प्रतिष्ठित रिटायर शिक्षक दीनानाथ जी की पोती आज जीवन के एक नए अध्याय की शुरुआत करने जा रही थी। अवनि जब अपने कमरे से गहरे नीले रंग के रेशमी परिधान में तैयार होकर निकली, तो दीनानाथ जी की आँखों में नमी आ गई। उन्होंने अपनी पोती के सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया। अवनि न केवल सुंदर थी, बल्कि अत्यंत स्वाभिमानी और स्पष्टवादी भी थी। कुछ ही देर में वर पक्ष का आगमन हुआ। शहर के बड़े बिल्डर शिवप्रसाद जी के बेटे, विहान के साथ अवनि का रिश्ता तय हुआ था। विहान देखने में सुंदर था, ऊँचे कद का और महँगे कपड़ों में उसकी शख्सियत प्रभावशाली लग रही थी। दोनों को सामने रखे हुए सुसज्जित मंच पर बिठाया गया। रस्मों की शुरुआत होने ही वाली थी कि वातावरण में कुछ बदलने लगा।
जैसे ही विहान मंच पर बैठा, उसके पास खड़े लोगों ने एक अजीब सी बेचैनी महसूस की। विहान के हाव-भाव सामान्य नहीं थे। वह बार-बार अपनी घड़ी देख रहा था और उसके पैर कांप रहे थे। अचानक उसके कोट की जेब से कुछ गोलियाँ नीचे गिरीं और वह उन्हें उठाने के लिए नीचे झुका तो लड़खड़ा गया। अवनि, जो पास ही बैठी थी, ने देखा कि विहान की आँखें लाल थीं और उसके बात करने का लहजा बेहद असंगत था। विहान ने पास खड़े वेटर को डांटते हुए जिस अभद्र भाषा का प्रयोग किया, उसने पूरी सभा को स्तब्ध कर दिया। वह नशे में नहीं था, बल्कि किसी प्रतिबंधित नशीली दवा (ड्रग्स) के प्रभाव में था।
अवनि ने गौर किया कि विहान के हाथ लगातार कांप रहे थे और वह अपनी सुध-बुध खो चुका था। अवनि अपनी जगह से खड़ी हो गई। उसने शांति से विहान की ओर देखा और फिर अपने दादाजी की ओर मुड़ी। "दादाजी, मैं यह सगाई अभी और इसी वक्त रद्द करना चाहती हूँ," अवनि की आवाज़ पूरे हॉल में गूँज उठी। सन्नाटा छा गया। सुमित्रा जी दौड़कर अवनि के पास आईं, "अवनि! यह क्या कह रही हो? सब लोग देख रहे हैं, पागलपन मत करो।"
दीनानाथ जी के छोटे भाई, जो पुराने ख्यालों के थे, चिल्लाए, "अवनि, होश में आओ! इतना बड़ा घर है, शहर के सबसे अमीर लोग हैं ये। ज़रा सी बात पर तमाशा मत बनाओ। समाज में हमारी नाक कट जाएगी।" विहान के पिता, शिवप्रसाद जी ने भी अपना रुतबा दिखाते हुए कहा, "बेटा, विहान थोड़ा थका हुआ है। वह अभी विदेश से लौटा है, इसलिए ऐसा लग रहा है। इतनी छोटी बात पर रिश्ता नहीं तोड़ा जाता।"
परंतु अवनि टस से मस नहीं हुई। उसने दृढ़ता से कहा, "यह थकान नहीं है। यह नशा है। जो व्यक्ति अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण दिन पर स्वयं को नियंत्रित नहीं रख सकता और नशे की गिरफ्त में है, वह किसी दूसरे के जीवन की जिम्मेदारी क्या उठाएगा? रही बात खानदान की इज्जत की, तो क्या इज्जत सिर्फ लड़कियों के कंधों पर होती है? क्या एक लड़के का आचरण कुल की प्रतिष्ठा खराब नहीं करता?"
