मीरा का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। उसने नज़रें झुका लीं और खीर चलाने लगी। पास खड़ी ननद, रिया, उसे गौर से देख रही थी। रिया की नज़रें मीरा के हाथों पर टिकी थीं। मीरा ने आटा गूंथते वक़्त भी अपनी चूड़ियाँ ऊपर नहीं चढ़ाई थीं, और न ही ब्लाउज की आस्तीन मोड़ी थी। अमूमन काम करते वक़्त महिलाएं साड़ी का पल्लू कमर में खोंस लेती हैं, पर मीरा ने खुद को किसी बंडल की तरह लपेटा हुआ था।
रिया ने देखा कि मीरा की कलाई के पास, जहाँ ब्लाउज का कपड़ा पसीने से गीला होकर त्वचा से चिपक गया था, वहाँ से एक मटमैला सा रंग कपड़े पर उभर आया था। जैसे कोई मेकअप पिघल रहा हो। रिया को खटका लगा। यह सिर्फ़ शर्म या लिहाज़ नहीं था। मीरा कुछ छिपा रही थी। कुछ ऐसा, जो उसे इस भीषण गर्मी में भी खुद को 'कैद' रखने पर मजबूर कर रहा था।
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जून की उमस भरी दोपहरी थी। रसोई में पंखा तो था, लेकिन मसालों की तड़के और चूल्हे की आंच ने वहां का तापमान बढ़ा दिया था। इसके बावजूद, मीरा ने पूरी बांह का ब्लाउज पहना हुआ था और साड़ी के पल्लू को कसकर अपने कंधों और गले के चारों ओर लपेटा हुआ था। उसके माथे पर पसीने की बूंदें चमक रही थीं, जो फाउंडेशन की एक मोटी परत को भेदकर बाहर आने के लिए संघर्ष कर रही थीं।
"अरे मीरा बेटा, तुम पसीने से तर-बतर हो रही हो," सासू माँ, सावित्री जी ने चिंतित होकर कहा। "यह पल्लू थोड़ा ढीला कर लो, और पंखे की स्पीड बढ़ा दूँ क्या? इतनी गर्मी में तुम बीमार पड़ जाओगी।"
मीरा ने हड़बड़ाकर पल्लू को और कस लिया। उसकी आँखों में एक अजीब सा भय तैर गया।
"नहीं माँ जी," मीरा की आवाज़ में एक अस्वाभाविक कम्पन था। "मुझे... मुझे दरअसल थोड़ी ठंड लग रही है। शायद कल रात ए.सी. ज़्यादा तेज़ था, तो शरीर में हरारत सी है।"
वहाँ मौजूद बुआ सास ने माथे पर बल डालते हुए कहा, "जेठ की दोपहरी में ठंड? यह कैसी हरारत है भाई? कहीं बहु को कोई इन्फेक्शन तो नहीं है?"
मीरा का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। उसने नज़रें झुका लीं और खीर चलाने लगी। पास खड़ी ननद, रिया, उसे गौर से देख रही थी। रिया की नज़रें मीरा के हाथों पर टिकी थीं। मीरा ने आटा गूंथते वक़्त भी अपनी चूड़ियाँ ऊपर नहीं चढ़ाई थीं, और न ही ब्लाउज की आस्तीन मोड़ी थी। अमूमन काम करते वक़्त महिलाएं साड़ी का पल्लू कमर में खोंस लेती हैं, पर मीरा ने खुद को किसी बंडल की तरह लपेटा हुआ था।
रिया ने देखा कि मीरा की कलाई के पास, जहाँ ब्लाउज का कपड़ा पसीने से गीला होकर त्वचा से चिपक गया था, वहाँ से एक मटमैला सा रंग कपड़े पर उभर आया था। जैसे कोई मेकअप पिघल रहा हो। रिया को खटका लगा। यह सिर्फ़ शर्म या लिहाज़ नहीं था। मीरा कुछ छिपा रही थी। कुछ ऐसा, जो उसे इस भीषण गर्मी में भी खुद को 'कैद' रखने पर मजबूर कर रहा था।
"लाओ भाभी, मैं चला देती हूँ खीर," रिया ने अचानक मीरा के हाथ से कलछी लेने की कोशिश की।
इस अचानक हुए संपर्क से मीरा बिजली के झटके की तरह पीछे हट गई। "नहीं! मैं... मैं कर लूँगी।" उसका स्वर इतना तीखा था कि रसोई में सन्नाटा छा गया।
सावित्री जी ने हैरान होकर देखा। मीरा को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने तुरंत नज़रें झुका लीं, "वो... मेरा मतलब था, यह शगुन की खीर है, मैं खुद बनाना चाहती थी।"
