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मैं बदल गई हूँ

 रात के ग्यारह बज रहे थे। घर में सब सो चुके थे, मगर कविता की आँखों में नींद नहीं थी। वह चुपचाप स्टोर-रूम से पुराने बक्से बाहर खींच लाई थी—वही बक्सा, जिसमें सालों से “कभी फुर्सत मिली तो” वाली चीज़ें कैद थीं।

बक्से की धूल झाड़ते-झाड़ते उसकी उँगलियों में खुरदरापन चुभा, तो वह अनायास अपने हाथों को देखने लगी। उँगलियाँ मोटी हो गई थीं, नाखूनों पर नेलपॉलिश की कोई परछाईं नहीं, और हथेलियों पर महीन-सी दरारें—जैसे सारी उम्र घर की जिम्मेदारियों ने वहाँ अपनी लिखावट छोड़ दी हो।

वह उठकर शीशे के सामने आ खड़ी हुई। बाथरूम के बाहर वाला वही पुराना दर्पण, जिसकी तरफ वह अक्सर सिर्फ जल्दी-जल्दी नजर डालकर निकल जाती थी—काजल ठीक है, दुपट्टा सही है, बाल बँधे हैं, बस। आज उसने पहली बार दर्पण को समय दिया।

चेहरे पर हल्की झुर्रियाँ थीं, गालों की चमक पहले जैसी नहीं, और आँखों के नीचे थकान की परछाईं गहरी। कविता ने अपने ही प्रतिबिंब से फुसफुसाकर पूछा, “मैं सच में इतनी बदल गई?”

उसके कानों में शाम का एक वाक्य गूंज उठा—सिर्फ एक वाक्य, मगर ऐसा जैसे किसी ने भीतर की दीवार पर हथौड़ा मार दिया हो।

“मम्मी, अब आप बूढ़ी हो गई हो… आपसे ये सब नहीं होगा।”

यह वाक्य उसकी बेटी तृषा ने कहा था। और तृषा की आवाज़ में ताने की धार नहीं थी, बस एक बेपरवाह-सा सच था। जैसे कोई मौसम का हाल बता दे—आज गर्मी ज्यादा है।

शाम का पूरा दृश्य उसकी आँखों में लौट आया।

तृषा के कॉलेज का वार्षिक समारोह था। कविता ने सुबह से ही घर संभाला—सासुमा की दवाइयाँ, ससुर जी का बीपी, पति समीर के ऑफिस के कपड़े, बेटे शौर्य का टिफिन, और फिर तृषा की पिंक साड़ी को इस्त्री, ब्लाउज का हुक, ईयररिंग ढूंढना—सब कुछ।

समारोह में तृषा को स्टेज पर नृत्य करना था। नृत्य! वही नृत्य जिसे देखकर कविता के भीतर का कोई पुराना सपना हर बार सिर उठाता था।

कॉलेज में जब कविता पढ़ती थी, वह भी नाचती थी। स्कूल में जब पहली बार उसे “बेस्ट डांसर” का बैज मिला था तो वह पूरे रास्ते बस्ता पीठ पर उछलाती चली आई थी। माँ ने माथा चूमकर कहा था, “मेरी कविता नाचती है तो लगता है आँगन में बसंत उतर आया।”

पर फिर बसंत को जिम्मेदारियों की धूप लग गई।

शादी के बाद नए घर में कदम रखते ही कविता ने जैसे खुद को “सही बहू” की सूची में जमा कर लिया—सबका ध्यान, सबका आराम, सबका समय, सबकी जरूरतें। उसे खुद भी अच्छा लगता था जब लोग कहते, “कविता जैसी बहू हर घर में हो।” वह उस तारीफ को अपने अस्तित्व का प्रमाण मान बैठी थी।

समारोह के दौरान जब तृषा ने डांस किया, तो तालियों के साथ कविता के दिल में भी कुछ बजा था। उसके कदम अनजाने में संगीत के साथ हिलने लगे थे। लेकिन जैसे ही उसने उत्साह में थोड़ा-सा हाथ उठाया, उसकी कमर में हल्का खिंचाव हुआ और वह ठिठक गई।

“मम्मी, बैठिए… आपको क्या जरूरत है नाचने की!” तृषा ने हँसते हुए उसे कुर्सी पर बिठाया और फिर वही वाक्य बोल दिया—“अब आप बूढ़ी हो गई हो।”

कविता मुस्कुरा दी थी, मगर उस मुस्कान के भीतर कुछ टूट गया था। उसे चोट इसलिए नहीं लगी कि बेटी ने “बूढ़ी” कहा। चोट इसलिए लगी कि उसने खुद भी कभी महसूस नहीं किया कि कब उसकी उम्र ने उसके सपनों को दबा दिया।

