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प्रेम... तो आत्मा की तरह शाश्वत है

 सुबह की पहली किरण खिड़की के कांच से छनकर कमरे में बिखर गई थी, लेकिन कर्नल दिग्विजय सिंह की आँखों में नींद का नामो-निशान नहीं था। साठ साल की उम्र में यह पहली बार था जब उन्हें अपने ही घर का सन्नाटा शोर जैसा लग रहा था। उन्होंने करवट बदली और आदत के मुताबिक दाईं ओर देखा, जहाँ टीकवुड की छोटी मेज पर हमेशा पानी का जग रखा होता था। जग वहीं था, लेकिन उसके नीचे वह छोटा सा कागज का टुकड़ा नहीं था जिस पर रोज़ एक नया 'सुविचार' लिखा होता था।

"पापा, उठिए! सात बज गए हैं, सूर्य नमस्कार का समय निकल जाएगा!"

दिग्विजय जी के कानों में एक चहकती हुई आवाज़ गूंजी। वह हड़बड़ा कर उठ बैठे। उनकी नज़रें कमरे के दरवाजे की ओर गईं। वहां कोई नहीं था। सिर्फ़ हवा से हिलता हुआ परदा था। उन्होंने एक गहरी सांस ली और खुद को याद दिलाया—माही अब इस घर में नहीं है। कल विदाई के वक़्त जिस तरह वह उनके गले लगकर रोई थी, उस आंसुओं की नमी अभी भी उनके कुर्ते के कंधे पर महसूस हो रही थी।

दिग्विजय जी ने रजाई हटाई और बिस्तर से नीचे पैर रखे। फ़र्श ठंडा था, बिल्कुल उनके मन की तरह।

"अरे कर्नल साहब, आज कॉफी नहीं मिलेगी क्या?"

उन्हें फिर से वही भ्रम हुआ। यह उनका रोज़ का खेल था। माही सुबह उठते ही सबसे पहले किचन में खटपट शुरू करती थी और फिर दो बड़े मग कॉफी लेकर आती। एक उसके लिए, जिसमें चीनी ज्यादा होती थी, और एक कर्नल साहब के लिए—ब्लैक और कड़क।

दिग्विजय जी धीरे-धीरे चलते हुए रसोई की ओर बढ़े। रसोई एकदम साफ-सुथरी थी, उतनी साफ जितनी माही के रहते कभी नहीं होती थी। वह खाना बनाते वक़्त आधा सामान स्लैब पर ही फैला देती थी। आज सब कुछ अपनी जगह पर था, और यही तरतीब उन्हें काट रही थी। उन्होंने केतली में पानी चढ़ाया।

"पापा, आप गैस क्यों जला रहे हैं?"

दिग्विजय जी के मन में चल रहे संवाद ने फिर जोर पकड़ा। उन्होंने कल्पना में देखा कि माही दरवाजे पर खड़ी कमर पर हाथ रखे उन्हें देख रही है।

"क्योंकि अब मुझे अपनी कॉफी खुद बनानी होगी, माही," उन्होंने बुदबुदाते हुए जवाब दिया।

"लेकिन आपको तो किचन के काम से नफरत थी न? आप कहते थे कि फ़ौज में जवानों से काम करवाने की आदत है, खुद करने की नहीं," माही की कल्पित आवाज़ ने उन्हें छेड़ा।

"हाँ, नफरत थी," दिग्विजय जी ने कप में कॉफी पाउडर डालते हुए सोचा। "लेकिन वो नफरत तब तक थी जब तक तुम थी। तुम्हारे हाथ की वो बेस्वाद कॉफी, जिसे तुम दुनिया की बेस्ट कॉफी कहती थी, उसे पीने के लिए मैं किचन की अव्यवस्था भी बर्दाश्त कर लेता था। अब कॉफी तो शायद बेहतर बनेगी, पर उसमें वो मिठास नहीं होगी जो तुम्हारी बातों से आती थी।"

कॉफी का मग लेकर वह बरामदे में आ गए। उनकी इज़ी-चेयर (आराम कुर्सी) वहीं रखी थी। बागीचे में गेंदे के फूल खिले थे।

"अरे पापा, न्यूज़पेपर कहाँ है?"

दिग्विजय जी की नज़र मुख्य द्वार पर पड़ी। अखबार वाला अखबार फेंक कर जा चुका था। वह वहीं पडा था।

"आज मैंने अखबार उठाया ही नहीं," दिग्विजय जी ने मन ही मन अपनी बेटी से कहा।

"क्यों? उसके लिए तो आप मुझसे रोज़ लड़ते थे। 'माही, पन्ना मत मोड़ो', 'माही, खेल का पृष्ठ बाद में पढ़ना'," माही की हंसी उनके कानों में गूंजी।

"लड़ता था क्योंकि मुझे तुम्हें चिढ़ाने में मज़ा आता था। अखबार पढ़ने से ज्यादा मज़ा, तुम्हें उस पर अपनी राय देते हुए सुनने में आता था। तुम राजनीति पर जो बेतुकी टिप्पणियां करती थी, वो अब कौन करेगा? अब यह अखबार सिर्फ़ खबरों का पुलिंदा है, और खबरें तो वैसे भी अच्छी नहीं होतीं।"

