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गृह प्रवेश

 “मैं मम्मी को नहीं बताऊंगी… मैं खुद ही सामना करूंगी।” यह सोचकर स्नेहा ने अपने आंसू पोंछे। चेहरे पर मजबूती का नकाब चढ़ाया और मां के घर की तरफ निकल गई। पिता के बरसी-पूजन का काम था। रिश्तेदार आए हुए थे, घर में भीड़ थी, और हर चेहरे पर सहानुभूति—लेकिन स्नेहा के भीतर एक और ही उथल-पुथल चल रही थी।

पूजा में बैठी वह मंत्र तो सुन रही थी, पर कान बार-बार पिछले दो दिनों की उन बातों पर अटक जाते—जिन्होंने उसे अंदर से तोड़ दिया था।

उसकी सास विमला और पति अभिषेक… दोनों ने इतनी सहजता से उसे “अलग” कर दिया था, मानो वह घर की सदस्य नहीं, किसी काम की सुविधा भर हो। दो दिन पहले जब वह मायके जाने लगी थी, तब विमला जी ने ताना कस दिया था—
“हर छोटी बात पर मायके भागना तुम्हारी आदत बन गई है, स्नेहा। शादी के बाद भी मां-बाप की छाया नहीं छोड़ पाई?”

और अभिषेक… जिसने हमेशा कहा था “मैं तुम्हारे साथ हूं”—वह भी उस दिन बस इतना बोलकर रह गया था—
“मां सही कह रही हैं, स्नेहा… तुम हर चीज़ को दिल पर ले लेती हो।”

स्नेहा ने बहस नहीं की थी। बस चुपचाप निकल गई थी। क्योंकि उस वक्त बोलने पर शब्द नहीं, आँसू निकलते। और आँसू उसे कमज़ोर बना देते।

अब पूजा निपटा कर शाम को वह वापस ससुराल आ गई। घर में सबकुछ सामान्य था—लेकिन सामान्य के नीचे एक अजीब सी ठंडक थी। जैसे उसके होने-न होने से किसी को फर्क नहीं पड़ता।

अगला दिन कार्यक्रम वाला था। विमला जी की छोटी बेटी नंदिनी का “गृह प्रवेश” था। नंदिनी की नई-नई शादी हुई थी, और शहर के दूसरे छोर पर अपने पति के साथ नए फ्लैट में जा रही थी। आज उसी का विधिवत गृह प्रवेश होना था।

सुबह से विमला जी की आवाज़ घर में गूंज रही थी—“ये मिठाई का डिब्बा लेना… वो साड़ी का कवर मत भूलना… पूजा की थाली ठीक से सजाओ… पंडित जी को समय पर बुलाना…”
और स्नेहा? उसने बिना किसी बहस के सब कुछ कर दिया। बच्चों के कपड़े, अभिषेक का कुर्ता, विमला जी की चूड़ियां—सब ठीक समय पर। उसने शॉपिंग भी निपटा दी, फूल भी मंगवा दिए, नारियल-कुमकुम भी रख दिया, और सबसे जरूरी—सबकी पैकिंग तक करके कार में रखवा दी।

दोपहर होते-होते सब तैयार हो चुके थे। विमला जी ने आईने में अपनी साड़ी की पल्लू ठीक की। अभिषेक ने बच्चों को जूते पहनाए। कार की चाबी उठी। माहौल में “चलो-चलो” की हलचल आ गई।

बस… स्नेहा नहीं उठी।

वह ड्राइंग रूम के कोने में, बिल्कुल शांत बैठी थी। उसके हाथ में एक साधारण-सा रुमाल था, जिसे वह बिना देखे बार-बार मोड़ रही थी। जैसे मन के भीतर की गांठें उसी रुमाल में बंधी हों।

विमला जी की निगाह पड़ी तो चौंक कर बोलीं,
“स्नेहा, तुम अभी तक तैयार नहीं हुई? जल्दी करो… देर हो रही है। हमारी बेटी का गृह प्रवेश है।”

स्नेहा ने सिर नहीं उठाया। कोई जवाब नहीं दिया।

अभिषेक को यह “चुप्पी” बुरी लगी। उसके स्वर में झुंझलाहट थी—
“स्नेहा! मां तुमसे कुछ कह रही हैं। टाइम वेस्ट मत करो, जल्दी तैयार हो जाओ।”

स्नेहा ने पहली बार नजर उठाई। उसके चेहरे पर न गुस्सा था, न रोना—बस एक ठहराव था।
“जी, मैं समय वेस्ट नहीं कर रही। सब सामान कार में रख दिया है। बच्चों को तैयार कर दिया है। आप दोनों भी तैयार हैं… बस आपको रवाना होना है।”

विमला जी और अभिषेक दोनों एक साथ रुक गए।
“और तुम?” विमला जी की आवाज़ में अब आश्चर्य था।

“मैं नहीं जा रही।” स्नेहा ने बहुत साधारण ढंग से कहा, जैसे “चाय नहीं पीनी” कह रही हो।

अभिषेक हक्काबक्का रह गया।
“क्या मतलब? क्यों नहीं जा रही?”

