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नाटक

 रात के दो बज रहे थे। पूरा मोहल्ला गहरी नींद में डूबा था। तभी सन्नाटे को चीरती हुई एक दिल दहला देने वाली चीख गूंजी—“पापा जी… नहीं… पापा जी, आँखें खोलो!” पड़ोसी हड़बड़ाकर उठ बैठे।

वर्मा जी ने बालकनी से झांककर देखा। सामने हरि मोहन जी के घर का दरवाज़ा खुला था और भीतर कोहराम मचा था। लोग भागते हुए पहुंचे। नज़ारा रूह कंपा देने वाला था। 59 वर्षीय हरि मोहन ज़मीन पर पड़े थे। शरीर ऐंठ रहा था, मुंह से झाग निकल रहा था। उनके दोनों बेटे—अमित और रोहन—बदहवास होकर उन्हें झकझोर रहे थे। अमित का चेहरा आंसुओं से भीगा हुआ था। वह पागलों की तरह चीख रहा था—“एंबुलेंस बुलाओ! कोई एंबुलेंस बुलाओ! मेरे पापा जी को कुछ हो गया है!”

रोहन दौड़कर पानी लाया, लेकिन हरि मोहन के हलक से पानी नीचे नहीं उतरा। उनकी आंखों की पुतलियां जैसे स्थिर हो चुकी थीं। कुछ ही मिनटों में एंबुलेंस आ गई। सायरन की आवाज़ ने पूरे मोहल्ले को जगा दिया।

अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड के बाहर अमित और रोहन एक-दूसरे से लिपटकर रो रहे थे। उनका दुख देखकर वहां मौजूद लोगों की आंखें भी नम हो गईं। थोड़ी देर बाद डॉक्टर बाहर आए। उन्होंने सिर झुका लिया। “सॉरी… हम उन्हें बचा नहीं सके। ज़हर बहुत तेज़ी से फैल गया। उनके पैर के अंगूठे पर दो निशान हैं। लगता है किसी बेहद जहरीले साँप ने काटा है।”

यह सुनते ही अमित ज़मीन पर बैठ गया। उसकी आवाज़ फटने लगी—“साँप? हमारे घर में साँप कहाँ से आया?” मोहल्ले के लोग उसे संभालने लगे—“बेटा, खुद को संभालो। तुम टूट जाओगे तो घर कैसे संभलेगा? शायद भगवान को यही मंज़ूर था…”

पुलिस ने इसे दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटना मानकर केस दर्ज किया। पोस्टमार्टम हुआ। अगले दिन अंतिम संस्कार के समय श्मशान घाट पर सन्नाटा पसरा था। अमित ने जब पिता की चिता को मुखाग्नि दी, तो वह बेहोश होकर गिर पड़ा। लोग आपस में कहने लगे—“कलयुग में ऐसे बेटे कहाँ मिलते हैं… बाप के जाने का इतना गम…”

धीरे-धीरे रिश्तेदार और हमदर्द लौट गए। घर में अब सिर्फ सन्नाटा था। बाहर से सब सामान्य लगता था, पर घर की चार दीवारी के भीतर हवा का रुख कुछ और था।

उसी रात, जब सारे मेहमान चले गए, अमित और रोहन अपने पिता के कमरे में बैठे थे—उसी कमरे में जहां हरि मोहन ने अंतिम सांस ली थी। बाहर लोगों के सामने जो बेटे दहाड़े मारकर रो रहे थे, अब उनकी आंखों में आंसू नहीं थे। वहां एक अजीब सी ठंडी शांति थी।

रोहन ने धीमे स्वर में पूछा, “भैया… अब सब ठीक हो जाएगा न?” अमित ने पिता की तस्वीर की तरफ देखा। उसकी आंखों में कुछ चमक-सी थी। वह बोला, “हाँ… बस कुछ दिन का और नाटक है। फिर हमारी जिंदगी बदल जाएगी।” यह कहते ही दोनों भाई हंस पड़े—बिना किसी ग्लानि के।

कोई सोच भी नहीं सकता था कि हरि मोहन की मौत कोई साधारण हादसा नहीं, बल्कि सोची-समझी साजिश का नतीजा थी।

