कॉन्फ्रेंस रूम में सन्नाटा पसरा हुआ था, बस प्रोजेक्टर की हल्कीन हमिंग साउंड सुनाई दे रही थी। राघव अपनी प्रेजेंटेशन के सबसे अहम हिस्से पर था, तभी उसकी जेब में रखे फोन ने वाइब्रेट करना शुरू कर दिया। उसने अनदेखा किया, लेकिन वाइब्रेशन रुकने का नाम नहीं ले रहा था। झुंझलाते हुए उसने फोन निकाला। स्क्रीन पर 'पापा' लिखा देख उसके माथे पर लकीरें उभर आईं। उसने कॉल काट दी और वापस स्क्रीन की ओर देखा।
दो मिनट भी नहीं बीते थे कि फोन फिर बज उठा। इस बार बॉस ने भी उसकी तरफ सवालिया नज़रों से देखा। "सॉरी सर, शायद कोई इमरजेंसी है," राघव ने बुदबुदाते हुए कहा और कमरे से बाहर निकल गया।
"हाँ पापा? क्या हुआ? मैं मीटिंग में हूँ," राघव ने फोन उठाते ही तेज़ आवाज़ में कहा।
उधर से एक खंखारने की आवाज़ आई, फिर एक झिझकती हुई आवाज़, "बेटा, वो... डिस्टर्ब किया क्या? वो दरअसल, घर की छत की मरम्मत करवानी थी। मॉनसून आने वाला है, पिछली बार भी पानी टपका था।"
राघव ने अपनी कलाई घड़ी देखी। "पापा, इसके लिए आपने मुझे दिन में दो बार फोन कर दिया? मैंने पिछले महीने ही तो पैसे भेजे थे। क्या हुआ उन पैसों का?"
"वो... वो पैसे तो तुम्हारी माँ की दवाइयों और बिजली के बिल में लग गए। महंगाई बहुत है बेटा," पिता की आवाज़ में एक अजीब सी लाचारी थी, जो राघव उस वक्त महसूस नहीं कर पाया।
"ठीक है, ठीक है। मैं शाम तक ट्रांसफर कर दूंगा। अभी फोन रखिए," राघव ने बिना जवाब का इंतज़ार किए फोन काट दिया। उसे गुस्सा आ रहा था। उसे लग रहा था कि रिटायरमेंट के बाद उसके पिता को शायद अंदाज़ा नहीं है कि पैसे कमाने के लिए कितनी मेहनत करनी पड़ती है। उसे कभी-कभी महसूस होता कि वह सिर्फ़ एक बैंक खाता बनकर रह गया है, जिसका पिन कोड उसके घर वालों के पास है।
शाम को जब वह घर पहुँचा, तो उसका मूड उखड़ा हुआ था। उसने अपना बैग सोफे पर फेंका और टाई ढीली करते हुए बैठ गया। उसकी पत्नी, सुमेधा, पानी का गिलास लेकर आई। राघव का चेहरा देखते ही वह समझ गई कि आज फिर वही बात हुई है।
"फिर से बाबूजी का फोन आया था?" सुमेधा ने नरमी से पूछा।
"और किसका होगा?" राघव ने पानी एक सांस में पीते हुए कहा। "सुमेधा, मुझे समझ नहीं आता। उनकी पेंशन आती है, मैं हर महीने ऊपर से पैसे भेजता हूँ, फिर भी हर दूसरे महीने कोई न कोई नया खर्चा सामने आ जाता है। कभी छत, कभी दीवार, कभी रिश्तेदार की शादी। मुझे लगता है उन्हें बस यह चेक करने की आदत हो गई है कि मेरा अकाउंट चालू है या नहीं।"
सुमेधा ने उसके पास बैठकर उसके कंधे पर हाथ रखा। "राघव, तुम गलत सोच रहे हो। वो घर पुराना है, और वो दोनों भी अब बूढ़े हो रहे हैं। ज़रूरतें बढ़ती हैं।"
"ज़रूरतें नहीं, उम्मीदें बढ़ रही हैं," राघव ने चिढ़कर कहा। "मैं यहाँ गधे की तरह खटता हूँ ताकि उन्हें कोई कमी न हो, लेकिन उधर से बस मांगों की लिस्ट आती है। कभी नहीं पूछते कि बेटा, तू कैसा है? तेरी नौकरी कैसी चल रही है? बस पैसा भेज दो।"
सुमेधा ने कुछ पल उसे देखा, फिर धीरे से बोली, "राघव, तुमने पिछली बार उनसे कब बात की थी? मतलब, बिना पैसों की बात किए? सिर्फ़ हाल-चाल पूछने के लिए?"
