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माँ मेहमान नहीं है

 सुबह का समय था। सोसाइटी के पार्क में रोज़ की तरह चहल-पहल रहती थी—कोई टहल रहा होता, कोई बच्चों के पीछे भाग रहा होता, तो कोई बेंच पर बैठकर अपनी सहेलियों से दिनभर की बातें साझा कर रहा होता। लेकिन आज कई दिनों से एक चेहरा वहाँ दिखाई नहीं दे रहा था—रीता।

“अरे, रीता आजकल दिखती ही नहीं,” सुजाता ने टहलते हुए कहा।
“हाँ, पहले तो रोज़ सुबह मिलती थी,” दूसरी सहेली ने हामी भरी।

सुजाता को भी अजीब लगा। उसने सोचा, चलो फोन करके पूछ ही लेती हूँ।
“रीता, सब ठीक तो है? कई दिनों से पार्क नहीं आ रही हो,” उसने फोन पर पूछा।

रीता ने गहरी साँस ली।
“सब ठीक है… बस घर में मेहमान आए हुए हैं।”

“अच्छा, तो इसीलिए,” सुजाता हँस पड़ी।
“चल कोई बात नहीं, मेहमान आए हों तो समय लग ही जाता है। हमारे यहाँ तो अतिथि को भगवान माना जाता है।”

रीता के स्वर में चिड़चिड़ापन झलक आया।
“काहे के भगवान! सुबह से रात तक बस उनकी सेवा… थक जाती हूँ। अभी बेटा स्कूल से लौटेगा, फिर और काम।”

यह कहकर रीता ने फोन काट दिया।
सुजाता कुछ पल तक फोन हाथ में पकड़े सोचती रही—ऐसे कौन से मेहमान हैं जो रीता को इतना परेशान कर रहे हैं?
फिर बच्चों की चिंता याद आई और वह घर की ओर चल पड़ी।

दो दिन बाद सुजाता बाज़ार गई। लौटते समय उसका रास्ता रीता के घर के सामने से होकर जाता था। मन में आया, क्यों न एक बार मिल ही लिया जाए। उसने दरवाज़े की घंटी बजाई।

दरवाज़ा रीता के पति अनिल ने खोला।
“अरे सुजाता जी, आइए आइए।”

“नमस्ते,” सुजाता ने मुस्कुराते हुए कहा।
“वैसे मेहमान गए या अभी भी रुके हैं?”

अनिल चौंक गया।
“मेहमान? हमारे घर?”
फिर उसने भीतर की ओर आवाज़ लगाई—
“रीता, देखो कौन आया है।”

रीता जल्दी से बाहर आई।
“अरे सुजाता, तुम?”
उसके चेहरे पर हल्की घबराहट थी।

सुजाता ने हँसते हुए कहा,
“मैं तो सोच रही थी मेहमानों से मिल भी लूँ। तुम तो फोन पर बहुत परेशान लग रही थीं।”

रीता ने तुरंत बात संभाली।
“अरे, वो… अनिल मज़ाक कर रहे हैं। माँ-पापा आए हुए हैं, मैं उन्हीं की बात कर रही थी।”

सुजाता को झटका-सा लगा।
“माँ-पापा?”
वह कुछ कह पाती, उससे पहले अनिल ने शांत स्वर में कहा—
“सुजाता जी, माँ-पापा मेहमान कैसे हो सकते हैं? ये घर उन्हीं का है। असल में तो हम यहाँ रहने वाले मेहमान हैं।”

अनिल की बात सुनकर रीता का चेहरा लाल हो गया।
वह चुपचाप रसोई की ओर मुड़ गई।

अंदर बैठी सास-ससुर की ओर सुजाता की नज़र गई।
सास सोफे पर बैठी ऊन बुन रही थीं और ससुर अख़बार पढ़ रहे थे। दोनों के चेहरे पर संकोच साफ़ झलक रहा था, जैसे वे अपने ही घर में किसी का बोझ हों।

सुजाता का मन भारी हो गया।
उसने धीरे से कहा,
“मैं बस ऐसे ही मिलने आई थी।”
और कुछ देर बाद वहाँ से विदा ले ली।

घर लौटते समय उसके दिमाग़ में अनिल की बात गूँज रही थी—
‘माँ-पापा मेहमान कैसे हो सकते हैं?’