हरि मोहन का जीवन खुली किताब जैसा था। सरकारी नौकरी से रिटायर होने ही वाले थे। जो जमा-पूंजी थी, वह बेटों की पढ़ाई और शादी में लग चुकी थी। मगर अमित और रोहन की आंखों में भूख थी—मेहनत की रोटी की नहीं, रातों-रात अमीर बनने की। उन्हें लगता था कि उनके दोस्त चमचमाती गाड़ियों में घूम रहे हैं और उनके हिस्से में सिर्फ पिता की ईमानदारी और सादगी बची है। इसी लालच ने उनके मन में वह भयानक बीज बो दिया, जिसने मानवता को शर्मसार कर दिया।

एक रात अमित ने रोहन से कहा, “पापा के रिटायर होने के बाद क्या मिलेगा? थोड़ा-सा पीएफ और पेंशन… उससे हमारे सपने पूरे नहीं होंगे।” रोहन ने हामी भरते हुए कहा, “भैया, मैंने सुना है बीमा करवाओ तो बहुत पैसा मिलता है। एक्सीडेंटल डेथ हो तो रकम दोगुनी भी हो जाती है।”

यही वह पल था जब शैतान ने उनके दिमाग पर कब्जा कर लिया। उन्होंने पिता को इंसान नहीं, एक ‘प्रोजेक्ट’ समझ लिया।

अगले कुछ महीनों में घर में बीमा एजेंटों का आना-जाना शुरू हो गया। कभी एक एजेंट, कभी दूसरा। हरि मोहन, जो बेटों पर आंख मूंदकर भरोसा करते थे, बिना सवाल किए कागज़ों पर हस्ताक्षर करते गए। “पापा जी, ये भविष्य के लिए है,” अमित मीठी आवाज़ में कहता। “हाँ बेटा, तुम जो ठीक समझो,” हरि मोहन कांपते हाथों से साइन कर देते। उन्हें क्या पता था कि वे अपने ही मौत के कागज़ पर दस्तखत कर रहे हैं।

एक-दो नहीं, कुल 11 बीमा पॉलिसियां करवाई गईं। कुल बीमा राशि—कई करोड़ रुपये। प्रीमियम भरने के लिए दोनों भाइयों ने उधार लिया, घर के गहने तक गिरवी रख दिए। यह एक जुआ था—जिसमें दांव पर पिता की जान लगी थी। पॉलिसियां तैयार थीं, अब इंतजार था उस “दुर्घटना” का, जो करोड़ों का चेक बनकर उनके हाथ में आ जाए।

उन्होंने कई योजनाएं बनाईं। कभी सोचा सीढ़ियों से धक्का दे देंगे, कभी कार से टक्कर करवा देंगे। लेकिन हर बार पकड़े जाने का डर रास्ता रोक देता। फिर उन्हें एक ऐसा रास्ता सूझा जो ‘कुदरती’ लगे—साँप का काटना। ऐसा ज़हर, जो फिंगरप्रिंट नहीं छोड़ता, कोई हथियार नहीं छोड़ता, बस मौत छोड़ जाता है। कातिल होगा तो सिर्फ साँप।

उन्हें जरूरत थी किसी ऐसे इंसान की, जो साँपों का जानकार हो। उनकी तलाश एक सपेरे तक जा पहुंची—कालू। वे उसे शहर के बाहरी इलाके में मिले। कालू उनकी मंशा भांप गया था। उसने डरते हुए कहा, “साहब, पाप लगेगा…” मगर अमित ने नोटों की गड्डी उसकी ओर बढ़ा दी—“पाप-पुण्य सब यहीं रह जाता है। तू अपना काम कर।”

हरि मोहन को बेटों के व्यवहार में आया बदलाव ‘प्यार’ लगता था। उन्हें लगता, बेटे जिम्मेदार हो गए हैं। अमित रात को उनके पास बैठता, पैर दबाता—“पापा जी, आप बस आराम करो।” हरि मोहन की आंखें भर आतीं। वे मन ही मन अपनी पत्नी की तस्वीर से कहते—“देख रही हो… हमारे बेटे तो सच में श्रवण कुमार हैं।” उन्हें जरा भी भनक नहीं थी कि यह सब एक मुखौटा है।

