फोन की घंटी बजी तो मैं रोज़ की तरह लापरवाही से उठाकर बोली, “हेलो?”
उधर से आवाज़ आई—“तुम घर पर हो? मैं तुम्हारे घर की तरफ आ रहा हूँ… सोचा, तुमसे मिल भी लूं।”
मेरे हाथ की उंगलियाँ अचानक ठंडी पड़ गईं। दस साल… दस साल बाद। वही आवाज़, वही लहजा—जैसे समय ने बस बीच में एक लंबा-सा कॉमा लगा दिया हो, वाक्य खत्म नहीं किया हो।
“हाँ… आ जाओ,” मैंने हड़बड़ाहट में कहा, जैसे कोई परीक्षा में बिना पढ़े उत्तर दे देता है।
फोन कटते ही मेरा कमरा वही था, पर मैं वही नहीं रही। दीवार पर टंगी घड़ी टिक-टिक कर रही थी, पर मेरे भीतर कुछ और ही बजने लगा। कॉलेज के दिन—कैंटीन की टेबल, लाइब्रेरी के कोने, उसकी हँसी, मेरी बहस, छोटी-छोटी बातों पर रूठना, फिर मिनटों में मान जाना… सब कुछ अचानक सामने आ खड़ा हुआ।
हम दोस्त थे। बस दोस्त। यही तो हम दोनों ने बार-बार कहा था—खुद से भी और दुनिया से भी। फिर भी… आज उसकी आवाज़ सुनकर मेरा दिल क्यों “सूर-सूर” नहीं, “धक-धक” करके उछल पड़ा?
मैंने कमरे को देखा—सोफे के कुशन सही किए, टेबल पर रखी किताबें समेटीं, बालों में उंगलियाँ फिराईं।
मन में सवालों का शोर था—कैसा दिखता होगा? वैसा ही? या बदल गया होगा? क्या मैं बदल गई हूँ?
और सबसे बड़ा सवाल—मिलते ही क्या कहूँगी?
मन हुआ, दरवाज़ा खुलते ही उसे जोर से गले लगा लूँ। कहूँ—“इतने दिन कहाँ थे?”
फिर खुद ही रोक लिया। नहीं… ये सब फिल्मी है।
पर दिल बोला—तुम्हारा दिल तो वही पुरानी फिल्म का टिकट लेकर बैठा है।
गेट की घंटी बजी तो मैं अपने खयालों से ऐसे बाहर निकली जैसे किसी ने अचानक नाम पुकार लिया हो। मैंने दरवाज़ा खोला।
वह सामने खड़ा था।
एक पल को मुझे लगा हवा भी रुक गई। वही आंखें… पर अब उनमें कॉलेज वाला बचपना नहीं था, कोई थकान थी, कोई ठहराव था। बाल थोड़े बदल गए थे, चेहरे पर हल्की-सी सख्ती थी—जैसे जिम्मेदारियों ने मन में एक नई तह बना दी हो।
“कैसी हो?” उसने पूछा।
इतना साधारण सवाल… और मेरे भीतर जैसे कोई दरवाज़ा खुल गया।
कैसी हूँ?
मैं कहना चाहती थी—“अच्छी नहीं हूँ… ठीक भी नहीं… बस चल रही हूँ।”
पर मैंने वही कहा जो सभ्य लोग कहते हैं—“ठीक हूँ।”
वह मुस्कुराया। “बहुत दिन हो गए… सोचा, मिल लूं।”
मैं उसे अंदर लिवा लाई।
मेरे कदम हल्के थे, पर मन भारी।
मुझे लगा था, बैठते ही बातें फूट पड़ेंगी—मैं शिकायतें करूँगी, वह हँसेगा, मैं पुराने किस्से छेड़ूँगी, हम दोनों उन दिनों में लौट जाएंगे।
“चाय पीओगे?” मैंने पूछा।
“हाँ, ठीक है,” उसने कहा।
मैं रसोई में चली गई। गैस जलाई, केतली रखी, चीनी डाली… पर हाथ अपने काम में थे, मन उसके पास।
सोचा—चाय बनाते-बनाते मैं कह दूंगी… कि तुम बिना बताए क्यों चले गए थे?
फिर सोचा—नहीं, ये पूछने का हक किस रिश्ते में होता है? दोस्ती में?
