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शक

 कॉफी हाउस के कांच के दरवाजे के उस पार का दृश्य विनय के पैरों तले जमीन खिसकाने के लिए काफी था। सामने वाली टेबल पर उसकी भाभी, सुधा, एक अजनबी शख्स के साथ बैठी थीं। वह शख्स उम्र में सुधा के बराबर ही लग रहा था, पहनावे से संभ्रांत और चेहरे से काफी आकर्षक। लेकिन जो बात विनय को सबसे ज्यादा खटक रही थी, वह थी सुधा के चेहरे पर बिखरी हंसी।

घर में हमेशा सिर पर पल्लू रखने वाली, धीमी आवाज़ में बात करने वाली और "जी मम्मी जी, जी भैया" तक सीमित रहने वाली सुधा भाभी यहाँ बिलकुल बदली हुई लग रही थीं। वह उस आदमी के हाथ पर अपना हाथ रखकर कुछ समझा रही थीं, और बीच-बीच में खिलखिलाकर हंस रही थीं। विनय ने पिछले पांच सालों में—जब से सुधा भैया आलोक से ब्याह कर आई थीं—उन्हें इतना खुलकर हंसते कभी नहीं देखा था।

विनय के मन में शक का एक विषैला बीज अंकुरित हो गया। "क्या भाभी भैया को धोखा दे रही हैं?" यह सवाल उसके दिमाग में हथौड़े की तरह बजने लगा। आलोक भैया, जो अपनी छोटी सी फैक्ट्री चलाने में दिन-रात एक कर देते हैं, क्या उन्हें इस बात की भनक भी है?

विनय वहां से चुपचाप हट गया। उसने तय किया कि वह अभी कोई तमाशा नहीं करेगा, बल्कि तह तक जाकर सच का पता लगाएगा।

घर पहुँचकर विनय का मन अशांत था। रात को खाने की मेज पर जब सुधा रोटियां परोस रही थीं, तो विनय की नज़रें लगातार उनके चेहरे को टटोल रही थीं। सुधा बिलकुल सामान्य थीं। वही सादगी, वही अपनापन।

"विनय भैया, आज आपकी पसंद की भिंडी बनाई है, थोड़ी और लीजिए ना," सुधा ने आग्रह किया।

विनय ने रूखेपन से मना कर दिया, "नहीं, भूख नहीं है।"

सुधा ने एक पल के लिए चिंतित होकर उसकी ओर देखा, लेकिन कुछ कहा नहीं। विनय सोच रहा था कि इंसान कितना अच्छा अभिनेता हो सकता है। बाहर कुछ और, घर के भीतर कुछ और।

अगले कुछ दिनों तक विनय जासूस बन गया। उसने गौर किया कि सुधा दोपहर में दो घंटे के लिए घर से गायब रहती थीं। पूछने पर कहती थीं कि मंदिर जा रही हैं या किसी सहेली के घर कीर्तन में। लेकिन विनय जानता था कि हकीकत कुछ और है।

एक हफ्ते बाद, विनय को मौका मिल गया। सुधा ने दोपहर में जल्दी-जल्दी काम निपटाया, एक फाइल अपने बैग में डाली और ऑटो पकड़कर निकल गईं। विनय अपनी बाइक से पीछे लग गया।

ऑटो शहर के एक पॉश इलाके में रुका। यह 'सिल्वर लीफ' नामक एक बड़ी कॉर्पोरेट बिल्डिंग थी। सुधा वहां उतरीं और रिसेप्शन पर कुछ बात करके लिफ्ट की ओर बढ़ गईं। विनय ने बाइक खड़ी की और दौड़कर लॉबी में पहुंचा। उसने देखा कि लिफ्ट पांचवें माले पर रुकी है। वहां बोर्ड पर लिखा था—'समर्पण पब्लिशिंग हाउस'।

विनय का माथा ठनका। पब्लिशिंग हाउस? भाभी यहाँ क्या करने आई हैं? क्या वह आदमी यहीं काम करता है? विनय सीढ़ियों से ऊपर चढ़ा। पांचवें माले पर कांच के केबिन बने हुए थे। विनय ने आड़ लेकर देखा तो उसका शक यकीन में बदलने लगा।

उसी केबिन में वही आदमी बैठा था जिसे उसने कॉफी हाउस में देखा था। सुधा उसके सामने बैठी थीं। दोनों के बीच काफी गंभीर चर्चा हो रही थी। तभी उस आदमी ने दराज से एक लिफाफा निकाला और सुधा को दिया। सुधा ने लिफाफा लेकर अपने बैग में रख लिया और बदले में वह फाइल उस आदमी को सौंप दी।

