ट्रेन की पटरियों की खड़खड़ाहट रमाकांत बाबू के कानों में नहीं, बल्कि सीधे उनके दिल पर हथौड़े की तरह बज रही थी। एसी कोच की ठंडक के बावजूद उनके माथे पर पसीने की बूंदें थीं। उन्होंने अपनी बगल वाली सीट पर रखे छोटे से सूटकेस को कसकर पकड़ रखा था, मानो वही उनकी बची-कुची जमापूंजी हो। खिड़की के बाहर पीछे छूटते हुए पेड़-पौधे और बिजली के खंभे उन्हें यह अहसास दिला रहे थे कि वे अपने बेटे के घर से, हमेशा के लिए, एक बहुत कड़वी याद लेकर लौट रहे हैं।
रमाकांत जी की पत्नी, सुमित्रा, का देहांत तीन साल पहले हो गया था। तब से वे अपने पैतृक गांव में अकेले ही रह रहे थे। बेटा 'समीर' और बहू 'तनीषा' मुंबई में रहते थे। बहुत जिद करके समीर उन्हें अपने पास मुंबई ले गया था।
"पापा, अब आप वहां अकेले कैसे रहेंगे? यहाँ हम हैं, तनीषा है, आपका ख्याल रखेंगे," समीर ने भावुक होकर कहा था।
लेकिन मुंबई के उस 2 BHK फ्लैट में बीते पिछले चार महीने रमाकांत जी के लिए किसी वनवास से कम नहीं थे। समस्या समीर से नहीं थी, समस्या थी तनीषा से।
रमाकांत जी पुराने ख्यालात के, सिद्धांतवादी स्कूल मास्टर रहे थे। और तनीषा? वह एक कॉर्पोरेट कंपनी में एचआर मैनेजर थी। मॉर्डन, तेज-तर्रार और अपनी शर्तों पर जीने वाली। रमाकांत जी को उसका रहन-सहन रत्ती भर भी नहीं भाता था।
सुबह 9 बजे सोकर उठना, बिना नहाए लैपटॉप लेकर बैठ जाना, घर में खाना बनाने के बजाय आए दिन 'जोमैटो' या 'स्विगी' से खाना ऑर्डर करना। रमाकांत जी को लगता था कि तनीषा ने उनके बेटे को गुलाम बना रखा है। शाम को समीर ऑफिस से थका-हारा आता, और तनीषा उसे ही चाय बनाने को कह देती। यह देखकर रमाकांत जी का खून खौल उठता था। उन्होंने कई बार दबी जुबान में समीर को समझाने की कोशिश की थी।
"बेटा, घर गृहस्थी ऐसे नहीं चलती। औरत का काम घर को संवारना होता है, न कि हुक्म चलाना," वे कहते।
लेकिन समीर हंसकर टाल देता, "पापा, वो भी थकती है। यहाँ लाइफस्टाइल अलग है।"
कल रात जो हुआ, उसने रमाकांत जी के सब्र का बांध तोड़ दिया था।
रात के खाने की मेज पर रमाकांत जी ने देखा कि तनीषा ने फिर से बाहर से पिज़्ज़ा मंगवाया है। उन्हें सादा दाल-रोटी पसंद थी। उन्होंने थोड़ा चिढ़कर कहा, "बहू, आज फिर बाहर का खाना? महीने भर में दस बार तो तुम बाहर से मंगा चुकी हो। पैसे पेड़ पर नहीं उगते। समीर की कमाई को ऐसे बर्बाद मत करो।"
तनीषा ने पिज़्ज़ा का टुकड़ा प्लेट में रखते हुए तपाक से जवाब दिया था, "पापाजी, समय भी पेड़ पर नहीं उगता। आज मेरी मीटिंग्स बहुत लंबी थीं, मुझमें खाना बनाने की हिम्मत नहीं थी। और वैसे भी, यह मेरे पैसों का है, समीर के नहीं।"
यह जवाब रमाकांत जी के कलेजे को चीर गया। एक बहू का अपने ससुर को यह जताना कि वह कमाती है, उन्हें घोर अपमानजनक लगा। रात भर वे सो नहीं पाए। उन्हें लगा कि इस घर में उनकी हैसियत एक पुराने फर्नीचर से ज्यादा कुछ नहीं है, जो सिर्फ जगह घेर रहा है। सुबह होते ही उन्होंने अपना सामान पैक किया और समीर के लाख रोकने पर भी स्टेशन आ गए।
"मैं जा रहा हूँ समीर। जहाँ मेरी इज्जत नहीं, वहां मेरा रहना व्यर्थ है," उन्होंने दो टूक कह दिया था।
अब ट्रेन अपनी रफ़्तार पकड़ चुकी थी। रमाकांत जी ने अपनी आँखें मूंद लीं। उन्हें सुमित्रा की याद आ रही थी। "अगर सुमित्रा होती, तो घर को मंदिर बना कर रखती। यह मॉडर्न लड़कियां घर को सराय समझती हैं," उन्होंने मन ही मन सोचा।
तभी उनकी जेब में रखा फोन वाइब्रेट हुआ। उन्होंने देखा, समीर का फोन था। उन्होंने काट दिया। वे बात नहीं करना चाहते थे। थोड़ी देर बाद फिर फोन बजा। इस बार अनजान नंबर था। झुंझलाते हुए उन्होंने फोन उठाया।
"हेलो?"
