रविवार की दोपहर थी, लेकिन विकास के माथे पर तनाव की लकीरें साफ़ देखी जा सकती थीं। वह अपने पॉश अपार्टमेंट की बालकनी में बैठा लैपटॉप पर एक्सेल शीट खोले बैठा था। मुद्दा वही पुराना था—घर का बजट। उसकी मल्टीनेशनल कंपनी की नौकरी सुनने में तो बहुत भारी-भरकम लगती थी, 'सीनियर मैनेजर', लेकिन महीने की पच्चीस तारीख आते-आते बैंक अकाउंट में सन्नाटा पसर जाता था। होम लोन की ईएमआई, कार लोन, बच्चों की स्कूल फीस और क्रेडिट कार्ड के बिल—ये सब मिलकर उसकी सैलरी को दीमक की तरह चाट जाते थे।
तभी डोरबेल बजी। विकास ने झुंझलाते हुए लैपटॉप बंद किया और दरवाज़ा खोला। सामने एक साधारण से कपड़े पहने, कंधे पर एक पुराना सा बैग टांगे एक आदमी खड़ा था। यह 'कन्हैया' था, प्लंबर। बाथरूम का गीज़र पिछले दो दिनों से लीक कर रहा था और विकास ने सुबह ही उसे फोन किया था।
"आइए कन्हैया जी, वो मास्टर बेडरूम का गीज़र देखना है," विकास ने उसे अंदर बुलाते हुए कहा।
कन्हैया ने चप्पलें बाहर उतारीं और अंदर आया। वह करीब पचास साल का रहा होगा, चेहरे पर मेहनत की झुर्रियां और हाथों में वो खुरदरापन जो सालों तक रिंच और पाइप पकड़ने से आ जाता है। उसने बिना कोई वक्त बर्बाद किए अपना काम शुरू कर दिया।
विकास वहीं पास में खड़ा होकर उसे देखने लगा, ताकि यह सुनिश्चित कर सके कि काम ठीक से हो रहा है या नहीं। कन्हैया बड़ी कुशलता से काम कर रहा था। नट खोलना, वाशर बदलना, पाइप की जांच करना—उसके हाथ किसी सर्जन की तरह चल रहे थे।
"साहब, इसका एलिमेंट जल गया है और थर्मोस्टेट भी बदलना पड़ेगा," कन्हैया ने पंद्रह मिनट बाद पसीना पोंछते हुए कहा। "सामान मेरे पास है, अभी बदल दूँ?"
"हाँ-हाँ, बदल दो। बस ठीक चलना चाहिए," विकास ने कहा।
आधे घंटे में काम ख़त्म हो गया। कन्हैया ने गीज़र ऑन किया, लीकेज बंद थी और पानी गर्म होने लगा था। उसने अपने औज़ार समेटे और हाथ पोंछे।
"कितने हुए?" विकास ने बटुआ निकालते हुए पूछा।
"साहब, सामान का 1200 और मेरी मज़दूरी 800। कुल 2000 रुपये," कन्हैया ने बहुत ही सहज भाव से कहा।
विकास का हाथ बटुए पर ही रुक गया। "क्या? 800 रुपये मज़दूरी? भाई, तुमने किया ही क्या है? बस आधे घंटे का काम था। आधे घंटे के 800 रुपये? इतना तो मैं अपनी कंपनी में घण्टे का नहीं कमाता!" विकास का स्वर थोड़ा ऊँचा हो गया था। यह शहरी मध्यम वर्ग की वो कुंठा थी जो हर जगह भाव-तोल करने पर उतर आती है।
कन्हैया मुस्कुराया। उसकी मुस्कान में एक अजीब सा ठहराव था, न कोई गुस्सा, न कोई शर्मिंदगी।
"साहब, पैसे समय के नहीं, हुनर के हैं," कन्हैया ने नरमी से कहा। "और रही बात आधे घंटे की, तो इस आधे घंटे के लिए मैंने बीस साल धूप में बाल सफ़ेद किए हैं। अगर आप पेंच कसना जानते, तो आपको मुझे बुलाना ही नहीं पड़ता।"
विकास चुप हो गया। बात तो सही थी। उसने बेमन से दो हज़ार निकाला और कन्हैया को थमा दिया। कन्हैया ने नोट को माथे से लगाया और जेब में रख लिया।
विकास को अभी भी वो 800 रुपये चुभ रहे थे। उसने सोचा, थोड़ी बातचीत करके देखता हूँ कि ये दिन भर में कमाता कितना है।
"वैसे कन्हैया, काम-धाम कैसा चल रहा है? मंदी का असर है या नहीं?" विकास ने पूछा।
"भगवान की दया है साहब," कन्हैया ने बैग टांगते हुए कहा। "काम की कोई कमी नहीं है। अब देखिए न, आपके यहाँ से निकलकर अभी मुझे चार जगह और जाना है। आज रविवार है तो लोग घर पर ही मिलते हैं, इसलिए आज थोड़ा ज्यादा दौड़-भाग रहती है।"
विकास ने मन ही मन गणित लगाया। "चार जगह और? मतलब दिन भर में कितने घर कर लेते हो?"
