"अरे बहू, ये क्या? तू अपना सामान बांध कर कहां चली?"
अभी-अभी बहू वंदना को बुलाने के लिए कमरे में आई सुमित्रा जी उसे सामान पैक करते देखकर हैरान रह गईं। वंदना के बिस्तर पर दो बड़े सूटकेस खुले पड़े थे। अलमारी खाली हो चुकी थी और वंदना बड़ी तेज़ी से अपने कपड़े और ज़रूरत का सामान उसमें भर रही थी।
वंदना ने सास की आवाज़ सुनी, लेकिन उसके हाथ नहीं रुके। उसने एक भीगी हुई साड़ी को तह किया—वही साड़ी जो उसने अपनी शादी की सालगिरह पर पहनी थी।
"वंदना! मैं कुछ पूछ रही हूँ। तू बहरी हो गई है क्या? और ये सूटकेस क्यों निकाल रखे हैं? कार्तिक (वंदना का पति) कहाँ है?" सुमित्रा जी ने आगे बढ़कर वंदना का हाथ पकड़ लिया।
वंदना ने धीरे से अपना हाथ छुड़ाया और एक गहरी सांस ली। उसकी आँखें लाल थीं, जैसे पूरी रात रोई हो, लेकिन अब उनमें आंसुओं की जगह एक ठंडी आग थी।
"मैं जा रही हूँ माँजी," वंदना ने सपाट आवाज़ में कहा।
"जा रही है? कहाँ? मायके? पर क्यों? अभी कल ही तो तूने कार्तिक के साथ अपना जन्मदिन मनाया था। अचानक ऐसा क्या हो गया?" सुमित्रा जी के स्वर में घबराहट थी। उन्हें आभास हो गया था कि मामला छोटा-मोटा झगड़ा नहीं है।
"जन्मदिन?" वंदना ने एक कड़वी हंसी हंसी। "माँजी, जिसे आप जन्मदिन का जश्न समझ रही थीं, वो मेरे भ्रम के टूटने का मातम था।"
वंदना ने सूटकेस की चेन बंद की और बिस्तर पर बैठ गई।
"माँजी, कल रात कार्तिक ने मुझसे एक तोहफा मांगा था। उन्होंने कहा कि मेरे जन्मदिन पर वो मुझसे कुछ चाहते हैं।"
"तो? पति-पत्नी में लेन-देन तो चलता रहता है," सुमित्रा जी ने राहत की सांस लेने की कोशिश की। "कार्तिक थोड़ा जिद्दी है, बचपन से ही। तू तो जानती है उसे। उसने कुछ कह दिया होगा, तूने दिल पर ले लिया होगा।"
"उन्होंने मुझसे मेरे पिताजी का दिया हुआ वो पुश्तैनी प्लॉट मांगा जो शहर के बीचों-बीच है," वंदना ने सुमित्रा जी की आँखों में देखते हुए कहा।
सुमित्रा जी चुप हो गईं। वे जानती थीं कि कार्तिक का बिज़नेस पिछले कुछ समय से डांवाडोल चल रहा था।
"तो क्या हुआ?" सुमित्रा जी ने दबी ज़बान में कहा। "मुसीबत में पत्नी ही तो पति के काम आती है। अगर वो प्लॉट बेचकर उसका काम जम जाता, तो घर में ही तो सुख आता।"
"मैंने भी यही सोचा था माँजी," वंदना ने कहा। "मैं साइन करने के लिए तैयार थी। कागज़ात कार्तिक के बैग में ही रखे थे। लेकिन तभी उसका फोन बजा। वो वॉशरूम में थे, तो स्क्रीन पर मैसेज फ्लैश हुआ। मैंने गलती से पढ़ लिया।"
वंदना का गला रुंध गया। उसने पानी का घूंट भरा।
"मैसेज किसी 'रिया' का था। लिखा था—'कार्तिक, प्लॉट के पेपर्स पर साइन हुए या नहीं? साइन होते ही हम वो फ्लैट बुक करेंगे और फिर हमेशा के लिए उस घर की किचकिच से दूर चले जाएंगे। आई लव यू।'"
सुमित्रा जी के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वे धम्म से पास रखी कुर्सी पर बैठ गईं। "रिया? वो... वो तो कार्तिक की पुरानी ऑफिस कलीग थी न? पर वो सब तो शादी से पहले खत्म हो गया था।"
