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दूध का डब्बा

 सर ...... ,,,,,,,,

बस एक दूध का डिब्बा दे दीजिए… जब बड़ी हो जाऊँगी तो पैसे लौटा दूँगी …. !!!!

यही शब्द थे उस छोटी-सी लड़की के, जिसने उस ठंडी शाम को मेरे दिल में एक ऐसा घाव दे दिया, जो आज तक नहीं भरा…

शाम के छह बजे थे। मैं अपनी किराना दुकान बंद करने ही वाला था कि तभी दरवाजे पर लगी घंटी धीमे से बजी— टिंग… टिंग…

मैंने सिर उठाकर देखा—

दरवाजे के बाहर कोई नहीं था।

बस हल्की हवा अंदर घुसकर मेरे सामने रखे पुराने कैलेंडर को हिलाती रही।

मैंने सोचा—शायद कोई बच्चा शरारत कर गया।

मैं शटर गिराने ही वाला था कि अचानक मुझे अपने पैरों के पास कोई हलचल महसूस हुई।

नीचे झुककर देखा—

एक नन्ही-सी लड़की…

फटे जूते, गंदी फ्रॉक, और कंधे तक उलझे बाल।

वह जैसे डरते-डरते दुकान में दाखिल हुई थी।

उसकी आँखें मेरी आँखों से नहीं बल्कि मेरे पीछे रखी दूध की कतार को निहार रही थीं।

चेहरे पर ऐसा भाव मानो कई दिनों से भूखी हो… या शायद किसी को भूखा ना सोने देना चाहती हो।

मैंने पूछा,

“क्या चाहिए बेटा?”

वह हिचकिचाई… होंठ काँपे… फिर धीरे से बोली—

“सर, बस एक दूध का डिब्बा दे दीजिए। जब… जब बड़ी हो जाऊँगी, तो पैसे लौटा दूँगी।”

मेरे हाथ वहीं रुक गए।

कहानी की सच्चाई धीरे-धीरे खुलने लगी…

मैंने कभी उस बच्ची को पहले नहीं देखा था।

यह इलाका सामाजिक कॉलोनी था, जहाँ ज़्यादातर मध्यम वर्ग ही रहता था।

मैंने पूछा—

“बेटा, तुम्हारा घर कहाँ है? तुम्हारे मम्मी-पापा कहाँ हैं?”

वह तुरंत एक कदम पीछे हट गई, जैसे डर गई हो कि कहीं मैं मना ना कर दूँ।

उसकी आवाज़ और धीमी हो गई—

“घर… पास ही है सर। मम्मी बीमार हैं… और दवा लेने के बाद उन्हें दूध देना होता है… पर घर में पैसे नहीं हैं।”

मैंने ध्यान से देखा—

उसके हाथ ठंड से लाल थे।

कलाई पर चोट का पुराना निशान भी दिख रहा था।

वह बार-बार अपनी उंगलियाँ अपनी फ्रॉक में छिपा रही थी।

मैंने उससे कहा,

“तुम अपना नाम बताओ।”

वह बोली, “रिया।”

फिर उसने इतना धीमे कहा कि मुश्किल से सुनाई दिया—

“मम्मी कहती हैं कि भगवान सबकी सुनता है… लेकिन आज भगवान ने शायद हमारे घर की घंटी बंद कर दी है।”

उस एक वाक्य ने मेरे मन को झकझोर दिया।

मैंने दूध का पैकेट उठाया और उसकी ओर बढ़ाया…

लेकिन उसने हाथ नहीं बढ़ाया।

बल्कि उसने अपनी जेब से एक मुड़ा-तुड़ा सिक्का निकाला—

पचास पैसे का।

“सर, ये ले लीजिए… बाकी मैं बड़ी होकर दे दूँगी। स्कूल में मैडम कहती हैं कि मेहनत करने से सब मिल जाता है। मैं भी मेहनत करूँगी… सच में पैसे लौटा दूँगी।”

उसकी आँखों में झूठ नहीं था, सिर्फ बेबसी थी।

मैंने मुस्कुराकर कहा,

“रिया, ये दूध तुम्हारी मम्मी के लिए मेरा तोहफा है। पैसे की कोई जरूरत नहीं।”

लेकिन वह ज़िद पर अड़ी रही।

“नहीं सर… मम्मी कहती हैं कि किसी पर बोझ नहीं बनना चाहिए।”

इतना परिपक्व जवाब एक पाँच-छह साल की बच्ची का नहीं लगता था।

जो दर्द उसने झेला था, वह उसके शब्दों में दिख रहा था।

आखिर मैंने हल्का सा झुककर कहा—

“चलो एक वादा करते हैं। तुम अच्छी बच्ची बनकर पढ़ाई करोगी, और जब डॉक्टर बनोगी तब मुझे याद करके एक चॉकलेट देना। बस इतना ही भुगतान चलेगा।”

