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मायके पर गर्व

 "देखो विकास, तुम मेरे पति हो, समझदार हो, इसलिए तुम्हें समझा रही हूँ। आजकल ये बेटियों और बहनों को मायके से लाने और ससुराल छोड़ने का रिवाज लगभग खत्म हो गया है। पहले के जमाने की बात अलग थी, तब न तो इतनी गाड़ियाँ थीं, न ही सड़कें सुरक्षित थीं, और औरतें घर की चारदीवारी में रहती थीं। लेकिन आज? आज के जमाने में औरतें फाइटर प्लेन उड़ा रही हैं। तुम्हारी दीदी, रागिनी दीदी, खुद एक मल्टीनेशनल कंपनी में एचआर हेड हैं। उनके पास अपनी खुद की एसयूवी है। अब तुम दो सौ किलोमीटर गाड़ी चलाकर उन्हें लेने जाओगे, फिर वो तुम्हारे साथ आएँगी... यह सब कितना अजीब और पिछड़ा हुआ लगता है। अच्छी बात है न, वो आत्मनिर्भर हैं, जब मन चाहे आ सकती हैं, किसी पर निर्भर नहीं रहना पड़ता।"

मीरा ने गीले हाथों को तौलिए से पोंछते हुए विकास को समझाया। विकास, जो हाथ में कार की चाबी लिए खड़ा था, कुछ पल के लिए ठिठक गया। उसकी पत्नी मीरा की बातें तार्किक थीं। व्यावहारिक थीं। आज के दौर में जब हर कोई समय बचाने की होड़ में है, विकास का अपनी बड़ी बहन को लेने के लिए दूसरे शहर जाना शायद बेवकूफी ही लगे।

विकास ने चाबी मेज पर रख दी और सोफे पर धप्प से बैठ गया। "तुम सही कह रही हो मीरा। दीदी तो खुद ही कहती हैं कि मुझे परेशान होने की ज़रूरत नहीं है। पर पता नहीं क्यों, मन था कि इस बार राखी पर मैं उन्हें खुद लेकर आता। बचपन में बाबूजी हमेशा बुआ को लेने जाते थे, वह उत्साह, वह इंतज़ार... सब याद आ रहा था।"

मीरा ने मुस्कुराते हुए विकास के कंधे पर हाथ रखा। "विकास, भावुक मत हो। वो प्यार अब वीडियो कॉल और इंस्टेंट मैसेज में बदल गया है। समय के साथ चलना ही समझदारी है। अभी तुम उन्हें फोन कर दो कि वो अपनी सुविधा से आ जाएं।"

विकास ने भारी मन से रागिनी दीदी को फोन लगाया।

"हल्लो दीदी, वो मैं कह रहा था कि... तुम कल सुबह अपनी गाड़ी से ही आ जाना। मीरा कह रही थी कि तुम्हें ड्राइविंग पसंद भी है और फिर मुझे ऑफिस से छुट्टी लेने में भी दिक्कत हो रही थी।"

उधर से रागिनी की आवाज़ आई, जिसमें एक पल का ठहराव था। "हाँ... हाँ विक्की, कोई बात नहीं। मैं आ जाऊँगी। वैसे भी ड्राइवर है, या मैं खुद ड्राइव कर लूँगी। तू परेशान मत हो। कल दोपहर तक पहुँचती हूँ।"

फोन कट गया। विकास को दीदी की आवाज़ में वह खनक सुनाई नहीं दी जो आमतौर पर मायके आने की बात पर होती थी। लेकिन उसने खुद को समझाया कि शायद काम का तनाव होगा।

अगले दिन दोपहर को रागिनी अपनी बड़ी सी चमचमाती कार से मायके पहुँची। उसने डिज़ाइनर सूट पहना था, आँखों पर महंगा चश्मा था और हाथ में ब्रांडेड बैग। उसे देखकर मीरा को बहुत गर्व महसूस हुआ।

"देखो विकास," मीरा ने फुसफुसाते हुए कहा, "इसे कहते हैं मॉडर्न वूमन। कितनी शान से आई हैं दीदी। अगर तुम लेने जाते, तो वही पुरानी घिसी-पिटी रस्म अदायगी लगती।"

