शाम का वक्त था। घर में रोज़ की तरह हलचल थी। माँ रसोई में चाय बना रही थीं, टीवी पर समाचार चल रहे थे और ड्रॉइंग रूम में बैठे पापा अख़बार पढ़ रहे थे। कॉलेज से लौटी अनुष्का ने बैग एक तरफ़ रखा और सीधे माँ के पास आ गई।
“मम्मी, आज मेरी दोस्त की बर्थडे पार्टी है। शाम सात बजे से है। क्या मैं जा सकती हूँ?”
अनुष्का की आवाज़ में उत्साह था, पर आँखों में हल्की-सी झिझक भी—क्योंकि घर में हर बार यह सवाल सिर्फ़ सवाल नहीं रहता था।
माँ ने मुस्कुराकर कहा,
“ज़रूर जा सकती हो बेटा। बस बता देना पार्टी कितने बजे खत्म होगी। अगर देर हो गई तो पापा लेने आ जाएंगे।”
अनुष्का के चेहरे पर राहत की चमक आ गई।
“थैंक यू मम्मी।”
लेकिन तभी पीछे से आवाज़ आई—
“क्या! पार्टी? वो भी रात को?”
यह उसके बड़े भाई आरव की आवाज़ थी, जो कमरे में आते ही भड़क उठा।
“मम्मी, आपको ज़रा भी अंदाज़ा है आजकल की पार्टियों में क्या होता है? शराब, सिगरेट, ड्रग्स—सब चलता है। और आप इसे इतनी आसानी से भेज रही हो?”
अनुष्का कुछ बोलती, उससे पहले माँ ने शांति से कहा,
“आरव, वहाँ इसके कॉलेज के दोस्त होंगे। कोई अनजान जगह नहीं है। और ये अकेली भी नहीं जा रही।”
आरव ने तंज कसते हुए कहा,
“मम्मी, आप बहुत भोली हो। आजकल कौन-सी पार्टी ‘साधारण’ होती है? और अगर देर हो गई तो पापा लेने आ जाएंगे—ये सोचकर आप निश्चिंत हो गईं?”
अनुष्का अब चुप नहीं रह पाई।
“भैया, आप भी तो अपने दोस्तों की पार्टियों में जाते हो। तब आपको ये सब खतरे नज़र नहीं आते?”
आरव झुंझला गया।
“क्योंकि मैं लड़का हूँ। मेरे साथ कोई ज़बरदस्ती नहीं करेगा। पर लड़कियों के साथ… मैंने अपनी आँखों से देखा है कि कुछ लड़के किस तरह गलत हरकतें करते हैं।”
अनुष्का ने गहरी साँस ली। उसकी आवाज़ में गुस्सा नहीं था, बल्कि ठहराव था।
“भैया, जब गलत हरकतें लड़के करते हैं, तो रोक-टोक लड़कियों पर क्यों? रोकना तो उन्हें चाहिए जो गलत करते हैं।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
आरव कुछ कहने ही वाला था कि अनुष्का ने बात आगे बढ़ाई—
“अगर हर लड़का ये तय कर ले कि वो किसी लड़की के साथ गलत नहीं करेगा, और कहीं गलत होते देखे तो विरोध करेगा, तो लड़कियाँ खुद-ब-खुद सुरक्षित हो जाएँगी। है ना?”
माँ चुपचाप सुन रही थीं। पापा ने अख़बार नीचे रख दिया था।
अनुष्का ने धीरे से जोड़ा,
“और वैसे भी भैया, ये पार्टी मेरी दोस्त के घर पर है। उसके मम्मी-पापा भी वहाँ होंगे। ये कोई क्लब या बार नहीं है।”
आरव की आवाज़ धीमी पड़ गई।
“मुझे बस तेरी फ़िक्र है।”
अनुष्का मुस्कुरा दी।
“मुझे पता है। और मुझे आपकी फ़िक्र की कद्र है। लेकिन भरोसा भी ज़रूरी होता है।”
कुछ पल बाद आरव ने कहा,
“ठीक है। पर समय पर लौट आना। और कुछ भी अजीब लगे तो तुरंत फोन करना।”
अनुष्का ने सिर हिलाया।
“पक्का।”
पार्टी में माहौल बिल्कुल वैसा ही था जैसा अनुष्का ने बताया था। दोस्त, हँसी, केक, म्यूज़िक—सब कुछ सादगी भरा। कोई ज़बरदस्ती नहीं, कोई असहजता नहीं। रात साढ़े नौ बजे तक पार्टी खत्म हो गई।
घर लौटते वक्त अनुष्का सोच रही थी—काश हर घर में इस तरह बातें खुलकर हो पातीं।
घर पहुँचते ही आरव ने पूछा,
“सब ठीक रहा?”
“हाँ,” अनुष्का ने मुस्कुराकर कहा,
“बहुत अच्छा।”
आरव ने राहत की साँस ली।
“अच्छा है।”
कुछ दिनों बाद कॉलेज में एक सेमिनार हुआ—‘सुरक्षा और जिम्मेदारी’। वहाँ एक वक्ता ने कहा—
“लड़कियों को रोकना सुरक्षा नहीं है। लड़कों को जिम्मेदार बनाना सुरक्षा है।”
अनुष्का को वही बात याद आ गई, जो उसने उस दिन घर में कही थी।
सेमिनार के बाद आरव उसे लेने आया। रास्ते में उसने कहा,
“आज मुझे एहसास हुआ कि मैं हमेशा तुझे रोकने की सोचता रहा, पर खुद से ये नहीं पूछा कि मैं और मेरे जैसे लड़के समाज में क्या बदलाव ला सकते हैं।”
अनुष्का ने आश्चर्य से उसकी ओर देखा।
“मतलब?”
आरव बोला,
“मतलब ये कि अगर कहीं किसी लड़की के साथ गलत होता देखूँ, तो चुप नहीं रहूँगा। क्योंकि अगर मैं अपनी बहन को सुरक्षित देखना चाहता हूँ, तो किसी और की बहन की सुरक्षा के लिए भी खड़ा होना होगा।”
अनुष्का की आँखें नम हो गईं।
“यही तो मैं कहना चाहती थी भैया।”
उस दिन दोनों के बीच कुछ बदल गया था।
भरोसा बढ़ा था।
सोच बदली थी।
माँ-पापा ने भी महसूस किया कि बच्चों को डर में रखकर नहीं, संवाद में रखकर सुरक्षित किया जा सकता है।
अनुष्का अब भी पार्टियों में जाती थी, दोस्तों के साथ बाहर निकलती थी—पर ज़िम्मेदारी के साथ।
और आरव अब सिर्फ़ भाई नहीं था, बल्कि एक ऐसा इंसान बन रहा था जो यह समझ चुका था—
सुरक्षा का मतलब दीवारें खड़ी करना नहीं,
बल्कि सोच को सही दिशा देना है।
क्योंकि जब समाज यह सीख ले कि
लड़कियों की आज़ादी खतरा नहीं है,
और लड़कों की जिम्मेदारी बोझ नहीं है—
तभी असली सुरक्षा संभव होगी।
मूल लेखिका : संगीता अग्रवाल
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