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अपशगुनी

 अभिषेक के जाते ही जैसे पूरे मोहल्ले की हवा बदल गई। जिन लोगों के चेहरे कल तक मुस्कान से भरे थे, आज वही चेहरे फुसफुसाहटों से सने थे। कोई कहता, “इसके कदम पड़ते ही घर का चिराग बुझ गया,” तो कोई ताना मारता, “जिसे लक्ष्मी समझते थे, वही अपशकुन निकली।”

और उन सब बातों के बीच, एक लड़की थी—अनामिका—जो चुपचाप अपने भीतर की दुनिया में टूटती जा रही थी। उसके हाथों की चूड़ियों की खनक कहीं गायब हो गई थी, पैरों की पायल का संगीत जैसे उसकी सिसकियों में दब गया था। जिस घर में वह बहू बनकर आई थी, वहीं अब वह अपने आप को अनचाही-सी महसूस करने लगी थी… मगर यह सब दूसरों के कारण नहीं, अपने भीतर उठती ग्लानि की परछाइयों के कारण।

अनामिका के सास-ससुर—सरला देवी और जगदीश प्रसाद—भी वह सब सुनते थे। मोहल्ले की कानाफूसी, रिश्तेदारों की छींटाकशी, दूर के तानों की गूंज—सब उनके कानों तक पहुँचती। सरला देवी विचलित हो जातीं, तो जगदीश प्रसाद उन्हें धीरे से कहते, “तुम्हें जो देखना है, उसकी आँखों में देखो। उसकी हालत देखो। लोग तो बस बात करेंगे।”

और फिर दोनों ने एक अनकहा संकल्प कर लिया—कि अनामिका को यह अहसास तक नहीं होने देंगे कि दुनिया उसे क्या कह रही है।

अभिषेक की मृत्यु के बाद अनामिका का जीवन जैसे ठहर गया था। सुबह होती तो उसे लगता, रात ने उसे नींद नहीं, बस खालीपन दिया है। वह उठती, कमरे की खिड़की खोलती, पर हवा भी उसे ठंडी नहीं लगती। घर में हर चीज वैसी ही थी—दीवार पर घड़ी वैसी ही टिक-टिक करती थी, रसोई में चूल्हा जलता था, आँगन में धूप उतरती थी—पर अनामिका के भीतर कुछ टूटकर बिखर गया था।

सरला देवी उसे पल भर अकेला नहीं छोड़तीं। कभी उसके बाल सहलातीं, कभी उसे अपने पास बिठाकर चुपचाप उसके हाथ पकड़ लेतीं। जगदीश प्रसाद बाहर से मजबूत दिखते, पर रात में पूजा घर के कोने में बैठकर वह अक्सर देर तक दीपक की तस्वीर के सामने आँखें पोंछते रहते।

इसी बीच एक दिन अनामिका के मायके से उसके माता-पिता आए। पिता—शिवनाथ जी—और माँ—मृदुला—बेटी को देखते ही रो पड़े। पर उनके रोने में दुख के साथ-साथ एक डर भी था। वे भी कानाफूसी सुन चुके थे, और उन्हें अंदेशा था कि अब बेटी को इस घर में कैसे रखा जाएगा।

जगदीश प्रसाद ने उन्हें आदर से बैठाया, पानी दिया, फिर बड़े ही शांत स्वर में बोले, “अनामिका आपकी बेटी है। आप जब चाहें, उसे ले जा सकते हैं। हमारा बेटा तो चला गया… अब इस घर में उजाला यही है। लेकिन यदि आप इसे अपने साथ ले जाना चाहें, हम रोकेंगे नहीं।”

शिवनाथ जी और मृदुला एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे। उनके मन में बेटी के भविष्य की चिंता थी, पर इस घर की सच्चाई देखकर उनकी आँखों में शर्म भी उतर आई। जिस बेटी को वे “बोझ” समझकर घर लाना चाहते थे, वही बेटी इस घर में “ज्योति” बनकर देखी जा रही थी।

वे खाली हाथ नहीं आए थे, पर खाली मन लेकर लौट गए। बेटी को साथ लिए बिना। जाते वक्त मृदुला ने बस अनामिका के माथे को चूमा और फुसफुसाई, “बेटा, हम फिर आएंगे।”

अनामिका कुछ नहीं बोली। उसके पास शब्द नहीं थे।

समय गुजरता रहा। कभी-कभी घर में रिश्तेदार आते और अजीब-सी बातें करते। कोई कहता, “अब तो लड़की को वापस भेज देना चाहिए,” कोई पूछता, “और कब तक इसकी जिम्मेदारी उठाओगे?” कोई और थपकी देता, “दूसरी शादी करा दो, घर फिर से बस जाएगा।”

