"मैं ही वो बदनसीब पिता हूँ, जिसने अपनी 'सावित्री' को खो दिया था," दीनानाथ जी रो पड़े। "मैं ही तुम्हारा नाना हूँ बेटा।"
वाणी के हाथ से तानपूरा छूटने ही वाला था कि शंभू काका ने संभाल लिया।
"नानाजी?" वाणी की आँखों में भी आंसू आ गए। "माँ... माँ हमेशा आपकी तस्वीर छिपाकर देखती थीं।"
दीनानाथ जी ने वाणी को गले लगा लिया। बरसों का जमा हुआ बर्फ का पहाड़ पिघल चुका था। उस खाली हवेली में आज फिर से रिश्तों की शहनाई गूंज उठी थी।
"मुझे माफ़ कर दो बेटा," दीनानाथ जी सिसक रहे थे। "मैं अपने अहंकार में अंधा हो गया था। मैंने अपनी बेटी को, अपनी विरासत को खुद से दूर कर दिया। बीस साल... बीस साल मैंने कैसे काटे हैं, मैं ही जानता हूँ।"
थोड़ी देर बाद, जब माहौल शांत हुआ, तो दीनानाथ जी ने अपने आंसू पोंछे।
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बनारस के पुराने मोहल्ले में स्थित 'संगीत साधना केंद्र' की इमारत आज भी अपनी पुरानी शानो-शौकत की गवाही दे रही थी। लेकिन पिछले कुछ सालों से इसकी दीवारों पर उदासी की सीलन चढ़ गई थी। पंडित दीनानाथ मिश्र, जो कभी शास्त्रीय संगीत की दुनिया में एक बड़ा नाम हुआ करते थे, आज अपनी ही खामोशी में कैद थे।
आज संगीत विद्यालय के लिए एक नए सहायक शिक्षक (Assitant Teacher) का चयन होना था। दीनानाथ जी की उम्र अब 70 के पार थी, और गले ने साथ देना कम कर दिया था, लेकिन कानों की परख अब भी वही थी—बाज़ जैसी तेज़। उन्हें एक ऐसा शिष्य चाहिए था जो न सिर्फ़ बच्चों को सिखा सके, बल्कि उनकी 'विरासत' को भी संभाल सके।
दीनानाथ जी अपने कक्ष में बैठे थे। सामने हारमोनियम रखा था, लेकिन उंगलियां उस पर नहीं चल रही थीं। उनके माथे पर पसीने की बूंदें थीं और चेहरे पर झुंझलाहट। बाहर हॉल में कई उम्मीदवार आए हुए थे।
उनके मैनेजर और पुराने दोस्त, शंभू काका, एक-एक करके लोगों को अंदर भेज रहे थे।
पहला उम्मीदवार आया। उसने 'राग यमन' छेड़ा। दो मिनट बाद ही दीनानाथ जी ने हाथ उठा दिया।
"सुर में ठहराव नहीं है। रियाज़ की कमी है। जाइये।"
दूसरा आया। उसने बंदिश तो सही गाई, लेकिन दीनानाथ जी को उसमें 'आत्मा' नज़र नहीं आई।
"संगीत गले से नहीं, नाभि से निकलता है बेटा। अभी तुम्हें बहुत सीखना बाकी है। अगला!"
दोपहर हो गई। करीब पंद्रह लोग आए और गए। किसी का सुर पक्का नहीं था, तो किसी का ताल कच्चा था। और सबसे बड़ी बात, दीनानाथ जी को किसी की आँखों में वो 'समर्पण' नहीं दिखा जिसकी उन्हें तलाश थी। वे थक चुके थे। यह थकान शारीरिक कम और मानसिक ज़्यादा थी। उन्हें लगने लगा था कि उनकी यह संगीत परंपरा उनके साथ ही ख़त्म हो जाएगी।
दीनानाथ जी ने अपनी छड़ी उठाई और शंभू काका से कहा, "रहने दो शंभू। आज का दिन ही ख़राब है। कलयुग आ गया है, अब संगीत साधना नहीं, सिर्फ़ 'प्रदर्शन' रह गया है। बंद करो यह सब, मैं घर जा रहा हूँ।"
शंभू काका ने पानी का गिलास बढ़ाते हुए कहा, "पंडित जी, बस थोड़ा धैर्य और रखिये। एक आखिरी लड़की बची है। सुबह से कोने में बैठी अपनी बारी का इंतज़ार कर रही है। इतनी दूर से आई है, कम से कम उसे सुन तो लीजिये।"
दीनानाथ जी ने गहरी सांस ली। "ठीक है, बुलाओ। इसे भी निपटा ही देते हैं। वैसे भी उम्मीद तो बची नहीं है।"
शंभू काका ने बाहर आवाज़ दी।
दरवाज़े पर एक हल्की सी दस्तक हुई और फिर एक युवती ने प्रवेश किया। उसने साधारण सा सूती कुर्ता पहना था, कंधे पर तानपूरा था और आँखों में एक अजीब सी चमक।
दीनानाथ जी अपनी फाइलों को समेट रहे थे, उन्होंने ऊपर नहीं देखा।
"बैठो। क्या सुनाओगी?" उन्होंने रूखेपन से पूछा।
लड़की ने तानपूरा मिलाया। कमरे में तानपूरे की गूंज फैल गई। उस गूंज में ही कुछ ऐसा था कि दीनानाथ जी का हाथ रुक गया। उन्होंने धीरे से सिर उठाया।
जैसे ही उनकी नज़र उस लड़की के चेहरे पर पड़ी, उनका दिल एक पल के लिए धड़कना भूल गया। वो बड़ी-बड़ी आँखें, वो तीखी नाक, और माथे पर वो छोटी सी बिंदी।
दीनानाथ जी के मुंह से अनायास ही एक नाम निकल गया, "सावित्री...!"