दिग्विजय जी ने कॉफी का एक घूंट भरा। कड़वी थी। उन्होंने प्याली मेज पर रख दी।

थोड़ी देर बाद वह उठकर माही के कमरे की तरफ बढ़े। कल की गहमागहमी के बाद यह कमरा अस्त-व्यस्त पड़ा था। बिस्तर पर साड़ियों के रैपर, कुछ हेयर-पिन्स और पैकिंग के गत्ते बिखरे थे।

"पापा, इसे रहने दीजिये, मैं आकर समेट लूँगी," माही की आवाज़ आई।

दिग्विजय जी रुके नहीं। वह झुककर एक-एक रैपर उठाने लगे। उन्होंने चादर को खींचकर ठीक किया, तकियों को झाड़ा और मेज पर बिखरे उसके सौंदर्य प्रसाधनों को एक डिब्बे में रखने लगे।

"आप यह क्या कर रहे हैं पापा? आपने तो कभी अपना बिस्तर भी ठीक नहीं किया। माँ के जाने के बाद यह सब तो मैं ही करती थी," माही का स्वर हैरान था।

"हाँ बेटा," दिग्विजय जी की आँखें भर आईं। "तब मुझे लगता था कि यह 'औरतों वाले काम' हैं। या शायद मुझे आदत पड़ गई थी कि मेरी बेटी मेरा ख्याल रखेगी। मैं एक पिता होने का रौब झाड़ता रहा और तुम एक माँ की तरह मुझे पालती रही। आज जब मैं यह चादर ठीक कर रहा हूँ, तो मुझे महसूस हो रहा है कि यह सिर्फ़ एक काम नहीं था, यह तुम्हारा प्रेम था जिसे मैं अधिकार समझता रहा। अब जब तुम नहीं हो, तो मुझे अपनी आत्मनिर्भरता किसी सज़ा जैसी लग रही है।"

कमरा साफ करने के बाद वह अलमारी के पास गए। वहां माही का एक पुराना टेडी-बियर रखा था। उन्होंने उसे उठाया और सीने से लगा लिया।

"सुधर गए हैं आप कर्नल साहब," माही की शरारती आवाज़ गूंजी। "अब क्या करेंगे?"

"अब मैं टहलने जाऊंगा," दिग्विजय जी ने सोचा।

"अकेले? आप तो कहते थे कि बिना मेरे, आपकी वॉक बोरिंग होती है। मैं बहुत बकबक करती हूँ न?"

"हाँ, तुम बहुत बोलती थी। इतना कि कभी-कभी मैं कहता था—'माही, चुप रहो, चिड़ियों की आवाज़ सुनने दो'। लेकिन आज... आज मैं उसी बकबक को सुनने के लिए तरस रहा हूँ। मैं पार्क जाऊंगा, उसी बेंच पर बैठूंगा जहाँ हम बैठते थे। लेकिन जानता हूँ, वहां तुम नहीं मिलोगी। शायद निराश होकर लौट आऊंगा।"

दिग्विजय जी ने अपने ट्रैक सूट के जूते पहने। फीते बांधते वक़्त उनकी कमर में हल्की टीस उठी, लेकिन शिकायत करने के लिए कोई नहीं था।

"लौटकर क्या करेंगे?"

"नहाने जाऊंगा।"

"इतनी जल्दी? आप तो रिटायरमेंट के बाद ग्यारह बजे से पहले बाथरूम का रुख भी नहीं करते थे। कहते थे, अब किस बात की जल्दी है?"

"हाँ, तब कोई जल्दी नहीं थी," दिग्विजय जी ने जूते का फीता कसते हुए कहा। "क्योंकि तब मुझे पता था कि तुम घर पर हो। मैं जानबूझकर देर करता था ताकि जब मैं नहाकर निकलूं, तो गरमा-गरम नाश्ता मेज पर लगा मिले। मुझे तुम्हारे इंतज़ार करवाने की आदत थी। मैं सोचता था कि मेरा आराम सबसे ज़रूरी है। लेकिन अब... अब सुबह ही नहा लूँगा।"

"क्यों पापा? अब ज़िन्दगी के मायने बदल गए क्या?"

दिग्विजय जी एक पल के लिए ठिठक गए। उनकी नज़र दीवार पर लगी उस घड़ी पर गई जो अब भी टिक-टिक कर रही थी।

"हाँ माही, मायने बदल गए हैं। पहले मैं जीता था क्योंकि घर में रौनक थी। अब मैं जीऊंगा ताकि उस रौनक की यादों को संजो सकूं। देर तक सोने का मतलब है देर तक उन सपनों में रहना जहाँ तुम अभी भी छोटी बच्ची हो। जागना हकीकत है। और हकीकत यह है कि तुम पराई हो गई हो। इसलिए जल्दी नहाकर मैं उस दिन की शुरुआत करना चाहता हूँ जहाँ मुझे अपनी तन्हाई से दोस्ती करनी है।"

"नहाने के बाद क्या करेंगे? टीवी देखेंगे?"