राघव चुप हो गया। उसे याद नहीं आ रहा था। पिछले छह महीनों में जब भी बात हुई, या तो उन्होंने पैसे मांगे थे या उसने ट्रांजेक्शन कन्फर्म करने के लिए फोन किया था।
"अगले हफ़्ते लॉन्ग वीकेंड है," सुमेधा ने सुझाव दिया। "चलो, घर चलते हैं। मिस्त्री को बुलाकर छत की मरम्मत तुम्हारे सामने करवा लेंगे। वैसे भी आरव अपने दादा-दादी को याद कर रहा था।"
राघव ने पहले मना करना चाहा, लेकिन फिर सोचा कि एक बार जाकर देख ही ले कि आखिर इतना पैसा लग कहाँ रहा है।
शुक्रवार की रात वे अपनी कार से कानपुर के लिए निकले। राघव पूरे रास्ते यही सोचता रहा कि वहाँ पहुँचकर वह पिता को समझाएगा कि थोड़ा हाथ खींचकर खर्च करें। वह कोई कुबेर का खजाना लेकर नहीं बैठा है।
शनिवार की दोपहर जब वे घर पहुँचे, तो मंज़र कुछ और ही था। घर का गेट जंग खा रहा था। बाहर का छोटा बगीचा, जिसे उसके पिता बड़े शौक से सजाते थे, अब सूखा और वीरान पड़ा था। राघव ने हॉर्न बजाया। उसके पिता, दीनानाथ जी, लपकते हुए बाहर आए। उनकी चाल में लड़खड़ाहट थी, और चश्मा एक तरफ से टेप से चिपका हुआ था।
"अरे! तुम लोग आने वाले थे बताया भी नहीं!" दीनानाथ जी की आँखों में चमक आ गई। उन्होंने आरव को गोद में उठाने की कोशिश की, लेकिन कमर के दर्द ने उन्हें रोक दिया। माँ, सावित्री देवी, भी पल्लू ठीक करती हुई बाहर आ गईं। उनके चेहरे पर झुर्रियां बढ़ गई थीं।
अंदर पहुँचकर राघव ने घर का जायज़ा लेना शुरू किया। दीवारों से सचमुच पपड़ी झड़ रही थी। जिस सोफे पर वह बैठा, उसका स्प्रिंग बाहर निकलकर चुभ रहा था। उसने पिता की ओर देखा। दीनानाथ जी अभी भी उसी पुराने कुर्ते में थे जो राघव ने तीन साल पहले दिवाली पर भेजा था।
"पानी लाती हूँ," सावित्री जी रसोई की ओर बढ़ीं।
"रहने दो माँ," राघव ने कहा। "आप बैठो।"
शाम को चाय के वक़्त राघव ने बात छेड़ी। "पापा, मैंने पिछले महीने जो पैसे भेजे थे, वो पंद्रह हज़ार रुपये... वो तो काफ़ी थे न घर के खर्च के लिए?"
दीनानाथ जी ने चाय की प्याली मेज पर रखी। उनकी नज़रों में एक अपराधी जैसा भाव था। "हाँ बेटा, काफ़ी थे। लेकिन वो... तुम्हारे चाचाजी के बेटे का एक्सीडेंट हो गया था। उनके पास इलाज के पैसे नहीं थे, तो मैंने पांच हज़ार उन्हें दे दिए। और फिर तुम्हारी माँ का बीपी बढ़ गया था, डॉक्टर ने कुछ टेस्ट लिखे थे..."
राघव को गुस्सा आया। "पापा, आप दूसरों की मदद करने में लगे हैं और यहाँ अपनी छत टपक रही है? चाचाजी का बेटा कमाता नहीं है क्या? आप कब तक समाज सेवा करते रहेंगे?"
