Skip to main content

कुछ कीमतें ऐसी होती हैं, जिन्हें कोई दौलत चुका नहीं सकती।

 शारदा को कभी अपने भाग्य से शिकायत नहीं रही थी। साधारण से परिवार में ब्याही गई थी, पति राकेश एक मध्यम स्तर के व्यापारी थे। शुरू के वर्षों में जीवन जैसे-तैसे चलता रहा। सीमित आय, सीमित इच्छाएँ और सीमित सपने। शारदा ने भी खुद को उसी दायरे में ढाल लिया था। बेटे विवेक के जन्म के बाद तो उसका पूरा संसार उसी के इर्द-गिर्द सिमट गया।

समय बदला।
राकेश के व्यापार को अचानक पंख लग गए। नए कॉन्ट्रैक्ट मिले, बड़ा निवेश आया और कुछ ही वर्षों में घर की आर्थिक स्थिति पूरी तरह बदल गई। वही छोटा-सा मकान एक बड़े बंगले में बदल गया। पुरानी स्कूटर की जगह चमचमाती कार ने ले ली। घर में नौकर-चाकर बढ़ गए और रिश्तेदारों का आना-जाना भी।

शारदा को जैसे नई दुनिया मिल गई थी। जो चीज़ें कभी सिर्फ़ ख्वाब थीं, अब पल भर में घर आ जातीं। महंगे कपड़े, जेवर, फर्नीचर, सजावट—सब कुछ। उसे लगने लगा कि पैसे का मतलब ही यही है—जितना मिले, उतना उड़ाओ।

विवेक जब माँ से बीस रुपये माँगता, तो वह सौ पकड़ा देती।
“मेरे बेटे को किसी चीज़ की कमी नहीं होनी चाहिए,” वह गर्व से कहती।

धीरे-धीरे विवेक की इच्छाएँ भी उसी रफ्तार से बढ़ने लगीं। नए मोबाइल, महंगे जूते, दोस्तों के लिए पार्टी—कुछ भी मना नहीं होता। शारदा को लगता था कि यही तो माँ का फर्ज़ है—बेटे की हर ख्वाहिश पूरी करना।

उसके बदलते व्यवहार को देखकर उसकी सहेलियाँ और रिश्तेदार चिंतित होने लगे।
“शारदा, पैसे के साथ संयम भी ज़रूरी होता है,” एक सहेली ने समझाया।
“बच्चे को इतना खुला मत छोड़ो,” किसी ने कहा।

लेकिन शारदा हँसकर टाल देती।
“आजकल के बच्चों को रोक-टोक पसंद नहीं। और वैसे भी, हमारे पास है तो क्यों न दें?”

विवेक दसवीं कक्षा में पहुँचा तो उसकी माँगें और स्पष्ट हो गईं।
एक दिन उसने कहा—
“माँ, मुझे बाइक चाहिए।”

शारदा ने बिना सोचे हामी भर दी।
उसके भाई ने विरोध किया—
“अभी वो नाबालिग है, लाइसेंस भी नहीं है। बाइक देना ठीक नहीं।”

शारदा मुस्कुरा दी।
“भैया, यही उम्र तो है मस्ती करने की। अभी नहीं करेगा तो कब करेगा?”

बाइक घर आई तो विवेक का घमंड भी उसके साथ आ गया।
तेज़ रफ्तार, बिना हेलमेट, दोस्तों को पीछे बैठाकर सड़कों पर उड़ान भरना—यह सब उसकी दिनचर्या बन गया।
कभी ट्रैफिक पुलिस रोक लेती, कभी किसी का नुकसान हो जाता—शारदा हर बार पैसे से मामला सुलझा देती।

उसे लगता था कि पैसा हर गलती को ढक सकता है।

एक रात विवेक दोस्त की पार्टी से लौट रहा था।
शराब नहीं पी थी, पर जोश और रफ्तार नशे से कम नहीं थी।
अंधेरी सड़क, तेज़ बाइक और सामने से आती ट्रक—सब कुछ कुछ ही सेकंड में हुआ।

अगली सुबह शारदा की दुनिया उजड़ चुकी थी।

हॉस्पिटल के गलियारों में भागते हुए उसके कदम काँप रहे थे।
राकेश डॉक्टरों से गिड़गिड़ा रहे थे—
“पैसे की चिंता मत कीजिए… बस मेरे बेटे को बचा लीजिए।”

डॉक्टरों ने जान बचा ली…
पर कीमत बहुत भारी थी।

विवेक का एक पैर हमेशा के लिए चला गया।

जब शारदा ने बेटे को होश में आते देखा, तो उसके भीतर का घमंड, उसकी सारी अकड़ एक पल में चूर हो गई।
विवेक की आँखों में डर था, सवाल थे—
“माँ… मैं अब कैसे चलूँगा?”

शारदा के पास कोई जवाब नहीं था।

घर लौटने के बाद सब कुछ वैसा ही था—बड़ा घर, पैसा, सुविधाएँ—
पर अब हर चीज़ उसे काटने दौड़ती लगती थी।

वह समझ चुकी थी कि उसने बेटे को प्यार नहीं, छूट दी थी।
संरक्षण नहीं, लापरवाही दी थी।
और उसी लापरवाही ने उसके बेटे से उसका भविष्य छीन लिया था।

लोग सांत्वना देने आते।
“भगवान की मर्ज़ी,” कहते।
पर शारदा को हर चेहरे में एक ही सवाल दिखता—
“जब रोका गया था, तब क्यों नहीं समझी?”