“क्योंकि मुझे निमंत्रण ढंग से नहीं दिया गया।” स्नेहा ने उसी सहजता से जवाब दे दिया।

विमला जी का चेहरा तमतमा गया।
“ये कैसी बकवास है! फोन पर बताया तो था। सबको आना है—तो सबको आना है। तुम भी ‘सब’ में ही तो आती हो।”

स्नेहा हल्के से मुस्कुराई—पर वह मुस्कान खुशी की नहीं थी।
“बस यही बात है, मम्मी जी। आपको निमंत्रण मिला तो मैं ‘सब’ में हूं। लेकिन मुझे अलग से नहीं बोला गया… तो मैं ‘सब’ में नहीं हूं।”

अभिषेक ने तेज़ स्वर में कहा—
“ये ड्रामा बंद करो। वहां लोग पूछेंगे तो क्या कहेंगे हम?”

स्नेहा की आंखें एक पल को नम हुईं, फिर वह संभल गई।
“जैसे मैं कल पूरे रास्ते में सोचती रही कि मम्मी से क्या कहूंगी… कि आपका व्यवहार क्यों बदल गया… वैसे ही आप भी सोच लीजिएगा। आखिर आप भी तो मेरे मां के दामाद हैं—और मम्मी जी, आप भी तो उसकी ‘समधन’।”

विमला जी का गला सूख गया।
“तुम बदला ले रही हो?”

“बदला नहीं…” स्नेहा ने धीरे से कहा, “मैं बस आपको आपकी ही भाषा में बात समझा रही हूं। उस दिन आपने कहा था—‘सम्मान दोगे तो सम्मान मिलेगा।’ आज मैं कह रही हूं—‘रिश्ता निभाओगे तो रिश्ता निभेगा।’”

कमरे में एक पल को ऐसा सन्नाटा छा गया, जैसे किसी ने पंखा बंद कर दिया हो। बच्चे भी सहम गए। अभिषेक की निगाहें नीचे झुक गईं। विमला जी के चेहरे पर पहली बार असमंजस था—क्योंकि वह समझ रही थीं कि बहू ने झगड़ा नहीं किया… उसने बस दर्पण रख दिया है।

अभिषेक ने स्वर धीमा किया।
“कौन-सी बात बुरी लग गई तुम्हें?”

स्नेहा की आवाज़ में दर्द था, पर वह चीखी नहीं।
“बुरी बात नहीं… बुरा ‘अहसास’ लगा। मैं आपके घर की बहू हूं, घर की सदस्य हूं—पर कभी-कभी मुझे ऐसा लगता है मैं बस… सुविधा हूं। जब काम होता है तो सब याद आता है—और जब भावनाएं चाहिए होती हैं, तो मुझे ‘ज्यादा संवेदनशील’ कहकर चुप करा दिया जाता है।”

विमला जी ने झूठी सख्ती दिखाने की कोशिश की।
“बहू, हम सब टेंशन में थे… तुम भी समझो।”

स्नेहा ने सिर हिलाया।
“मैं समझती हूं। इसलिए तो आज कोई काम नहीं छोड़ा। पर मम्मी जी… क्या रिश्तों में बस काम ही काफी है? कभी कोई प्यार से पूछे—‘तुम ठीक हो?’ कभी कोई कहे—‘चलो तुम भी साथ चलो, तुम्हारे बिना अच्छा नहीं लगेगा।’ बस यही चाहिए था।”

अभिषेक का चेहरा धीरे-धीरे नरम पड़ने लगा। उसे याद आया—उस दिन उसने स्नेहा की आंखों में वही सवाल देखा था, जो आज उसके शब्दों में सुनाई दे रहा था।

विमला जी ने बहुत देर बाद कहा—
“स्नेहा… उस दिन हमने गलत किया।”

