Skip to main content

मैं सिर्फ़ बहू हूँ

 बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी, और अंदर अनन्या के मन में भी सवालों की झड़ी लगी हुई थी। ऑफिस से लौटते ही जब उसने अपनी भीगी हुई छतरी एक कोने में रखी, तो उसे उम्मीद थी कि शायद आज उसे थोड़ी राहत मिलेगी। लेकिन ड्राइंग रूम का नजारा देखकर उसकी सारी थकान, झुंझलाहट में बदल गई।

उसकी ननद, राधिका, जो दो दिन पहले ही मायके आई थी, सोफे पर पसर कर मैगजीन पढ़ रही थी। सास, सुजाता जी, और देवर, विशाल, पास ही कुर्सियों पर बैठकर किसी गहरे मंथन में डूबे थे। अनन्या के अंदर आते ही उन तीनों की बातें अचानक थम गईं। एक अजीब-सी खामोशी छा गई, जैसे किसी ने चलती हुई फिल्म को म्यूट कर दिया हो।

"अरे बहू, आ गई तुम?" सुजाता जी ने ऐसे पूछा जैसे अनन्या का आना कोई सरप्राइज हो, जबकि घड़ी शाम के सात बजा रही थी—उसके लौटने का रोज़ का वक्त।

अनन्या ने फीकी मुस्कान के साथ सिर हिलाया। "जी माँजी।"

अभी उसने अपना बैग सोफे की आर्मरेस्ट पर रखा ही था कि विशाल चहकते हुए बोला, "भाभी! क्या टाइमिंग है आपकी। बाहर एकदम रोमांटिक मौसम हो रहा है, और हम अभी बात ही कर रहे थे कि आज तो भाभी के हाथ के प्याज़ और पालक के पकौड़े मिल जाएं तो मज़ा आ जाए। साथ में वो आपकी स्पेशल अदरक वाली चाय!"

राधिका ने भी सुर में सुर मिलाया, "हाँ भाभी, प्लीज़। ससुराल में तो मुझे ही सब करना पड़ता है, यहाँ आई हूँ तो सोचा आज आपके हाथ का स्वाद चख लूँ। भैया अभी ऑफिस से आए नहीं हैं, उनके आने तक गरमा-गरम नाश्ता हो जाएगा।"

अनन्या के पैरों में दिन भर की दौड़-भाग का दर्द था और सिर में हल्की टीस, लेकिन 'ना' कहने का विकल्प भारतीय बहुओं के मेन्यू कार्ड में अक्सर नहीं होता। उसने एक गहरी सांस ली, अपनी साड़ी का पल्लू कमर में खोंसा और मुस्कुराते हुए कहा, "ठीक है, मैं अभी फ्रेश होकर बनाती हूँ।"

वह बेडरूम में गई, जल्दी से कपड़े बदले और रसोई का रुख किया। बेसन फेंटते हुए और प्याज़ काटते हुए उसकी आँखों में पानी आ गया—शायद प्याज़ की वजह से, या शायद उस उपेक्षा की वजह से जो उसे महसूस हो रही थी।

रसोई से ड्राइंग रूम साफ दिखाई नहीं देता था, लेकिन सुजाता जी के कमरे का दरवाजा हल्का सा खुला था। थोड़ी देर बाद, अनन्या ने देखा कि राधिका, विशाल और सुजाता जी ड्राइंग रूम छोड़कर अब उस कमरे में चले गए हैं। दरवाजा पूरी तरह बंद नहीं था, बस भिड़ाया हुआ था।

कड़ाही में तेल गर्म हो रहा था, लेकिन अनन्या का ध्यान उस कमरे की तरफ था। वहां से धीमी-धीमी आवाज़ें आ रही थीं। 'खुसुर-पुसुर' का वही दौर फिर शुरू हो गया था। अनन्या को हमेशा लगता था कि जब भी वह आस-पास नहीं होती, ये लोग उसके बारे में ही बातें करते हैं। शिकायतें, बुराइयां, या फिर कोई ऐसी योजना जिसमें उसे शामिल करना ज़रूरी नहीं समझा जाता।

"धीरे बोलो... भाभी सुन लेंगी तो आफत हो जाएगी," विशाल की दबी हुई आवाज़ अनन्या के कानों में पड़ी।

अनन्या के हाथ ठिठक गए। उसका शक सही था। कुछ तो ऐसा है जो उससे छिपाया जा रहा है। क्या वे उसकी किसी गलती पर चर्चा कर रहे हैं? या फिर राधिका के लिए कोई महंगा तोहफा खरीदने की योजना बन रही है जिसका खर्चा अंत में अनन्या और उसके पति, मयंक, की जेब पर आएगा?

