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सोंच

 शाम की चाय की चुस्कियों के साथ कॉलोनी के पार्क की बेंच पर बैठना मनोरमा और कांता चाची का रोज़ का नियम था। मनोरमा, जो एक सरकारी स्कूल में प्रिंसिपल थी, रिटायरमेंट के करीब थी। वहीं कांता चाची, जो उम्र में उनसे दस साल बड़ी थीं, एक पारंपरिक और रसूखदार परिवार की गृहणी थीं। दोनों के बीच एक अजीब सा विरोधाभास था, फिर भी एक गहरी दोस्ती थी। मनोरमा की दुनिया किताबों और विचारों में सिमटी थी, जबकि कांता चाची की दुनिया उनके तीन हट्टे-कट्टे बेटों और उनके भविष्य की योजनाओं के इर्द-गिर्द घूमती थी।

कांता चाची अक्सर अपनी भारी-भरकम सोने की चूड़ियाँ खनकाते हुए कहतीं, "मनोरमा, तू बुरा मत मानना, पर मुझे तेरी चिंता होती है। तेरी दोनों बेटियां, रिया और जिया, परदेस चली जाएंगी। चिड़िया की तरह उड़ जाएंगी। फिर बुढ़ापे में तेरा और तेरे साहब का क्या होगा? देखो मेरे घर को, तीन बेटे हैं—रवि, कवि और अवि। मेरा घर तो हमेशा बहुओं और पोते-पोतियों से भरा रहेगा। मैं तो राज करूँगी राज! तू अभी से आदत डाल ले अपना पानी खुद भरने की, क्योंकि बेटियों के घर का तो पानी भी नहीं पीते।"

मनोरमा बस मुस्कुरा देती। वह जानती थी कि कांता चाची के शब्दों में कड़वाहट नहीं, बल्कि वह सदियों पुरानी सोच है जो मानती है कि बेटा 'पूंजी' है और बेटी 'पराया धन'। मनोरमा हमेशा कहती, "चाची, औलाद तो औलाद होती है। अगर जड़ें मज़बूत हों, तो पेड़ चाहे कहीं भी हो, उसकी छांव माँ-बाप तक पहुँच ही जाती है।"

समय का पहिया घूमा। पांच साल बीत गए।

मनोरमा रिटायर हो गई थीं। उनकी दोनों बेटियां अपनी-अपनी फील्ड में नाम कमा रही थीं। बड़ी बेटी रिया बैंगलोर में सॉफ्टवेयर इंजीनियर थी और छोटी जिया मुंबई में फैशन डिज़ाइनर। मनोरमा और उनके पति, रमेश जी, अपनी शांत ज़िंदगी जी रहे थे।

दूसरी तरफ, कांता चाची का घर वाकई भर गया था। तीनों बेटों की शादियां हो चुकी थीं। घर में तीन बहुएं आ गई थीं। ऊपर से देखने पर कांता चाची का घर किसी मेले जैसा लगता था। हर वक़्त गाड़ियां आती-जातीं, बच्चों का शोर, और रसोई में खटपट। लेकिन उस भरे-पूरे घर की दीवारों के पीछे की हकीकत कुछ और ही थी।

एक दोपहरी, जब सूरज सिर पर था, मनोरमा अपने बगीचे में पौधों को पानी दे रही थी। तभी उसने देखा कि कांता चाची धीरे-धीरे, लंगड़ाते हुए उनके गेट की तरफ आ रही हैं। उनके हाथ में एक टिफिन था। कांता चाची का चेहरा उतरा हुआ था, और वो पुरानी चमक, जो उनके तीन बेटों की माँ होने के गुरूर से आती थी, कहीं गायब थी।

मनोरमा ने दौड़कर गेट खोला। "अरे चाची! इतनी धूप में? और यह पैर में क्या हुआ?"