"पापाजी? मैं तनीषा बोल रही हूँ..." उधर से घबराई हुई आवाज आई।
रमाकांत जी का मन हुआ कि फोन पटक दें। "मुझे तुमसे कोई बात नहीं करनी। मैं जा रहा हूँ, अब तुम और तुम्हारा पैसा, दोनों आजाद हो।"
"पापाजी, प्लीज मेरी बात सुनिए! समीर... समीर को हार्ट अटैक आया है!" तनीषा की आवाज में रुलाई फूट पड़ी।
रमाकांत जी के हाथ से फोन लगभग छूट गया। "क्या? क्या बक रही हो?"
"जी पापाजी... आप जैसे ही निकले, वो बहुत तनाव में थे। सीने में दर्द की शिकायत की और गिर पड़े। मैं उन्हें सिटी हॉस्पिटल लेकर आई हूँ। डॉक्टर कह रहे हैं स्थिति गंभीर है। प्लीज आप... आप अगले स्टेशन पर उतर कर वापस आ जाइये। मुझे आपकी जरूरत है।"
रमाकांत जी का दिमाग सुन्न पड़ गया। उनका बेटा, उनका समीर, जिंदगी और मौत से जूझ रहा है? सारी नाराजगी, सारा स्वाभिमान एक पल में धुएं की तरह उड़ गया।
अगला स्टेशन 'कल्याण' था। वे हड़बड़ाहट में उतरे और उल्टे पाँव दूसरी ट्रेन पकड़कर वापस मुंबई की तरफ भागे। रास्ते भर वे भगवान से प्रार्थना करते रहे। उन्हें अपने आप पर गुस्सा आ रहा था। "अगर मैं उसे तनाव देकर न आता, तो शायद यह न होता," उनका मन उन्हें कोस रहा था।
जब वे अस्पताल पहुंचे, तो आईसीयू के बाहर का नजारा देखकर उनके कदम ठिठक गए।
तनीषा वहां एक बेंच पर बैठी थी। उसके बाल बिखरे हुए थे, आँखों का काजल फैलकर गालों पर आ गया था। उसने वही कपड़े पहन रखे थे जो सुबह घर पर थे। लेकिन जो चीज रमाकांत जी ने देखी, वह कुछ और थी।
तनीषा के हाथ में एक फाइल थी और दूसरे हाथ में फोन। वह रो रही थी, लेकिन साथ ही किसी से फोन पर बात भी कर रही थी। रमाकांत जी धीरे-धीरे उसके पीछे जाकर खड़े हो गए।
"सर, प्लीज... मेरा लोन अभी अप्रूव कर दीजिये। मेरे पास इतना कैश नहीं है... हाँ, मैं जानती हूँ मेरी पिछली ईएमआई बाउंस हुई थी... देखिए, मेरे पति आईसीयू में हैं। मुझे पैसों की सख्त जरूरत है। मैं अपनी पीएफ का पैसा भी निकाल रही हूँ... प्लीज सर..."