उसे अपने हालात याद आ गए। उसके माता-पिता गाँव में रहते थे। जब भी वे कुछ दिनों के लिए आते, सुजाता के बच्चे खुशी से उनके इर्द-गिर्द घूमते रहते। वह जानती थी, काम बढ़ जाता है, दिनचर्या बदल जाती है, पर मन में कभी यह भाव नहीं आया कि वे बोझ हैं।

अगले दिन पार्क में सुजाता ने यह बात बाकी सहेलियों से साझा की।
“सोचो ज़रा,” उसने कहा,
“आजकल शहरों में माँ-बाप भी ‘अनचाहे मेहमान’ बनते जा रहे हैं।”

एक बुज़ुर्ग महिला, जो पास की बेंच पर बैठी थीं, बोलीं—
“बेटी, ये समय की सबसे बड़ी विडंबना है। जिनके लिए पूरी ज़िंदगी खपा दी, वही आज बोझ लगने लगे हैं।”

उधर रीता के घर में भी उस दिन माहौल बदला-बदला था।
रात को खाना खाते समय अनिल ने चुप्पी तोड़ी।
“रीता, तुम्हें बुरा लगा होगा, पर जो मैंने कहा, वो सच था।”

रीता ने प्लेट में खाना घुमाते हुए कहा,
“मुझे पता है ये घर मम्मी-पापा का है। पर मेरी दिनचर्या बिगड़ जाती है, सब कुछ बदल जाता है।”

अनिल ने संयम से कहा,
“दिनचर्या बदलना मुश्किल है, पर रिश्ते बदल जाना उससे भी ज़्यादा डरावना है।
सोचो, अगर कल को हमारे बच्चे बड़े होकर हमें ‘मेहमान’ कहने लगें, तो कैसा लगेगा?”

रीता चुप हो गई।
उसकी आँखों के सामने माँ-पापा की छवि घूम गई—कैसे उन्होंने अपनी सहूलियतें छोड़कर बेटे के पास रहने का फैसला किया था, ताकि बच्चे उनका सहारा बन सकें, ताकि बुढ़ापे में अकेलापन न खाए।

अगली सुबह रीता ने एक छोटा-सा कदम उठाया।
उसने सास को रसोई में बुलाया।
“माँ, आप आज मेरे साथ बैठकर चाय पीजिए। मुझे आपकी पुरानी बातें सुननी हैं।”

सास पहले तो चौंकीं, फिर मुस्कुरा दीं।
“क्या हुआ आज अचानक?”

“बस… समझ आ रहा है कि समय कितना तेज़ी से निकल रहा है,” रीता ने धीमे से कहा।

उस दिन रीता पार्क नहीं गई।
लेकिन उसके भीतर कुछ बदल रहा था।

शाम को जब अनिल घर लौटा, तो उसने देखा कि उसके माता-पिता बच्चों के साथ हँस रहे थे और रीता रसोई से चाय लाते हुए मुस्कुरा रही थी।
उसने कुछ नहीं कहा, बस मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद दिया।

कुछ दिनों बाद सुजाता फिर से रीता से मिली।
“आजकल तो तुम पार्क में भी दिखने लगी हो,” उसने चुटकी ली।

रीता ने हल्की-सी शर्मिंदगी के साथ कहा,
“शायद मुझे खुद से मिलने का वक्त मिल गया है।”

दोनों हँस पड़ीं।

शहर की उस सोसाइटी में ज़िंदगी फिर अपने ढर्रे पर चलने लगी।
पर सुजाता के मन में एक सवाल हमेशा के लिए बैठ गया था—
हम किस दिशा में जा रहे हैं, जहाँ अपने ही माता-पिता ‘मेहमान’ कहलाने लगें?

रिश्ते सुविधाओं से नहीं, स्वीकार से चलते हैं।
और जो अपने ही घर में अपनापन खो दें,
वहाँ दीवारें तो रहती हैं,
पर घर नहीं बचता।

मूल लेखिका : संगीता अग्रवाल


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