जिस दिन पहली पॉलिसी का वेटिंग पीरियड पूरा हुआ, उसी दिन दोनों भाइयों ने तय कर लिया—अब और इंतजार नहीं। कालू एक कोबरा एक काले बैग में लेकर आया। रात में उसे कमरे में छोड़ दिया गया, मगर साँप बिस्तर पर चढ़ने के बजाय खिड़की से बाहर निकल गया। पहली कोशिश नाकाम रही।

अगली सुबह हरि मोहन ने अमित को परेशान देखकर पूछा, “बेटा, तुम लोग आजकल बहुत चिंतित लगते हो… कोई बात है क्या?” अमित ने झूठ बोल दिया, “नहीं पापा जी, बस काम का तनाव है। सब ठीक हो जाएगा।” पिता ने उसके सिर पर हाथ फेर दिया।

असफलता ने दोनों भाइयों को और भी बेरहम बना दिया। अब उन्होंने तय किया कि साँप को हथियार की तरह इस्तेमाल करेंगे—उसे पकड़कर पिता को कटवाएंगे। इस बार कालू से रसेल वाइपर मंगवाया गया, जिसका ज़हर तेजी से शरीर को तोड़ देता है।

उसी रात उन्होंने हरि मोहन को नींद की गोली भी दी। “पापा जी, ये विटामिन है। खा लो, ताकत आएगी,” रोहन ने कहा। हरि मोहन ने बिना सोचे गोली निगल ली—यह सोचकर कि बेटा सेहत की चिंता कर रहा है।

रात का सन्नाटा गहराया। हरि मोहन अचेत अवस्था में थे। अमित ने दस्ताने पहने और साँप को गर्दन के पास से कसकर पकड़ा। रोहन ने पिता का पैर दबा कर पकड़ा, ताकि कोई हरकत न हो। एक बेटे ने उस शरीर को जकड़ा जिसने उसे जीवन दिया था, और दूसरे ने उसी शरीर पर मौत का दंश लगवाया। साँप ने हरि मोहन के पैर के अंगूठे पर दांत गड़ा दिए। एक हल्की-सी कराह निकली… फिर सब शांत।

कुछ देर बाद वे साँप को दूर जाकर छोड़ आए। अब इंतजार शुरू हुआ। ज़हर धीरे-धीरे हरि मोहन के शरीर में फैलता रहा। वे तड़पते रहे—और पास के कमरे में बैठे बेटे अपने पिता की अंतिम सांसों का नहीं, बल्कि करोड़ों के आने का इंतजार कर रहे थे। और आखिर रात के दो बजे वह चीख उठी… और कहानी सबके सामने “दुर्घटना” बनकर आ गई।

करीब एक महीने बाद, एक बीमा कंपनी के दफ्तर में हरि मोहन का क्लेम पहुंचा। यह सामान्य मामला होता, लेकिन क्षेत्रीय मैनेजर समीर गुप्ता की नजर फाइल पर अटक गई। “मौत—सर्पदंश। क्लेम—50 लाख। पॉलिसी—चार महीने पहले।” समीर का माथा ठनका। उसने सिस्टम में हरि मोहन का पैन नंबर डाला। स्क्रीन पर जो दिखा, वह चौंकाने वाला था—एक नहीं, कुल 11 पॉलिसियां, अलग-अलग कंपनियों की, और कुल राशि कई करोड़ रुपये।

समीर ने तुरंत सीनियर इन्वेस्टिगेटर अर्जुन प्रताप को बुलाया। अर्जुन अनुभवी था, उसे सीधी बात में भी गड़बड़ी सूंघाई देती थी। उसने फाइल देखी और बोला, “ये इत्तेफाक नहीं हो सकता। इतनी सारी पॉलिसियां, वो भी कुछ महीनों में, और मौत… सर्पदंश से!”