"कुछ खत्म नहीं हुआ था माँजी," वंदना ने अपना मंगलसूत्र उतारकर टेबल पर रख दिया। "सब चल रहा था। मेरी पीठ पीछे। कार्तिक मुझसे वो प्लॉट बिज़नेस के लिए नहीं, बल्कि अपनी नई ज़िंदगी शुरू करने के लिए मांग रहे थे। वो मुझे और आपको... हम दोनों को धोखा दे रहे थे। वो मुझसे साइन करवाकर उस रिया के साथ शिफ्ट होने वाले थे, और हमें इस कर्ज़ में डूबे हुए घर में छोड़ने वाले थे।"
"नहीं... मेरा बेटा ऐसा नहीं कर सकता," सुमित्रा जी ने इनकार में सिर हिलाया। "तू झूठ बोल रही है। तुझे कोई गलतफहमी हुई है।"
तभी कार्तिक कमरे में दाखिल हुआ। उसने वंदना को तैयार और सूटकेस पैक देखा। उसके चेहरे पर एक पल के लिए डर आया, लेकिन फिर वही ढिठाई आ गई।
"तो तुमने माँ को बता ही दिया?" कार्तिक ने बेपरवाही से कहा। "अच्छा हुआ। रोज़-रोज़ के नाटक से तो जान छूटी।"
सुमित्रा जी लपककर बेटे के पास गईं और उसका कॉलर पकड़ लिया। "कार्तिक! यह क्या सुन रही हूँ मैं? तू उस लड़की के चक्कर में अपनी गृहस्थी उजाड़ रहा है? वंदना जैसी हीरा बहू को छोड़ रहा है?"
कार्तिक ने माँ का हाथ झटक दिया।
"हीरा? माँ, प्लीज। मैं वंदना के साथ कभी खुश नहीं था। यह शादी आपकी ज़िद थी। मैं रिया से प्यार करता हूँ। और हाँ, वंदना जा रही है तो जाने दो। वैसे भी अब मुझे इसकी ज़रूरत नहीं है।"
"और वो प्लॉट?" वंदना ने शांत स्वर में पूछा। "उसका क्या हुआ कार्तिक?"
"वो मुझे नहीं चाहिए," कार्तिक ने गुर्राते हुए कहा। "तुम्हारे टुकड़ों पर पलने की ज़रूरत नहीं है मुझे। मैं अपने दम पर रिया के साथ रह लूँगा। तुम निकलो यहाँ से।"
सुमित्रा जी फूट-फूट कर रोने लगीं। "बेटा, तू क्या कह रहा है? यह घर टूट जाएगा। समाज में हमारी क्या इज़्ज़त रहेगी?"
"समाज की फिक्र आपको होगी माँ, मुझे अपनी खुशी की फिक्र है," कार्तिक ने अपना फैसला सुना दिया।
वंदना ने अपना दूसरा सूटकेस उठाया। उसने सुमित्रा जी की तरफ देखा जो ज़मीन पर बैठकर रो रही थीं।
"माँजी, आप उठिए," वंदना ने कहा।
"मैं कहाँ जाऊँ बहू?" सुमित्रा जी ने सिसकते हुए कहा। "मेरा बेटा ही कपूत निकल गया। मैंने जिसे नाज़ों से पाला, आज वो किसी और के लिए मुझे और तुझे बेघर करने पर तुला है। तू जा बेटी... अपने मायके जा। तेरी ज़िंदगी अभी बची है। मेरे कर्म फूटे थे जो मुझे यह दिन देखना पड़ा।"
कार्तिक ने दरवाज़े की तरफ इशारा किया। "ड्रामा खत्म हो गया हो तो जाओ वंदना। मेरी फ्लाइट है शाम की, मुझे रिया के पास जाना है।"
वंदना मुख्य द्वार तक गई। कार्तिक के चेहरे पर जीत की मुस्कान थी। उसे लगा वंदना चली गई।
लेकिन वंदना दरवाज़े पर रुकी। उसने पलटकर कार्तिक को देखा।
"कार्तिक, तुम शायद भूल रहे हो," वंदना ने अपनी आवाज़ में एक नई मज़बूती लाते हुए कहा। "यह घर, जिसमें हम खड़े हैं, यह तुम्हारे पिता के नाम पर था।"
"हाँ, तो?" कार्तिक ने चिढ़कर कहा। "पिताजी के बाद मैं ही इसका वारिस हूँ।"
"नहीं," वंदना ने अपने पर्स से एक कानूनी दस्तावेज़ निकाला। "पिताजी जानते थे कि उनका बेटा कैसा है। इसीलिए गुज़रने से पहले, आईसीयू में उन्होंने अपनी वसीयत बदल दी थी। उन्होंने यह घर अपनी पत्नी, सुमित्रा देवी के नाम कर दिया था।"
कार्तिक का रंग उड़ गया। "क्या बकवास है?"