लड़की ने तानपूरे के तार को छेड़ते हुए हैरानी से उनकी ओर देखा। "जी नहीं पंडित जी, मेरा नाम 'वाणी' है।"
दीनानाथ जी हड़बड़ा गए। उन्होंने अपना चश्मा ठीक किया और खुद को संभाला। उनकी आँखों में नमी तैर गई थी।
"माफ़ करना बेटा... वो... तुम्हारी शक्ल-सूरत... मेरी एक बहुत पुरानी शिष्या से मिलती है। बिल्कुल वैसी ही आँखें। एक पल के लिए मुझे लगा कि वो लौट आई है। ख़ैर, छोड़ो। तुम क्या गाओगी?"
वाणी ने हल्का सा सिर झुकाया। उसे अजीब लगा, क्योंकि उसकी माँ का नाम 'सावित्री' ही था। और लोग अक्सर कहते थे कि वाणी अपनी माँ की परछाई है। उसे माँ ने बताया था कि उन्होंने बनारस घराने से तालीम ली थी, लेकिन अपने गुरु का नाम कभी नहीं बताया था। माँ हमेशा कहती थीं कि उनके गुरु उनसे बहुत नाराज़ हैं, इसलिए वाणी को कभी इस बारे में बात करने की इज़ाज़त नहीं थी। वाणी चुप रही। उसे नौकरी की सख़्त ज़रूरत थी, वह अपनी पहचान बताकर कोई रिस्क नहीं लेना चाहती थी।
"पंडित जी, मैं 'राग भैरवी' में एक ठुमरी पेश करना चाहती हूँ," वाणी ने विनम्रता से कहा।
दीनानाथ जी ने अनुमति दी।
वाणी ने आलाप लेना शुरू किया। जैसे ही उसकी आवाज़ कमरे में गूंजी, दीनानाथ जी की आँखें बंद हो गईं। यह आवाज़... यह सिर्फ़ सुर नहीं था। इसमें एक दर्द था, एक पुकार थी। वाणी जब गा रही थी, तो उसकी हरकतें, उसका हाथ घुमाने का तरीका, और ऊंचे सुरों पर जाने का अंदाज़... सब कुछ दीनानाथ जी को अतीत में खींच ले गया।
यह वही शैली थी जो बीस साल पहले उनकी बेटी सावित्री गाया करती थी।
सावित्री—दीनानाथ जी की इकलौती बेटी और सबसे होनहार शिष्या। बीस साल पहले, सावित्री ने एक साधारण स्कूल टीचर से प्रेम विवाह कर लिया था। दीनानाथ जी, जो अपनी परंपरा और कुल के अभिमान में थे, उन्होंने सावित्री के इस फैसले को स्वीकार नहीं किया था। उन्होंने उसे घर से निकाल दिया था और कसम खाई थी कि वे उसका चेहरा कभी नहीं देखेंगे। सावित्री रोते हुए गई थी और फिर कभी नहीं लौटी।
आज वाणी को गाते देख, दीनानाथ जी का वो कठोर अभिमान आंसुओं में पिघलने लगा। वाणी 'रस के भरे तोरे नैन' गा रही थी—वही ठुमरी जो सावित्री को सबसे ज़्यादा पसंद थी।
जैसे ही गाना ख़त्म हुआ, कमरे में सन्नाटा छा गया। शंभू काका भी कोने में खड़े अपनी आँखें पोंछ रहे थे।
दीनानाथ जी काफी देर तक चुप रहे। फिर उन्होंने भारी आवाज़ में पूछा, "बेटी, यह तालीम... यह गायकी... तुमने कहाँ से सीखी?"
वाणी थोड़ी सहम गई। उसे लगा शायद उसने कुछ ग़लत गा दिया है।
"वो... पंडित जी, मेरी माँ ही मेरी गुरु हैं। उन्होंने ही मुझे सब सिखाया है। बचपन से मैं उन्हीं का रियाज़ सुनती आ रही हूँ।"
"तुम्हारी माँ का नाम क्या है?" दीनानाथ जी का गला रुंध गया था।
वाणी ने एक पल सोचा। क्या सच बताना सही होगा? लेकिन झूठ बोलना कला का अपमान होगा।
"मेरी माँ का नाम सावित्री देवी है," वाणी ने धीरे से कहा।
दीनानाथ जी ने अपनी छड़ी छोड़ दी। उनके कांपते हाथ मेज़ पर टिक गए।
"और... और तुम्हारे पिता?"