"यही कोई 8-10 घर तो हो ही जाते हैं साहब। कभी-कभी किसी बड़ी बिल्डिंग का कॉन्ट्रैक्ट मिल जाता है तो पूरा दिन वहीं निकल जाता है," कन्हैया ने बताया।
विकास का दिमाग चकरा गया। अगर यह औसतन एक घर से 500 रुपये भी मज़दूरी लेता है (सामान का प्रॉफिट अलग), और दिन में 10 घर करता है, तो 5000 रुपये रोज़! यानी महीने का डेढ़ लाख रुपये! और इसमें कोई टैक्स नहीं, कोई टीडीएस नहीं। पूरा कैश!
विकास, जो अपनी 'सीटीसी' (Cost to Company) और 'इन-हैंड' सैलरी के बीच के अंतर को देख-देखकर रोज़ कुढ़ता था, उसे लगा जैसे किसी ने उसके गाल पर तमाचा मार दिया हो।
तभी कन्हैया का फोन बजा। एक महंगा आईफोन। विकास की नज़र उस पर टिक गई। कन्हैया ने फोन उठाया और स्पीकर पर बात करने लगा क्योंकि उसके हाथ गंदे थे।
"हाँ रमेश, बोल... अरे नहीं भाई, वो प्लॉट 60 लाख का है, मैंने बयाना दे दिया है... हाँ, रजिस्ट्री अगले हफ्ते करवा लेंगे... और सुन, वो जो मार्केट वाली दुकान का किराया आया है न, उसे बैंक में जमा मत करना, उससे नई वाली साइट पर सीमेंट और ईंट गिरवा देना... ठीक है, मैं शाम को मिलता हूँ।"
कन्हैया ने फोन काटा और विकास की तरफ देखा, जो अब बुत बना खड़ा था। विकास की आँखों में अब सवाल नहीं, बल्कि एक अविश्वास था।
"प्लॉट? 60 लाख?" विकास के मुंह से अनायास ही निकल गया। "कन्हैया भाई, तुम तो बड़े आदमी निकले!"
कन्हैया हंसा। "अरे नहीं साहब, हम कहाँ बड़े आदमी। हम तो मज़दूर हैं। बस यह है कि पाई-पाई जोड़ते हैं। मैंने जवानी में ही समझ लिया था कि हाथ के काम में ही बरकत है।"
विकास की जिज्ञासा अब चरम पर थी। उसने कन्हैया को रोकने का इशारा किया। "बैठो न दो मिनट। पानी पी लो।"
कन्हैया सोफे के किनारे पर संकोच से बैठ गया। विकास ने पूछा, "बुरा मत मानना भाई, पर तुम सिर्फ प्लंबर का काम करके इतना सब कैसे मैनेज करते हो? प्लॉट, दुकानें...?"
