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आशीर्वाद

 दिवाली की साफ-सफाई का दौर जोरों पर था। शर्मा सदन में भी वही चहल-पहल थी जो हर भारतीय मध्यमवर्गीय परिवार में त्यौहारों के दौरान होती है। घर की बड़ी बहू, सुमन, सुबह से ही कमर कसकर काम में जुटी हुई थी। कभी पंखे साफ करना, कभी अलमारियों से पुराने अखबार बदलना, तो कभी रसोई के डिब्बों को धोकर धूप में सुखाना।

सुमन को इस घर में आए हुए दो साल हो चुके थे। वह स्वभाव से बेहद शांत और कर्मठ थी। उसकी सास, कमला देवी, वैसे तो दिल की बुरी नहीं थीं, लेकिन पुराने रिति-रिवाजों और "लोक-लाज" के नाम पर उनकी सोच थोड़ी संकीर्ण हो जाती थी। उनके लिए घर की बहू का मतलब था— चौबीसों घंटे सेवा में तत्पर रहने वाली एक मूरत, जिसकी अपनी कोई इच्छा न हो।

दोपहर के खाने की मेज पर जब सब इकट्ठा हुए, तो सुमन ने झिझकते हुए अपनी बात रखी।

"मम्मी जी," सुमन ने पानी का जग रखते हुए कहा, "वो माँ का फोन आया था आज सुबह। कह रही थीं कि अगर इस बार दिवाली पर मैं तीन-चार दिनों के लिए मायके आ जाती, तो अच्छा लगता। पिछले साल भी मैं नहीं जा पाई थी। भाई की नौकरी भी अब दूसरे शहर में लग गई है, वो भी आ रहा है। सब साथ होते तो..."

कमला देवी के हाथ का निवाला वहीं रुक गया। उन्होंने चश्मा ठीक करते हुए सुमन की ओर देखा, जैसे उसने कोई बहुत बड़ा अपराध कर दिया हो।

"सुमन, तुम कैसी बातें कर रही हो?" कमला देवी ने कड़े स्वर में कहा। "दिवाली साल का सबसे बड़ा त्यौहार है। घर की लक्ष्मी ही अगर त्यौहार वाले दिन घर पर नहीं रहेगी, तो पूजा कौन करेगा? रिश्तेदार आएंगे, मिलने-जुलने वाले आएंगे। वो क्या कहेंगे? कि शर्मा जी की बहू त्यौहार पर मायके जाकर बैठ गई? हमारे खानदान में आज तक ऐसा नहीं हुआ।"

सुमन का चेहरा उतर गया। उसने धीरे से कहा, "लेकिन मम्मी जी, मैं दिवाली के दो दिन पहले जाकर, गोवर्धन पूजा तक वापस आ जाऊंगी। मुख्य पूजा की तैयारी मैं करके जाऊंगी।"

"नहीं मतलब नहीं," कमला देवी ने अपना फैसला सुना दिया। "त्यौहार ससुराल में ही मनाए जाते हैं। मायके जाने के लिए पूरा साल पड़ा है। अभी काम बहुत है, इन फालतू ख्यालों को दिमाग से निकाल दो और सफाई पर ध्यान दो।"

पास बैठे सुमन के ससुर, रमाकांत जी, अखबार पढ़ रहे थे। उन्होंने पत्नी की टोन सुनी पर हमेशा की तरह चुप रहना ही बेहतर समझा। सुमन के पति, विशाल, ने पत्नी के उदास चेहरे को देखा। उसे बुरा लगा, लेकिन माँ के सामने बोलने की हिम्मत वह भी नहीं जुटा पाया।

सुमन चुपचाप वहां से उठी और रसोई में चली गई। बर्तनों की खनखनाहट के बीच उसकी सिसकियों की आवाज दब गई। उसे दुख इस बात का नहीं था कि उसे काम करना पड़ रहा था, दुख इस बात का था कि शादी के बाद लड़की का अपने माता-पिता के घर जाना एक 'याचिका' बन जाता है, जबकि ससुराल में रहना 'कर्तव्य'।

शाम को घर का माहौल थोड़ा तनावपूर्ण था। तभी कमला देवी का फोन बजा। स्क्रीन पर 'प्रिया' का नाम चमक रहा था। प्रिया, कमला देवी की बेटी और सुमन की ननद, जो दूसरे शहर में ब्याही थी।

फोन उठाते ही कमला देवी का चेहरा खिल उठा। उनकी आवाज में मिसरी घुल गई।

"अरे मेरी लाडो! कैसी है तू? सब ठीक तो है न?"

