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अहंकार

 तीसरी बार... हाँ, पिछले छह महीनों में यह तीसरी बार था जब उनके घर का ऊपरी हिस्सा, जिसे वे 'बरसाती' कहते थे, खाली हो गया था। वहां रहने वाला पेइंग गेस्ट, २४ साल का लड़का—समीर, अपना सामान समेटकर जा चुका था। समीर के जाने के बाद घर की वही पुरानी, काट खाने वाली खामोशी फिर लौट आई थी।

कर्नल रघुनंदन और उनकी पत्नी, सुमति देवी, दोनों ही अब अपनी सत्तर की दहलीज़ लांघ चुके थे। दोनों के बच्चे विदेशों में सेटल थे। साल-दो साल में एक बार वीडियो कॉल पर रस्मी बातें हो जाती थीं, लेकिन घर की चारदीवारी में जो जीवन धड़कना चाहिए, वह नदारद था। इसीलिए, किसी की सलाह पर उन्होंने ऊपर का कमरा किराए पर देना शुरू किया था। पैसे की कोई कमी नहीं थी, कमी थी तो बस आवाज़ों की।

समीर जब आया था, तो कर्नल साहब को उसकी हर बात से चिढ़ थी। उसके जूतों की खट-खट, सीढ़ियों पर चढ़ते वक्त उसका तेज़ रफ़्तार में गुनगुनाना, और कभी-कभी देर रात तक फोन पर बात करते हुए जोर से हंसना। कर्नल साहब अनुशासन प्रिय थे, सेना की नौकरी ने उन्हें वक्त और नियम का पाबंद बना दिया था। समीर का बेपरवाह रवैया उन्हें अनुशासनहीनता लगता था।

लेकिन सुमति देवी के लिए समीर, हवा के एक ताज़े झोंके जैसा था।

"सुनती हो, फिर से उसने वो भयानक शोर शुरू कर दिया," कर्नल साहब अक्सर अपनी इजी-चेयर पर बैठकर, ऊपर से आती गिटार की आवाज़ पर नाक-भौं सिकोड़ते थे।

सुमति देवी मुस्कुरा देतीं, "अजी छोड़िये भी, जवान खून है। घर में थोड़ी रौनक तो रहती है। वरना हम दोनों तो बस खांसने और कराहने की आवाज़ें ही सुनते हैं।"

समीर के रहने से घर का माहौल बदल गया था। वह सिर्फ़ एक किराएदार नहीं था। आते-जाते वह सुमति देवी से रसोई में झांककर पूछ लेता, "आंटी, आज क्या खुशबू आ रही है? राजमा बने हैं क्या?" और सुमति देवी का चेहरा खिल उठता। वे जानबूझकर रोटियां थोड़ी ज्यादा बना लेतीं। कभी-कभी वह कर्नल साहब के पास बैठकर जबरदस्ती उनसे क्रिकेट पर बहस करने लगता। कर्नल साहब को गुस्सा आता कि यह लड़का बड़ों के सामने इतनी जुबान चलाता है, लेकिन अंदर ही अंदर उन्हें वह बहस अच्छी लगती। कम से कम कोई तो था जो उनकी बातों को सिर्फ़ 'जी पापा जी' कहकर टाल नहीं रहा था, बल्कि सुन रहा था, प्रतिक्रिया दे रहा था।

परसों जो हुआ, उसने सब बदल दिया।

बात बहुत छोटी थी। समीर रात को देर से आया था। गेट खोलने में कर्नल साहब को उठना पड़ा। उनकी नींद टूट गई थी और पुराने जोड़ों का दर्द जाग गया था। गुस्से में उन्होंने समीर को बहुत खरी-खोटी सुना दी।

"यह धर्मशाला नहीं है मिस्टर समीर! अगर आपको रात को आवारागर्दी करनी है, तो कोई और ठिकाना ढूंढ लीजिये। अनुशासन ही जीवन का आधार है, और आप जैसे लड़के इसे कभी नहीं समझेंगे," कर्नल साहब ने गुस्से में कांपते हुए कहा था।

समीर चुपचाप सुनता रहा। उसने कोई जवाब नहीं दिया, बस सिर झुकाकर अपने कमरे में चला गया। अगली सुबह, उसने माफ़ी नहीं मांगी, न ही कोई सफाई दी। उसने बस इतना कहा, "अंकल, मैं कमरा खाली कर रहा हूँ। मुझे नहीं पता था कि मेरी वजह से आपको इतनी तकलीफ़ हो रही है।"

कर्नल साहब का अहंकार उन्हें रोकने की इजाजत नहीं दे रहा था, और सुमति देवी की आँखों में तैरते आंसू समीर को रोक नहीं पाए। वह चला गया।