रागिनी का स्वागत हुआ। घर में चहल-पहल बढ़ गई। माँ ने अपनी बेटी की पसंद के पकवान बनाए थे। मीरा भी ननद की खातिरदारी में लग गई। रागिनी सबके साथ हंस-बोल रही थी, अपनी कंपनी की बातें बता रही थी, देश-विदेश की यात्राओं के किस्से सुना रही थी।

शाम को जब सब आंगन में बैठे चाय पी रहे थे, तभी पड़ोस के शर्मा जी के घर के सामने एक ऑटो रुका। उसमें से शर्मा जी की बेटी, सुधा उतरी। सुधा बहुत साधारण परिवार से थी। उसका भाई, जो पसीने से तर-बतर था, ऑटो से उसका सामान उतार रहा था। वह बस से अपनी बहन को लेने गया था और फिर ऑटो करके घर लाया था।

सुधा के चेहरे पर थकान थी, कपड़े भी सफर में थोड़े सिलवटों वाले हो गए थे, लेकिन जैसे ही वह ऑटो से उतरी, उसने अपने भाई की पीठ पर एक धौल जमाई और हंसते हुए कहा, "तूने तो पूरी बस में मेरी नाक में दम कर दिया, कितना बोलता है रे तू!" और उसका भाई भी हंसते हुए उसका बैग उठाकर घर की ओर भागा।

विकास और मीरा यह देख रहे थे। अचानक विकास ने देखा कि रागिनी की नज़रें भी उसी दृश्य पर टिकी थीं। रागिनी के हाथ में चाय का कप था, लेकिन वह उसे पी नहीं रही थी। उसकी नज़रें उस साधारण से भाई-बहन की जोड़ी पर जमी थीं जो एक-दूसरे से लड़ते-झगड़ते घर में दाखिल हो रहे थे।

रागिनी की आँखों में एक अजीब सा सूनापन तैर गया। वह कुछ देर तक शून्य में ताकती रही, फिर अचानक उठी और बोली, "मैं ज़रा फ्रेश होकर आती हूँ," और तेज़ी से अपने कमरे में चली गई।

मीरा को कुछ खटका। वह एक संवेदनशील महिला थी। भले ही वह आधुनिक विचारों की थी, लेकिन वह भावनाओं को पढ़ना जानती थी। उसने विकास को इशारे से चुप रहने को कहा और दबे पाँव रागिनी के कमरे की ओर गई।

कमरे का दरवाज़ा हल्का सा खुला था। रागिनी बिस्तर के किनारे बैठी थी और अपने बैग से कुछ निकाल रही थी। मीरा ने देखा कि रागिनी एक पुरानी तस्वीर को हाथ में लिए हुए है और उसकी आँखों से आँसू बह रहे हैं। वह वही सशक्त, आत्मनिर्भर एचआर हेड रागिनी नहीं थी; वह इस वक्त एक छोटी सी बच्ची लग रही थी जो कुछ ढूंढ रही हो और उसे वह मिल न रहा हो।

मीरा ने दरवाजा खटखटाया। "दीदी?"

रागिनी हड़बड़ा गई। उसने जल्दी से आँसू पोंछे और जबरदस्ती मुस्कुराई। "अरे मीरा, आओ न। बस कुछ पुराना सामान देख रही थी।"

मीरा ने अंदर आकर दरवाज़ा बंद किया और रागिनी के पास बैठ गई।

"दीदी, आप झूठ बहुत बुरा बोलती हैं। अभी बाहर सब ठीक था, फिर अचानक शर्मा जी की बेटी को देखकर आपकी आँखों में ये आँसू क्यों?"