सरला देवी उन सबके सामने संयम रखतीं, पर उनके चले जाने के बाद उनका चेहरा बुझ जाता। जगदीश प्रसाद तब कहते, “सरला, मत रो। हमारी बहू के सामने कमजोर मत पड़।”

एक शाम जगदीश प्रसाद अनामिका के पास बैठे। वह आँगन में तुलसी के पास बैठी थी, सूखी-सी। जगदीश प्रसाद ने उसके सिर पर हाथ रखा, जैसे कोई पिता बेटी के सिर पर रखता है।

“अनामिका,” उन्होंने धीरे से कहा, “तुम अपनी अधूरी पढ़ाई पूरी कर लो। व्यस्त रहोगी तो मन भी लगेगा। और… अभिषेक की भी यही इच्छा थी।”

अनामिका की आँखों में पहली बार एक हल्की-सी हलचल हुई। “पर बाबूजी… मैं… क्या मैं कर पाऊंगी?”

जगदीश प्रसाद ने उसके हाथों को अपने हाथों में लिया। “तुमने इस घर का दुख संभाला है, तो पढ़ाई क्या चीज़ है? तुम करोगी… और अच्छा करोगी।”

उस रात अनामिका पहली बार देर तक नहीं रोई। पहली बार उसने मन में यह सोचा कि शायद जीवन खत्म नहीं हुआ है।

कुछ दिनों बाद वह वापस कॉलेज जाने लगी। टेक्सटाइल इंजीनियरिंग का अंतिम वर्ष बचा था। पहले दिन जब वह कॉलेज पहुँची तो उसकी सहेलियाँ उसे देखकर चुप हो गईं। कुछ आँखों में सहानुभूति थी, कुछ में जिज्ञासा, और कुछ में वही समाज वाला डर—“अब इसकी जिंदगी कैसी होगी?”

अनामिका ने किसी को जवाब नहीं दिया। उसने बस किताबें खोलीं, नोट्स बनाए, और हर दिन खुद से लड़ती रही।

धीरे-धीरे उसके चेहरे पर फिर से हल्की मुस्कान लौटने लगी। वह अब भी दुखी थी, पर दुख उसके जीवन का मालिक नहीं रहा।

पढ़ाई पूरी हुई तो जगदीश प्रसाद ने उसे अपने पास बुलाया। “कल से तुम्हें फैक्ट्री जॉइन करनी है।”

अनामिका चौंक गई। “मैं? पर… फैक्ट्री?”

जगदीश प्रसाद बोले, “हमारी टेक्सटाइल इंडस्ट्री… अभिषेक संभालता था। अब मैं बूढ़ा हो गया हूँ। और मैं चाहता हूँ, यह जिम्मेदारी तुम संभालो। मैं तुम्हारे साथ रहूंगा। तुम्हें बस आगे बढ़ना है।”

अनामिका के हाथ काँपने लगे। उसे लगा जैसे यह जिम्मेदारी बहुत भारी है। पर सरला देवी ने उसकी पीठ थपथपाई। “बहू, तूने घर संभाला है, फैक्ट्री भी संभाल लेगी।”

फैक्ट्री का पहला दिन कठिन था। कर्मचारियों की नजरें, कुछ का संदेह, कुछ की दया, और कुछ का उपहास। पर अनामिका ने काम को पकड़ लिया। उसने पुराने रिकॉर्ड देखे, मशीनों की जानकारी ली, प्रोडक्शन शेड्यूल समझे, और धीरे-धीरे कर्मचारियों का भरोसा जीतने लगी।

उसने सबसे पहले फैक्ट्री में एक नई व्यवस्था शुरू की—महिला कर्मचारियों के लिए अलग विश्राम कक्ष और छोटी-सी क्रेच सुविधा। लोगों ने पूछा, “यह क्यों?”

अनामिका ने बस इतना कहा, “क्योंकि जो औरतें घर चलाती हैं, वही उद्योग भी चला सकती हैं। उन्हें थोड़ा सहारा चाहिए।”

फैक्ट्री में धीरे-धीरे उसकी इज्जत बनने लगी। अब लोग उसे “मालकिन” नहीं, “मैडम” नहीं, बल्कि “बहूजी” कहकर सम्मान देने लगे।

पर समाज का जहर इतनी आसानी से कम नहीं होता।

एक शाम अनामिका फैक्ट्री से लौटी तो घर में अजीब-सी तैयारी थी। सरला देवी ने नई साड़ी पहनी थी, जगदीश प्रसाद ने सफेद कुर्ता। अनामिका घबरा गई। “क्या बात है?”