उसने दोबारा कढ़ाई की तरफ रुख किया, लेकिन रिया की शंका अब यकीन में बदल रही थी। उसने देखा था कि हड़बड़ाहट में मीरा का पल्लू जब थोड़ा सरका था, तो उसकी गर्दन के पिछले हिस्से पर—बालों की जड़ों के पास—त्वचा का रंग बाकी चेहरे से अलग था। एकदम दूधिया सफ़ेद।
दोपहर का खाना खत्म होने तक मीरा की हालत खराब हो चुकी थी। पसीने और घबराहट ने उसे निढाल कर दिया था, लेकिन उसने अपनी 'सुरक्षा कवच' रूपी साड़ी को एक इंच भी इधर-उधर नहीं होने दिया। मेहमानों के जाने के बाद वह सीधे अपने कमरे में भागी और दरवाज़ा अंदर से बंद कर लिया।
शाम को जब उसका पति, विहान, ऑफिस से लौटा, तो घर का माहौल कुछ भारी था। माँ ने बताया कि मीरा की तबीयत ठीक नहीं है, उसे शायद बुखार है क्योंकि वह दिन भर "ठंड लग रही है" कह रही थी।
विहान कमरे में गया। अंदर अंधेरा था। खिड़कियों पर भारी परदे गिरे हुए थे। मीरा बिस्तर के एक कोने में दुबकी बैठी थी। उसने अभी भी वही भारी साड़ी पहनी हुई थी। कमरे में घुटन थी क्योंकि उसने पंखा बंद कर रखा था।
"मीरा?" विहान ने बत्ती जलाई।
रोशनी होते ही मीरा ने अपना चेहरा घुटनों में छिपा लिया।
"तुम ठीक तो हो? माँ कह रही थीं तुम्हें ठंड लग रही है?" विहान उसके पास जाकर बैठा और उसकी नब्ज़ टटोलने के लिए हाथ बढ़ाया।
मीरा ने अपना हाथ झटक लिया। "मुझे मत छुओ विहान... प्लीज।"
विहान सन्न रह गया। "क्या हुआ? तुम इतनी डरी हुई क्यों हो? और इस गर्मी में तुमने यह शॉल क्यों ओढ़ रखी है? देखो, तुम्हारा चेहरा तमतमाया हुआ है।"
विहान ने जबरदस्ती ए.सी. का रिमोट उठाया और उसे ऑन कर दिया। "पागल हो जाओगी तुम इस गर्मी में। कपड़े बदलो और आराम करो।"
"बंद करो इसे!" मीरा चिल्लाई। वह उठी और ए.सी. बंद कर दिया। उसकी साँसें फूल रही थीं। पसीने की वजह से उसके चेहरे का मेकअप अब जगह-जगह से बहने लगा था। गालों पर धारियां बन गई थीं। और उन धारियों के नीचे से... उसकी असली त्वचा झांकने लगी थी।
विहान की नज़र उसके गाल पर पड़ी। वह ठिठक गया। उसने एक कदम आगे बढ़ाया। मीरा दीवार से जा चिपकी।
"वही देखने के लिए आगे बढ़ रहे हो न, जिसे छिपाने के लिए मेरे माँ-बाप ने शादी में लाखों रुपये पानी की तरह बहा दिए?" मीरा की आवाज़ में दर्द और कड़वाहट का सैलाब था।
"मीरा, तुम किस बारे में बात कर रही हो?" विहान उलझन में था।
मीरा ने कांपते हाथों से अपनी साड़ी का पल्लू खींचा और उसे फर्श पर गिरा दिया। फिर उसने पास रखे टिश्यू बॉक्स से मुट्ठी भर टिश्यू निकाले और अपने चेहरे को रगड़ना शुरू किया। वह बेतहाशा अपना चेहरा पोंछ रही थी। आँखों का काजल, गालों का फाउंडेशन, गर्दन पर लगा कंसीलर... सब कुछ पोंछ डाला।
जब उसने चेहरा ऊपर उठाया, तो विहान ने देखा।
मीरा के होंठों के आसपास, उसकी आँखों के किनारों पर, और उसकी गर्दन पर बड़े-बड़े सफ़ेद दाग थे। विटिलिगो (Safed Daag)। वह बीमारी जिससे समाज आज भी अछूतों जैसा बर्ताव करता है। उसके हाथों की कलाइयों पर भी वही सफ़ेद निशान थे, जिन्हें उसने पूरी बांह के ब्लाउज में छिपा रखा था।
"यह हूँ मैं," मीरा ने सिसकते हुए कहा। "ल्यूकोडर्मा। बचपन से है। मेरे माता-पिता ने शादी तय करते वक़्त तुम्हें नहीं बताया, है न? उन्होंने कहा था कि लड़का हाथ से निकल जाएगा। उन्होंने मुझे हफ़्तों तक डर्मा-ब्लेंड मेकअप करना सिखाया। उन्होंने कहा, 'बस शादी हो जाने दो, फिर धीरे-धीरे पता चलेगा तो वो छोड़ नहीं पाएगा'। लेकिन मैं... मैं घुट रही हूँ विहान। मैं हर पल इस डर में जी रही हूँ कि अगर मेरा पसीना मेकअप को बहा ले गया तो क्या होगा? अगर तुमने मेरा हाथ पकड़ लिया तो क्या होगा?"