उधर से प्रिया ने कुछ कहा, जिसे सुनकर कमला देवी की खुशी का ठिकाना नहीं रहा।

"सच? अरे यह तो बहुत अच्छी खबर है! तू आ रही है? और वो भी पूरे दस दिनों के लिए? अरे वाह! दामाद जी भी आ रहे हैं न? नहीं नहीं, तू चिंता मत कर। मैं आज ही तेरे पसंद के बेसन के लड्डू और मठरी बनवाना शुरू कर दूंगी। सुमन है न, वो सब कर देगी। तू बस आराम से आ। ये तेरा ही घर है बेटा, तुझे आने के लिए पूछना पड़ेगा क्या?"

सुमन रसोई के दरवाजे पर खड़ी यह सब सुन रही थी। अभी कुछ ही घंटों पहले जब उसने अपने घर जाने की बात की थी, तो 'परंपरा' और 'लोक-लाज' की दुहाई दी गई थी। और अब, जब वही बात उनकी अपनी बेटी पर आई, तो सारे नियम हवा हो गए? क्या प्रिया किसी और घर की बहू नहीं थी? क्या उस घर में दिवाली नहीं मननी थी?

सुमन की आँखों में आंसू आ गए। यह दोहरा मापदंड उसे अंदर तक छलनी कर गया। उसने विशाल को देखा, जो सोफे पर बैठा मोबाइल चला रहा था। विशाल ने भी अपनी माँ की बातें सुनी थीं और फिर सुमन की ओर देखा। सुमन की आँखों में तैरता सवाल विशाल को बेचैन कर गया।

रात को जब वे अपने कमरे में थे, सुमन खामोश थी। वह खिड़की के पास खड़ी बाहर देख रही थी। विशाल उसके पास आया और कंधे पर हाथ रखा।

"सुमन, मैं जानता हूँ तुम्हें बुरा लगा है। माँ का तरीका थोड़ा पुराना है, पर वो..."

सुमन ने पहली बार विशाल की बात काटी। वह पलटी, उसकी आँखों में गुस्सा नहीं, बल्कि एक गहरी पीड़ा थी।

"विशाल, बात सिर्फ जाने या न जाने की नहीं है। बात उस सोच की है। प्रिया दीदी आ रही हैं, मुझे बहुत खुशी है। वो मेरी ननद हैं, मैं उनकी सेवा करूंगी, उनके लिए पकवान भी बनाऊंगी। लेकिन क्या मैं इंसान नहीं हूँ? मेरे माता-पिता, माता-पिता नहीं हैं? अगर प्रिया दीदी का हक़ है कि वो त्यौहार पर अपने मायके आएं, तो मेरा हक़ क्यों नहीं? क्या शादी होते ही लड़की के जज़्बात ससुराल की जागीर हो जाते हैं?"

विशाल के पास कोई जवाब नहीं था। वह जानता था कि सुमन सौ प्रतिशत सही थी।

"मैं कल माँ से बात करूंगा," विशाल ने वादा किया।

अगले दिन सुबह नाश्ते की मेज पर माहौल खुशनुमा था। कमला देवी प्रिया के आने की तैयारियों में मग्न थीं।

"सुमन, सुन," कमला देवी ने उत्साह से कहा। "प्रिया के कमरे के पर्दे बदल देना। और हां, वो मटर-पनीर उसे बहुत पसंद है, तो आज मटर छीलकर रख लेना। परसों वो आ रही है।"

"जी मम्मी जी," सुमन ने सिर झुकाकर कहा।

तभी विशाल ने अपना चाय का कप मेज पर रखा और गला खंखाड़ा।

"माँ, मैंने अभी-अभी जीजाजी (प्रिया के पति) से फोन पर बात की," विशाल ने झूठ बोला, लेकिन उसका चेहरा एकदम गंभीर था।

कमला देवी और रमाकांत जी ने चौंककर उसकी तरफ देखा। "क्यों? क्या हुआ? सब ठीक तो है न?"