स्नेहा ने कुछ नहीं कहा। सिर्फ उनकी तरफ देखा।

विमला जी का गला भर आया।
“तुम मायके जा रही थी, हमने तुम्हें रोका नहीं… उल्टा ताना मार दिया। मुझे लगा… बहुएं आजकल ज्यादा आज़ाद हो गई हैं, इसलिए डांट दी। पर सच तो ये है कि घर की शांति बहू के मन से जुड़ी होती है… अगर वही टूट जाए, तो घर में रस्में रह जाती हैं, रिश्ते नहीं।”

अभिषेक ने आगे बढ़कर स्नेहा के पास बैठते हुए कहा—
“और मैं… मैं भी गलत था। मुझे तुम्हारा साथ देना चाहिए था। हर बात में ‘मां सही’ कहकर मैं तुम्हें अकेला छोड़ देता हूं। मुझे लगा तुम समझ जाओगी… पर सच ये है कि समझने के लिए किसी को थोड़ा झुकना पड़ता है।”

स्नेहा की आंखों से एक बूंद गिर गई।
“मैं झुकती रही, अभिषेक… पर एक वक्त आता है जब झुकना आत्मसम्मान पर चोट बन जाता है।”

विमला जी ने धीरे से उसका हाथ पकड़ लिया।
“बहू… माफी मांगना आसान नहीं होता, पर आज मैं सच में माफी मांग रही हूं। हमें तुम्हें बार-बार ‘सब’ में शामिल नहीं करना चाहिए… तुम्हें ‘अपना’ समझकर बुलाना चाहिए। तुम सिर्फ बहू नहीं, बेटी जैसी हो—और बेटी को निमंत्रण नहीं, अधिकार दिया जाता है।”

अभिषेक ने भी कहा—
“चलो… अब तैयार हो जाओ। लेकिन इस बार मैं नहीं कहूंगा ‘तैयार हो जाओ, देर हो रही है।’
मैं कहूंगा—‘तुम चलोगी तो अच्छा लगेगा।’”

स्नेहा ने पहली बार उस दिन खुलकर सांस ली। उसने उठकर अलमारी से साड़ी निकाली। बच्चों ने भी राहत की सांस ली। विमला जी ने खुद उसके बालों में पिन लगाई—जैसे कोई मां बेटी को तैयार करती है।

कार में बैठते वक्त, विमला जी ने एक और बात कही—
“आज से एक नियम… किसी भी कार्यक्रम की जानकारी ‘सबको’ नहीं, ‘स्नेहा को’ पहले दी जाएगी। क्योंकि घर की बहू अगर खुद को अपना महसूस करेगी, तभी वह घर को भी अपना बनाएगी।”

गृह प्रवेश के कार्यक्रम में वे समय पर पहुंचे। नंदिनी ने दरवाजे पर आरती की थाली पकड़ी थी। जैसे ही उसने स्नेहा को देखा, खुश होकर बोली—
“भाभी! आप आ गईं… मैं तो सोच रही थी, आप नहीं आईं तो मुझे बहुत बुरा लगेगा।”

स्नेहा ने मुस्कुराकर उसके सिर पर हाथ रखा।
“ऐसा कैसे हो सकता है? घर में खुशी हो और मैं न आऊं।”

उस शाम, लौटते समय कार में एक नई-सी गर्माहट थी। जैसे कोई पुरानी गांठ खुल गई हो। बच्चों ने पीछे सीट पर गाना शुरू कर दिया। अभिषेक ड्राइव करते हुए बार-बार रियर मिरर में स्नेहा को देख रहा था—जैसे पहली बार समझ रहा हो कि उसकी पत्नी सिर्फ घर चलाने वाली नहीं, घर की धड़कन भी है।

रात को घर पहुंचकर स्नेहा ने चुपचाप रसोई में पानी रखा। विमला जी भी पीछे-पीछे आ गईं।
उन्होंने धीमे से कहा—
“बहू, आज तुमने हमें जो सिखाया… वो शायद कोई और न सिखा पाता। रिश्ते मांगने से नहीं चलते, निभाने से चलते हैं।”

स्नेहा ने सिर झुकाकर कहा—
“और रिश्ते तब ही निभते हैं, जब दोनों तरफ से ‘अपना’ कहा जाए।”

उस रात स्नेहा को लंबे समय बाद नींद आई—ऐसी नींद जिसमें आंसुओं की नमी नहीं थी, बस मन का सुकून था। क्योंकि उसने लड़ाई नहीं जीती थी—उसने अपने रिश्ते को सही दिशा दी थी।

और यही उसकी जीत थी।

लेखिका : सुमन चौहान 


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