रागिनी ने पहले तो टालना चाहा, पर मीरा के स्नेहपूर्ण स्पर्श ने उसके सब्र का बांध तोड़ दिया।

"मीरा, तुम्हें पता है आत्मनिर्भर होना कितना थका देने वाला काम है?" रागिनी ने भर्राई आवाज़ में कहा।

"आज जब मैं अपनी लक्ज़री कार में अकेले ड्राइव करके आ रही थी, तो एसी की ठंडक थी, संगीत था, सब कुछ था... पर वो सुकून नहीं था जो बचपन में विक्की के साथ रोडवेज की खटारा बस में आता था।"

मीरा चुपचाप सुन रही थी।

रागिनी ने आगे कहा, "तुमने और विक्की ने सोचा कि मेरे पास संसाधन हैं, तो मुझे किसी की ज़रूरत नहीं। तुम सही हो, मुझे 'सफर' के लिए किसी की ज़रूरत नहीं है, पर मुझे 'महसूस' करने के लिए अपने भाई की ज़रूरत थी। जब भाई ससुराल आकर बहन को ले जाता है न मीरा, तो वो सिर्फ एक पिक-अप सर्विस नहीं होती। वो उस बहन के लिए एक सम्मान होता है। उसे लगता है कि उसके मायके वालों को उसकी इतनी तलब है कि वो उसे लेने दौड़े चले आए। वो ससुराल में, अपने पति और सास को गर्व से कहती है—'मेरा भाई मुझे लेने आया है'। उस एक वाक्य में जो रसूख और जो प्यार होता है, वो मेरी इस महंगी गाड़ी और बड़े पद में नहीं है।"

रागिनी की बातें मीरा के दिल में सीधे उतर गईं।

"आज जब मैं खुद आई, तो मेरी सास ने कहा—'जाओ बहू, ड्राइवर ले जाओ'। किसी को फर्क नहीं पड़ा। लेकिन अगर विक्की आता, तो घर में एक उत्सव होता कि 'मामा जी आए हैं'। रास्ते भर हम भाई-बहन वो बातें करते जो फोन पर नहीं हो सकतीं। मैं उसे अपनी परेशानियां बताती, वो मुझे अपने किस्से सुनाता। वो चार घंटे का रास्ता हमारा अपना होता। आज मैं दो घंटे में पहुँच गई, पर वो रास्ता मुझे काटने को दौड़ रहा था। मैं अकेली थी मीरा... बिल्कुल अकेली।"

मीरा की आँखों में भी नमी आ गई। उसने जिसे 'पिछड़ा हुआ रिवाज' समझा था, असल में वह रिश्तों को तरोताज़ा रखने का एक बहाना था। उसने 'सुविधा' को 'प्रेम' से ऊपर रख दिया था। उसे अहसास हुआ कि आज की नारी चाहे कितनी भी सशक्त क्यों न हो जाए, मायके की देहरी पर वह वही छोटी सी बिटिया बनना चाहती है जिसे पिता या भाई की उंगली पकड़कर चलने में जो सुरक्षा महसूस होती है, वह दुनिया की किसी ताकत में नहीं।

मीरा ने रागिनी का हाथ थामा। "दीदी, मुझे माफ़ कर दीजिए। मैंने इसे सिर्फ लॉजिक और प्रैक्टिकलिटी के चश्मे से देखा। मैं भूल गई थी कि कुछ रस्में पेट्रोल और समय बचाने के लिए नहीं, बल्कि यादें बनाने के लिए होती हैं।"

रागिनी ने मुस्कुराकर मीरा को गले लगा लिया। "कोई बात नहीं पगली। जमाना बदल रहा है, मैं समझती हूँ। बस कभी-कभी दिल बच्चा बन जाता है।"

शाम को राखी का त्यौहार मना। हंसी-मज़ाक हुआ। लेकिन विकास को अभी भी लग रहा था कि दीदी की हंसी में वह पुरानी वाली खनक नहीं है।

अगले दिन वापसी का समय था। रागिनी अपना सामान पैक कर रही थी। उसने अपनी कार की चाबी उठाई और बाहर आई।

"अच्छा माँ, अच्छा विक्की... चलती हूँ। ऑफिस में कल मीटिंग है," रागिनी ने कहा, हालांकि उसका मन नहीं था।