रमाकांत जी सन्न रह गए। लोन? ईएमआई बाउंस? समीर तो कहता था कि सब बहुत अच्छा चल रहा है। उसकी तनख्वाह बहुत अच्छी है।
तनीषा ने फोन काटा और सिर पकड़कर रोने लगी। तभी एक नर्स आई, "मैम, 2 लाख रुपये जमा करवाने होंगे, एंजियोप्लास्टी करनी है।"
"जी... जी सिस्टर। मैं कर रही हूँ। बस आधे घंटे में," तनीषा ने अपने आंसू पोंछे और अपने पर्स से कुछ क्रेडिट कार्ड्स निकाले।
रमाकांत जी ने देखा कि तनीषा ने अपने गले से सोने की चेन उतारी और उसे मुट्ठी में भींच लिया। वह शायद उसे गिरवी रखने या बेचने की सोच रही थी।
रमाकांत जी की आँखों के आगे से पर्दा हट रहा था। वे धीरे से आगे बढ़े और तनीषा के कंधे पर हाथ रखा।
तनीषा चौंक कर मुड़ी। रमाकांत जी को देखते ही वह फूट-फूट कर रो पड़ी और उनके पैरों में गिर गई। "पापाजी... समीर... डॉक्टर कह रहे हैं..."
रमाकांत जी ने उसे उठाया और पास बिठाया। "तनीषा, शांत हो जा बेटी। मैं आ गया हूँ। समीर को कुछ नहीं होगा। पर मुझे सच बता, यह पैसों की क्या समस्या है? समीर तो कहता था..."
तनीषा ने हिचकियों के बीच जो बताया, उसे सुनकर रमाकांत जी के पैरों तले जमीन खिसक गई।
"पापाजी, समीर की नौकरी... छह महीने पहले ही छूट गई थी। कंपनी में ले-ऑफ (छंटनी) हुआ था। उन्होंने आपको नहीं बताया क्योंकि उन्हें डर था कि आपको धक्का लगेगा। उन्हें लगता था कि वे जल्द ही दूसरी नौकरी ढूंढ लेंगे। लेकिन मार्केट बहुत खराब है..."
रमाकांत जी अवाक रह गए। "तो... तो घर कैसे चल रहा था?"
"मैं चला रही थी पापाजी," तनीषा ने नजरें झुका लीं। "मेरी सैलरी से घर का किराया, ईएमआई और बाकी खर्चे चल रहे थे। लेकिन पिछले महीने मेरी कंपनी ने भी सैलरी में 30% कटौती कर दी। हम बहुत मुश्किल दौर से गुजर रहे थे। इसलिए... इसलिए मैं बाहर से खाना मंगाती थी क्योंकि मैं घर और ऑफिस दोनों मैनेज करने के चक्कर में एक्स्ट्रा शिफ्ट कर रही थी ताकि कुछ और पैसे बन सकें। खाना बनाने में जो दो घंटे लगते, उस वक्त मैं फ्रीलांस प्रोजेक्ट करती थी।"
रमाकांत जी को लगा जैसे किसी ने उन्हें तवे पर बैठा दिया हो। जिन बातों के लिए वे तनीषा को कोसते थे—बाहर का खाना, देर तक काम करना, समीर से काम करवाना—वे सब असल में मजबूरियां थीं। वह लड़की अकेले अपने कंधों पर पूरे घर का बोझ उठा रही थी और उफ़ तक नहीं कर रही थी। और कल रात... कल रात उसने कहा था 'यह मेरे पैसों का है'। वह अहंकार नहीं था, वह एक थकी हुई, हताश पत्नी का स्वाभिमान था जो अपने बेरोजगार पति को अपने पिता की नजरों में गिरने से बचा रही थी।
रमाकांत जी की आँखों से पश्चाताप के आंसू बह निकले। उन्होंने तनीषा के हाथ से वह सोने की चेन ले ली।
"पापाजी, इसे बेचने दीजिये, समीर का इलाज..." तनीषा घबराई।
रमाकांत जी ने चेन वापस उसके गले में पहना दी।
"जब तक बाप जिंदा है, घर की लक्ष्मी को अपने गहने बेचने की जरूरत नहीं है," उन्होंने अपनी जेब से पासबुक निकाली। "मैं रिटायर्ड हूँ तनीषा, मरा नहीं हूँ। मेरे पीएफ और ग्रेच्युटी का पैसा किस दिन काम आएगा?"