आज, उसके जाने के तीसरे दिन, शाम की चाय की मेज़ पर कर्नल साहब अखबार लिए बैठे थे, लेकिन उनकी नज़रें एक ही लाइन पर अटकी हुई थीं। सुमति देवी चाय की प्याली लेकर आईं। प्याली मेज़ पर रखने की हल्की सी खनक भी बम विस्फोट जैसी लगी।

"चाय," सुमति ने धीरे से कहा।

कर्नल साहब ने अखबार नीचे किया। सामने वाली कुर्सी खाली थी। अक्सर इस वक्त समीर कॉलेज से लौटता था और सीढ़ियां चढ़ते हुए जोर से चिल्लाता था, "आंटी, चाय मिलेगी क्या? आज सर दर्द से फटा जा रहा है!"

उस शोर में एक अपनापन था। आज वह शोर नहीं था, तो चाय का स्वाद भी फीका लग रहा था।

"वह लड़का... अपना चार्जर भूल गया है शायद," कर्नल साहब ने मेज़ के कोने पर पड़े एक काले तार को देखते हुए कहा। वह चार्जर नहीं था, कर्नल साहब का अपना चश्मे का कवर था, लेकिन सुमति देवी ने उन्हें टोका नहीं। वे जानती थीं कि कर्नल साहब बहाना ढूंढ रहे हैं—समीर का ज़िक्र छेड़ने का।

"हाँ," सुमति देवी ने भारी मन से कहा। "कल फोन किया था उसने। कह रहा था, सब ठीक है। नए घर में शिफ्ट हो गया है।"

"हूँ," कर्नल साहब ने झूठी बेरुखी दिखाई। "अच्छा ही हुआ चला गया। बहुत शोर मचाता था। अब कम से कम शांति से रह सकेंगे। मुझे तो वैसे भी शांति पसंद है।"

सुमति देवी से रहा नहीं गया। उनका सब्र का बांध टूट गया। "शांति? इसे आप शांति कहते हैं? यह मरघट जैसी चुप्पी शांति है? वह लड़का शोर नहीं मचाता था, वह ज़िंदा होने का एहसास दिलाता था। हम दोनों तो कब के... बस साँसें ले रहे हैं। वह आया था तो लगा था कि जीवन फिर से लौट आया है।"

कर्नल साहब चौंक गए। सुमति, जो हमेशा दबी आवाज़ में बात करती थीं, आज उनकी आवाज़ में एक अजीब सी तल्खी और दर्द था।

"तुम क्या कहना चाहती हो सुमति? मैंने उसे निकाला नहीं, वह खुद गया है," कर्नल साहब ने बचाव की मुद्रा अपनाई।

"वह खुद गया क्योंकि उसे लगा कि वह हमारे लिए बोझ है," सुमति देवी की आँखों से आंसू बह निकले। "उसने मुझसे कहा था जाते वक्त... 'आंटी, अंकल को मेरी वजह से परेशानी होती है। मैं नहीं चाहता कि इस उम्र में उनकी नींद ख़राब हो। वो सही कहते हैं, मैं अनुशासनहीन हूँ।'... वह हमारा खयाल रखकर गया है, और आप अपनी मूछों की ताव में अकड़े बैठे रहे।"

कर्नल साहब चुप हो गए। बाहर बारिश शुरू हो गई थी। बूंदों की आवाज़ टीन की छत पर पड़ रही थी, बिलकुल वैसे ही जैसे समीर के गिटार की तेज़ धुन बजती थी। वे अपनी कुर्सी से उठे और धीरे-धीरे सीढ़ियों की तरफ बढ़े।

बरसाती का दरवाज़ा खुला था। कमरा एकदम साफ़ था। समीर ने जाने से पहले सब कुछ सलीके से रख दिया था। बिस्तर करीने से लगा था, अलमारी खाली थी। कर्नल साहब अंदर गए। हवा में अभी भी उस सस्ते डिओडरेंट की महक बची थी जो समीर इस्तेमाल करता था।

दीवार पर एक जगह पेंट उखड़ा हुआ था, जहाँ समीर ने शायद कोई पोस्टर चिपकाया होगा। कर्नल साहब ने उस जगह को उंगली से छुआ। अचानक उनकी नज़र कोने में पड़ी एक पुरानी किताब पर गई। यह समीर की नहीं, कर्नल साहब की ही एक मिलिट्री हिस्ट्री की किताब थी, जो उन्होंने समीर को पढ़ने के लिए दी थी—या यूँ कहें कि जबरदस्ती थमा दी थी।

किताब के अंदर एक पन्ना मुड़ा हुआ था। कर्नल साहब ने उसे खोला। वहां एक छोटा सा नोट रखा था। कागज के एक फटे हुए टुकड़े पर घसीटती हुई लिखावट में लिखा था:

"सॉरी अंकल। मुझे पता है मैं बहुत शोर मचाता हूँ और लापरवाह हूँ। पर सच कहूँ तो, मुझे यहाँ अपने दादाजी की याद आती थी। वो भी आपकी तरह ही डांटते थे। मैं आपकी नींद खराब नहीं करना चाहता, इसलिए जा रहा हूँ। पर आपकी वो 'कारगिल वार' वाली कहानी अधूरी रह गई... कभी मिलने आऊंगा तो सुनूंगा। अपना खयाल रखिएगा। - आपका उपद्रवी, समीर।"

कर्नल साहब की आँखों के सामने धुंध छा गई। जिस 'अनुशासन' का वे जीवन भर दम भरते रहे, आज वही अनुशासन उन्हें काटने को दौड़ रहा था। उन्हें एहसास हुआ कि जिसे वे 'शोर' समझ रहे थे, दरअसल वह एक संवाद था। दो पीढ़ियों के बीच का संवाद, जिसे उनकी जिद ने तोड़ दिया था। वे भूल गए थे कि घर ईंट-पत्थर से नहीं, बल्कि रिश्तों की गर्माहट और थोड़ी-बहुत नोक-झोंक से बनता है। समीर का वह 'शोर' दरअसल इस बात का सबूत था कि घर में कोई और भी है, कि वे दुनिया में अकेले नहीं हैं।

वे नीचे उतरे। सुमति देवी अभी भी खिड़की के पास खड़ी बाहर बारिश को देख रही थीं।

कर्नल साहब ने अपना गला साफ़ किया। "सुमति..."

सुमति ने पलटकर देखा। कर्नल साहब के हाथ में वह नोट था।

"उस लड़के का नंबर है तुम्हारे पास?" कर्नल साहब ने पूछा।

"हाँ, क्यों?"

"मिलाओ उसे। कहो कि अपना चार्जर ले जाए... और... और यह भी कह देना कि अगर उसे वो कारगिल वाली कहानी पूरी सुननी है, तो संडे को आ जाए। मैं राजमा-चावल के बिना कहानी नहीं सुनाता।"

सुमति देवी के चेहरे पर अविश्वास और फिर एक भीगी हुई मुस्कान फैल गई। उन्होंने कांपते हाथों से मोबाइल उठाया।

घंटी बजी। दूसरी तरफ से आवाज़ आई, "हेलो, आंटी?"

कर्नल साहब ने सुमति के हाथ से फोन ले लिया। एक पल की खामोशी रही। फिर कर्नल साहब ने अपनी भारी लेकिन थोड़ी लरजती आवाज़ में कहा, "मिस्टर समीर, यह कर्नल रघुनंदन बोल रहा हूँ। एक आदेश है। अपना सामान वापस ले आओ। यह घर बहुत बड़ा है और हम दो बूढ़े लोगों के लिए यहाँ की शांति अब बर्दाश्त नहीं हो रही। हमें थोड़ा शोर चाहिए... थोड़ा अनुशासनहीन शोर।"

उधर से समीर की हंसी सुनाई दी—वही बेपरवाह, खिलखिलाती हुई हंसी, जिसने एक पल में ही 'शांति-कुंज' के सन्नाटे को फिर से तोड़ दिया।

कर्नल साहब ने फोन सुमति को वापस किया और वापस अपनी इजी-चेयर पर जा बैठे। बाहर बारिश अब भी हो रही थी, लेकिन अब वह उन्हें शोर नहीं लग रही थी। उन्हें लग रहा था कि प्रकृति भी संगीत सुना रही है।

उस शाम, घर में फिर से पुराने गानों का एक कैसेट बजाया गया। आवाज़ थोड़ी ऊँची थी, इतनी कि पड़ोसी भी सुन सकें। कर्नल रघुनंदन और सुमति देवी ने समझ लिया था कि जीवन का असली संगीत सन्नाटे में नहीं, बल्कि अपनों के कोलाहल में है। वे 'असहाय' तब हुए थे जब समीर चला गया था, लेकिन अब, उसकी वापसी की उम्मीद ने उन्हें फिर से 'सशक्त' कर दिया था। नौकर या किराएदार घर का काम करते हैं, लेकिन कुछ लोग अनजाने में घर की रूह बन जाते हैं। और रूह के बिना, शरीर सिर्फ़ एक खाली मकान होता है।

अब उन्हें इंतज़ार था उस खट-खट का, उस बेसुरी सीटी का, और उस 'हंगामा' का जो उन्हें यह एहसास दिलाता रहे कि वे अभी भी ज़िंदा हैं।

मूल लेखिका 

विभा गुप्ता


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