"माँ, आप चिंता मत करो, भैया को मैं संभाल लूँगी, लेकिन भाभी को पता नहीं चलना चाहिए," राधिका कह रही थी।

अनन्या का दिल भारी हो गया। यह 'परायापन' उसे काटता था। वह इस घर के लिए दिन-रात खटती थी, अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा घर के खर्च में देती थी, फिर भी 'अपने' और 'पराए' की लकीर इतनी गहरी थी कि उसे मिटाया नहीं जा सकता था।

तेल से धुआं उठने लगा। अनन्या ने जल्दी से पकौड़े तलने शुरू किए। उसका मन हुआ कि अभी जाकर दरवाजा खोल दे और पूछे कि आखिर क्या खिचड़ी पक रही है? लेकिन संस्कार और मर्यादा ने उसके पैर जकड़ लिए। उसने चाय का पानी चढ़ाया। अदरक कूटते हुए उसने अपना गुस्सा उस इमामदस्ते पर निकाला।

तभी विशाल की आवाज़ फिर आई, थोड़ी ऊँची, शायद वह उत्तेजित हो गया था। "अरे माँ, कब तक टालेंगे? वो लोग कल ही आने वाले हैं। अगर इंतज़ाम नहीं हुआ तो बेइज्जती हो जाएगी।"

सुजाता जी की आवाज़ आई, "मैं देखती हूँ, मेरे पास जो पुराने कंगन हैं, उन्हें..."

आगे की बात अनन्या सुन नहीं पाई क्योंकि चाय उबलकर बाहर गिरने लगी थी। उसने गैस बंद की। ट्रे में पकौड़े और चाय सजाई। उसका चेहरा तमतमाया हुआ था। उसे अब यकीन हो गया था कि घर में पैसों की कोई समस्या है या कोई लेन-देन है जिसे उससे छुपाया जा रहा है। शायद विशाल ने कोई नया कांड कर दिया है जिसे माँ अपने गहने बेचकर सुलझाना चाहती हैं।

ट्रे लेकर जब वह कमरे की तरफ बढ़ी, तो अंदर सन्नाटा छा गया। राधिका ने जल्दी से अपनी गोद में रखी कोई फाइल तकिये के नीचे सरका दी। सुजाता जी ने अपनी आँखों के कोने पोंछे और चेहरे पर जबरदस्ती की मुस्कान लाते हुए बोलीं, "अरे बहू, इतनी जल्दी बना भी लाई? बड़ी महक आ रही है।"

अनन्या ने ट्रे मेज पर पटखने के अंदाज में रखी। पकौड़ों की खुशबू कमरे में फैल गई, लेकिन तनाव की गंध उससे कहीं ज्यादा तेज थी।

"लीजिए," अनन्या ने रूखे स्वर में कहा। "और अगर मेरी वजह से आप लोगों की 'सीक्रेट मीटिंग' में खलल पड़ रहा हो, तो मैं वापस रसोई में चली जाती हूँ। मयंक के आने पर ही आऊंगी।"

तीनों एक-दूसरे का मुंह ताकने लगे।

विशाल ने हिम्मत करके चाय का कप उठाया। "अरे नहीं भाभी, ऐसी कोई बात नहीं है। हम तो बस..."

"बस क्या विशाल?" अनन्या अब चुप नहीं रह सकी। उसकी सहनशक्ति जवाब दे चुकी थी। "मैं पिछले एक घंटे से देख रही हूँ। जब मैं आई तो तुम लोग चुप हो गए। फिर यहाँ बंद कमरे में खुसुर-पुसुर। 'भाभी को पता नहीं चलना चाहिए', 'बेइज्जती हो जाएगी', 'कंगन बेचने पड़ेंगे'... मुझे सब सुनाई दिया है। क्या मैं इस घर की कुछ नहीं लगती? मयंक और मैं दिन-रात मेहनत करते हैं, और तुम लोग हमसे ही बातें छुपाते हो? अगर कोई मुसीबत है तो बताओ, वरना कल को बात बिगड़ेगी तो इल्ज़ाम फिर मुझ पर ही आएगा कि बहू ने ध्यान नहीं दिया।"

सुजाता जी की आँखें भर आईं। राधिका ने लज्जित होकर सिर झुका लिया।

अनन्या का गुस्सा और बढ़ गया। "क्या हुआ? अब खामोश क्यों हो? विशाल, तुमने फिर सट्टे में पैसे गवाएं हैं क्या? या किसी से उधार लिया है?"