"यह वसीयत की कॉपी है," वंदना ने कागज़ लहराया। "और माँजी..."
वंदना वापस अंदर आई और सुमित्रा जी के पास घुटनों के बल बैठ गई।
"माँजी, आप कह रही थीं न कि आप कहाँ जाएंगी? आपको कहीं जाने की ज़रूरत नहीं है। यह घर आपका है। कानूनी तौर पर भी और हक़ से भी।"
फिर वंदना उठी और कार्तिक के सामने खड़ी हो गई।
"कार्तिक, मैंने सूटकेस इसलिए पैक नहीं किया क्योंकि मैं यह घर छोड़कर जा रही हूँ। मैंने सूटकेस इसलिए पैक किया क्योंकि मैं तुम्हारे उस कमरे से अपना सामान शिफ्ट कर रही हूँ। आज से मैं इस घर की बहू नहीं, इस घर की मालकिन की 'बेटी' बनकर रहूँगी।"
"तुम... तुम यह नहीं कर सकतीं!" कार्तिक चिल्लाया। "माँ, इसे निकालो यहाँ से!"
सुमित्रा जी, जो अब तक आंसुओं में डूबी थीं, वंदना की बात सुनकर सन्न रह गई थीं। उन्होंने कांपते हाथों से वो वसीयत का कागज़ लिया। उन्हें अपने दिवंगत पति की दूरदर्शिता याद आई।
सुमित्रा जी ने आंसू पोंछे। उन्होंने दीवार का सहारा लेकर खुद को खड़ा किया। वे कार्तिक की तरफ मुड़ीं।
"कार्तिक," सुमित्रा जी की आवाज़ में अब ममता नहीं, एक कड़ा फैसला था। "वंदना सही कह रही है। यह घर मेरा है।"
"तो? मैं आपका बेटा हूँ माँ!" कार्तिक ने इमोशनल कार्ड खेला।
"बेटा?" सुमित्रा जी ने कड़वाहट से कहा। "बेटा वो होता है जो बुढ़ापे में माँ का सहारा बने, वो नहीं जो अपनी माँ के गहने और बहू का प्लॉट हड़पकर अपनी अय्याशी के लिए भाग जाए। तूने आज साबित कर दिया कि तेरे लिए रिश्ते कोई मायने नहीं रखते।"
सुमित्रा जी ने दरवाज़े की तरफ उंगली उठाई।
"तू रिया के पास जाना चाहता था न? जा। अभी निकल जा। लेकिन याद रखना, जिस प्लॉट के भरोसे तू उछल रहा था, वो वंदना का है। और जिस घर के भरोसे तू अकड़ रहा था, वो मेरा है। तेरे पास अब न घर है, न ज़मीन, और न ही माँ।"
"माँ!" कार्तिक गिड़गिड़ाया। "आप मज़ाक कर रही हैं न?"
