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अहंकार

 सावित्री देवी के घर की दीवारों पर टंगी अनगिनत शील्ड और मेडल इस बात की गवाही देते थे कि उनका परिवार 'साधारण' नहीं, बल्कि 'सर्वोत्तम' था। उनका बेटा मयंक शहर का सबसे बड़ा न्यूरोसर्जन था और बहू रितिका एक सफल आर्किटेक्ट। सावित्री जी को हमेशा अपनी परवरिश और अपने 'जीन्स' (Genes) पर घमंड रहा था। उनके लिए जीवन एक रेस थी और उनका परिवार हमेशा फर्स्ट आता था।

जब रितिका गर्भवती हुई, तो सावित्री जी की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। यह सिर्फ एक बच्चे का आना नहीं था, यह उनके लिए 'सिंघानिया खानदान' के अगले 'जीनियस' का आगमन था।

सावित्री जी ने रितिका की दिनचर्या पूरी तरह बदल दी। वे सुबह उसे बादाम और अखरोट भिगोकर देतीं, ताकि बच्चे का दिमाग तेज हो। रात को केसर वाला दूध पिलातीं, ताकि बच्चा गोरा और सुंदर हो। वे अक्सर रितिका के पेट पर हाथ रखकर कहतीं, "देखना रितिका, यह बच्चा मयंक से भी दो कदम आगे निकलेगा। मैं अभी से इसके लिए सबसे अच्छे इंटरनेशनल स्कूल की लिस्ट बना रही हूँ।"

रितिका मुस्कुरा देती, पर कभी-कभी उसे डर लगता। "माँ जी, बच्चा स्वस्थ हो, बस इतना काफी है। जीनियस होना जरूरी तो नहीं?"

सावित्री जी तुरंत टोक देतीं, "अरे, कैसी बात करती हो? हमारा पोता है, साधारण कैसे हो सकता है? उसे तो डॉक्टर या साइंटिस्ट ही बनना है।"

नौ महीने का समय सावित्री जी ने इसी उम्मीद और तैयारी में बिताया। उन्होंने बच्चे के कमरे को किताबों और एजुकेशनल खिलौनों से भर दिया। वे रोज भगवान से प्रार्थना करतीं कि उनके घर में 'पूर्णता' (Perfection) का एक और उदाहरण जन्म ले।

आखिरकार वह दिन आ गया। अस्पताल के कॉरिडोर में सावित्री जी बेचैनी से टहल रही थीं। तभी डॉक्टर बाहर आए। उनके चेहरे पर वह मुस्कान नहीं थी जिसकी सावित्री जी को उम्मीद थी।

डॉक्टर ने मयंक के कंधे पर हाथ रखा और धीमे स्वर में कहा, "बधाई हो, बेटा हुआ है। लेकिन..."

"लेकिन क्या?" सावित्री जी का दिल जोर से धड़का। "क्या वह गोरा नहीं है? या वजन कम है?"

डॉक्टर ने एक गहरी सांस ली। "सावित्री जी, बच्चा शारीरिक रूप से स्थिर है, लेकिन उसे 'डाउन सिंड्रोम' है। इसका मतलब है कि उसका मानसिक और शारीरिक विकास बाकी बच्चों की तुलना में धीमा होगा। वह एक 'स्पेशल चाइल्ड' है।"

सावित्री जी को लगा जैसे किसी ने उन्हें ऊँची इमारत से धक्का दे दिया हो। 'स्पेशल चाइल्ड'? मंदबुद्धि? उनके घर में? जहाँ हर कोई टॉपर था, वहां एक ऐसा बच्चा जो शायद ठीक से बोल भी न पाए?

जब नर्स बच्चे को लेकर आई, तो सावित्री जी ने उसे गोद में लेने से मना कर दिया। बच्चे की आँखें थोड़ी तिरछी थीं और चेहरा आम बच्चों से अलग था। वह उनकी उम्मीदों का 'राजकुमार' नहीं था। वह उनकी 'परफेक्शन' की दुनिया का एक 'डिफेक्टेड पीस' था।

मयंक और रितिका ने अपने बेटे को सीने से लगा लिया और उसका नाम 'कबीर' रखा। लेकिन सावित्री जी के लिए वह घर का हिस्सा नहीं बन पाया।

कबीर के घर आने के बाद घर का माहौल बदल गया। सावित्री जी ने खुद को अपने कमरे तक सीमित कर लिया। जब कोई पड़ोसी या रिश्तेदार बच्चे को देखने आता, तो वे बहाना बनाकर उन्हें टाल देतीं। उन्हें शर्म आती थी। उन्हें लगता था कि समाज क्या कहेगा? कि सावित्री देवी का पोता 'असामान्य' है?