"हां, सब ठीक है," विशाल ने संजीदगी से कहा। "मैंने जीजाजी से कह दिया कि वो प्रिया को दिवाली पर यहां न भेजें।"

कमला देवी के हाथ से चम्मच छूट गया। "क्या? तू पागल हो गया है क्या? अपनी ही बहन को आने से मना कर दिया? किस हक़ से?"

विशाल ने बहुत ही शांत स्वर में जवाब दिया, "उसी हक़ और उसी दलील से, जो आपने कल सुमन को दी थी, माँ।"

कमला देवी सन्न रह गईं। "क्या मतलब?"

"मतलब साफ़ है माँ," विशाल ने सुमन की तरफ एक नजर डाली और फिर अपनी माँ की आँखों में देखा। "कल आपने कहा था न कि दिवाली बड़ा त्यौहार है और घर की लक्ष्मी को अपने ससुराल में ही रहना चाहिए। तो प्रिया भी तो किसी की बहू है, किसी घर की लक्ष्मी है। अगर वो त्यौहार पर हमारे घर आ जाएगी, तो उसके ससुराल में अंधेरा नहीं हो जाएगा? वहां रिश्तेदार क्या कहेंगे? उनकी नाक नहीं कटेगी?"

कमला देवी का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। "तुझे क्या हो गया है विशाल? प्रिया इस घर की बेटी है। उसका मन है अपने माँ-बाप के साथ त्यौहार मनाने का। उसके ससुराल वाले बहुत समझदार हैं, वो उसे नहीं रोकते। तू क्यों बीच में टांग अड़ा रहा है?"

विशाल ने तुरंत बात पकड़ी। "बिल्कुल माँ! उसके ससुराल वाले समझदार हैं क्योंकि वो अपनी बहू की खुशियों की कद्र करते हैं। वो समझते हैं कि एक लड़की का मन अपने मायके के लिए भी धड़कता है। लेकिन हम? क्या हम समझदार हैं? आप चाहती हैं कि आपकी बेटी तो मायके आकर खुशियां मनाए, लेकिन दूसरे की बेटी को आप 'परंपरा' की जंजीरों में जकड़ कर रखें? यह दोहरा न्याय क्यों माँ?"

रमाकांत जी, जो अब तक चुप थे, उन्होंने अपना अखबार नीचे रखा। उन्होंने कमला देवी की ओर देखा, जो अब जवाब ढूँढने के लिए संघर्ष कर रही थीं।

विशाल ने आगे कहा, "माँ, सोचिए अगर जीजाजी की माँ भी प्रिया से यही कहतीं कि 'तुम घर की बहू हो, कहीं नहीं जाओगी', तो आपको कैसा लगता? आपको दुख होता न? आपको लगता न कि आपकी बेटी कैद में है? सुमन के माता-पिता को भी वही लग रहा है। सुमन भी किसी की लाडो है। उसका भी मन करता है।"

कमला देवी खामोश हो गईं। विशाल के शब्दों ने उन्हें एक आईना दिखा दिया था, जिसमें उन्हें अपना ही अक्स नजर आ रहा था—एक ऐसी सास का अक्स जो अपनी बेटी के लिए तो सारी आजादी चाहती थी, लेकिन बहू के लिए सिर्फ बंदिशें।

रमाकांत जी ने चुप्पी तोड़ी। "कमला, बेटा सही कह रहा है। हम अपनी सुविधा के हिसाब से नियम नहीं बदल सकते। अगर हमें अपनी बेटी का इंतजार है, तो सुमन के माता-पिता भी तो राह देख रहे होंगे। जो नियम हम दूसरों की बेटी पर थोपते हैं, वही नियम कल को हमारी बेटी पर भी लागू हो सकता है। क्या तुम चाहोगी कि प्रिया कभी त्यौहार पर न आ पाए?"