विनय को लगा अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है। वह लिफाफा... जरूर उसमें पैसे होंगे। और वह फाइल? शायद भैया की फैक्ट्री के कोई कागजात? या प्रॉपर्टी के पेपर? विनय का खून खौल उठा। उसे लगा कि उसकी सीधी-सादी दिखने वाली भाभी असल में घर के खिलाफ कोई बड़ी साजिश रच रही हैं।

उसने सोचा कि अंदर जाकर रंगे हाथों पकड़ ले, लेकिन फिर उसे लगा कि भैया को सबूत देना जरूरी होगा। उसने अपने मोबाइल से छिपकर उनकी कुछ तस्वीरें लीं और वहां से निकल गया।

शाम को घर का माहौल भारी था। आलोक फैक्ट्री से जल्दी आ गए थे क्योंकि उनकी तबीयत कुछ ठीक नहीं थी। वे सोफे पर लेटे हुए थे और सुधा उनके सिर पर बाम लगा रही थीं। विनय यह पाखंड देख नहीं पाया।

"बस करिए भाभी!" विनय चिल्लाया। उसकी आवाज़ इतनी तेज़ थी कि आलोक हड़बड़ा कर उठ बैठे और माँ जी रसोई से दौड़ी चली आईं।

"क्या हुआ विनय? ऐसे क्यों चिल्ला रहे हो?" आलोक ने पूछा।

विनय ने अपनी जेब से मोबाइल निकाला और टेबल पर पटक दिया। "भैया, आप जिसे देवी समझकर पूज रहे हैं, असल में वो आपको धोखा दे रही हैं। यह देखिए तस्वीरें।"

आलोक ने हैरान होकर मोबाइल उठाया। सुधा का चेहरा पीला पड़ गया। उसने घबराकर विनय की ओर देखा, "विनय भैया, आप... आप गलत समझ रहे हैं।"

"चुप रहिए आप!" विनय ने हाथ के इशारे से उसे रोका। "मैंने अपनी आँखों से देखा है। कॉफी हाउस में उस आदमी के साथ हंसना, आज उसके ऑफिस जाकर पैसे लेना, फाइलें देना... सब देखा है मैंने। आप उस आदमी के साथ मिलकर भैया को लूट रही हैं या फिर... या फिर कोई और ही चक्कर चल रहा है?"

माँ जी ने जब यह सुना तो वे धम्म से कुर्सी पर बैठ गईं। "बहू, यह विनय क्या कह रहा है? कौन है वो आदमी?"

सुधा की आँखों में आंसू आ गए। वह कुछ बोलने की कोशिश कर रही थी, लेकिन शब्द गले में अटक रहे थे। आलोक ने तस्वीरों को गौर से देखा। फिर उसने शांत भाव से मोबाइल नीचे रखा और सुधा की ओर देखा।

"सुधा, क्या यह शेखर जी हैं?" आलोक ने पूछा।

विनय हक्का-बक्का रह गया। "भैया, आप उस आदमी को जानते हैं?"

आलोक ने एक गहरी सांस ली। "हाँ विनय, मैं जानता हूँ। लेकिन मुझे यह नहीं पता था कि सुधा उनसे आज मिलने गई थी।"

विनय भ्रमित हो गया। "मतलब? चल क्या रहा है इस घर में?"

तभी सुधा ने अपने आँसू पोंछे और अपने कमरे की ओर दौड़ी। थोड़ी देर बाद वह एक डायरी और वही लिफाफा लेकर लौटी जो उसने ऑफिस में लिया था। उसने वह लिफाफा आलोक के हाथों में रख दिया।

आलोक ने लिफाफा खोला। उसमें पचास हजार रुपये नकद नहीं, बल्कि पचास हजार रुपये का एक चेक था। चेक पर लिखा था—'रॉयल्टी भुगतान - अनामिका (सुधा शर्मा)'।

विनय और माँ जी सन्न रह गए।

सुधा ने सिसकते हुए कहा, "माँ जी, विनय भैया... मैं कोई साजिश नहीं कर रही थी। मैं... मैं लिखती हूँ। कहानियां लिखती हूँ।"

कमरे में सन्नाटा छा गया।

सुधा ने आगे बताया, "शादी से पहले मुझे लिखने का बहुत शौक था। मेरी कई कविताएं पत्रिकाओं में छपती थीं। लेकिन शादी के बाद... घर-गृहस्थी में सब छूट गया। फिर जब मैंने देखा कि आलोक जी फैक्ट्री के कर्ज को लेकर परेशान रहते हैं, तो मैंने सोचा कि मैं भी कुछ मदद करूँ। लेकिन मुझे डर था। हमारे खानदान में औरतों का नौकरी करना या बाहर काम करना अच्छा नहीं माना जाता। मुझे लगा आप लोग नाराज होंगे कि घर की बहू कहानियां लिख रही है, अपना नाम अखबारों में छपवा रही है।"