कांता चाची ने जबरदस्ती मुस्कुराने की कोशिश की, "कुछ नहीं बहू... वो बस बाथरूम में पैर फिसल गया था। मोच आ गई है। सोचा, तेरे लिए थोड़ी कढ़ी बनाई थी, तुझे पसंद है न, तो दे आऊं।"

मनोरमा ने उन्हें सहारा देकर सोफे पर बिठाया। "चाची, घर में तीन-तीन बहुएं हैं, बेटे हैं, आप क्यों कष्ट करती हैं? किसी के हाथ भिजवा देतीं।"

कांता चाची की आँखों में एक पल के लिए पानी तैरा, जिसे उन्होंने पल्लू से पोंछ लिया। "अरे, वो सब बिजी रहते हैं। बड़ी वाली ऑफिस जाती है, मंझली बच्चों में उलझी है, और छोटी... वो तो अपने कमरे से निकलती ही नहीं। मैंने सोचा, थोड़ा चल लूँगी तो पैर ठीक हो जाएगा।"

मनोरमा समझ गई कि बात कुछ और है। उसने चाची के लिए ठंडा पानी मंगाया। कांता चाची घर को निहारने लगीं। घर एकदम शांत और व्यवस्थित था। "बड़ा सुकून है तेरे घर में मनोरमा," उन्होंने एक गहरी सांस भरकर कहा।

"सुकून तो है चाची, पर कभी-कभी सन्नाटा भी लगता है," मनोरमा ने सच कहा।

तभी मनोरमा का फ़ोन बजा। वीडियो कॉल थी। स्क्रीन पर रिया और जिया दोनों थीं।

"माँ! हैप्पी एनिवर्सरी इन एडवांस!" दोनों एक साथ चिल्लाईं।

मनोरमा खिलखिला उठी। "बदमाशों, कल है सालगिरह।"

"पता है माँ," रिया बोली, "लेकिन आपका गिफ्ट आज शाम तक पहुँच जाएगा। और सुनिए, पापा की शुगर की दवाई खत्म हो रही थी, मैंने ऑनलाइन आर्डर कर दी है, एक घंटे में आ जाएगी। और माँ, वो जो आपकी वाशिंग मशीन खराब थी, मैकेनिक को बुक कर दिया है, वो 4 बजे आएगा। आप बस गेट खोल देना।"

कांता चाची यह सब देख और सुन रही थीं। बेटियां कोसों दूर बैठकर भी अपनी माँ की रसोई की एक-एक खबर रख रही थीं। कॉल कटने के बाद मनोरमा ने देखा कि कांता चाची की आँखों से आंसू बह रहे थे।

"क्या हुआ चाची?" मनोरमा ने घबराकर पूछा।

कांता चाची का बांध टूट गया। "मनोरमा, तू ठीक कहती थी। राज करने के सपने देखना आसान है, पर हकीकत बहुत कड़वी होती है। मेरा घर भरा हुआ है, पर मैं अकेली हूँ। मेरे तीन बेटे हैं, पर मुझे डॉक्टर के पास ले जाने के लिए किसी के पास वक्त नहीं है। सब कहते हैं—'माँ, आप तो ठीक हो, बस वहम है'। आज सुबह पैर मुड़ा, तो मंझली बहू बोली—'अम्माजी, देख कर चला करो, अब मैं आपकी मालिश करूँ या बच्चों का टिफिन बनाऊं?'"

कांता चाची सिसक रही थीं। "मुझे लगा था कि बेटे सेवा करेंगे। पर बेटे तो अपनी गृहस्थी की चक्की में ऐसे पिस गए हैं कि उन्हें माँ-बाप, फर्नीचर का पुराना टुकड़ा लगने लगे हैं। मैं भरी रसोई में अपने लिए रोटियां खुद सेंकती हूँ मनोरमा। वो कहते हैं—'माँ, हमने तो पिज़्ज़ा मंगाया है, आप खाओगी नहीं, तो अपने लिए खिचड़ी बना लो।' बुढ़ापे में रानियों जैसा जीवन तो दूर, मुझे तो अपनी इज़्ज़त बचानी भारी पड़ रही है।"

मनोरमा ने चाची का हाथ थाम लिया। वह उन्हें कोई ज्ञान नहीं देना चाहती थी, न ही 'मैंने तो कहा था' बोलकर उन्हें नीचा दिखाना चाहती थी।