"यह मज़ाक नहीं है," वंदना ने बीच में कहा। "मैंने टैक्सी बुला ली है। तुम्हारे लिए। तुम्हारा सामान भी बाहर रखवा दिया है। तुम अपनी 'आज़ादी' चाहते थे न? लो, मिल गई आज़ादी। अब जाओ और जी लो अपनी ज़िंदगी।"
कार्तिक ने देखा कि बाज़ी पलट चुकी है। वह गुस्से में बड़बड़ाता हुआ अपना बैग उठाकर बाहर निकल गया। उसे यकीन था कि माँ उसे रोक लेगी। वह गेट तक धीरे-धीरे गया। लेकिन पीछे से कोई आवाज़ नहीं आई।
जब कार्तिक की टैक्सी चली गई, तो घर में भारी सन्नाटा छा गया।
सुमित्रा जी सोफे पर निढाल होकर गिर गईं। एक माँ के लिए अपने बेटे को घर से निकालना आसान नहीं था, चाहे वो कितना भी गलत क्यों न हो।
वंदना ने पानी का गिलास भरकर उन्हें दिया।
"माँजी, पानी पीजिए।"
सुमित्रा जी ने वंदना का हाथ पकड़ लिया। "बहू, तू जा रही थी न? तू रुकी क्यों? मैं तो बुढ़िया हूँ, मेरा क्या है... पर तूने अपनी जवानी इस खंडहर में क्यों फंसा ली? कार्तिक तो चला गया।"
वंदना ने सुमित्रा जी के चरणों में सिर रख दिया।
"माँजी, मैं जा रही थी। सच में। लेकिन जब मैंने आपकी आँखों में वो डर देखा—अकेलेपन का डर—तो मुझे अपने पिताजी याद आ गए। उन्होंने मरते वक़्त मुझसे कहा था कि 'वंदना, ससुराल को कभी पराया मत समझना'।"
वंदना ने सिर उठाया और मुस्कुराई।
"कार्तिक ने रिश्ता तोड़ा है, आपने नहीं। मेरा और आपका रिश्ता एक कागज़ (तलाक) से नहीं जुड़ा है जो उसके फटने से खत्म हो जाए। आपने मुझे बेटी माना था न? तो बेटी माँ को अकेले कैसे छोड़ सकती है?"
"और रही बात मेरी ज़िंदगी की," वंदना ने दृढ़ता से कहा, "तो मैं पढ़ी-लिखी हूँ। कल से मैं फिर से अपनी जॉब ज्वाइन करूँगी। हम दोनों मिलकर इस घर को चलाएंगे। हमें किसी कार्तिक की ज़रूरत नहीं है खुश रहने के लिए।"
सुमित्रा जी ने वंदना को गले लगा लिया। आज उस घर से एक 'बेटा' ज़रूर गया था, लेकिन उस घर को एक 'वारिस' मिल गया था—जो खून से नहीं, दिल से जुड़ा था।
शाम घिर आई थी। वंदना ने उठकर बत्तियां जलाईं। उसने अपना सूटकेस वापस खोला और अपने कपड़े अलमारी में जमा दिए—लेकिन इस बार पति की अलमारी में नहीं, बल्कि उस कमरे की अलमारी में जो अब उसका अपना था।
रसोई से चाय की महक आ रही थी। सुमित्रा जी अदरक कूट रही थीं।
"वंदना! चाय बन गई है, आ जा।"
वंदना मुस्कुराई। कार्तिक ने सोचा था कि वो वंदना को बेसहारा छोड़ रहा है, लेकिन उसने अनजाने में उसे 'आज़ाद' कर दिया था।
बाहर सड़क पर अंधेरा था, लेकिन घर के अंदर दो औरतें चाय की चुस्कियों के साथ अपनी नई ज़िंदगी का नक्शा बना रही थीं। बिना किसी सहारे के, बिना किसी डर के।
सुमित्रा जी ने चाय का कप वंदना को थमाया और कहा, "बहू, कल वकील को बुला लेना। मुझे यह घर तेरे नाम करना है।"
"नहीं माँजी," वंदना ने कहा। "घर आपके नाम ही रहेगा। बस नेमप्लेट बदलनी है।"
"क्या लिखवाएगी?"
"सुमित्रा और वंदना निवास," वंदना ने हंसते हुए कहा।
और उस ठहाके में पुरानी बेड़ियां टूटने की खनक साफ सुनाई दे रही थी।
दोस्तों, यह कहानी हमें सिखाती है कि रिश्ते खून से नहीं… दिल से बनते हैं।
कभी-कभी बेटा पराया हो जाता है, और बहू बेटी बन जाती है।
👉 अब आप बताइए…
अगर आप वंदना की जगह होते तो क्या आप भी सास का साथ देते?
और कार्तिक को माफ़ करते या बाहर निकाल देते?
💬 नीचे कमेंट करके जरूर बताइए, आपकी राय बहुत जरूरी है…
क्या सच में “रिश्तों की असली वारिस बेटी होती है, बेटा नहीं?”
लेखिका : रीमा साहू
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