आज भी उसके पास पैसा है।
लेकिन वह जान चुकी है—
कुछ कीमतें ऐसी होती हैं, जिन्हें कोई दौलत चुका नहीं सकती।

अब वह हर माँ को यही कहती है—
“प्यार दीजिए, पर सीमा के साथ।
वरना एक दिन पछताने के लिए बहुत कुछ बचता है…
और सुधारने के लिए कुछ भी नहीं।”

लेखिका : विभा गुप्ता


Comments

Popular posts from this blog

दामाज बेटा बन जाता है पर बहू पराये घर की रहती है

  "अरे भाईसाहब (ननदोई) इतनी सुबह सुबह ?" "मम्मी पापा ने बुलाया था.कुछ जरूरी काम है." प्रमोद ने रश्मि को रूखा सा उत्तर दिया. "आ गये बेटे. बहू खड़े खड़े क्या बातें कर रही हो जाओ चाय बना लाओ." "जी मम्मी जी" रश्मि चाय बनाते हुए सोच रही थी ऐसी क्या बात हो सकती है जो भाईसाहब को सुबह बुलाया.कल रात उसे सास ससुर के कमरे से खुसुरफुसुर की आवाजें आ रही थी.मन में उठी किसी अनहोनी की आशंका को झटक कर वह चाय ले कर ड्रॉइंग रूम में गई. "बहू नाश्ता जल्दी बना देना.हमें काम से जाना है." "मम्मी जी कहाँ जाना है ?" "आकर बताते है तुम नाश्ते की तैयारी करो." रश्मि ने सास ससुर और प्रमोद को नाश्ता दिया.कुछ देर में तीनो तैयार हो कर चले गये और रश्मि घर के काम निपटाने लगी. ये थी रश्मि. शर्मा परिवार की इकलौती बहू.रश्मि की शादी रूपेश से हुए एक साल हो गया था.रूपेश की एक बड़ी शादीशुदा बहन कंचन और एक छोटी बहन काजल  जो कॉलेज में पढ़ती है.रूपेश दूसरे शहर में नौकरी करता था.उसकी इच्छा थी कि रश्मि  मम्मी पापा की देखभाल के लिए उनके साथ रहे.रश्मि ने भी रूपेश की इच्...

घर के लक्ष्मी का सम्मान

  "रवि... सुनिए ना... मुझे आपसे कुछ ज़रूरी बात करनी थी। वो मेरे पैरों में बहुत सूजन आ रही है और कमर में भी..." सुमन ने रात के सन्नाटे में, करवट बदलते हुए अपने पति रवि से कहने की कोशिश की। उसकी आवाज़ में एक दबी हुई कराह थी। रवि ने झल्लाहट में अपनी आँखों से बांह हटाई और मोबाइल की स्क्रीन पर समय देखा। रात के साढ़े ग्यारह बज रहे थे। "सुमन, प्लीज यार! अभी ऑफिस की टेंशन कम नहीं है जो तुम घर की रामायण शुरू कर देती हो? सुबह से शाम तक घर पर रहती हो, आराम ही तो करती हो। माँ बता रही थीं कि आजकल तुम दोपहर में दो-तीन घंटे सोती हो। फिर भी थकान? और ये पैरों में सूजन वूजन सब वहम है, थोड़ा वॉक किया करो। अब सोने दो, कल मेरी बहुत बड़ी प्रेजेंटेशन है।" रवि ने कंबल मुंह तक खींच लिया और दूसरी तरफ करवट ले ली। सुमन की आँखों में आए आंसू अँधेरे में ही जज़्ब हो गए। वह क्या बताती कि जिसे उसकी सास 'दोपहर की नींद' कहती हैं, वह असल में छत पर पापड़ और अचार सुखाने की चिलचिलाती धूप वाली मेहनत होती है। रवि को सच सुनना ही नहीं था, क्योंकि उसके लिए माँ का कहा पत्थर की लकीर था। सुमन ने चुपचाप एक दर्द न...

हकीकत

  सुमन के हाथों से शादी की मेहंदी भी नहीं उतरी थी कि उसके साथ सुधा जी ने उसे पूरी तरह से काम में झोंक दिया। सुबह से शाम हो जाती, लेकिन सुधा जी के काम तो मानो पूरे ही नहीं होते थे। जैसे ही सुमन आराम करने के लिए अपने कमरे में जाती, वैसे ही सुधा जी कहतीं, "बहू, जरा मेरे सिर में तेल की मालिश कर दो" या "कपड़े प्रेस कर दो"। कोई न कोई बहाना बनाकर पहले से ही तैयार रखतीं। सुमन कुछ भी नहीं बोल पाती और झट से काम पर लग जाती—आखिर नई-नई बहू जो ठहरी! सुमन के पति रोहित दूसरे शहर में नौकरी करते थे। शादी के लिए भी कम ही छुट्टियाँ मिली थीं, इसलिए शादी के आठ दिन बाद ही अपने काम पर लौट गए। तभी एक दिन… "अरे बहू, कब तक सोती रहेगी? कितना समय हो गया है, आज तुम्हारे ससुर जी ऑफिस के लिए भी निकल गए और तूने चाय तक नहीं बनाई। आगे से ध्यान रखना, समझ गई? ठीक चार बजे उठ जाना, क्योंकि तेरे ससुर जी सुबह छह बजे ही निकल जाते हैं। बहुएं तो काम के लिए ही तो लाई जाती हैं, एक लौटी बहू हो, नहीं बताएंगे तो कैसे सीखोगी? बड़े-बूढ़ों की कदर करना सीखो," सुधा जी नसीहत देतीं। "मुझसे गलती हो गई मांजी...