हर सुबह ठीक सात बजे संदीप अपने पिता के कमरे के बाहर रुककर आवाज़ देता—
“पापा… मैं फैक्ट्री के लिए निकल रहा हूँ। शाम को आकर बैठेंगे।”
पिता बिना देखे ही मुस्कुरा देते।
“ठीक है बेटा… ध्यान से जाना।”
संदीप यही कहकर निकलता और रोज़ की तरह रास्ते में फैक्ट्री पहुँचते ही घर फोन कर देता—
“पापा, पहुँच गया।”
बस इतना सुन लेना ही पिता के लिए काफी होता था।
उनकी सुबह उसी एक वाक्य से शुरू होती और उसी भरोसे पर दिन कट जाता।
संदीप उनके जीवन का एकमात्र सहारा था। पत्नी के जाने के बाद घर में वही था जो उन्हें जीने का कारण देता था। शाम को संदीप लौटता, पिता के पैर दबाता, चाय बनाता और दिनभर की बातें सुनाता। कभी फैक्ट्री की परेशानियाँ, कभी भविष्य के सपने—
“पापा, थोड़ा पैसा और जुड़ जाए तो आपकी दवाइयों की चिंता नहीं रहेगी।”
“पापा, अगले साल आपको घुमाने ले चलूँगा।”
पिता मुस्कुराकर बस इतना कहते—
“मुझे कहीं नहीं जाना बेटा, तू पास बैठा रहे, वही काफी है।”
उस दिन भी सब कुछ रोज़ जैसा ही था।
संदीप तैयार हुआ, पिता के पैर छुए और बोला—
“पापा, आज काम ज़्यादा है, पर शाम को जल्दी आ जाऊँगा।”
पिता ने आशीर्वाद दिया।
संदीप चला गया।
फोन आया—
“पापा, पहुँच गया।”
पिता निश्चिंत होकर अपनी छोटी-सी दुकान के हिसाब-किताब में लग गए।
करीब एक घंटे बाद फोन फिर बजा।
उन्होंने बिना सोचे समझे उठा लिया—
“हाँ बेटा…”
उधर से घबराई हुई आवाज़ आई—
“आप संदीप के पापा बोल रहे हैं?… संदीप का एक्सीडेंट हो गया है… सिटी हॉस्पिटल ले जा रहे हैं…”
फोन हाथ से फिसल गया।
पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
पिता को याद नहीं रहा कि दुकान कैसे बंद की, सड़क कैसे पार की, बस इतना याद था कि उनका बेटा खून में लथपथ है।
हॉस्पिटल पहुँचते ही वह स्ट्रेचर पर पड़े संदीप को देख टूट गए।
चेहरा पहचान में आ रहा था, पर शरीर…
उन्होंने कांपते हाथों से बेटे का हाथ थामा—
“मैं हूँ ना बेटा… कुछ नहीं होगा।”
ऑपरेशन थियेटर का दरवाज़ा बंद हो गया।
बाहर बैठे पिता हर सेकंड को जी रहे थे।
घड़ी की सुईयाँ मानो रुक गई थीं।
अचानक बत्ती गुल हो गई।
कुछ देर बाद डॉक्टर बाहर आए।
आवाज़ सपाट थी—
“सॉरी… हम आपके बेटे को नहीं बचा सके।”
वह वाक्य सुनते ही पिता के भीतर कुछ बुझ गया।
आँखों के सामने अँधेरा छा गया।
वे वहीं ज़मीन पर बैठ गए, जैसे शरीर ने साथ छोड़ दिया हो।
दिन बीते।
रिश्तेदार आए, संवेदनाएँ दीं, चले गए।
घर सूना हो गया।
सुबह सात बजे कोई आवाज़ नहीं आती।
शाम को कोई पैर नहीं दबाता।
पिता अब भी जी रहे थे, पर बस साँसें चल रही थीं।
हर दीवार, हर कोना संदीप की याद दिलाता।
उसकी तस्वीर के सामने बैठकर वह घंटों बातें करते—
“आज तू होता तो चाय बनाता… आज तू होता तो कहता— पापा आराम करो…”
कुछ दिनों बाद फैक्ट्री के मैनेजर आए।
सफेद कपड़े में लिपटा हुआ रुपयों का बंडल उनके हाथ में थमा दिया।
“हमें बहुत अफ़सोस है… ये कंपनी की तरफ़ से मुआवज़ा है।”
पिता ने पैसे नहीं देखे।
उनकी नज़र दीवार पर टंगी संदीप की तस्वीर पर टिक गई।
वही मुस्कान… वही आँखें…
उन्होंने कांपते हाथों से पैसे लौटाते हुए कहा—
“साहब… ये रुपये मुझे पापा कहकर नहीं पुकारेंगे।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
उन्होंने भर्राई आवाज़ में कहना जारी रखा—
“ये मेरे पैरों की मालिश नहीं करेंगे… ये मेरे साथ बैठकर चाय नहीं पिएँगे… ये पूछेंगे नहीं कि दवा खाई या नहीं।”
आँसू बहने लगे।
“एक पिता की चाह मुआवज़ा नहीं होती साहब… उसकी चाह होती है अपने बेटे के साथ बैठना… उसका इंतज़ार करना… उसकी आवाज़ सुनना…”
वह फूट-फूटकर रो पड़े।
मैनेजर सिर झुकाकर बाहर चला गया।
उस शाम पिता ने पहली बार संदीप की अलमारी खोली।
उसके कपड़े, उसकी डायरी, उसका पुराना मोबाइल—
डायरी के आख़िरी पन्ने पर लिखा था—
“पापा के लिए नई चप्पलें लेनी हैं, पुरानी घिस गई हैं।”
पिता ने डायरी सीने से लगा ली।
उस रात उन्होंने पहली बार संदीप के तकिये पर सिर रखकर रोया।
कुछ महीनों बाद उन्होंने दुकान फिर से खोल ली।
हर सुबह दुकान खोलते समय आसमान की ओर देखते और कहते—
“जा बेटा… फैक्ट्री पहुँच गया होगा।”
शाम को दुकान बंद करते हुए बुदबुदाते—
“आज देर हो गई, कल बैठेंगे।”
लोग कहते—
“समय सब ठीक कर देता है।”
पर सच यह था—
समय सिर्फ़ सिखा देता है दर्द के साथ जीना।
आज भी अगर कोई बेटा अपने पिता का हाथ थामे सड़क पार करता दिखता है, तो उनकी आँखें भर आती हैं।
क्योंकि वे जानते हैं—
बेटे की कीमत मुआवज़े में नहीं,
उस एक आवाज़ में होती है—
“पापा… मैं आ गया।”
लेखिका : विभा गुप्ता
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