विहान चुपचाप खड़ा उसे देखता रहा। कमरे में सिर्फ़ ए.सी. की हमिंग साउंड और मीरा की सिसकियों की आवाज़ थी।
"मैं धोखेबाज़ नहीं हूँ विहान," मीरा ज़मीन पर बैठ गई, उसका साहस जवाब दे गया था। "मैं बस... मैं बस एक सामान्य ज़िंदगी चाहती थी। मुझे लगा था कि अगर मैं यह मुखौटा लगाए रखूँ, तो शायद तुम मुझे प्यार कर पाओगे। लेकिन आज रसोई में... मुझे लगा मैं पकड़ी जाऊंगी। मुझे ठंड नहीं लग रही थी विहान, मैं डर से कांप रही थी।"
विहान धीरे से उसके पास गया और उसके सामने घुटनों के बल बैठ गया। मीरा ने अपनी हथेलियों से अपना चेहरा ढक लिया। उसे उम्मीद थी कि अब विहान चिल्लाएगा, उसे घर से निकालने की बात करेगा, या अपने माँ-बाप को बुलाएगा कि उन्हें ठगा गया है।
लेकिन विहान ने धीरे से उसके हाथों को उसकी आँखों से हटाया। उसने अपनी जेब से रुमाल निकाला और मीरा के गाल पर बचे हुए काजल के धब्बे को पोंछा।
"तुम्हें पता है मीरा," विहान ने बहुत ही शांत स्वर में कहा। "आज सुबह जब तुम जागी थीं, तो मैंने देखा था कि तुम्हारी गर्दन के पीछे एक छोटा सा सफ़ेद पैच था, जहाँ से रात को मेकअप हट गया था।"
मीरा की आँखें फैल गईं। "तुम्हें... तुम्हें पता था?"
"मुझे लगा शायद कोई इन्फेक्शन है या कुछ और," विहान ने कहा। "लेकिन मैं चुप रहा क्योंकि मुझे लगा तुम जब सहज महसूस करोगी, तब बताओगी। लेकिन मैंने यह नहीं सोचा था कि तुम इसके लिए खुद को इतनी सज़ा दे रही हो।"
विहान ने मीरा का हाथ अपने हाथ में लिया और उसकी उस उंगली को चूमा जिस पर सफ़ेद निशान था।
"यह सिर्फ़ त्वचा है मीरा। इसमें मेलानिन कम है, बस। इससे तुम 'तुम' होना बंद नहीं हो जातीं। क्या इस दाग ने तुम्हारे द्वारा बनाई गई खीर का स्वाद बदल दिया? क्या इसने तुम्हारी उस हंसी को कम कर दिया जो मैंने तस्वीरों में देखी थी?"