"नहीं भाभी!" विशाल तड़पकर बोला। उसने तकिये के नीचे से वह फाइल निकाली और अनन्या के सामने रख दी। "मैंने कोई गलत काम नहीं किया। यह देखो।"

अनन्या ने झिझकते हुए फाइल उठाई। वह एक अस्पताल की रिपोर्ट और कुछ लोन के कागज़ात थे। रिपोर्ट सुजाता जी की थी। उन्हें घुटनों की तत्काल सर्जरी की ज़रूरत थी, जिसका खर्चा पांच लाख रुपये बताया गया था। और लोन के कागज़ रिजेक्ट हो चुके थे।

अनन्या स्तब्ध रह गई। उसने सुजाता जी की तरफ देखा।

सुजाता जी ने रुंधे गले से कहा, "बहू, डॉक्टर ने कहा है कि ऑपरेशन जल्दी नहीं हुआ तो मैं चल-फिर नहीं पाऊंगी। विशाल और राधिका इसी का जुगाड़ करने की कोशिश कर रहे थे। विशाल का बिज़नेस अभी मंदा चल रहा है, और राधिका के ससुराल में भी तंगी है। हम सोच रहे थे कि मेरे पुराने कंगन बेचकर काम चला लेंगे।"

"लेकिन मुझसे क्यों छुपाया?" अनन्या की आवाज़ मद्धम पड़ गई।

राधिका ने धीरे से कहा, "भाभी, भैया और आपने पिछले महीने ही अपनी नई कार ली है। आपकी ईएमआई शुरू हुई है। माँ नहीं चाहती थीं कि आप पर और बोझ पड़े। वो कह रही थीं कि 'अनन्या दिन भर ऑफिस में खटती है, घर आकर भी काम करती है, अब उससे पैसे मांगकर मैं उसे और नहीं दबाना चाहती।' हम बस यही सोच रहे थे कि बिना आपको और भैया को परेशान किए कैसे इंतज़ाम करें।"

अनन्या के हाथ से फाइल छूटकर सोफे पर गिर गई। जिसे वह अपनी 'उपेक्षा' समझ रही थी, वह दरअसल सास का 'संकोच' और 'प्यार' था। वे लोग उसे पराया नहीं समझ रहे थे, बल्कि उसे मुसीबतों से बचाना चाह रहे थे। वे अपने तरीके से उसका ख्याल रख रहे थे, भले ही वह तरीका नादानी भरा हो।

अनन्या की आँखों से आंसू बह निकले। उसने आगे बढ़कर सुजाता जी का हाथ पकड़ लिया।

"माँजी, आपने मुझे इतना पराया समझ लिया? क्या कार, आपके पैरों से ज्यादा कीमती है? और कंगन? वो कंगन बाबूजी की निशानी हैं, उन्हें बेचने की बात भी आपने कैसे सोची?"

सुजाता जी रो पड़ीं, "तो क्या करती बेटा? तुम दोनों पर पहले ही बहुत खर्चा है।"

अनन्या ने आंसू पोंछे और अपनी साड़ी के पल्लू से चाबियों का गुच्छा निकाला। उसने अपनी अलमारी की चाबी राधिका की हथेली पर रखी।

"राधिका, मेरी अलमारी के लॉकर में एक एफ.डी. (Fixed Deposit) के कागज़ रखे हैं। वो मेरे पिता ने शादी के वक्त मेरे नाम किए थे। वो ठीक पांच लाख की है। उसे तुड़वाने का प्रोसेस कल ही शुरू करते हैं।"

विशाल एकदम खड़ा हो गया, "नहीं भाभी, वो आपके पापा का पैसा है, आपकी सुरक्षा के लिए। हम उसे नहीं छू सकते।"