अर्जुन शहर पहुंचा। सामान्य बीमा अधिकारी बनकर उसने आस-पास पूछताछ की। उसे लगा कहीं बेटों की बदसलूकी, झगड़ा, या कोई पुराना विवाद मिलेगा। लेकिन मोहल्ले में दोनों बेटों की छवि देवदूत जैसी थी। वर्मा जी ने आंखों में आंसू भरकर कहा, “साहब, हरि मोहन जी तो देवता आदमी थे। अमित रोज़ शाम को पैर दबाता था, रोहन मंदिर ले जाता था… आज के जमाने में ऐसे बच्चे कहाँ मिलते हैं?”

अर्जुन सीधे घर पहुंचा। उसने शांत स्वर में पूछा, “आपके पिता पर कोई कर्ज था?” अमित ने तुरंत सिर हिलाया, “नहीं सर। वो तो बहुत सादा जीवन जीते थे।” अर्जुन ने अगला सवाल दागा, “फिर इतना भारी बीमा क्यों? प्रीमियम कैसे भरा गया?” अमित ने भावुक होकर कहा, “सर… पापा जी कहते थे, मैं तुम दोनों के लिए कुछ बड़ा छोड़कर जाऊंगा। उन्होंने अपनी सेविंग्स… सब लगा दीं। हमें तो बाद में पता चला।”

अमित का अभिनय इतना सच्चा था कि एक पल के लिए अर्जुन भी डगमगा गया। मगर अर्जुन भावनाओं का कैदी नहीं था। वह जानता था—जीवित लोग झूठ बोल सकते हैं, पर शरीर पर बने निशान झूठ नहीं बोलते।

वह पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर से मिला और फॉरेंसिक तस्वीरें दोबारा देखीं। अर्जुन ने कहा, “डॉक्टर साहब, क्या काटने के निशान कुछ अलग नहीं लग रहे?” डॉक्टर ने ज़ूम किया। कुछ देर चुप रहने के बाद उसका चेहरा बदल गया। “हाँ… सामान्य काटने में निशान उतने गहरे नहीं होते। यहां घाव बहुत गहरा है, आसपास की त्वचा कुचली हुई है। ऐसा तभी होता है जब साँप को दबाकर रखा जाए, ताकि वह पूरा ज़हर इंजेक्ट कर दे। यह ‘बाइट’ कम, ‘जबरन कराया गया दंश’ ज्यादा लगता है।”

अर्जुन को जवाब मिल गया—यह हादसा नहीं, हत्या थी।

अब सवाल था—किसने किया और कैसे। अर्जुन ने पुलिस की मदद से कॉल रिकॉर्ड्स खंगाले। अधिकांश कॉल्स व्हाट्सऐप पर थीं, मगर घटना से दो दिन पहले एक सामान्य कॉल मिला—सिर्फ दस सेकंड का। नंबर ट्रेस हुआ तो लोकेशन निकली शहर के बाहरी इलाके की वही बस्ती, जहां सपेरे रहते थे।

पुलिस टीम उस बस्ती में पहुंची और उस नंबर के मालिक कालू को पकड़ लिया। थाने में पूछताछ के दौरान वह टूट गया। रोते हुए बोला, “साहब, मुझे माफ कर दो… मैंने नहीं सोचा था कि ये हत्या करेंगे।” इंस्पेक्टर ने सख्ती से पूछा, “कौन थे?” कालू ने हुलिया बताया—और वह अमित-रोहन से मेल खाता था। “पहली बार कोबरा ले गए… काम नहीं हुआ। दूसरी बार रसेल वाइपर मांगकर ले गए… और पैसे भी दिए।”

अब खेल पलट चुका था। अर्जुन ने चाल चली। उसने अमित को फोन किया और बेहद सम्मान से कहा, “बधाई हो, आपकी क्लेम की प्रक्रिया पूरी हो गई है। चेक तैयार है। बस आखिरी औपचारिकता और सिग्नेचर के लिए कल आप और रोहन हमारे लीगल ऑफिस आ जाइए। मैं एड्रेस भेज रहा हूँ।”

फोन रखते ही घर में मातम का नकाब उतर गया और अंदर जश्न का शोर उठने लगा। अमित ने रोहन को गले लगाया—“देखा, मैंने कहा था न… अब हम राजा की तरह जिएंगे!”