विनय अपनी जगह पर जड़ा रह गया। उसे अपने कहे हर शब्द पर पछतावा हो रहा था।

सुधा ने उस आदमी के बारे में बताया, "वो शेखर जी हैं, मेरे पब्लिशर। उन्होंने मेरी कहानियों को 'अनामिका' नाम से छापने का प्रस्ताव दिया था ताकि मेरी पहचान गुप्त रहे। वो फाइल जो मैंने उन्हें दी, वो मेरी नई किताब की पांडुलिपि (Manuscript) थी। और यह चेक... मेरी पिछली किताब की रॉयल्टी है।"

आलोक ने सुधा का हाथ थाम लिया। उसकी आँखों में गर्व और अपराधबोध दोनों थे। "सुधा, तुम्हें मुझे बताना चाहिए था। क्या मैं इतना पुराने ख्यालों का हूँ कि तुम्हारी प्रतिभा को रोकता?"

सुधा ने सिर झुका लिया। "नहीं आलोक, आप नहीं... पर मुझे डर था। विनय भैया हमेशा कहते थे कि भाभी घर को कितनी अच्छे से संभालती हैं, वही उनका धर्म है। मुझे लगा कि अगर मैं बाहर की दुनिया में कदम रखूंगी तो शायद घर के प्रति मेरी निष्ठा पर सवाल उठेंगे... और देखिए, आज वही हुआ।"

विनय घुटनों के बल बैठ गया। उसका गला रुंध गया था। "भाभी... मुझे माफ़ कर दीजिए। मेरी छोटी सोच ने आपकी तपस्या को पाप का नाम दे दिया। मैंने अपनी आँखों से जो देखा, उसे अपने दिमाग की गंदगी से जोड़ लिया। मैं... मैं बहुत शर्मिंदा हूँ।"

माँ जी, जो अब तक चुप थीं, उठीं और सुधा के पास गईं। उन्होंने चेक को एक तरफ रखा और सुधा के हाथों को अपने हाथों में ले लिया। उन हाथों में रोटियां बनाने के निशान थे और स्याही के भी।

"पगली," माँ जी की आवाज़ कांप रही थी, "तूने यह क्यों सोचा कि हम तुझे रोकेंगे? लक्ष्मी तो सरस्वती का रूप भी होती है, यह आज तूने साबित कर दिया। हमें तो गर्व होना चाहिए कि हमारी बहू इतनी गुणी है।"

सुधा ने राहत की सांस ली। जैसे उसके सीने से मनों बोझ उतर गया हो।

आलोक ने विनय के कंधे पर हाथ रखा। "विनय, जो दिखता है, हमेशा सच वही नहीं होता। शक करने से पहले एक बार सवाल पूछ लेना चाहिए था। खैर, जो हुआ सो हुआ। अब यह बताओ, अनामिका जी की नई किताब का विमोचन कब है?"

माहौल हल्का हो गया। विनय ने उठकर चेक उठाया और श्रद्धा से सुधा के हाथ में दिया। "भाभी, यह चेक नहीं, यह मेरी गलती सुधारने का मौका है। अगली बार जब आप शेखर जी से मिलने जाएंगी, तो ऑटो से नहीं, मैं अपनी बाइक पर छोड़ने जाऊंगा। और मैं वहां बाहर सीना तानकर खड़ा रहूँगा कि अंदर जो लेखिका बैठी हैं, वो मेरी भाभी हैं।"

सुधा मुस्कुरा दी। यह वही मुस्कान थी जो विनय ने कॉफी हाउस में देखी थी, लेकिन आज यह मुस्कान घर की चारदीवारी के अंदर थी, और इसमें डर नहीं, आत्मविश्वास था।

उस रात के खाने पर विनय ने भरपेट खाना खाया। उसे अहसास हो गया था कि किसी स्त्री का दायरा सिर्फ रसोई तक सीमित नहीं होता। अगर उसे मौका मिले, तो वह कलम से भी उतनी ही क्रांति ला सकती है जितनी वह अपनी खामोशी से घर संवारने में लाती है।

विनय ने मन ही मन तय किया कि कल सबसे पहले वह बाज़ार जाकर 'अनामिका' की लिखी किताब खरीदेगा और उसे पढ़ेगा। क्योंकि अब उसे उस 'अनजान व्यक्ति' से खतरा नहीं था, बल्कि उसे गर्व था कि वह व्यक्ति उसकी भाभी की प्रतिभा को दुनिया के सामने ला रहा था।

शंका के काले बादल छंट चुके थे और घर में विश्वास की एक नई सुनहरी धूप खिली थी। सुधा अब सिर्फ एक बहू नहीं थी, वह एक रचयिता थी, जिसकी कलम की स्याही ने आज परिवार के रिश्तों को एक नया रंग दे दिया था।

लेखिका :कविता राकेश


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