अनन्या ने विशाल को डपटते हुए कहा, "चुप कर। जब तू मुझे 'भाभी' कहता है, तो मैं माँ को 'माँ' कहती हूँ। अगर आज मेरे पापा बीमार होते, तो क्या मैं वो पैसे नहीं लगाती? और रही बात सुरक्षा की, तो जब तक यह परिवार साथ है, मुझे किसी और सुरक्षा की ज़रूरत नहीं है।"

कमरे में एक भारी चुप्पी छा गई, लेकिन यह चुप्पी उस खामोशी से अलग थी जो अनन्या के आते वक्त थी। इस चुप्पी में सम्मान था, कृतज्ञता थी और अटूट प्रेम था।

सुजाता जी ने अनन्या को गले लगा लिया। "मैं तो डरती थी कि आजकल की बहुएं नौकरी करती हैं, उन्हें घर की जिम्मेदारियों से क्या मतलब। लेकिन तूने तो आज मुझे शर्मिंदा कर दिया, अनन्या।"

"शर्मिंदा नहीं माँ, बस इतना समझ लीजिये कि मैं सिर्फ पकोड़े बनाने वाली मशीन नहीं हूँ," अनन्या ने मुस्कुराते हुए कहा, "मैं इस घर की ढाल भी बन सकती हूँ।"

तभी बाहर मुख्य दरवाज़ा खुलने की आवाज़ आई। मयंक घर आ गया था। वह अपनी छतरी बंद करते हुए अंदर आया और सबको सुजाता जी के कमरे में, गीली आँखों और मेज पर रखे ठंडे पकोड़ों के साथ देखकर घबरा गया।

"क्या हुआ? सब ऐसे क्यों बैठे हैं? और अनन्या, तुम रो रही हो?" मयंक ने चिंतित होकर पूछा।

अनन्या ने पल्लू से चेहरा पोंछा और एक बड़ी सी मुस्कान के साथ बोली, "कुछ नहीं मयंक, बस माँजी और बच्चे मेरे हाथ के पकोड़े खाकर भावुक हो गए थे। आप हाथ-मुंह धो लीजिये, मैं आपके लिए ताजी चाय और गरम पकोड़े लाती हूँ। और हाँ... कल हमें छुट्टी लेनी पड़ेगी, माँजी के घुटनों के ऑपरेशन की डेट जो लेनी है।"

मयंक हैरान होकर कभी माँ को, कभी अनन्या को देखने लगा। उसे कुछ समझ नहीं आया, लेकिन उसने देखा कि सुजाता जी, अनन्या को ऐसे देख रही थीं जैसे किसी ने उन्हें दुनिया का सबसे अनमोल खज़ाना दे दिया हो।

विशाल ने मयंक के कंधे पर हाथ रखा और कहा, "भैया, आप फ्रेश हो जाओ। आज चाय भाभी नहीं, मैं बनाऊंगा। भाभी आज थक गई हैं, वो आराम से बैठकर खाएंगी।"

उस बरसात की शाम, पकौड़े ठंडे हो चुके थे, लेकिन रिश्तों में जो गर्माहट आई थी, उसने पूरे घर को सुकून से भर दिया था। वह 'खुसुर-पुसुर' जो शक की दीवार खड़ी कर रही थी, अब एक खुले संवाद में बदल चुकी थी। अनन्या को समझ आ गया था कि कभी-कभी बंद दरवाजों के पीछे साजिशें नहीं, बल्कि अपनों की मजबूरियां और परवाह छिपी होती हैं, बस ज़रूरत होती है उस दरवाजे को विश्वास के साथ खोलने की।