अगली सुबह दोनों भाई अच्छे कपड़े पहनकर, चेहरे पर मासूमियत का नकाब लगाकर बताए पते पर पहुंचे। लेकिन वह कोई लीगल ऑफिस नहीं था—वह पुलिस स्टेशन का विशेष कमरा था, जहां कैमरे लगे थे। दूसरे कमरे में कालू खड़ा था। इंस्पेक्टर ने कहा, “देख, पहचान। क्या ये वही हैं?” कालू ने तुरंत कहा, “हाँ साहब… यही दोनों थे।”

इंस्पेक्टर हथकड़ी लेकर अंदर आया। अमित ठिठक गया। “सर, वो बीमा…” इंस्पेक्टर मुस्कुराया, “बीमा भी होगा… पहले ये बताओ, तुम कालू को कैसे जानते हो?”

“कौन कालू? हम किसी सपेरे को नहीं जानते!” अमित हकलाया। उसी वक्त कालू को सामने लाया गया। उसे देखते ही रोहन चीख पड़ा। कालू बोला, “यही हैं साहब… यही ले गए थे साँप।”

अमित अब भी चीखने लगा, “ये झूठ बोल रहा है! हमें फंसा रहा है!” अर्जुन आगे बढ़ा। उसने मोबाइल में एक ऑडियो चलाया। कमरे में अमित की आवाज़ गूंजी—“मुझे रिस्क नहीं चाहिए। ऐसा साँप दे कि सुबह तक काम हो जाए… नहीं हुआ तो पैसे नहीं मिलेंगे।”

सबूतों ने हवा को भारी कर दिया। रोहन टूट गया, जमीन पर गिरकर रोने लगा—“भैया ने किया सब… भैया का आइडिया था!” अमित कुछ पल घूरता रहा, फिर एक पागलों जैसी हंसी हंसने लगा। “हाँ… मैंने किया। क्यों न करता? पूरी जिंदगी गरीबी देखी। पापा के पास था ही क्या—सिर्फ आदर्श! आदर्शों से पेट नहीं भरता। करोड़ मिल रहे थे… वो बूढ़े हो गए थे, आज नहीं तो कल मरते ही। हमने बस उन्हें थोड़ा जल्दी भेज दिया।”

उसके शब्द सुनकर पुलिस वालों का भी खून खौल उठा। मामला फास्ट ट्रैक कोर्ट में चला। फॉरेंसिक रिपोर्ट, सपेरे का बयान, कॉल रिकॉर्ड और ऑडियो—सबूत इतने पुख्ता थे कि बचाव पक्ष के पास कहने को कुछ नहीं बचा। अदालत ने दोनों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। सभी बीमा पॉलिसियां रद्द कर दी गईं। जिन करोड़ों के लिए उन्होंने अपना सब कुछ गिरवी रख दिया था, वह उनके लिए सिर्फ कागज बनकर रह गया।

जेल की कोठरी में अब दोनों भाई अकेले थे। न पैसा मिला, न इज्जत बची। पत्नियां अलग हो गईं, बच्चे अपने पिता के नाम से मुंह मोड़ने लगे। रात के सन्नाटे में अमित को अक्सर लगता कि उसके पैर पर कुछ रेंग रहा है। वह चीखकर उठता—“पापा जी… मुझे माफ कर दो!” मगर माफी देने वाला वह पिता अब इस दुनिया में नहीं था।

और रोहन—जो कभी हर बात में “हाँ भैया” कहता था—अब उसी भैया को कोसता रहता। दोनों के बीच अब वही जहर था, जो उन्होंने अपने पिता को दिया था।

हरि मोहन का घर धीरे-धीरे वीरान पड़ गया। लोग उसके सामने से गुजरते हुए भी कदम तेज कर लेते हैं। कहते हैं, रात को वहां सिसकियों की आवाजें आती हैं—जैसे दीवारों के भीतर कोई भरोसा अभी भी मर रहा हो।

 

लेखिका : कल्पना चौबे


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