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बदतमीजी नहीं। स्वाभिमान है।

 मीरा के हाथों में हल्का-हल्का कंपन था। परीक्षा की किताबें खुले बैग में रखी थीं, पर उसके मन में अक्षर नहीं, सिर्फ एक ही वाक्य घूम रहा था—“अगले शनिवार सगाई है… और बीस दिन में विदेश…”

दोपहर को मामी का फोन आया था। मामी की आवाज़ में ऐसा उत्साह था जैसे उन्होंने कोई जंग जीत ली हो।
“मीरा, तू किस्मत वाली है! लड़का विदेश में है, कंपनी में बड़ा पद है। उसके पापा ने कहा है सगाई अभी कर देते हैं, फिर शादी बड़े होटल में… और हां, पासपोर्ट-वीजा भी वो लोग करा देंगे। तू बस तैयार रहना।”

मीरा ने फोन कान से लगाए रखा, मगर दिमाग सुन्न था। वह अमीर-गरीब, होटल-विदेश… इन सब बातों के लिए बनी ही नहीं थी। उसका सपना तो बस इतना था कि वह पढ़-लिखकर नौकरी करे, अपने बाबा के कंधों का भार थोड़ा हल्का करे। उसने कभी नहीं सोचा था कि कोई “सपनों का राजकुमार” उसके घर यूं अचानक उतर आएगा।

घर में खबर आग की तरह फैली। पड़ोसनें बधाइयों की मिठास लेकर आईं, पर उनकी आंखों में ईर्ष्या की किरकिराहट भी थी। सहेलियों ने मिठाई खिलाई, फिर कान में फुसफुसाईं—“अब तो तू अमेरिका जाएगी… हमें भूल मत जाना।”
मीरा मुस्कुरा देती, पर भीतर कहीं डर काँपता रहता।

शाम पांच बजे तक लड़के वाले आने वाले थे। मीरा की मां रेखा ने पुराने बर्तन भी चमका दिए, मेज पर सफेद चादर बिछा दी, और एक छोटा सा गुलदस्ता भी रख दिया। मीरा के पिता महेश ने अपनी घड़ी बार-बार देखी। उनकी कमीज़ इस्त्री की हुई थी, पर माथे की सिलवटें किसी इस्त्री से नहीं मिट सकती थीं।

पांच बजे बीते। फिर छह। फिर सात।
बच्चों ने पूछना शुरू किया—“बाबा, मेहमान कब आएंगे?”
महेश ने बनावटी हंसी के साथ कहा—“बस बेटा, आते ही होंगे… ट्रैफिक होगा।”

आठ बजने पर रेखा का दिल धकधक करने लगा। उसने मीरा को अलग कमरे में बुलाकर कहा—“बेटी, तू ठीक तो है? इतना बड़ा रिश्ता… भगवान की मेहर है।”
मीरा ने जवाब नहीं दिया। उसके भीतर कुछ अजीब-सा लग रहा था, जैसे कोई अनदेखी रस्सी उसकी सांसों को बांध रही हो।

नौ बजते-बजते महेश ने अपने भाई सुरेश से कहा—“भाई, एक बार फोन करके पूछ लो, कहां तक पहुंचे।”
सुरेश ने फोन मिलाया। उधर से जो बात निकली, उसने पूरे घर का रंग फिका कर दिया।

“वो लोग… होटल में हैं। कहते हैं गली बहुत गंदी है, बहुत तंग है। वो यहां नहीं आएंगे। बोल रहे हैं—आप लोग होटल आ जाइए, सगाई वहीं हो जाएगी।”

सुरेश की आवाज़ जैसे टूट गई। महेश कुछ पल तक पत्थर बने रहे। उनके चेहरे पर अपमान की लाली नहीं, एक असहाय-सी पीड़ा थी। रेखा के हाथ से चम्मच गिरते-गिरते बचा। बच्चे कुछ समझ नहीं पाए, पर हवा में फैल गई चुप्पी ने उन्हें भी सहमा दिया।

महेश धीरे-धीरे मीरा के कमरे में आए। उनके शब्द भारी थे।
“बेटी… वो लोग होटल में हैं। कहते हैं हम वहां आ जाएं।”

मीरा ने पिता के चेहरे को देखा। वह चेहरा जिसने हर महीने फीस के लिए एक-एक रुपया जोड़कर रखा था। जिसने अपने जूतों को घिसते हुए भी कभी बच्चों के सपनों को घिसने नहीं दिया था। आज उसी चेहरे पर किसी ने बिना हाथ उठाए थप्पड़ मार दिया था।

मीरा की सांस गहरी हुई। उसने बहुत धीरे से कहा—“बाबा, मैं इस रिश्ते के लिए तैयार नहीं हूं।”

महेश चौंक गए। “क्या? पर… बेटी, सब इंतज़ाम… लोग… और तेरा भविष्य…”

मीरा की आवाज़ पहली बार दृढ़ हुई—“बाबा, जो इंसान मेरे घर में एक घंटे बैठना अपनी शान के खिलाफ समझे… वो जिंदगी भर मेरे अस्तित्व को क्या समझेगा? वो मुझे पत्नी नहीं, कोई शोपीस समझेगा। और जो लोग हमारी गली की गंदगी से डर गए… वो हमारे संघर्षों से कैसे प्यार करेंगे?”