कन्हैया ने बताया, "साहब, शुरुआत मैंने अकेले की थी। साइकिल पर घूमता था। पर फिर मैंने देखा कि इस शहर में काम बहुत है और करने वाले कम। तो मैंने गाँव से चार-पाँच लड़कों को बुलाया। उन्हें काम सिखाया। अब मेरी एक छोटी सी टीम है। मैं कॉन्ट्रैक्टर हूँ। बड़े-बड़े बिल्डर मुझे काम देते हैं। नई बिल्डिंगों में पूरी प्लंबिंग का ठेका मैं लेता हूँ। यह जो घर-घर जाकर रिपेयर करता हूँ, यह तो बस पुराने ग्राहकों से रिश्ता बनाए रखने के लिए है। असली कमाई तो प्रोजेक्ट्स से आती है।"
"तो तुम्हारे बच्चे? वो क्या करते हैं?" विकास ने पूछा, यह सोचते हुए कि शायद वे भी इसी काम में होंगे।
"बड़ा बेटा कनाडा में है साहब, एमएस कर रहा है," कन्हैया की आँखों में चमक आ गई। "और बेटी पुणे से आर्किटेक्चर कर रही है। मैंने उनसे कहा कि जो पढ़ना है पढ़ो, पैसे की चिंता मत करना। बस एक शर्त रखी थी कि कभी अपनी जड़ों को मत भूलना।"
विकास सन्न रह गया। उसका खुद का सपना था कि उसका बेटा विदेश जाकर पढ़े, लेकिन अपनी सेविंग्स देखकर उसे डर लगता था। और यहाँ कन्हैया, जिसे वह 'अनपढ़ मज़दूर' समझ रहा था, अपने बेटे को कनाडा भेज चुका था।
"साहब, आप लोग पढ़े-लिखे हैं, एसी में बैठकर काम करते हैं, अच्छी बात है," कन्हैया ने अपनी बात जारी रखी। "पर मैंने देखा है कि आप लोगों की कमाई का एक बड़ा हिस्सा 'दिखावे' में चला जाता है। महंगी गाड़ी, महंगी घड़ी, ब्रांडेड कपड़े, वीकेंड पर पार्टी... हम लोग सादा खाते हैं, सादा पहनते हैं। हमारा पैसा 'दिखता' नहीं है, 'बढ़ता' है। मैंने जो पहला 5 लाख कमाया था, उससे गाँव में खेत लिया। फिर जो कमाया, उससे शहर के बाहरी इलाके में ज़मीन ली। तब वो ज़मीन कौड़ियों के भाव थी, आज वहाँ हाईवे निकल गया है तो कीमत आसमान छू रही है। आप लोग पैसे को बैंक में रखते हैं जहाँ वो सड़ता है, हम पैसे को काम पर लगाते हैं।"
कन्हैया उठा और अपना बैग कंधे पर टांगा। "अच्छा साहब, चलता हूँ। शर्मा जी के यहाँ नल बदलना है।"
वह चला गया। विकास दरवाज़े पर खड़ा उसे लिफ्ट में जाते हुए देखता रहा।
वापस आकर विकास सोफे पर धम्म से बैठ गया। उसकी नज़र फिर से अपने लैपटॉप की स्क्रीन पर गई जहाँ एक्सेल शीट खुली थी।
कॉलम ए: सैलरी (टीडीएस कटने के बाद)।
कॉलम बी: होम लोन, कार लोन, पर्सनल लोन।
बैलेंस: न के बराबर।
वह सोच रहा था कि समाज की नज़र में वह 'सफेदपोश' है, सफल है, एलीट क्लास है। उसके पास डिग्रियाँ हैं, पद है, टाइल वाला बाथरूम है। लेकिन आर्थिक आज़ादी? वो तो उस कन्हैया के पास थी जिसके कपड़ों पर ग्रीस और मिट्टी लगी थी।
विकास को एहसास हुआ कि वह एक ऐसे सुनहरे पिंजरे में कैद है जिसकी चाबी उसने खुद ही फेंक दी है। वह 'एसेट' (संपत्ति) बनाने के बजाय 'लायबिलिटी' (दायित्व) पाल रहा था। कन्हैया जीएसटी के दायरे से बाहर था, न कोई आईटी रिटर्न का झंझट, न दिखावे का बोझ। वह चुपचाप अपनी दौलत का साम्राज्य बना रहा था, जबकि विकास जैसे लोग सिर्फ़ टैक्स भरने और किश्तें चुकाने के लिए जी रहे थे।
उसने लैपटॉप बंद कर दिया। आज उसे एक्सेल शीट पर नहीं, अपनी ज़िंदगी की बैलेंस शीट पर काम करने की ज़रूरत थी। उसने बालकनी से नीचे झांका, कन्हैया अपनी पुरानी बाइक पर किक मार रहा था। बाइक पुरानी थी, पर उस पर बैठने वाला आदमी अपनी ज़िंदगी का असली राजा था।
विकास ने एक गहरी सांस ली और मन ही मन कहा, "असली साक्षरता डिग्रियों में नहीं, वित्तीय समझ में है। और आज एक प्लंबर मुझे एमबीए वाली क्लास दे गया।"
सन्नाटा था, लेकिन उस सन्नाटे में विकास के दिमाग में एक शोर गूंज रहा था—बदलाव का शोर।
लेखक : संदीप शर्मा
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