दीनानाथ जी चुप रहे। सुमेधा ने बात संभालने की कोशिश की, "राघव, छोड़ो न ये बातें। हम आए हैं, सब ठीक कर देंगे।"
अगली सुबह, राघव एक स्थानीय ठेकेदार को बुलाने के लिए बाज़ार जाने लगा। दीनानाथ जी ने कहा, "मैं भी चलता हूँ। तुम्हें दुकानों का भाव नहीं पता, ठग लेंगे।"
बाज़ार में चलते हुए राघव ने महसूस किया कि उसके पिता के जूते घिस चुके थे। वे धीरे-धीरे चल रहे थे। राघव की तेज़ चाल के साथ कदम मिलाने के लिए उन्हें लगभग दौड़ना पड़ रहा था। एक दुकान पर रुककर दीनानाथ जी ने दुकानदार से कहा, "अरे रमेश, देखो मेरा बेटा आया है। बम्बई में बहुत बड़ा अफ़सर है।"
दुकानदार मुस्कुराया, "नमस्ते भइया। बाबूजी तो आपकी ही बातें करते रहते हैं। कहते हैं मेरा बेटा लाखों में खेलता है, राजा है राजा।"
राघव को शर्मिंदगी महसूस हुई। वह सोचने लगा कि पिता उसे 'राजा' बताते हैं, और वह उन्हें 'भिखारी' समझ रहा था।
घर लौटते समय, एक मेडिकल स्टोर के सामने दीनानाथ जी रुके। "बेटा, यहाँ से मेरी शुगर की गोलियां ले लो। दो दिन से ख़त्म हैं।"
राघव सन्न रह गया। "दो दिन से? आपने बताया क्यों नहीं? और पैसे तो मैंने भेजे नहीं थे अभी, तो आप दवाई कैसे लेते?"
"सोचा था जब तुम पैसे भेजोगे तब ले आऊंगा। उधार बहुत हो गया है शर्मा जी का, अब शर्म आती है मांगने में," दीनानाथ जी ने नज़रें झुका कर कहा।
राघव के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह जिसे 'जल्दी मचना' कह रहा था, वह दरअसल मजबूरी थी। उसने सोचा था कि पिता पैसे जमा कर रहे होंगे, लेकिन यहाँ तो वे बुनियादी ज़रूरतों के लिए भी तरस रहे थे, सिर्फ़ इसलिए ताकि बेटे को बार-बार फोन करके परेशान न करना पड़े। वे दो दिन से बिना दवाई के थे, लेकिन उन्होंने दोबारा फोन नहीं किया था क्योंकि राघव ने मीटिंग में डांट दिया था।
घर पहुँचकर राघव छत पर गया। वहां सुमेधा पहले से मौजूद थी। छत की हालत ख़राब थी। जगह-जगह दरारें थीं।
"देख रहे हो?" सुमेधा ने पूछा।
"हाँ, मरम्मत की सख़्त ज़रूरत है," राघव ने कहा।
"मैं छत की नहीं, उस रिश्ते की बात कर रही हूँ," सुमेधा ने दीनानाथ जी की ओर इशारा किया जो नीचे आंगन में आरव के साथ खेल रहे थे। "राघव, कल रात माँ जी बता रही थीं कि पापा ने अपना चश्मा तीन महीने पहले तोड़ा था। टेप लगाकर काम चला रहे हैं क्योंकि उन्हें लगा कि अगर तुमसे चश्मे के लिए पैसे मांगे, तो तुम सोचोगे कि बुड्ढा खर्चे बढ़ा रहा है।"
राघव की आँखों में नमी आ गई। उसे वह पल याद आया जब बचपन में उसने एक महंगा खिलौना मांगा था और पिता ने अपनी घड़ी बेचकर उसे दिलाया था। और आज? आज वह लाखों कमा रहा है, लेकिन उसका पिता टेप लगा चश्मा पहन रहा है और दो दिन तक दवाई के बिना रह रहा है, सिर्फ़ उसके 'गुस्से' के डर से।
उसने महसूस किया कि वह पैसे तो भेज रहा था, लेकिन 'अपनापन' भेजना भूल गया था। उसने अपने और माता-पिता के बीच एक दीवार खड़ी कर दी थी, जहाँ से सिर्फ़ नोटों के बंडल इधर से उधर फेंके जा रहे थे, लेकिन भावनाएं उस दीवार से टकराकर मर रही थीं। पिता को डर यह नहीं था कि पैसा आना बंद हो जाएगा; उन्हें डर यह था कि पैसा मांगते-मांगते कहीं बेटा ही उनसे दूर न हो जाए।
राघव तेज़ी से सीढ़ियां उतरकर नीचे आया। दीनानाथ जी आरव को एक पुरानी कहानी सुना रहे थे। राघव उनके पास जाकर घुटनों के बल बैठ गया।
"पापा," उसकी आवाज़ भर्राई हुई थी।
दीनानाथ जी ने चौंककर देखा। "क्या हुआ बेटा? ठेकेदार नहीं मिला?"