माहौल गरमा गया था। पड़ोस की महिलाएं कानाफूसी करने लगीं कि लड़की का दिमाग सातवें आसमान पर है, इतनी पढ़ाई-लिखाई ने इसे बड़बोला बना दिया है। लेकिन अवनि के पिता, जो अब तक चुप थे, आगे आए। उन्होंने अपनी बेटी का हाथ थामा और बोले, "अवनि सही कह रही है। हम अपनी बेटी को एक सोने के पिंजरे में नहीं भेजना चाहते जहाँ उसे हर दिन एक नशेड़ी के साथ तिल-तिल कर मरना पड़े। हमें पैसे और रुतबे से ज़्यादा अपने बच्चे का मानसिक सुकून प्यारा है।"
विहान की माँ ने ऊँची आवाज़ में कहा, "अरे! ये तो उल्टा चोर कोतवाल को डांटे वाली बात हो गई। हमारे बेटे में कोई कमी नहीं है। तुम्हारे जैसी हज़ारों मिलेंगी इसे। तुम्हारा तो नसीब ही फूटा है जो इतने बड़े घर की बहू बनने का मौका गँवा रही हो। कल को तुमसे कोई शादी नहीं करेगा।"
अवनि ने मुस्कुराकर जवाब दिया, "आंटी जी, यदि शादी का अर्थ केवल समझौता और घुटन है, तो मुझे अकेले रहना स्वीकार है। मैं किसी की 'बहू' बनने से पहले खुद में एक 'इंसान' हूँ और मुझे अपना सम्मान सर्वोपरि है।" विहान के घरवाले गुस्से में पैर पटकते हुए वहां से चले गए। घर में उदासी छा गई, लेकिन अवनि के चेहरे पर एक अजीब सा सुकून था।
अगले कुछ हफ्ते कस्बे में अवनि की ही चर्चा रही। लोग उसे 'मुँहफट' और 'विद्रोही' कहते रहे। लेकिन अवनि ने इन बातों पर ध्यान देने के बजाय अपनी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी जारी रखी। उसने एक स्थानीय स्कूल में बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया ताकि वह आत्मनिर्भर बन सके। उसकी हिम्मत देखकर कस्बे की अन्य लड़कियाँ भी प्रेरित होने लगीं।
एक साल बीत गया। अवनि का चयन राज्य प्रशासनिक सेवा में हो गया। इसी दौरान, उनके घर एक साधारण परिवार से प्रस्ताव आया। लड़का, साकेत, एक कॉलेज में प्रोफेसर था। साकेत के पिता ने दीनानाथ जी से कहा, "हमने आपकी पोती के बारे में बहुत सुना है। जो हिम्मत उसने पिछले साल दिखाई, वह आज के समय में बहुत ज़रूरी है। हमें ऐसी ही निडर और सत्य का साथ देने वाली बहू चाहिए।"
साकेत और अवनि की मुलाकात हुई। अवनि ने साकेत को साफ तौर पर अपनी पुरानी सगाई और उसके टूटने के कारणों के बारे में बताया। साकेत ने हँसते हुए कहा, "अवनि, मुझे तुम्हारे अतीत से कोई शिकायत नहीं है, बल्कि मुझे गर्व है कि तुमने गलत के खिलाफ आवाज़ उठाई। मुझे एक ऐसी जीवनसंगिनी चाहिए थी जो सही और गलत के बीच फर्क करना जानती हो।"
दोनों की शादी सादगी के साथ हुई। विदा होते समय अवनि ने अपने दादाजी के पैर छुए। दीनानाथ जी ने कहा, "बेटा, उस दिन तुमने सिर्फ अपना जीवन नहीं बचाया था, बल्कि हमारे पूरे परिवार को एक बड़ी त्रासदी से बचा लिया था। तुमने साबित कर दिया कि संस्कार केवल चुप रहने में नहीं, बल्कि सच बोलने में भी होते हैं।"
अवनि की यह कहानी कस्बे के लिए एक मिसाल बन गई। उसने यह सिद्ध कर दिया कि स्त्री केवल घर की 'लाज' नहीं होती, बल्कि वह अपने भविष्य की निर्माता भी है। खानदान की इज्जत किसी की चुप रहने की विवशता में नहीं, बल्कि चरित्र की शुद्धि और स्वाभिमान की रक्षा में निहित है। अवनि ने अपनी नई दुनिया में कदम रखा, जहाँ उसे न केवल प्यार मिला, बल्कि वह सम्मान भी मिला जिसकी वह हकदार थी।
क्या आप चाहेंगे कि मैं इस कहानी का कोई विशिष्ट हिस्सा बदलूँ या किसी पात्र के दृष्टिकोण को और विस्तार दूँ?
मूल लेखिका
अर्चना खंडेलवाल
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