रमाकांत जी ने काउंटर पर जाकर अपने कार्ड से पेमेंट किया। ऑपरेशन हुआ और वह सफल रहा।
तीन दिन बाद।
समीर को प्राइवेट वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया था। रमाकांत जी सोफे पर बैठे थे और तनीषा समीर को सूप पिला रही थी।
"पापा, मुझे माफ़ कर दीजिये," समीर ने कमजोर आवाज में कहा। "मैंने आपसे झूठ बोला।"
"चुप रह," रमाकांत जी ने डांटा, लेकिन उनकी आँखों में नमी थी। "झूठ तूने नहीं, मेरी आँखों ने मुझसे बोला था। मुझे लगा था कि मैं दुनिया देख चुका हूँ, पर मैं अपने घर की ही हकीकत नहीं देख पाया।"
वे उठे और तनीषा के पास गए। तनीषा सहम गई। उसे लगा शायद पापाजी फिर से किसी बात पर नाराज हैं।
रमाकांत जी ने अपने दोनों हाथ तनीषा के सिर पर रखे।
"तनीषा, लोग कहते हैं कि बेटा भाग्य से मिलता है और बहू सौभाग्य से। लेकिन तू... तू बहू नहीं है। तू तो श्रवण कुमार है। मैंने तुझे 'मॉर्डन' समझकर गलत आंका। मुझे लगा तू घर तोड़ रही है, जबकि तू तो अपनी हथेली पर इस घर की छत रोके खड़ी थी।"
"पापाजी..." तनीषा की आँखों में आंसू आ गए।
"मुझे माफ़ कर दे बेटा," रमाकांत जी का गला भर आया। "उस दिन ट्रेन में मैंने सोचा था कि काश सुमित्रा होती तो घर मंदिर होता। लेकिन आज मुझे समझ आया कि मंदिर मूर्तियों से नहीं, त्याग से बनता है। तूने पिज़्ज़ा मंगाकर भी जो तपस्या की है, वो मेरी सुमित्रा के चूल्हे की रोटियों से कम नहीं है। तूने मेरे बेटे का मान रखा, उसे मेरे सामने झुकने नहीं दिया।"
तनीषा ने रमाकांत जी को गले लगा लिया। वह पहली बार अपने ससुर के सीने से लगकर रोई, एक बहू की तरह नहीं, एक बेटी की तरह।
"अब मैं कहीं नहीं जा रहा," रमाकांत जी ने अपना फैसला सुनाया। "लेकिन अब इस घर के नियम बदलेंगे। अब घर का खर्चा मेरी पेंशन से चलेगा। और तुम दोनों... तुम दोनों अपनी जिंदगी फिर से पटरी पर लाओगे, बिना किसी तनाव के। और हाँ, तनीषा..."
"जी पापाजी?"
"कल वो जो पिज़्ज़ा तुम खा रही थी... एक मेरे लिए भी आर्डर करना। मैंने सुना है उसमें बहुत चीज़ (cheese) होता है। कभी-कभी बुड्ढों को भी 'मॉर्डन' होना चाहिए," रमाकांत जी ने मुस्कुराते हुए कहा।
कमरे में हंसी गूंज उठी। वह हंसी जो पिछले छह महीनों से आर्थिक तंगी और गलतफहमियों के बोझ तले दबी हुई थी।
रमाकांत जी ने खिड़की से बाहर देखा। मुंबई का शोर अब उन्हें परेशान नहीं कर रहा था। उन्हें समझ आ गया था कि 'संस्कार' का मतलब साड़ी पहनना या पैर छूना नहीं होता। संस्कार का मतलब होता है विषम परिस्थितियों में परिवार का हाथ न छोड़ना। और उनकी जींस पहनने वाली, पिज़्ज़ा खाने वाली, लैपटॉप पर खट-खट करने वाली बहू... संस्कारों में किसी भी 'सुधा' या 'सावित्री' से कम नहीं थी।
उस दिन रमाकांत जी ने सिर्फ अपना बेटा वापस नहीं पाया था, उन्होंने एक बेटी भी पाई थी—एक ऐसी बेटी जो लोहे की तरह मजबूत थी और मोम की तरह नरम। उन्होंने तय कर लिया कि अब वो इस घर की 'पुरानी नींव' बनकर रहेंगे, जो नई इमारत को गिरने नहीं देगी।
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