तभी मीरा ने पीछे से आकर रागिनी के हाथ से कार की चाबी छीन ली।

"अरे मीरा, ये क्या कर रही हो? मुझे देर हो जाएगी," रागिनी चौंकी।

मीरा ने वह चाबी विकास की तरफ उछाल दी। विकास ने हवा में ही चाबी लपक ली।

"विकास, गाड़ी निकालो। दीदी को छोड़ने तुम जाओगे," मीरा ने हुक्म दिया।

विकास और रागिनी, दोनों हैरान होकर मीरा को देखने लगे।

"पर मीरा... तुम ही तो कह रही थी..." विकास कुछ कहते-कहते रुक गया।

मीरा ने मुस्कुराते हुए कहा, "मैंने कहा था कि रिवाज बदल गए हैं, पर मैंने यह कब कहा कि जज़्बात बदल गए हैं? दीदी, आप आत्मनिर्भर हैं, यह दुनिया जानती है। लेकिन इस घर के लिए आप वही हमारी लाड़ली गुड़िया हैं। विकास आपको छोड़ने जाएगा, और वापसी में बस से धक्के खाते हुए आएगा। क्यों विकास, ठीक है न?"

विकास का चेहरा खिल उठा। उसे जैसे मनचाही मुराद मिल गई हो। "बिल्कुल! मैं तो तैयार हूँ। दीदी, बैठो। और हाँ, वो रास्ते में जो ढाबा पड़ता है न, जहाँ की कुल्हड़ वाली चाय तुम्हें पसंद थी, वहां रुकते हुए चलेंगे।"

रागिनी की आँखों में फिर से आँसू आए, पर इस बार ये खुशी के थे। उसने मीरा को कसकर गले लगाया। "शुक्रिया मीरा... तूने आज मुझे मेरा मायका सच में वापस दे दिया।"

"और हाँ दीदी," मीरा ने कान में फुसफुसाया, "अगली बार जब आओगी, तो विक्की तुम्हें लेने आएगा। चाहे तुम्हारे पास हेलीकॉप्टर ही क्यों न हो, लैंडिंग की परमिशन तभी मिलेगी जब पायलट विक्की होगा।"

हॉल में हंसी गूँज उठी।

विकास और रागिनी जब गाड़ी में बैठे, तो रागिनी ने अपनी सीट थोड़ी पीछे की और रिलैक्स होकर बैठ गई। उसने साइड मिरर में देखा, मीरा और माँ गेट पर हाथ हिला रही थीं।

गाड़ी जैसे ही हाइवे पर चढ़ी, रागिनी ने रेडियो बंद कर दिया।

"विक्की, तुझे याद है एक बार बचपन में तूने मेरी गुड़िया की टांग तोड़ दी थी और मैंने तुझे कितना मारा था?" रागिनी ने हंसते हुए बात शुरू की।

"अरे दीदी, वो टांग तो पहले से टूटी थी, आपने इल्जाम मुझ पर लगाया था..." विकास ने सफाई दी।

और फिर शुरू हो गया बातों का वो सिलसिला जो पिछले कई सालों से कहीं खो गया था। यह सफर पेट्रोल फूंकने वाला था, समय बर्बाद करने वाला था—कम से कम दुनिया की नज़र में। लेकिन उस बंद कार के भीतर, दो भाई-बहन अपने रिश्ते की जड़ों को फिर से सींच रहे थे।

मीरा ने घर के अंदर जाते हुए मन ही मन सोचा—"सही कहते हैं, औरतें हर जगह मौजूद हैं, हर काम कर सकती हैं। लेकिन कभी-कभी उन्हें बस 'बहन' या 'बेटी' बनकर रिलैक्स होना चाहिए, जहाँ उन्हें कोई और संभाले।"

उस दिन मीरा ने एक बड़ा सबक सीखा था। आधुनिकता का मतलब अपनी जड़ों को काट देना नहीं, बल्कि उन्हें नए तरीके से संजोना है। परंपराएं बोझ नहीं होतीं, अगर उनमें प्यार का अहसास हो। वो 200 किलोमीटर का सफर, उस दिन किसी तीर्थ यात्रा से कम नहीं था।

लेखक : अमित मिश्रा


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