"वो अब इस दुनिया में नहीं हैं। दो साल पहले उनका देहांत हो गया। उसके बाद से माँ बहुत बीमार रहती हैं। उन्होंने ही मुझे यहाँ भेजा है। उन्होंने कहा था कि अगर संगीत को उसकी असली गहराई में समझना है, तो बनारस में 'दीनानाथ जी' के पास जाओ, वो संगीत के ईश्वर हैं," वाणी ने बताया।
दीनानाथ जी की आँखों से आंसू बह निकले। उनकी बेटी, जिसे उन्होंने दुत्कार दिया था, उसने अपनी बेटी को नफ़रत नहीं, बल्कि अपने पिता के प्रति सम्मान सिखाया था?
"तुम्हारी माँ ने... कभी मेरे बारे में कुछ और बताया?" दीनानाथ जी ने पूछा।
"बस इतना कि उनके पिता बहुत उसूलों वाले थे। माँ कहती हैं कि मैंने अपने पिता का दिल दुखाया है, इसलिए शायद भगवान ने मुझे यह सज़ा दी है कि अब मैं गा नहीं सकती। माँ का गला खराब हो चुका है पंडित जी, वो अब बोल भी मुश्किल से पाती हैं," वाणी की आवाज़ भर्रा गई।
दीनानाथ जी अब अपनी कुर्सी पर बैठ नहीं सके। वे उठे और धीरे-धीरे वाणी के पास गए।
"मेरी बच्ची..." उन्होंने कांपते हाथों से वाणी के सिर पर हाथ रखा।
वाणी हैरान थी। "पंडित जी?"
"मैं ही वो बदनसीब पिता हूँ, जिसने अपनी 'सावित्री' को खो दिया था," दीनानाथ जी रो पड़े। "मैं ही तुम्हारा नाना हूँ बेटा।"
वाणी के हाथ से तानपूरा छूटने ही वाला था कि शंभू काका ने संभाल लिया।
"नानाजी?" वाणी की आँखों में भी आंसू आ गए। "माँ... माँ हमेशा आपकी तस्वीर छिपाकर देखती थीं।"
दीनानाथ जी ने वाणी को गले लगा लिया। बरसों का जमा हुआ बर्फ का पहाड़ पिघल चुका था। उस खाली हवेली में आज फिर से रिश्तों की शहनाई गूंज उठी थी।
"मुझे माफ़ कर दो बेटा," दीनानाथ जी सिसक रहे थे। "मैं अपने अहंकार में अंधा हो गया था। मैंने अपनी बेटी को, अपनी विरासत को खुद से दूर कर दिया। बीस साल... बीस साल मैंने कैसे काटे हैं, मैं ही जानता हूँ।"
थोड़ी देर बाद, जब माहौल शांत हुआ, तो दीनानाथ जी ने अपने आंसू पोंछे।
"चलो," उन्होंने शंभू काका से कहा। "गाड़ी निकालो।"
"कहाँ पंडित जी?" शंभू काका ने पूछा।
"मेरी बेटी के घर," दीनानाथ जी ने दृढ़ता से कहा। "बहुत देर कर दी मैंने। अब और एक पल नहीं गंवाना चाहता। मुझे अपनी सावित्री से माफ़ी मांगनी है। उसे वापस लाना है।"
फिर उन्होंने वाणी की ओर देखा, जिसकी आँखों में अब डर नहीं, बल्कि उम्मीद थी।
"और रही बात नौकरी की..." दीनानाथ जी मुस्कुराए, एक अरसे बाद उनके चेहरे पर ऐसी मुस्कान थी। "तो तुम्हें 'सहायक शिक्षक' की नौकरी नहीं मिलेगी।"
वाणी का चेहरा उतर गया।
"क्योंकि," दीनानाथ जी ने उसका हाथ थामकर कहा, "तुम अब इस विद्यालय की 'उत्तराधिकारी' हो। यह संगीत, यह हवेली, यह विरासत... सब तुम्हारी और तुम्हारी माँ की है। तुम सोमवार से नहीं, आज से ही, अभी से ही मेरी शिष्या भी हो और मेरी गुरु भी, जिसने मुझे मेरे पापों से मुक्ति दिलाई।"
वाणी ने झुककर नानाजी के पैर छुए। दीनानाथ जी ने उसे उठाया और कहा, "चलो, घर चलें। आज सच में अंत भला तो सब भला हुआ।"
जब वे हवेली से बाहर निकले, तो शाम का सूरज ढल रहा था, लेकिन दीनानाथ जी के जीवन में एक नया सवेरा हो रहा था। उन्हें न सिर्फ़ एक बेहतरीन गायिका मिली थी, बल्कि अपना खोया हुआ परिवार भी वापस मिल गया था। बनारस की गलियों में आज हवा का रुख बदला हुआ था, उसमें माफ़ी और मिलन की खुशबू थी।
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