कमला देवी की आँखों में नमी उतर आई। उनका गुस्सा पिघलकर शर्मिंदगी में बदल गया था। उन्होंने मुड़कर सुमन को देखा, जो अभी भी सिर झुकाए खड़ी थी, शायद इस डर से कि अब घर में क्लेश होगा।

कमला देवी अपनी कुर्सी से उठीं और सुमन के पास गईं। सुमन सहम गई।

कमला देवी ने धीरे से सुमन के सिर पर हाथ रखा।

"मुझे माफ़ कर दे बेटा," कमला देवी की आवाज भर्रा गई थी। "मैं अपनी ममता में इतनी स्वार्थी हो गई थी कि मुझे तेरी ममता दिखाई ही नहीं दी। मुझे लगा त्यौहार सिर्फ मेरे घर का है, मैं भूल गई कि खुशियां बांटने से बढ़ती हैं, कैद करने से नहीं।"

सुमन ने तुरंत उनके पैर छुए। "नहीं मम्मी जी, आप माफ़ी मत मांगिए। आप बस समझ गईं, मेरे लिए यही बहुत है।"

कमला देवी ने सुमन को गले लगाया और फिर अपनी साड़ी के पल्लू से आँखें पोंछते हुए बोलीं, "विशाल, अभी तूने सच में दामाद जी को फोन करके मना तो नहीं कर दिया न?"

विशाल मुस्कुराया। "नहीं माँ, मैं तो बस आपको यह अहसास दिलाना चाहता था कि जो नियम आप सुमन पर लगा रही थीं, वो अगर प्रिया पर लगे तो आपको कैसा महसूस होगा।"

कमला देवी ने राहत की सांस ली। फिर उन्होंने एक फैसला लिया।

"सुमन," उन्होंने स्नेह से कहा, "जा, अपना सामान पैक कर ले। तू दिवाली के लिए अपने मायके जा रही है।"

"सच मम्मी जी?" सुमन की आँखों में चमक आ गई।

"हां, लेकिन एक शर्त है," कमला देवी ने मुस्कुराते हुए कहा। "तू दिवाली के अगले दिन तक वापस आ जाना, क्योंकि प्रिया और दामाद जी तब तक यहीं होंगे। हम सब मिलकर गोवर्धन पूजा और भाई दूज मनाएंगे। आधा त्यौहार वहां, आधा यहां। ठीक है?"

"बिल्कुल ठीक है मम्मी जी!" सुमन खुशी से चहक उठी।

"और सुन," कमला देवी ने जोड़ा, "अपने भाई को भी साथ ले आना। उसे भी तो यहां का त्यौहार देखना चाहिए।"

घर का माहौल जो कल तक भारी था, अब पूरी तरह बदल चुका था। विशाल ने अपने पिता की ओर देखा और उन्होंने गर्व से बेटे को देखा।

उस दिन सुमन ने बहुत मन लगाकर प्रिया के आने की तैयारियां कीं। उसने बेसन के लड्डू बनाए, पूरे घर को सजाया और प्रिया के लिए एक सुंदर सा सूट भी गिफ्ट पैक किया। उसके काम करने की रफ़्तार में अब थकान नहीं, बल्कि दोगुना उत्साह था।

जब सुमन अपने मायके जाने के लिए निकली, तो कमला देवी ने उसके हाथों में मिठाई का डिब्बा और शगुन का लिफाफा रखा।

"यह तेरी माँ के लिए है," कमला देवी बोलीं। "और उनसे कहना कि अगली बार उन्हें भी हमारे पास आना होगा।"

गाड़ी में बैठते समय सुमन ने पीछे मुड़कर देखा। कमला देवी और विशाल गेट पर खड़े हाथ हिला रहे थे। सुमन के चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान थी।

उसने मन ही मन सोचा, "घर ईंट-पत्थरों से नहीं, बल्कि एक-दूसरे की भावनाओं को समझने से बनता है। आज मेरे ससुराल ने मुझे सिर्फ जाने की इजाजत नहीं दी, बल्कि मुझे सच में 'बेटी' होने का दर्जा दिया है।"

विशाल ने सही कहा था—न्याय का तराजू सबके लिए बराबर होना चाहिए। अगर हम अपनी बेटी के लिए खुला आसमान चाहते हैं, तो हमें अपने घर आई किसी और की बेटी के पंख नहीं कतरने चाहिए।

उस साल शर्मा सदन में दो बार दिवाली मनी—एक बार जब प्रिया आई, और दूसरी बार जब सुमन अपने मायके से ढेरों खुशियां और आशीर्वाद लेकर वापस लौटी।

लेखिका : हर्षिता सिंह


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