घर लौटकर वह रात भर व्यस्त रही—मेहमानों की चाय, बच्चों की बातें, समीर का मोबाइल कॉल, सासुमा का दर्द, बरतन—और आखिर में जब सब सो गए, तब वह शीशे के सामने खड़ी थी, अपनी ही आँखों में खुद को ढूंढती हुई।

उस समय कमरे के दरवाजे पर धीमी आहट हुई। समीर पानी पीने उठा था। उसे दर्पण के सामने खड़ी देखकर वह रुक गया।

“इतनी रात में… क्या हुआ?” उसकी आवाज़ में आदत की नरमी थी।

कविता ने पलटकर देखा। वह समीर से नाराज नहीं थी, न दुखी। वह बस खाली थी।

“कुछ नहीं,” वह बोली, “बस… अपना चेहरा देख रही थी।”

समीर ने हँसकर कहा, “चेहरे में क्या रखा है, तुम तो ऐसी ही अच्छी हो।”

कविता ने पहली बार महसूस किया कि “ऐसी ही अच्छी हो” में भी एक छुपा हुआ अर्थ है—यानी जैसी तुम हो, वैसी ही रहो। बदलने की जरूरत नहीं। अपने लिए कुछ चाहने की जरूरत नहीं।

उसने बहुत धीमे स्वर में पूछा, “समीर, क्या तुम्हें याद है शादी के पहले मैं कितनी बातें करती थी? गाती थी, नाचती थी…”

समीर कुछ सोचता रहा। “हाँ… पर अब तो तुम व्यस्त रहती हो। घर, माँ-पापा, बच्चे…”

कविता ने तुरंत कहा, “मैंने खुद को व्यस्त रखा, समीर।”

समीर ने眉 चढ़ाई। “मतलब?”

कविता के भीतर बरसों से जमा शब्द आज बाहर निकलने लगे। “मतलब ये कि मैं हर किसी की जरूरत का नाम ‘कर्तव्य’ रखकर भागती रही। और धीरे-धीरे मुझे अपनी ही जरूरतें ‘स्वार्थ’ लगने लगीं।”

समीर चुप हो गया।

कविता ने कहा, “आज तृषा ने कहा मैं बूढ़ी हो गई हूँ। और मैं सोचती रही—मैं बूढ़ी नहीं हुई, मैं थक गई हूँ। मैं अपने अंदर की लड़की को बहुत पीछे छोड़ आई हूँ।”

समीर का चेहरा थोड़ा गंभीर हुआ। “तुम कहना क्या चाहती हो?”

कविता ने गहरी साँस ली। “मैं फिर से नाचना चाहती हूँ।”

समीर हँस पड़ा, “अब? इस उम्र में?”

कविता ने उसकी हँसी में वही अनजानी चोट पकड़ ली। फिर उसने बहुत साफ कहा, “इस उम्र में नहीं तो किस उम्र में? साठ में? या तब जब शरीर सच में जवाब दे देगा?”

समीर हँसी रोककर बोला, “पर घर… माँ… पापा… बच्चों…”

कविता का स्वर पहली बार दृढ़ हुआ। “घर भी मेरा है, समीर। मैं सिर्फ दूसरों की सुविधा नहीं हूँ।”

अगली सुबह कविता ने वह किया जो उसने सालों से नहीं किया था—अपने लिए समय तय किया।

वह मोहल्ले के कम्युनिटी सेंटर गई, जहाँ एक छोटी-सी डांस क्लास चलती थी। दरवाजे पर बोर्ड लगा था—“सौम्या मैम की नृत्य कार्यशाला (सभी उम्र के लिए)”।

कविता के कदम रुक गए। भीतर से हँसी की आवाजें आ रही थीं। कुछ लड़कियाँ थीं, दो-चार महिलाएँ भी। कविता को लगा सब उसे देखेंगे और सोचेंगे—“देखो, ये आंटी नाचने आई हैं।”

लेकिन तभी भीतर से एक महिला बाहर निकली—गोल चेहरा, माथे पर छोटा-सा बिंदी, और आँखों में आत्मविश्वास।

“आप भी क्लास के लिए?” उसने मुस्कुराकर पूछा।

कविता ने हिचकते हुए कहा, “मैं… बस पूछने आई थी।”

महिला हँसी, “पूछने नहीं, करने आई हैं। अंदर आइए।”

कविता का गला सूख गया। “पर मैं… बहुत समय बाद… और घर में…”