राघव ने पिता के दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए। वे हाथ खुरदरे और कांप रहे थे। "पापा, आपने दवाई क्यों नहीं ली? आप मुझे दस बार फोन क्यों नहीं करते? मुझे डांटते क्यों नहीं कि 'राघव पैसे भेज, दवाई लेनी है'?"
दीनानाथ जी की आँखों में पानी भर आया। उन्होंने एक फीकी मुस्कान के साथ कहा, "बेटा, तुम पर इतना काम का बोझ रहता है। शहर में खर्चे भी तो कितने हैं। हम तो जैसे-तैसे काट लेते हैं। बस डर लगता है कि कहीं तुम यह न सोचने लगो कि बुड्ढा-बुढ़िया बोझ बन गए हैं।"
यह सुनकर राघव का संयम टूट गया। उसने पिता को गले लगा लिया। वह एक बच्चे की तरह रोना चाहता था। "बोझ आप नहीं, मेरी यह सोच थी पापा। मुझे माफ़ कर दीजिये। मैं भूल गया था कि मैं आपका बेटा हूँ, आपने मुझे पाला है, और आज मैं ही आपसे हिसाब मांग रहा था।"
उस शाम घर का माहौल बदल गया। राघव ने सिर्फ़ छत ठीक करवाने के पैसे नहीं दिए, बल्कि पिता को जबरदस्ती बाज़ार ले जाकर नया चश्मा, नए कुर्ते और ढेर सारा राशन दिलवाया। लेकिन सबसे ज़रूरी चीज़ जो उसने दी, वह था उसका 'वक़्त'। उसने अपना फोन स्विच ऑफ कर दिया और घंटों बैठकर पिता से उनके ज़माने की बातें सुनता रहा।
रात को जब वे वापस मुंबई जाने के लिए गाड़ी में बैठ रहे थे, तो दीनानाथ जी ने राघव का हाथ पकड़ा। इस बार उनकी पकड़ में झिझक नहीं, अधिकार था।
"पहुँचकर फोन करना," उन्होंने कहा। "और पैसों की चिंता मत करना, जब होंगे भेज देना। बस... बीच-बीच में फोन करके यह बता दिया करना कि खाना खाया या नहीं।"
राघव मुस्कुराया। "हाँ पापा। और सुनिए, छत ठीक होने के बाद उसकी फोटो व्हाट्सएप ज़रूर कीजियेगा। और अपना ख्याल रखिएगा, वरना मैं फिर आ जाऊंगा डांटने।"
गाड़ी जब धूल उड़ाती हुई गांव की सड़क से शहर के हाईवे की ओर मुड़ी, तो राघव ने साइड मिरर में देखा। उसके माता-पिता तब तक हाथ हिला रहे थे जब तक गाड़ी ओझल नहीं हो गई।
सुमेधा ने राघव की तरफ देखा और मुस्कुराई, "क्या हुआ मिस्टर कॉर्पोरेट? बैलेंस शीट मैच हो गई?"
राघव ने एक गहरी सांस ली, जैसे उसके सीने से कोई भारी पत्थर हट गया हो। "हाँ सुमेधा। आज समझ आया कि रिश्तों में 'बैलेंस' पैसों से नहीं, परवाह से बना रहता है। पैसे तो मैं पहले भी भेज रहा था, लेकिन आज मैं 'घर' होकर आया हूँ।"
राघव ने मन ही मन तय कर लिया कि अब वह सिर्फ़ पैसे ट्रांसफर नहीं करेगा। वह अब हर रविवार सिर्फ़ हाल-चाल पूछने के लिए फोन करेगा, ताकि उसके पिता को अपनी ज़रूरतों के लिए गिड़गिड़ाना न पड़े, बल्कि वे हक़ से कह सकें। उसने समझ लिया था कि बूढ़े माँ-बाप को आलीशान सुविधाओं से ज़्यादा अपने बच्चों की दो मीठी बातों की भूख होती है।
उस रात हाईवे पर दौड़ती कार में राघव अमीर महसूस कर रहा था—बैंक बैलेंस की वजह से नहीं, बल्कि उस खोए हुए सुकून को वापस पाने की वजह से, जिसे वह अपनी व्यस्तता की आड़ में कहीं पीछे छोड़ आया था।
लेखिका : पुष्पा प्रताप सिंह
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