्का नहीं होता, मैं…।”

विजय ने बीच में बात काट दी। “क्यों? बताता तो क्या हो जाता?”

अयान ने कपड़े बदलते-बदलते कमरे की तरफ जाते हुए धीमे से कहा, “आपके माथे पर एक नई शिकन नहीं बढ़ती, बस।”

विजय वहीं बैठा रह गया। मृदुला ने उसे देखा, फिर उसकी आँखों में उभरी नमी देख ली। उसने कोई सवाल नहीं किया। कुछ सच्चाइयाँ सवाल नहीं चाहतीं, बस स्वीकार चाहती हैं।

कुछ देर बाद अयान वापस आया। सूखे कपड़े, बालों में हल्की नमी, और चेहरा पहले से ज्यादा उजला। वह चाय की मेज़ पर बैठा और सहजता से बोला, “पापा… एक बात कहूँ?”

विजय ने सिर उठाया। “बोल।”

अयान ने दोनों हाथ जोड़कर मजाकिया अंदाज में कहा, “आज से आपकी चिंता का आधा बोझ मेरा हुआ। अब आप अपना ‘देखेंगे’ थोड़ा कम कर सकते हैं।”

मृदुला हँस पड़ी, पर हँसी के पीछे आँखें भीग गईं। विजय ने गहरी साँस ली। वह कुछ बोलना चाहता था, पर शब्द फिर गले में अटक गए। आखिर उसने कहा, “तूने… हमें पहले क्यों नहीं बताया कि तू इतना परेशान था?”

अयान ने बिना नाटकीयता के, बिल्कुल सीधे कहा, “क्योंकि मैं परेशान नहीं था, पापा। मैं… जिम्मेदार होना सीख रहा था। आपकी तरह।”

विजय के भीतर कुछ टूटकर पिघल गया। उसे याद आया, कैसे उसने अयान के स्कूल के लिए रात-रात भर एक्स्ट्रा काम किया था। कैसे उसने अपनी घड़ी बेचकर उसकी कोचिंग की फीस भरी थी। कैसे उसने किसी के सामने कभी यह स्वीकार नहीं किया था कि वह डरता भी है।

“और सुनो,” अयान की आवाज़ में अब एक नई दृढ़ता थी, “मैंने फैसला किया है कि हम घर की मरम्मत करवाएंगे। छत की सीलन, टंकी वाली दीवार… सब। मम्मी कब से कह रही हैं।”

मृदुला ने आंखें तरेरीं। “अब तो तुम्हें सब याद रहता है, है ना!”

अयान ने मुस्कुराकर कहा, “मम्मी, याद इसलिए रहता है क्योंकि आप कहती रहती हैं। वरना पापा तो ‘देखेंगे’ में ही दुनिया निकाल दें।”

विजय इस बार खुलकर हँसा। उसे महसूस हुआ कि बहुत समय बाद घर में हँसी बिना मजबूरी के आई है।

फिर अयान थोड़ा गंभीर हुआ। “पापा, एक और बात। मैं चाहता हूँ कि आप अपनी पुरानी दुकान वाली बात… अपने दिल से निकाल दें।”

विजय का चेहरा फिर भारी हो गया। “वो आसान नहीं है।”

“मैं जानता हूँ,” अयान ने धीरे से कहा, “पर आप ने उस घटना को अपने ऊपर ऐसे चिपका लिया है जैसे वही आपकी पहचान हो। जबकि मेरी पहचान तो आप हैं… जिसने गिरकर भी घर को खड़ा रखा।”

विजय ने नजरें झुका लीं। मृदुला ने उसके हाथ पर हाथ रखा। “सुन रहे हो? तुम्हारा बेटा बड़ा हो गया है, विजय। सिर्फ उम्र में नहीं… सोच में भी।”

विजय ने धीमे से कहा, “मुझे डर लगता है, मृदुला। कहीं… सब फिर से…”

अयान ने तुरंत कहा, “फिर से नहीं होगा। और अगर होगा भी… तो इस बार हम तीन हैं। अकेले नहीं।”

उस वाक्य में कोई फिल्मीपन नहीं था। बस एक सच था, जो घर की भीगी दीवारों को भी सूखा कर सकता था।

उस शाम बारिश थोड़ी कम हुई। घर की छत से टपकती बूंदें अब भी थीं, पर विजय को पहली बार लगा कि टपकती बूंदें सिर्फ पानी नहीं—एक नई शुरुआत का संकेत भी होती हैं। जैसे पुराने मकान में भी मरम्मत हो सकती है, वैसे ही पुराने मन में भी।

रात को खाना खाते समय विजय ने अचानक कहा, “अयान… कल से तू ऑफिस जाएगा… तो मैं भी…”

मृदुला और अयान दोनों ने एक साथ पूछा, “आप भी क्या?”

विजय ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “मैं भी कुछ शुरू करूँगा। बहुत समय से सोच रहा हूँ… अपनी उस पुरानी दुकान जैसी छोटी-सी चीज़… लेकिन इस बार साझेदार नहीं, बस मैं… और तुम लोग।”

मृदुला की आँखें चमक उठीं। “सच?”

विजय ने सिर हिलाया। “हाँ। क्योंकि अब मुझे लगता है कि डर के साथ जीना भी एक तरह का कर्ज है। और मैं… वह कर्ज उतारना चाहता हूँ।”

अयान ने खुशी से कहा, “वाह! तो फिर आपका ‘देखेंगे’ अब ‘करेंगे’ बन गया।”

विजय हँस पड़ा। “हाँ… शायद बन गया।”

उस रात जब सब सोने चले गए, विजय कुछ देर अकेला बैठा रहा। बाहर सड़क पर पानी की हल्की-हल्की आवाज़ थी। उसने कमरे की दीवार पर लगी अपनी माँ की फोटो की तरफ देखा। फिर मन ही मन बोला, “अम्मा… मैं डरता था कि मैं अपना वादा निभा नहीं पाऊँगा। पर आज… आज लगा कि तुम्हारा आशीर्वाद अभी भी हमारे घर में घूमता है।”

और उसके चेहरे पर वही नर्म-सी मुस्कान आ गई, जो बरसों पहले शायद उसने अपनी माँ की गोद में बैठकर की होगी—जब चिंता का अर्थ समझ में नहीं आता था, लेकिन भरोसा बहुत आसान था।

अब भरोसा लौट रहा था—धीरे-धीरे, बारिश के बाद की उस मिट्टी की खुशबू की तरह, जो कहती है: “गिरने के बाद भी उगने का मौसम आता है।”


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