"नहीं," दिग्विजय जी ने सिर हिलाया। "पूजा करूँगा।"

"पूजा? आप? आप तो नास्तिक थे पापा। माँ हमेशा कहती थीं कि आप पत्थर दिल फौजी हैं, भगवान में नहीं मानते। आप तो आरती के समय भी बाहर लॉन में टहलते रहते थे।"

"हाँ, मैं नहीं मानता था," दिग्विजय जी का गला रुंध गया। "मुझे लगता था कि मेरी ताकत, मेरी बंदूक, मेरा अनुशासन ही मेरा भगवान है। मुझे किसी के आगे झुकने की ज़रूरत नहीं। लेकिन कल... कल जब मैंने तुम्हारा हाथ उस लड़के, मयंक, के हाथ में दिया, तो मुझे महसूस हुआ कि एक पिता की ताकत कितनी सीमित होती है। मैं तुम्हारी सुरक्षा सीमा पर तो कर सकता हूँ, लेकिन तुम्हारी किस्मत की सुरक्षा मेरे हाथ में नहीं है।"

वह उठ खड़े हुए और घर के छोटे से मंदिर की ओर चले, जिसे उनकी पत्नी ने बनाया था और जिसे बाद में माही ने संभाला था। वहां राधा-कृष्ण की मूर्ति रखी थी।

"तो अब आप क्या मांगेंगे भगवान से? अपनी पुरानी घुटने के दर्द से राहत?" माही ने पूछा।

"नहीं," दिग्विजय जी ने अगरबत्ती जलाई। धुआं एक सीधी लकीर में ऊपर उठा। "मैं अपने लिए कुछ नहीं मांगूंगा। मैं तुम्हारे लिए मांगूंगा। मैं उस अदृश्य शक्ति के सामने झुकूंगा जिसे तुम्हारी माँ मानती थी, ताकि जहाँ मैं नहीं हूँ, वहां वह शक्ति तुम्हारे साथ रहे। यह अगरबत्ती मैं भगवान के लिए नहीं, बल्कि तुम्हारे नए घर की खुशहाली के लिए जला रहा हूँ।"

दिग्विजय जी ने हाथ जोड़े और आँखें बंद कर लीं। बंद आँखों में उन्हें भगवान नहीं, बल्कि माही का वह चेहरा दिखाई दिया जब वह विदा हो रही थी—आंसुओं के बीच एक मुस्कान, जो कह रही थी, 'पापा, अपना ख्याल रखना।'

पूजा करने के बाद, वह ड्राइंग रूम में आए। फ़ोन बजा। उन्होंने देखा—स्क्रीन पर 'माही' फ्लैश हो रहा था।

उनका हाथ कांप गया। उन्होंने एक गहरी सांस ली, अपने चेहरे पर एक मज़बूत पिता का मुखौटा चढ़ाया और फ़ोन उठाया।

"हैलो, पापा! गुड मॉर्निंग!" उधर से वही चहकती हुई आवाज़ आई। "उठ गए आप? चाय पी ली?"

दिग्विजय जी मुस्कुराए। इस बार यह भ्रम नहीं था। यह हकीकत थी।

"हाँ बेटा, उठ गया," उन्होंने अपनी आवाज़ को सामान्य रखते हुए कहा। "कॉफी पी ली। और सुन, मैंने अपना बिस्तर भी ठीक कर लिया है।"

उधर से माही की हंसी सुनाई दी, "अरे वाह! कर्नल साहब तो आत्मनिर्भर हो गए। अच्छा पापा, आपने दवाई ली?"

"ले लूँगा। तुम कैसी हो? दामाद जी कैसे हैं?"

"हम अच्छे हैं पापा। बस आपकी याद आ रही थी। मुझे लगा आप अभी सो रहे होंगे।"

"नहीं बेटा," दिग्विजय जी ने खिड़की के बाहर उगते हुए सूरज को देखा। "सो नहीं रहा था। बस... अपनी नई ज़िंदगी की टाइम-टेबल सेट कर रहा था। तुम फ़िक्र मत करो, तुम्हारा यह फौजी पिता अब मोर्चे पर अकेला ज़रूर है, लेकिन हारा नहीं है।"

फ़ोन रखने के बाद, घर का सन्नाटा अब उन्हें काटने को नहीं दौड़ रहा था। उन्हें समझ आ गया था कि माही कहीं गई नहीं है, बस उसका पता बदल गया है। और जो प्रेम और आदतें वह यहाँ छोड़ गई है, वही अब दिग्विजय जी के जीने का सहारा बनेंगी।

उन्होंने मेज से अखबार उठाया। आज वे इसे पूरा पढ़ेंगे, और शायद शाम को जब माही का फ़ोन आएगा, तो उसे सुनाने के लिए दो-चार राजनीतिक टिप्पणियां भी तैयार रखेंगे। क्योंकि चाय छूट गई हो, आदतें बदल गई हों, पर रिश्ता और प्रेम... वह तो आत्मा की तरह शाश्वत है, जो कभी नहीं बदलता।

लेखिका :गीता त्रिपाठी


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