"लेकिन... यह धोखा था," मीरा ने रूंआसे स्वर में कहा। "मेरे पापा ने झूठ बोला।"
"हाँ, वो गलत था," विहान की आवाज़ में थोड़ी सख्ती आई। "रिश्तों की नींव झूठ पर नहीं रखनी चाहिए थी। उन्हें मेरी समझ पर भरोसा करना चाहिए था। लेकिन अब जो है, सो है। मैं तुमसे शादी कर चुका हूँ मीरा, तुम्हारी त्वचा के रंग से नहीं।"
विहान खड़ा हुआ और उसने मीरा को भी उठाया। वह उसे ड्रेसिंग टेबल के आईने के सामने ले गया।
"देखो खुद को," विहान ने शीशे में उसकी आँखों में देखते हुए कहा। "यह जो तुम देख रही हो, यह कोई बीमारी नहीं है। यह नक्शा है... उन संघर्षों का जो तुमने झेले हैं। तुम्हें अब और मेकअप की परतें चढ़ाने की ज़रूरत नहीं है। कम से कम मेरे लिए तो नहीं। मुझे यह पसंद नहीं कि मेरी पत्नी मेरे ही घर में, मेरे ही कमरे में, गर्मी में ठिठुरने का नाटक करे सिर्फ़ इसलिए कि मैं उसे बदसूरत न समझूँ।"
मीरा शीशे में अपनी छवि देख रही थी। पहली बार बिना किसी पर्त के। पहली बार उसे अपना चेहरा डरावना नहीं, बल्कि एक हकीकत लगा। विहान का हाथ उसके कंधे पर था, और उसकी नज़रों में कोई घृणा नहीं थी।
"कल सुबह," विहान ने कहा, "तुम बिना उस भारी ब्लाउज और बिना उस मोटी परत के नीचे जाओगी। माँ जी और बाऊजी से मैं बात कर लूँगा। हो सकता है उन्हें समझने में थोड़ा वक़्त लगे, हो सकता है वो नाराज़ हों कि उनसे झूठ बोला गया... और उनका नाराज़ होना जायज़ भी है। हम उनकी नाराज़गी सह लेंगे, माफ़ी मांग लेंगे। लेकिन अब तुम छिपोगी नहीं। यह घर अब तुम्हारा है, और अपने घर में कोई नकाब पहनकर नहीं रहता।"
मीरा ने पलटकर विहान को गले लगा लिया। वह अभी भी रो रही थी, लेकिन यह आंसू डर के नहीं, मुक्ति के थे। वह आज़ाद हो गई थी—उस डर से जिसने उसे बचपन से जकड़ रखा था।
अगली सुबह, जब मीरा नाश्ते की मेज़ पर आई, तो उसने एक साधारण सूती साड़ी पहनी थी। चेहरे पर कोई मेकअप नहीं था। उसके होंठों और माथे के सफ़ेद दाग सुबह की रोशनी में साफ़ चमक रहे थे।
सावित्री जी की चाय की प्याली हवा में रुक गई। रिया ने अपनी माँ का हाथ दबाया, जैसे उन्हें शांत रहने का इशारा कर रही हो। विहान मीरा के बगल में बैठा और उसने अपनी माँ की तरफ देखा।
"माँ," विहान ने दृढ़ता से कहा, "मीरा को विटिलिगो है। शादी के वक़्त हमें नहीं बताया गया था, जो कि गलत था। लेकिन अब मीरा इस घर की बहु है। और मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। मुझे उम्मीद है कि आप भी मेरी पसंद का मान रखेंगी।"
एक पल के लिए सन्नाटा छाया रहा, जो किसी तूफ़ान से भी भारी था। मीरा की साँसें अटकी हुई थीं।
सावित्री जी ने धीरे से प्याली मेज़ पर रखी। उन्होंने मीरा के चेहरे को गौर से देखा, फिर विहान को। उनके चेहरे पर एक कठोरता थी जो धीरे-धीरे पिघलने लगी।
"चाय ठंडी हो रही है बहु," सावित्री जी ने अपनी ही रौ में कहा, "और सुन, कल से यह सूती साड़ी ही पहनना। उस रेशमी साड़ी में कल तुझे देखकर मुझे ही घबराहट हो रही थी। रंग-रूप तो ढल जाता है, इंसान का स्वभाव रहना चाहिए। झूठ बोला तेरे पिता ने, उसका हिसाब मैं उनसे बाद में लूँगी, लेकिन तुझे सजा नहीं दूँगी।"
मीरा की आँखों से एक आँसू टपक कर उसकी कलाई के सफ़ेद दाग पर गिरा। उसने मुस्कुराते हुए सिर हिलाया।
"जी माँ जी।"
उस दिन घर की खिड़कियाँ खुली थीं। हवा अंदर आ रही थी। मीरा को अब न ठंड लग रही थी, न गर्मी। उसे बस सुकून महसूस हो रहा था। उसने सीख लिया था कि सबसे सुंदर आवरण 'विश्वास' का होता है, और जब वह ओढ़ लिया जाए, तो किसी और शॉल या मेकअप की ज़रूरत नहीं पड़ती।
लेखिका : सीमा श्रीवास्तव
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