लेखिका : आरती शुक्ला


Comments

Popular posts from this blog

दामाज बेटा बन जाता है पर बहू पराये घर की रहती है

  "अरे भाईसाहब (ननदोई) इतनी सुबह सुबह ?" "मम्मी पापा ने बुलाया था.कुछ जरूरी काम है." प्रमोद ने रश्मि को रूखा सा उत्तर दिया. "आ गये बेटे. बहू खड़े खड़े क्या बातें कर रही हो जाओ चाय बना लाओ." "जी मम्मी जी" रश्मि चाय बनाते हुए सोच रही थी ऐसी क्या बात हो सकती है जो भाईसाहब को सुबह बुलाया.कल रात उसे सास ससुर के कमरे से खुसुरफुसुर की आवाजें आ रही थी.मन में उठी किसी अनहोनी की आशंका को झटक कर वह चाय ले कर ड्रॉइंग रूम में गई. "बहू नाश्ता जल्दी बना देना.हमें काम से जाना है." "मम्मी जी कहाँ जाना है ?" "आकर बताते है तुम नाश्ते की तैयारी करो." रश्मि ने सास ससुर और प्रमोद को नाश्ता दिया.कुछ देर में तीनो तैयार हो कर चले गये और रश्मि घर के काम निपटाने लगी. ये थी रश्मि. शर्मा परिवार की इकलौती बहू.रश्मि की शादी रूपेश से हुए एक साल हो गया था.रूपेश की एक बड़ी शादीशुदा बहन कंचन और एक छोटी बहन काजल  जो कॉलेज में पढ़ती है.रूपेश दूसरे शहर में नौकरी करता था.उसकी इच्छा थी कि रश्मि  मम्मी पापा की देखभाल के लिए उनके साथ रहे.रश्मि ने भी रूपेश की इच्...

घर के लक्ष्मी का सम्मान

  "रवि... सुनिए ना... मुझे आपसे कुछ ज़रूरी बात करनी थी। वो मेरे पैरों में बहुत सूजन आ रही है और कमर में भी..." सुमन ने रात के सन्नाटे में, करवट बदलते हुए अपने पति रवि से कहने की कोशिश की। उसकी आवाज़ में एक दबी हुई कराह थी। रवि ने झल्लाहट में अपनी आँखों से बांह हटाई और मोबाइल की स्क्रीन पर समय देखा। रात के साढ़े ग्यारह बज रहे थे। "सुमन, प्लीज यार! अभी ऑफिस की टेंशन कम नहीं है जो तुम घर की रामायण शुरू कर देती हो? सुबह से शाम तक घर पर रहती हो, आराम ही तो करती हो। माँ बता रही थीं कि आजकल तुम दोपहर में दो-तीन घंटे सोती हो। फिर भी थकान? और ये पैरों में सूजन वूजन सब वहम है, थोड़ा वॉक किया करो। अब सोने दो, कल मेरी बहुत बड़ी प्रेजेंटेशन है।" रवि ने कंबल मुंह तक खींच लिया और दूसरी तरफ करवट ले ली। सुमन की आँखों में आए आंसू अँधेरे में ही जज़्ब हो गए। वह क्या बताती कि जिसे उसकी सास 'दोपहर की नींद' कहती हैं, वह असल में छत पर पापड़ और अचार सुखाने की चिलचिलाती धूप वाली मेहनत होती है। रवि को सच सुनना ही नहीं था, क्योंकि उसके लिए माँ का कहा पत्थर की लकीर था। सुमन ने चुपचाप एक दर्द न...

हकीकत

  सुमन के हाथों से शादी की मेहंदी भी नहीं उतरी थी कि उसके साथ सुधा जी ने उसे पूरी तरह से काम में झोंक दिया। सुबह से शाम हो जाती, लेकिन सुधा जी के काम तो मानो पूरे ही नहीं होते थे। जैसे ही सुमन आराम करने के लिए अपने कमरे में जाती, वैसे ही सुधा जी कहतीं, "बहू, जरा मेरे सिर में तेल की मालिश कर दो" या "कपड़े प्रेस कर दो"। कोई न कोई बहाना बनाकर पहले से ही तैयार रखतीं। सुमन कुछ भी नहीं बोल पाती और झट से काम पर लग जाती—आखिर नई-नई बहू जो ठहरी! सुमन के पति रोहित दूसरे शहर में नौकरी करते थे। शादी के लिए भी कम ही छुट्टियाँ मिली थीं, इसलिए शादी के आठ दिन बाद ही अपने काम पर लौट गए। तभी एक दिन… "अरे बहू, कब तक सोती रहेगी? कितना समय हो गया है, आज तुम्हारे ससुर जी ऑफिस के लिए भी निकल गए और तूने चाय तक नहीं बनाई। आगे से ध्यान रखना, समझ गई? ठीक चार बजे उठ जाना, क्योंकि तेरे ससुर जी सुबह छह बजे ही निकल जाते हैं। बहुएं तो काम के लिए ही तो लाई जाती हैं, एक लौटी बहू हो, नहीं बताएंगे तो कैसे सीखोगी? बड़े-बूढ़ों की कदर करना सीखो," सुधा जी नसीहत देतीं। "मुझसे गलती हो गई मांजी...