रितिका और मयंक कबीर की देखभाल में जी-जान से लगे रहते। कबीर ने देर से गर्दन संभालना सीखा, देर से बैठना सीखा। जब वह तीन साल का हुआ, तब जाकर वह लड़खड़ाते हुए चल पाया। सावित्री जी यह सब दूर से देखतीं, पर कभी पास नहीं जातीं। अगर कबीर उनकी तरफ हाथ बढ़ाता, तो वे यह कहकर हट जातीं कि "मेरे घुटनों में दर्द है।"

कबीर अपनी दादी को बहुत गौर से देखता था। उसकी जुबान साफ नहीं थी, वह सिर्फ "आ..ई.." जैसी आवाजें निकालता था, जिसे रितिका समझ लेती थी, पर सावित्री जी उसे शोर मानती थीं।

एक दिन शाम को सावित्री जी की किटी पार्टी की सहेलियाँ अचानक घर आ गईं। सावित्री जी घबरा गईं। कबीर ड्राइंग रूम में ही खेल रहा था। उन्होंने जल्दी से रितिका को इशारे से कबीर को अंदर ले जाने को कहा। लेकिन इससे पहले कि रितिका कुछ करती, मिसेज वर्मा की नजर कबीर पर पड़ गई।

"अरे सावित्री, यह तुम्हारा पोता है? तुमने तो कभी मिलवाया नहीं," मिसेज वर्मा ने हैरानी से कहा।

सावित्री जी के माथे पर पसीना आ गया। उन्होंने हड़बड़ाहट में कहा, "हाँ... वो... इसकी तबीयत ठीक नहीं रहती, इसलिए बाहर नहीं निकालते।"

कबीर अपनी ही दुनिया में मग्न था। उसने एक ब्लॉक जोड़ा और खुशी से तालियां बजाने लगा। उसका थूक बह रहा था और गर्दन थोड़ी झुकी हुई थी। सहेलियों ने एक-दूसरे को देखा। उनकी आँखों में दया और व्यंग्य का मिला-जुला भाव था।

मिसेज शर्मा ने धीरे से कहा, "ओह! तो यह बात है। बेचारी सावित्री... सोचा क्या था और मिला क्या। बड़ी उम्मीदें थीं तुम्हें अपने पोते से।"

वे शब्द सावित्री जी के अहंकार पर सीधे वार कर रहे थे। उस दिन के बाद, सावित्री जी का व्यवहार कबीर के प्रति और रूखा हो गया। उन्हें लगने लगा कि इस बच्चे की वजह से उनका सामाजिक रुतबा कम हो रहा है।

समय बीतता गया। कबीर अब सात साल का हो चुका था। वह बोल नहीं पाता था, लेकिन महसूस सब करता था। उसे समझ आता था कि दादी उसे पसंद नहीं करतीं। फिर भी, वह रोज सुबह एक फूल तोड़कर लाता और दादी के कमरे के बाहर रख देता। सावित्री जी उसे देखतीं, पर अनदेखा कर देतीं।

एक दिन घर में कोई नहीं था। मयंक अस्पताल में था और रितिका किसी साइट विजिट पर गई थी। सावित्री जी घर पर अकेली थीं। दोपहर का समय था। सावित्री जी सीढ़ियों से उतर रही थीं कि अचानक उनका पैर फिसला। वे लुढ़कते हुए नीचे आ गिरीं।

"आह!" उनके मुंह से चीख निकल गई। उनके पैर की हड्डी टूट गई थी और सिर से खून बह रहा था। दर्द इतना तेज था कि वे उठ नहीं पा रही थीं। उनका मोबाइल ऊपर कमरे में रह गया था। घर में सन्नाटा था।

सावित्री जी ने मदद के लिए पुकारना चाहा, लेकिन दर्द के मारे आवाज़ गले में ही अटक गई। उनकी आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा। उन्हें लगा कि आज तो अंत निश्चित है।

तभी उन्हें किसी के दौड़ने की आवाज़ आई। वह कबीर था।

कबीर ने अपनी दादी को जमीन पर पड़े देखा। वह घबरा गया। "दा... दी..." उसके मुंह से अजीब सी आवाज़ निकली। वह उनके पास आया और अपने नन्हे हाथों से उनके सिर से बहते खून को रोकने की कोशिश करने लगा।

सावित्री जी अर्धचेतन अवस्था में थीं। उन्होंने देखा कि कबीर रो रहा है। वह अपनी टी-शर्ट उतारकर उनके घाव पर दबा रहा था। फिर वह दौड़कर किचन में गया। उसकी हाइट कम थी, उसने एक स्टूल खिसकाया, उस पर चढ़ा और पानी की बोतल और अपना स्कूल का बैग लेकर आया।

उसने पानी की बोतल दादी के मुंह से लगाई। फिर उसने अपने बैग से वह 'बज़र' (Buzzer) निकाला जो रितिका ने उसे आपात स्थिति के लिए दिया था। कबीर को बस इतना सिखाया गया था कि मुसीबत में लाल बटन दबाना है। उसने कांपते हाथों से वह बटन दबा दिया। यह बज़र सीधे मयंक के फोन से कनेक्टेड था।

मयंक को अलर्ट मिला और उसने तुरंत पड़ोसियों को फोन किया। दस मिनट के अंदर पड़ोसी आ गए और एम्बुलेंस बुलाई गई।