पर दोस्ती भी तो कोई छोटी चीज़ नहीं होती… उसमें भी कुछ अधिकार होते हैं, कुछ शिकायतें होती हैं, कुछ उम्मीदें होती हैं।
चाय लेकर लौटी तो वह हॉल में बैठा घर को देख रहा था—फोटो फ्रेम, किताबें, पौधे…
“तुम्हारा घर अच्छा है,” उसने कहा।
मैंने एक हल्की-सी मुस्कान के साथ चाय रखी।
हमने चाय की पहली चुस्की ली… और वहीं से बातचीत का रास्ता जैसे संकरा हो गया।
उसने नौकरी की बात की।
मैंने बच्चों की बात की।
उसने शहर के बदलने की बात की।
मैंने मौसम की।
हम दोनों हँसे भी, पर उस हँसी में पुरानी बेफिक्री नहीं थी।
बीच-बीच में चुप्पियाँ आतीं, और मैं उन चुप्पियों में बहुत कुछ सुनती थी—जो कहा नहीं गया था, जो कहा जा सकता था, पर कहा नहीं गया।
उसने कहा, “सुना है तुम अपनी जिंदगी में काफी सफल हो।”
“हाँ… कोशिश तो की,” मैंने कहा।
वह बोला, “अच्छा लगा सुनकर।”
उस एक वाक्य में न जाने कितनी गर्मी थी। जैसे दस साल की दूरी पर किसी ने हल्का-सा हाथ रख दिया हो।
मैंने सोचा—अब बोल दूँ।
कह दूँ—“तुमने कभी एक बार भी पूछा क्यों नहीं?”
कह दूँ—“मैंने कई बार तुम्हें याद किया।”
कह दूँ—“मुझे आज भी कुछ अधूरा लगता है।”
पर मेरे शब्द मेरे गले में जैसे अटक गए।
शायद मैं डर गई थी।
या शायद मैंने सीख लिया था कि हर अधूरापन पूरा नहीं किया जाता, कुछ अधूरेपन को संभालकर रखना पड़ता है।
घड़ी ने फिर टिक-टिक की।
वह उठने लगा। “चलूँ? देर हो रही है। फिर कभी मौका लगा तो मिलूंगा।”
“अभी?” मेरे भीतर से निकल गया, पर आवाज़ में नहीं।
मेरे चेहरे पर वही सभ्य मुस्कान थी, मगर दिल ने जैसे कुर्सी पकड़ ली—मत जाओ।
मैं दरवाज़े तक छोड़ने गई।
वह बाहर निकला, फिर एक पल को रुका।
“अच्छा लगा तुमसे मिलकर,” उसने कहा।
“मुझे भी,” मैंने कहा।
और सच में… अच्छा लगा था।
पर साथ ही… कुछ टूट भी गया था।
या शायद… कुछ फिर से जाग गया था, जो सोया नहीं था।
वह चला गया।
दरवाज़ा बंद हुआ तो घर फिर शांत हो गया।
पर भीतर शोर बढ़ गया।
मैं वही जगह बैठ गई जहाँ हम बैठे थे। चाय का कप खाली था, पर दिल नहीं।
मन हुआ, उसे फोन करूँ—“सुनो, वापस आ जाओ… बहुत बातें करनी हैं।”
मन हुआ, कहूँ—“मुझे रोना है… तुम्हारे सामने।”
पर मैंने कुछ नहीं किया।
बस खिड़की से बाहर देखा।
शाम ढल रही थी।
और मेरे भीतर एक सवाल रुक-रुककर धड़क रहा था—
क्या सच में हमारी दोस्ती बस दोस्ती थी?
या दोस्ती की आड़ में कोई ऐसा रिश्ता था, जिसे नाम देना हम दोनों ने कभी सीख ही नहीं पाया?
अब मुझे अगली मुलाकात का इंतजार है।
इस बार शायद मैं चाय से पहले बात करूँगी।
इस बार शायद मैं “ठीक हूँ” की जगह सच बोल दूँगी।
और अगर वह फिर कहे—“चलूँ?”
तो शायद… मैं कह दूँ—
“हाँ, पर इस बार जल्दी मत जाना… कुछ अधूरा है, उसे पूरा कर लो।”
लेखिका : दीपिका भाटिया
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