शहर के पुराने बुकस्टोर की सीढ़ियाँ चढ़ते ही किसी ने पीछे से पुकारा—
“अनु! तुम?”
मैं पलटी तो सामने खड़ी थी—शालिनी वर्मा। वही शालिनी, जो कभी मेरी कॉलेज की बहस प्रतियोगिता में मेरी सबसे बड़ी प्रतिद्वंद्वी हुआ करती थी। समय ने उसे पहचान से बाहर बदल दिया था। साधारण सलवार-कमीज़ में रहने वाली शालिनी आज खादी की सादी साड़ी, खुले बाल और बिना किसी बनावटी आभूषण के बेहद आत्मविश्वासी लग रही थी। उसके चेहरे पर एक गहरी शांति थी, जो पहले कभी नहीं देखी थी।
हम दोनों कुछ पल बस एक-दूसरे को देखती रहीं, फिर हँसी अपने आप फूट पड़ी। दिल्ली जैसे विशाल शहर में अचानक किसी पुराने परिचित से मिल जाना अपने आप में एक घटना थी। उसने ज़िद की कि पास ही बने छोटे से कैफे में बैठकर बात करें।
कॉफी के साथ बातचीत शुरू हुई। उसने बताया कि वह अब पास के सरकारी स्कूल में पढ़ाती है और शिक्षा से जुड़े सामाजिक कार्यों में भी सक्रिय है। यह सुनकर मुझे हैरानी हुई, क्योंकि कॉलेज के दिनों में शालिनी का सपना किसी बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में ऊँचे पद पर पहुँचने का था।
मुझे याद आने लगा—पंद्रह साल पहले की वह शालिनी, जो छोटे शहर से आई थी, आँखों में बड़े सपने और मन में असुरक्षाएँ लिए। कॉलेज का माहौल उसके लिए बिल्कुल नया था। वह हमेशा खुद को साबित करने की जल्दी में रहती। महंगे कपड़े, महंगे गैजेट, और उन दोस्तों की संगत जो सिर्फ दिखावे में जीते थे।
मैं तब छात्रावास में रहती थी और अक्सर उसे समझाने की कोशिश करती कि हर चमकती चीज़ सोना नहीं होती। पर वह मानती कहाँ थी। उसे लगता मैं उसकी महत्वाकांक्षाओं को छोटा कर रही हूँ।
कॉलेज के दूसरे साल में उसकी मुलाकात सिद्धार्थ से हुई। सिद्धार्थ—तेज-तर्रार, आत्मविश्वासी और पैसे वाला। शालिनी उसकी दुनिया में ऐसे डूब गई जैसे वही सब कुछ हो। पढ़ाई, परिवार, दोस्त—सब पीछे छूटने लगे। सिद्धार्थ की पार्टियों, लंबी ड्राइव्स और बड़े-बड़े वादों में उसे भविष्य दिखाई देता था।
फिर एक दिन, परीक्षा से ठीक पहले, वह टूट गई। सिद्धार्थ ने विदेश जाकर सेटल होने का फैसला कर लिया था—अकेले। शालिनी उसके लिए बस “एक अच्छा अनुभव” थी। उस रात वह मेरे कमरे में बैठकर देर तक रोती रही। पहली बार उसकी आवाज़ में पछतावे की गहराई थी।
मैंने उसे बस इतना कहा था—“जो टूट गया है, उसे जोड़ने से पहले खुद को संभालना ज़रूरी है।”
उसके बाद हम दोनों अपने-अपने रास्तों पर चल पड़े। समय बीत गया, संपर्क टूट गया।
आज कैफे में बैठी शालिनी ने खुद ही उस खालीपन को भरा। उसने बताया कि उस घटना के बाद वह कुछ समय तक पूरी तरह खोई रही। फिर घर लौटी, माँ-बाप के साथ रही। पहली बार उसने खुद से सवाल किए—वह क्या चाहती है, और क्यों।
उसी दौरान उसने शिक्षक बनने का फैसला किया। पढ़ाते-पढ़ाते उसे एहसास हुआ कि सच्ची संतुष्टि तालियों या पैसों में नहीं, बल्कि किसी के जीवन में बदलाव लाने में है।
उसने शादी भी की—अमित से, जो उसी स्कूल में विज्ञान पढ़ाता था। साधारण इंसान, पर ईमानदार और संवेदनशील। कोई दिखावा नहीं, कोई खोखले वादे नहीं।
“मैंने देर से सीखा,” शालिनी ने मुस्कुराते हुए कहा, “कि जीवन में स्थिरता सबसे बड़ी उपलब्धि है।”
कैफे से निकलते समय शाम ढल चुकी थी। सड़क पर चलती भीड़, पीली रोशनी, और हल्की ठंडी हवा—सब कुछ सामान्य था, पर भीतर कहीं कुछ बदल चुका था।
हम विदा लेने लगे तो उसने मेरा हाथ थाम लिया।
“तुम्हारी बातें तब समझ नहीं आई थीं,” उसने धीमे से कहा, “पर उन्होंने मुझे भटकने से बचा लिया।”
मैं कुछ नहीं बोली। सिर्फ मुस्कुरा दी।
कभी-कभी जीवन हमें अलग-अलग रास्तों पर ले जाकर वही सिखाता है, जो हम पहले सुनना नहीं चाहते थे। और जब सालों बाद किसी मोड़ पर फिर मुलाकात होती है, तो एहसास होता है—कुछ रिश्ते समय से नहीं, समझ से जुड़े होते हैं।
Comments
Post a Comment