जब सावित्री जी को अस्पताल ले जाया जा रहा था, तब कबीर ने उनका हाथ कसकर पकड़ रखा था। डॉक्टर ने उसे हटाने की कोशिश की, पर उसने हाथ नहीं छोड़ा। वह लगातार रोते हुए "दादी... दादी..." बुदबुदा रहा था—वे शब्द जो उसने सात सालों में कभी साफ नहीं बोले थे।

दो दिन बाद जब सावित्री जी को होश आया, तो उन्होंने देखा कि उनके बिस्तर के पास स्टूल पर कबीर सिर रखकर सोया हुआ था। मयंक और रितिका भी वहीं खड़े थे।

मयंक ने नम आँखों से कहा, "माँ, अगर कबीर ने समझदारी नहीं दिखाई होती, तो शायद हम आपको खो देते। डॉक्टर कह रहे थे कि सिर से खून बहुत बह गया था, पर कबीर ने कपड़ा दबाकर रखा, जिससे खून का रिसाव कम हुआ।"

सावित्री जी की नज़रें कबीर के मासूम चेहरे पर टिक गईं। वह बच्चा, जिसे उन्होंने 'मंदबुद्धि' समझा था, जिसे उन्होंने 'अपूर्ण' मानकर ठुकरा दिया था, आज उसी ने अपनी सूझबूझ और निस्वार्थ प्रेम से उनकी जान बचाई थी। उन्हें अपनी डिग्रियां, अपने मेडल और अपनी 'परफेक्शन' की परिभाषा सब बहुत छोटी लगने लगीं।

कबीर की नींद खुली। उसने दादी को जागते देखा तो उसके चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान आई जिसमें कोई मिलावट नहीं थी। उसने धीरे से दादी के प्लास्टर वाले हाथ को सहलाया और अपनी टूटी-फूटी जुबान में बोला, "दा...दी... ठी...क?"

सावित्री जी का बांध टूट गया। उनकी आँखों से आंसुओं की धारा बह निकली। उन्होंने अपने सही हाथ से कबीर को खींचा और सीने से लगा लिया।

"हाँ बेटा... दादी ठीक है। दादी बिल्कुल ठीक है," सावित्री जी रोते हुए बोलीं। "माफ कर दे बेटा... तेरी यह दादी ही बीमार थी। मेरा दिमाग बीमार था जो मैं हीरे को पत्थर समझती रही।"

रितिका और मयंक यह दृश्य देखकर अपनी आंसुओं को रोक नहीं पाए। जिस मिलन के लिए वे सात साल से तरस रहे थे, वह आज अस्पताल के बिस्तर पर हो रहा था।

सावित्री जी ने कबीर का माथा चूमा। "लोग कहते हैं कि तू 'स्पेशल' है। हाँ, तू सच में स्पेशल है बेटा। हम सबके पास दिमाग है, पर तेरे पास दिल है... बहुत बड़ा दिल।"

घर लौटने के बाद सावित्री जी बदल गईं। अब किटी पार्टी में वे कबीर को साथ लेकर जाती थीं।

एक दिन वही मिसेज वर्मा फिर मिलीं। उन्होंने कबीर को देखकर सहानुभूति से कहा, "सावित्री, बड़ा कठिन होता होगा न ऐसे बच्चे को संभालना? न पढ़ाई कर पाएगा, न नौकरी। वंश कैसे आगे बढ़ेगा?"

सावित्री जी ने कबीर का हाथ गर्व से थामा और सबकी आँखों में आँखें डालकर कहा, "मिसेज वर्मा, वंश नौकरियों और डिग्रियों से आगे नहीं बढ़ता, संस्कारों और सेवा से बढ़ता है। मेरा बेटा डॉक्टर होकर भी उस दिन मेरे पास नहीं था, पर मेरे इस पोते ने मेरी जान बचाई। यह डॉक्टर या इंजीनियर नहीं बनेगा, तो क्या हुआ? यह एक 'बेहतरीन इंसान' बनेगा। और आज की दुनिया में डॉक्टर-इंजीनियर तो बहुत मिल जाएंगे, पर इंसान ढूँढना मुश्किल है। यह मेरा पोता है, और यह मेरे लिए परफेक्ट है।"

सावित्री जी की बात सुनकर सब चुप हो गए। कबीर को कुछ समझ नहीं आया, बस उसे इतना पता था कि दादी ने उसका हाथ पकड़ा है और अब वे उसे कभी नहीं छोड़ेंगी। उसने अपनी जेब से एक मुरझाया हुआ फूल निकाला और दादी को दे दिया।

सावित्री जी ने उस फूल को अपने बालों में ऐसे लगाया जैसे वह दुनिया का सबसे कीमती गहना हो।

उस दिन उस घर की परिभाषा बदल गई थी। अब वहां सफलता का मतलब 'फर्स्ट आना' नहीं था, बल्कि 'साथ निभाना' था। सावित्री देवी समझ चुकी थीं कि ईश्वर कभी-कभी 'टूटी हुई' चीजें इसलिए भेजता है ताकि वह हमारे अहंकार को तोड़कर हमें 'सम्पूर्ण' बना सके। कबीर ने बिना एक शब्द बोले, अपनी दादी को प्यार की भाषा सिखा दी थी।

लेखक  : पंकज यादव


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