इस बार वह थोड़ा मुस्कुराई।

पहली बार उसकी आँखों में बचपन की चमक दिखी।

वह दूध का पैकेट लेकर दौड़ती हुई दुकान से बाहर निकली।

पर जाते-जाते मुड़ी और बोली—

“धन्यवाद, सर… आप भगवान जैसे हो।”

और वह गली के मोड़ पर आँखों से ओझल हो गई।

अगले दिन कुछ अजीब हुआ…

सुबह करीब नौ बजे, मेरी दुकान पर भीड़ लगी थी।

तभी गली के सिरे से एम्बुलेंस का सायरन सुनाई दिया—

पों पों… पों पों…

लोग दौड़ते हुए उस ओर जा रहे थे।

मैं भी चिंतित होकर बाहर आया।

वह एम्बुलेंस उसी झुग्गी के बाहर खड़ी थी, जिससे रिया आई थी।

मैंने किसी से पूछा—

“क्या हुआ?”

एक पड़ोसी ने कहा,

“वो… रिया की माँ… कल रात हालत ज़्यादा बिगड़ गई। सुबह तक… बच नहीं पाई।”

मेरे कानों में जैसे झनझनाहट होने लगी।

उसने आगे कहा—

“वो छोटी बच्ची पूरी रात अपनी माँ को हिलाती रही, दूध पिलाने की कोशिश करती रही, पर औरत ने आँख ही नहीं खोली।”

मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

मैं दौड़कर उस झुग्गी की तरफ गया…

छोटे से टीन के कमरे में भीड़ थी।

एक कोने में चारपाई पर रिया की माँ शांत पड़ी थी।

और कमरे के दूसरे कोने में…

रिया बैठी थी।

अपनी माँ का हाथ पकड़े…

आँखें सूखी थीं, जैसे आँसू भी अब साथ छोड़ चुके हों।

मैंने धीरे से उसके पास जाकर पूछा,

“रिया… बेटा…”

वह मेरी ओर मुड़ी।

उसके हाथ में वही दूध का पैकेट था…

पूरा का पूरा… खुला भी नहीं।

वह फूट पड़ी—

“सर… मैंने देर कर दी। मम्मी ने दूध पीने से पहले ही… मुझे छोड़ दिया।”

उसकी छोटी-सी हथेलियों में दूध का पैकेट काँप रहा था।

वह रुआँसी आवाज़ में बोली—

“मम्मी सो क्यों नहीं रही सर? उठ क्यों नहीं रही? मैंने तो जल्दी लाई थी दूध… सच में लाई थी…”

मैं खुद को रोक नहीं पाया।

मैंने उसे गोद में उठा लिया।

वह मेरे कंधे पर सिर रखकर बस यही दोहराती रही—

“मम्मी को समझा दो ना सर… मैं अब मेहनत भी करूँगी… रोऊँगी भी नहीं… बस एक बार उनसे बात करवा दो…”

उस पल पूरी झुग्गी में सन्नाटा था।

बस रिया के टूटते दिल की आवाज़ गूंज रही थी।

रीया को कौन संभालेगा?

वहाँ पता चला—

रिया का कोई रिश्तेदार नहीं था।

पिता उसे और उसकी माँ को बहुत पहले छोड़कर भाग गया था।

कई NGO और सरकारी लोग भी वहाँ खड़े थे, पर वह किसी की गोद में जाने को तैयार नहीं थी।

वह बस मुझे पकड़कर कह रही थी—

“सर, मुझे दुकान पर बैठने देना… मैं आपको काम में मदद करूँगी। मैं रोऊँगी भी नहीं। बस… मुझे अकेला मत छोड़िए।”

मैंने उसकी आँखों में देखा—

वह बच्ची मुझ पर भरोसा कर रही थी।

ऐसा भरोसा, जो शायद उसने दुनिया में किसी पर भी पहली बार किया था।

मैंने फौरन कहा—

“रिया, तुम अकेली नहीं हो। मैं हूँ ना।

तुम मेरे साथ चलोगी।

और तुम्हारी मम्मी जहाँ भी होंगी, वो खुश होंगी कि उनकी बेटी सुरक्षित है।”

उसने धीरे से मेरी शर्ट पकड़ी और बोली—

“सच, सर?”

मैंने सिर हिलाया।

वह मेरे सीने से लग गई—

जैसे वर्षों बाद किसी ने उसे सुरक्षा का एहसास दिया हो।

आज… पाँच साल हो गए हैं।

रिया अब मेरे घर में है।

मेरी पत्नी उसे अपनी बेटी की तरह पाल रही है।

वह स्कूल में टॉपर है।

हर साल टीचर्स डे पर वह एक कार्ड बनाकर देती है, जिसमें सबसे ऊपर लिखा होता है—

“Thank you, Sir… आपने उस दिन दूध से ज्यादा उम्मीद दी थी।”

वह कभी पैसे लौटाने की बात नहीं करती…

शायद उसे अब घर मिल गया है।

लेकिन मैं जानता हूँ—

जिस दिन वह डॉक्टर बनेगी,

वह सच में मुझे वह चॉकलेट जरूर देगी .... !!!!

💕💕 साभार .... 🙏🙏🙏🙏


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