रविवार की सुबह थी। घर में हल्की-सी सुस्ती और चाय की खुशबू फैली हुई थी। रसोई में अनन्या रोज़ की तरह काम में लगी थी। बच्चों का टिफ़िन भले आज न बनना हो, लेकिन घर के बाकी काम कभी छुट्टी नहीं लेते। झाड़ू, पोछा, कपड़े, नाश्ता—सब अपनी जगह खड़े रहते हैं।
तभी ड्रॉइंग रूम से उसके पति आशीष की आवाज़ आई—
“अनन्या, आज दोपहर में मेरे ऑफिस के कुछ सीनियर दोस्त आ रहे हैं। बढ़िया-सा खाना बना देना।”
अनन्या ने पलटकर देखा।
“आपने पहले क्यों नहीं बताया? घर में सामान भी पूरा नहीं है। अभी निकलना पड़ेगा।”
“तो निकल जाओ,” आशीष ने सहजता से कहा,
“मेरे दोस्तों के सामने कोई कमी नहीं रहनी चाहिए।”
अनन्या ने कुछ नहीं कहा। चुपचाप बैग उठाया और बाज़ार की ओर चल पड़ी। रास्ते में सोचती जा रही थी—अचानक आए मेहमान, अचानक की अपेक्षाएँ, और हमेशा की तरह उसकी जिम्मेदारी।
दोपहर तक वह रसोई में पसीने से भीग चुकी थी। चार तरह की सब्ज़ी, दाल, चावल, रायता, मिठाई—सब तैयार। उसने राहत की साँस ली और कमरे में जाकर साड़ी बदलने लगी।
आशीष ने उसे देखा तो眉 सिकोड़ लिया।
“तुम क्यों सज-धज रही हो? तुम्हें तो सब जानते हैं—घर पर ही रहती हो। ऑफिस में काम करने वाली थोड़े हो।”
अनन्या के हाथ रुक गए।
यह कोई नई बात नहीं थी। शादी के बाद से वह यह सुनती आई थी—
तुमने पढ़ाई भी अधूरी छोड़ी…
नौकरी नहीं करती…
सिर्फ़ घर संभालती हो…
वह बिना जवाब दिए बाहर आ गई।
मेहमान आ चुके थे। हँसी-ठहाके, ऑफिस की बातें, प्रमोशन और प्रोजेक्ट्स की चर्चा। अनन्या चुपचाप पानी और नाश्ता देती रही।
खाने की मेज़ पर एक मेहमान, विवेक, मुस्कुराते हुए बोला—
“भाभी, खाना कमाल का है। सच में आप बहुत सुघड़ गृहिणी हैं।”
अनन्या के चेहरे पर हल्की मुस्कान आई, लेकिन अगले ही पल आशीष ने हँसते हुए कहा—
“अरे हाँ, गृहिणी ही तो है। घर का काम करने के अलावा आता ही क्या है? ये तो कोई भी कर सकता है।”
मेज़ पर एक अजीब-सा सन्नाटा छा गया।
अनन्या के भीतर कुछ टूट-सा गया। सुबह से मेहनत, बाज़ार, रसोई, थकान—और बदले में यह?
वह पानी की ट्रे लेकर आई, लेकिन इस बार उसके कदम नहीं डगमगाए।
उसकी आवाज़ शांत थी, पर शब्दों में दृढ़ता थी—
“जी हाँ, मैं गृहिणी हूँ।
मुझे खाना बनाना आता है, घर संभालना आता है, बच्चों की देखभाल करना आता है।
पर क्या आप जानते हैं कि ‘गृहिणी’ शब्द का अर्थ क्या होता है?”
सब चुप हो गए।
“गृहिणी वह होती है, जिसके कारण पूरा गृह चलता है।
जिसकी वजह से पति निश्चिंत होकर बाहर काम करता है,
क्योंकि उसे पता होता है—
पीछे घर, बच्चे, माता-पिता और उसकी हर ज़रूरत संभालने वाला कोई है।
एक गृहिणी बिना वेतन के चौबीस घंटे काम करती है।
छुट्टी, बीमार पड़ने या मन खराब होने की कोई सुविधा नहीं होती।
नौकरानी काम कर सकती है,
लेकिन वह अपनापन नहीं दे सकती।
और हाँ—वह मोटी रकम भी लेती है।”
कमरे में सन्नाटा गहरा गया।
विवेक ने तुरंत कहा—
“सच कहूँ भाभी, आपने आज हमारी आँखें खोल दीं।”
दूसरे मेहमान, रोहन, ने आशीष की ओर देखते हुए कहा—
“दोस्त, तुम वाकई खुशकिस्मत हो। हर किसी को ऐसी जीवनसाथी नहीं मिलती।”
आशीष का चेहरा उतर गया।
उसे पहली बार अहसास हुआ कि जिस औरत को वह हल्के में लेता रहा,
वही आज उसके दोस्तों के सामने सबसे सम्मानित खड़ी थी।
खाना खत्म हुआ। मेहमान चले गए।
घर में सन्नाटा था।
आशीष ने धीमी आवाज़ में कहा—
“अनन्या… मुझे नहीं पता था कि तुम्हें इतना बुरा लगता है।”
अनन्या ने पहली बार बिना डर के कहा—
“बुरा नहीं लगता था आशीष… आदत हो गई थी।
पर आज मैंने खुद को छोटा नहीं होने दिया।”
आशीष चुप रहा।
उस दिन के बाद सब कुछ एकदम नहीं बदला,
पर कुछ तो बदला।
अब वह अचानक आदेश नहीं देता।
मेहमान आने से पहले पूछता है।
और सबसे बड़ी बात—
अब वह गर्व से कहता है—
“मेरी पत्नी गृहिणी है…
और वही हमारे घर की सबसे बड़ी ताक़त है।”
कभी-कभी सम्मान माँगना नहीं पड़ता,
बस अपने होने की कीमत खुद बतानी पड़ती है।
मूल लेखिका : संगीता अग्रवाल
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