रेखा की आंखें भर आईं। “पर बेटी, इतना बड़ा रिश्ता…”

मीरा ने मां का हाथ पकड़ा। “मां, बड़ा रिश्ता वह नहीं होता जिसमें बड़े होटल हों। बड़ा रिश्ता वह होता है जिसमें इंसानियत हो। आज उन्होंने हमें होटल बुलाकर साफ कह दिया—हम उनके बराबर नहीं हैं।”

सुरेश बीच में बोले—“मीरा, तू भावुक हो रही है। अमीर लोग ऐसे ही होते हैं… आदत नहीं होगी उन्हें…”

मीरा ने शांत स्वर में कहा—“चाचा, अगर आदत नहीं है तो उन्हें हमसे रिश्ता करने की भी आदत नहीं होनी चाहिए।”

महेश ने एक लंबी सांस ली। उनके भीतर पिता का प्यार और समाज का डर दोनों लड़ रहे थे। आखिर उन्होंने कहा—“तू जो कहेगी वही होगा। पर सोच समझकर…”

मीरा ने सिर झुका लिया, जैसे मन में निर्णय पहले से लिखा हुआ था। “मैंने सोच लिया है, बाबा।”

कुछ देर बाद सुरेश ने होटल फोन किया। मीरा ने खुद फोन अपने हाथ में लिया। उधर से लड़के की मां की आवाज आई—“हाँ, कब तक आ रहे हैं आप लोग? हम इंतजार कर रहे हैं।”

मीरा ने बहुत संयम से कहा—“नमस्ते। मैं मीरा बोल रही हूं। मुझे माफ कीजिए, हम होटल नहीं आ पाएंगे। और… यह रिश्ता भी नहीं कर पाएंगे।”

उधर कुछ पल सन्नाटा। फिर तीखी आवाज—“ये क्या बदतमीजी है? इतनी तैयारी… और तुम…?”

मीरा ने वही शांत स्वर रखा—“बदतमीजी नहीं। स्वाभिमान है। आपने हमारे घर को अपनाने से पहले उसे नापसंद कर दिया। हम किसी ऐसे घर में नहीं जाएंगे जहां हमारे होने से पहले हमारे हालात को शर्म समझा जाए।”

फोन कट गया। या शायद उन्होंने काट दिया। पर मीरा के लिए वो कटना किसी गांठ के खुलने जैसा था।

रेखा रो पड़ीं। “लोग क्या कहेंगे…”

मीरा ने मां की आंखों से आंसू पोंछ दिए। “लोग आज कहेंगे, कल भूल जाएंगे। पर अगर मैं चली गई और रोज़ अपमान सहती रही… तो मैं खुद को कभी माफ नहीं कर पाऊंगी।”

महेश धीरे से बोले—“बेटी… तूने मेरे सिर को झुकने नहीं दिया।”
उनकी आवाज़ में गर्व था, और एक दर्द भी—कि बेटी को इतना समझदार होना पड़ा।

मीरा बिना कुछ बोले रसोई में चली गई। उसने थालियां लगाईं, बच्चों को आवाज़ दी—“आओ, खाना ठंडा हो जाएगा।”

बच्चे दौड़ते आए। सबसे छोटा नीलू बोला—“दीदी, मेहमान नहीं आए?”
मीरा मुस्कुरा दी। “नहीं आए… पर हम हैं ना। आज हम मिलकर खाना खाएंगे।”

बच्चों ने जैसे राहत की सांस ली। उन्हें असल में मेहमानों से ज्यादा खाने से मतलब था। वे चटखारे लेकर पूड़ी-सब्ज़ी खाने लगे। मीरा उन्हें देखती रही। उसके मन में एक हल्की-सी थकान थी, पर उससे बड़ी एक शांति—जैसे उसने कोई भारी बोझ नीचे रख दिया हो।

उसी रात पड़ोस में खबर फैल गई। कोई बोला—“अरे, लड़की ने रिश्ता ठुकरा दिया!”
कोई बोला—“इतना बड़ा मौका छोड़ दिया!”
किसी ने ताना मारा—“आजकल की लड़कियां बहुत तेज़ हो गई हैं।”

पर अगले दिन जब महेश दुकान गए, तो पुराने ग्राहक ने उनके कंधे पर हाथ रखकर कहा—“भाईसाहब, आपकी बेटी ने बड़ा काम किया है। इज्जत की कीमत पैसे से बड़ी होती है।”

रेखा धीरे-धीरे संभलीं। उन्होंने मीरा के बालों पर हाथ फेरा। “मैं डर गई थी… पर तू सही थी।”
मीरा ने मां से कहा—“मां, मुझे बस इतना चाहिए कि मेरा घर मेरी पहचान हो, मेरी कमजोरी नहीं।”

कुछ हफ्तों बाद परीक्षा हुई। मीरा ने मन लगाकर पढ़ाई की और अच्छे नंबरों से पास हो गई। कॉलेज में उसका चयन छात्रवृत्ति के लिए हुआ। महेश ने मिठाई बांटी। इस बार मोहल्ले वालों की बधाई में ईर्ष्या कम और सम्मान ज्यादा था।

एक दिन सुरेश ने धीमे से कहा—“मीरा, अगर उस दिन तुम होटल चली जातीं, तो शायद हम सबको अच्छा लगता… पर आज समझ आया कि तुमने हमें ‘बेचा’ नहीं, बचाया था।”

मीरा ने बस इतना कहा—“चाचा, रिश्ते में सम्मान नहीं होगा तो विदेश भी जेल बन जाता है।”

महेश ने उस शाम घर की छत पर बैठकर तारों को देखा और बुदबुदाए—“मेरी बेटी बहुत दूर जाएगी… पर अपने स्वाभिमान के साथ।”

मीरा ने पिता की बात सुन ली। उसने मन ही मन कहा—“दूर जाना जरूरी नहीं, बाबा… जरूरी है कि जहां जाऊं, खुद को साथ लेकर जाऊं।”

और उस रात पहली बार उसे लगा—उसने कोई रिश्ता नहीं तोड़ा, उसने अपने लिए एक सही जिंदगी चुन ली।


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