कुछ दिन बाद, मनोरमा के पति रमेश जी को अचानक दिल का दौरा पड़ा। यह खबर कॉलोनी में आग की तरह फैल गई। कांता चाची घबरा गईं। उन्हें लगा, अब मनोरमा क्या करेगी? अकेली औरत, बेटियां दूर बैठी हैं, कैसे संभालेगी सब? कांता चाची लाठी टेकते हुए अस्पताल पहुँचीं, यह सोचकर कि मनोरमा अकेली बिलख रही होगी।

लेकिन जब वे अस्पताल के प्राइवेट वार्ड में पहुँचीं, तो नज़ारा देखकर दंग रह गईं।

रमेश जी बिस्तर पर थे, उनकी हालत स्थिर थी। रिया और जिया, दोनों वहाँ मौजूद थीं। रिया डॉक्टर से फाइलों पर चर्चा कर रही थी, और जिया अपने लैपटॉप पर शायद ऑफिस का काम भी निपटा रही थी और पिता के लिए जूस भी निकाल रही थी। कमरे में सब कुछ व्यवस्थित था। किसी के चेहरे पर लाचारी नहीं, बल्कि आत्मविश्वास था।

कांता चाची ने दबी आवाज़ में मनोरमा से पूछा, "ये दोनों इतनी जल्दी कैसे आ गईं?"

मनोरमा ने गर्व से बेटियों की ओर देखा। "चाची, जैसे ही खबर मिली, रिया ने बैंगलोर से और जिया ने मुंबई से पहली फ्लाइट पकड़ी। और आने से पहले ही इन्होंने यहाँ के बेस्ट कार्डियोलॉजिस्ट से बात कर ली थी। एम्बुलेंस भी इन्होंने ही भेजी थी। मुझे तो बस एम्बुलेंस में बैठना पड़ा। पैसों का इंतज़ाम, दवाईयां, यहाँ तक कि मेरे खाने-पीने का ख्याल... सब इन दोनों ने संभाल लिया।"

कांता चाची ने देखा कि रिया अपने पिता के सिर पर हाथ फेर रही थी और कह रही थी, "पापा, आप टेंशन मत लो, मैंने और जिया ने डिसाइड किया है कि हम रोटेशन में वर्क-फ्रॉम-होम करेंगे और अगले दो महीने आपके साथ ही रहेंगे।"

उस पल कांता चाची को अपनी वो बात याद आ गई—"तू खुद के लिए खाना बनाएगी, खटेगी।" आज अस्पताल में खड़े होकर उन्हें महसूस हुआ कि 'खट' तो वो रही हैं, अपने भरे-पूरे घर में। और मनोरमा? मनोरमा तो सच में रानी की तरह जी रही थी, क्योंकि उसकी बेटियों ने उसे कभी 'बोझ' महसूस ही नहीं होने दिया।

शाम को जब कांता चाची घर लौटीं, तो उनके घर में टीवी की तेज़ आवाज़ आ रही थी। ड्राइंग रूम में उनके बेटे और बहुएं हंसी-मजाक कर रहे थे। किसी ने यह भी नहीं पूछा कि "माँ, आप कहाँ गई थीं?" या "माँ, आपको भूख लगी है?"

कांता चाची चुपचाप अपने कमरे में गईं। अँधेरा पसरा हुआ था। उन्होंने पानी का जग उठाया, जो खाली था। उन्हें खुद उठकर पानी भरने जाना पड़ा। उस एक घूँट पानी ने उनके गले के साथ-साथ उनके सालों पुराने भ्रम को भी नीचे उतार दिया।

अगली सुबह, पार्क की बेंच पर मनोरमा अकेली बैठी थी। कांता चाची धीरे-धीरे आईं और उनके बगल में बैठ गईं। आज उनके चेहरे पर एक अजीब सी शांति थी।

"मनोरमा," कांता चाची ने धीमे स्वर में कहा।

"हाँ चाची?"