“घर में?” महिला ने प्यार से बात काटी, “घर के लिए आप रोज करती हैं। आज खुद के लिए कर लीजिए।”

कविता के भीतर कुछ पिघल गया। वह अंदर चली गई।

पहले दिन उसके कदम लड़खड़ाए। हाथ उठाने पर कंधे दुखे। कमर में जकड़न थी। साँसें जल्दी चढ़ रही थीं। एक पल को उसे लगा—तृषा ठीक कहती है, मैं बूढ़ी हो गई हूँ।

लेकिन फिर सौम्या मैम ने कहा, “नृत्य परफेक्शन नहीं माँगता, नृत्य सच्चाई माँगता है। आप जितनी सच्चाई से चलेंगी, उतना ही सुंदर लगेगा।”

कविता ने अपनी आँखें बंद कीं और कदम उठाए। वह नाच नहीं रही थी—वह खुद को वापस बुला रही थी।

दो हफ्तों में घर का माहौल बदलने लगा।

कविता पहले जैसे ही काम करती, पर अब वह काम के बीच में खुद को गायब नहीं करती थी। सासुमा की दवाइयाँ समय पर, पर साथ में कविता की क्लास भी समय पर। बेटे का टिफिन बना, मगर रात को कविता ने अपने लिए नींबू पानी भी बनाया।

समीर को शुरू में अजीब लगा। “आज खाना देर से?” वह पूछता।

कविता मुस्कुराकर कहती, “हाँ, क्योंकि आज मैं क्लास गई थी। पर खाना बनेगा। बस, अब हर चीज़ का बोझ मेरे सिर पर नहीं होगा।”

एक दिन सासुमा ने ताना मार दिया, “अब ये नाच-गाना शुरू हो गया? घर की बहू को शोभा देता है क्या?”

कविता ने पहली बार ताने से डरकर आवाज़ नहीं दबाई। उसने नम्रता से कहा, “माँ जी, बहू होने से पहले मैं इंसान हूँ। और इंसान को साँस चाहिए। ये नृत्य मेरी साँस है।”

सासुमा चुप रह गईं। शायद पहली बार उन्होंने बहू को सिर्फ काम की मशीन नहीं, एक जीवित मनुष्य की तरह देखा।

एक महीने बाद कॉलेज में फिर एक कार्यक्रम था—इस बार “फैमिली डे”। तृषा ने जिद की, “मम्मी आप मत नाचिएगा, बस आ जाइएगा।”

कविता ने हँसकर कहा, “मैं बस आऊँगी… पर बैठूँगी नहीं।”

समारोह में जब संगीत शुरू हुआ, सौम्या मैम की क्लास की महिलाओं ने एक छोटा-सा समूह नृत्य प्रस्तुत किया। और उन्हीं के बीच कविता भी थी—साधारण-सी साड़ी में, बालों में थोड़ी सफेदी के साथ, आँखों में चमक लिए।

डांस खत्म होते ही तालियाँ गूँज उठीं।

कविता की नजर सबसे पहले तृषा पर गई। तृषा स्तब्ध थी। फिर अचानक उसके चेहरे पर वही मुस्कान आई जो बचपन में “मम्मा” बोलते समय आती थी। वह दौड़कर आई और कविता को गले लगा लिया।

धीमे से बोली, “मम्मी… आप बूढ़ी नहीं हो। आप… कूल हो।”

कविता की आँखें भर आईं। “मैं कूल नहीं, बेटा। मैं… मैं फिर से मैं हूँ।”

उस रात घर लौटते समय समीर ने कार में कहा, “मुझे लगा था ये सब तुम्हारा शौक है… पर आज समझ आया—ये तुम्हारी जरूरत है।”

कविता ने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा, “शौक और जरूरत में फर्क सिर्फ इतना है, समीर—शौक छोड़ देने से उदासी होती है, और जरूरत छोड़ देने से इंसान मरने लगता है… भीतर से।”

समीर ने धीरे से कहा, “मैंने तुम्हें कभी रोका तो नहीं था…”

कविता ने बिना शिकायत के कहा, “रोकना जरूरी नहीं होता। कभी-कभी हम खुद ही अपने लिए दरवाजे बंद कर देते हैं।”

घर पहुँचकर कविता फिर शीशे के सामने खड़ी हुई। झुर्रियाँ वहीं थीं, बालों में सफेदी भी। पर चेहरे पर नूर लौट आया था—वह नूर जो उम्र से नहीं, आत्मसम्मान से आता है।

उसने दर्पण को देखकर धीमे से कहा, “हाँ… मैं बदल गई हूँ। अब मैं बूढ़ी नहीं—जिंदा हूँ।”


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