जगदीश प्रसाद ने उसे पास बिठाया। उनके चेहरे पर गंभीरता थी। सरला देवी की आँखें नम।

जगदीश प्रसाद बोले, “अनामिका… अब तुम्हारी विदाई का वक्त आ गया है।”

अनामिका का चेहरा पीला पड़ गया। “विदाई? आप… आप मुझे…”

सरला देवी रो पड़ीं। “नहीं बहू… हम तुम्हें छोड़ना नहीं चाहते। पर…”

जगदीश प्रसाद ने बात आगे बढ़ाई। “हम तुम्हें बोझ समझकर नहीं, बेटी समझकर विदा करना चाहते हैं। हमारी फैक्ट्री संभल गई, हमारा घर संभल गया। अब तुम्हारी जिंदगी का अगला हिस्सा भी संभलना चाहिए।”

अनामिका ने काँपते स्वर में कहा, “पर मैं तो… यहीं…”

जगदीश प्रसाद ने उसकी आँखों में देखा। “तुम्हारी उम्र अभी बाकी है। तुमने अभिषेक का साथ निभाया, अब खुद का भी हक है तुम्हारे ऊपर। हम चाहते हैं कि तुम दोबारा अपना घर बसाओ। और यह बात हमने मजबूरी में नहीं, सोच-समझकर कही है।”

अनामिका की आँखों से आँसू बहने लगे। “लेकिन लोग क्या कहेंगे?”

जगदीश प्रसाद ने कठोरता से कहा, “लोग? लोग वही हैं जिन्होंने तुम्हें अपशकुन कहा। अब वही लोग तुम्हें क्या हक देंगे? तुम्हारी जिंदगी का फैसला तुम्हें करना है, समाज को नहीं।”

अनामिका चुप हो गई। उसके भीतर कई आवाजें थीं—एक कहती, “तुम कैसे किसी और की बनोगी?” दूसरी कहती, “तुम अकेले कब तक रहोगी?” और तीसरी… जो सबसे सच्ची थी… कहती, “तुम्हें जीना है।”

उसी रात जगदीश प्रसाद ने उसे एक लिफाफा दिया। “यह पढ़ लो।”

लिफाफे में एक पत्र था—अभिषेक का।

अनामिका का दिल धड़कने लगा। पत्र में लिखा था—
“अगर कभी मैं न रहूँ, तो अनामिका को मत बांधना। उसे मेरे नाम की बेड़ी मत बनाना। अगर वह आगे बढ़े, खुश रहे, फिर से हँसे—तो समझना मैं वहीं हूँ। माँ-बाबूजी, मेरी बहू को बेटी समझना… और उसे जीने देना।”

अनामिका की चीख निकलते-निकलते रह गई। वह पत्र सीने से लगाकर रो पड़ी।

अगले कुछ महीनों में कई बातें हुईं। एक रिश्ता आया—एक विधुर, जिसका छोटा बच्चा था, और जो अनामिका की तरह जीवन के दर्द से गुजर चुका था। अनामिका ने पहली बार किसी से बात की, बिना डर के। उस व्यक्ति ने उससे कहा, “मैं तुम्हें भूलने नहीं कहूँगा। मैं बस तुम्हारे साथ चलना चाहता हूँ।”

अनामिका ने लंबा समय लिया। सरला देवी ने कभी दबाव नहीं बनाया। जगदीश प्रसाद ने कभी जल्दबाज़ी नहीं की। वे बस इतना कहते, “जो भी फैसला हो, सम्मान के साथ हो।”

और आखिर एक दिन अनामिका ने खुद कहा, “बाबूजी… अगर आप सच में मुझे बेटी मानते हैं, तो मेरी विदाई ऐसे करना कि लोग समझें—यह लड़की अपशकुन नहीं, साहस है।”

जगदीश प्रसाद की आँखें भर आईं। “ऐसे ही करेंगे… हमारी बेटी।”

विदाई वाले दिन घर में दीप जलाए गए। वही आँगन, वही तुलसी, वही दीवारें—पर आज हवाओं में कानाफूसी नहीं थी। आज हवा में एक नया संदेश था—कि स्त्री को सिर्फ सहन करने के लिए नहीं, जीने के लिए भी बनाया गया है।

अनामिका ने जाते वक्त सरला देवी के पैर छुए। सरला देवी ने उसे सीने से लगा लिया। “बहू नहीं, बेटी… खुश रहना।”

जगदीश प्रसाद ने उसके सिर पर हाथ रखा। “हमारा घर हमेशा तुम्हारा रहेगा। तुमने इस घर को अंधेरे में भी रोशन रखा। अब अपने जीवन में भी उजाला करना।”

अनामिका कार में बैठी तो उसने पीछे मुड़कर देखा। उसके पायल की हल्की-सी छम-छम फिर से सुनाई दी। उसकी चूड़ियों की खन-खन वापस लौट आई थी।

और उसे लगा जैसे कहीं दूर अभिषेक मुस्कुरा रहा है—जैसे कह रहा हो, “अब जी लो… मेरे हिस्से की भी।”

लेखिका : मालती सिन्हा 


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