"मुझे माफ़ कर दे बहन। मैं अपनी अज्ञानता में तुझे ताने मारती रही। मुझे लगता था कि बुढ़ापे का सहारा 'लिंग' (जेंडर) तय करता है। पर कल समझ आया कि सहारा 'संस्कार' और 'प्रेम' तय करते हैं। तेरी बेटियां बेटा बनकर नहीं आईं, वो तो 'माँ' बनकर तेरी और तेरे पति की सेवा कर रही हैं। और मेरे बेटे... वो शायद मेरे होकर भी मेरे नहीं हैं।"

मनोरमा ने चाची के कंधे पर हाथ रखा। "चाची, गलती आपकी नहीं है। समाज ने हमें यही पट्टी पढ़ाई है कि बेटा कुल का दीपक है। पर हम भूल जाते हैं कि दीये की रोशनी इस बात पर निर्भर करती है कि उसमें तेल और बाती कैसी है, न कि दीया मिटटी का है या सोने का। आप दुखी मत होइए। आप जब चाहें, हमारे घर आ जाया कीजिये। रिया और जिया तो आपको अपनी बड़ी नानी मानती हैं।"

कांता चाची मुस्कुराईं, पर इस बार उनकी मुस्कान में दर्द नहीं, एक नई समझ थी। "जानती है मनोरमा, कल रात मैंने अपने बेटों से कह दिया।"

"क्या कह दिया?"

"मैंने कह दिया कि मैं अब रसोइ में खटकर नहीं खाऊंगी। मेरे पास मेरे पति की पेंशन है और मेरी जमापूंजी है। मैंने अपने लिए एक टिफिन सर्विस लगवा ली है और घर के काम के लिए एक सहायिका रख ली है। मैंने उनसे कह दिया कि—मुझे रानी बनने का शौक नहीं है, बस इज़्ज़त से जीने का हक़ है। अगर तुम सेवा नहीं कर सकते, तो मैं तुम पर बोझ भी नहीं बनूँगी।"

मनोरमा हैरान रह गई। "इतनी बड़ी हिम्मत?"

कांता चाची ने आकाश की ओर देखा। "हिम्मत तो तेरी बेटियों को देखकर आई। जब वो लड़कियां होकर अपने माँ-बाप के लिए दुनिया हिला सकती हैं, तो मैं अपने ही घर में, अपने ही बेटों के सामने, नौकरानी बनकर क्यों जीऊं? मैंने मान लिया कि मेरे कोई 'श्रवण कुमार' नहीं हैं, और इस सच को स्वीकारते ही मुझे आज़ादी महसूस हुई।"

हवा का एक झोंका आया और गुलमोहर के कुछ लाल फूल उन दोनों के ऊपर गिर गए।

कांता चाची ने हंसते हुए कहा, "देख, भगवान भी कह रहे हैं कि ज़िन्दगी अभी बाकी है।"

उस दिन के बाद से, कांता चाची ने अपनी खुशियां दूसरों से उम्मीद करने की बजाय, खुद में तलाशनी शुरू कर दीं। वे अब मनोरमा के साथ सत्संग जातीं, योगा करतीं और कभी-कभी अपनी बहुओं को भी खरी-खरी सुना देतीं। उन्हें समझ आ गया था कि बेटा या बेटी होना गारंटी कार्ड नहीं है; असली गारंटी तो वह आत्मनिर्भरता और स्वाभिमान है जो इंसान अपने भीतर ज़िंदा रखता है।

और रही बात "खुद के लिए खाना बनाने" की, तो अब अक्सर शाम को कांता चाची, मनोरमा के घर बैठी, रिया और जिया के भेजे हुए ऑनलाइन आर्डर वाले पिज़्ज़ा का आनंद लेती नज़र आती थीं, और कहती थीं—"बेटियां तो सच में परियां होती हैं, जो दूर रहकर भी पास होने का अहसास कराती हैं।"

इस कहानी ने उस पुरानी कहावत को बदल दिया था—जरूरी नहीं कि बुढ़ापे की लाठी बेटा ही हो, कभी-कभी बेटियों का हौसला वो उड़न खटोला बन जाता है, जिस पर बैठकर माँ-बाप इज़्ज़त की उड़ान भरते हैं।

लेखिका : रत्न गुप्ता


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