रेस्टोरेंट की घड़ी में रात के साढ़े नौ बज रहे थे। बाहर हल्की-हल्की ठंड थी, पर अंदर हंसी और चहल-पहल से गर्माहट बनी हुई थी। जैसे ही दरवाजे की घंटी बजी, आर्या ने सहज ही नज़र उठाकर देखा—और उसके चेहरे पर आदर वाली मुस्कान अपने-आप आ गई।
“अंकल-आंटी आ गए,” उसने धीमे से कहा।
दरवाज़े के पास ही दोनो खड़े थे—वही परिचित, सधे हुए लोग, जिनका इस रेस्टोरेंट से पुराना नाता था।
“अरे, ये तो… राघव जी और शालिनी जी हैं!” वेटर ने भी पहचान लिया और तुरंत आगे बढ़कर नमस्ते की।
आदित्य ने कदम आगे बढ़ाए। “पापा… मम्मी…”
राघव जी ने बेटे को सीने से लगा लिया, “कैसा है तू? और ये जगह तो… वाह, और भी सुंदर हो गई है।”
शालिनी जी ने इधर-उधर देख कर कहा, “बहुत बदलाव किया है तुम लोगों ने। अब तो बिल्कुल नया लगता है। पर एक बात है—पुरानी अपनापन अभी भी है।”
आर्या ने हाथ जोड़कर कहा, “कैसे हैं आप, अंकल?”
“बहुत बढ़िया, बेटा,” राघव जी बोले, “तू कैसी है?”
“मैं भी ठीक हूँ,” आर्या ने मुस्कुराकर कहा।
सब लोग एक ही टेबल पर बैठ गए। थोड़ी देर में प्लेटें, सलाद, सूप, रोटियाँ, सब्ज़ियाँ—सबकुछ लगने लगा। शालिनी जी ने प्यार से कहा, “आज हमारी इच्छा है कि तुम सब हमारे साथ ही खाना खाओ। जितनी देर मिले, साथ बैठकर बातें कर लें।”
विवान ने हँसकर कहा, “आंटी, आप खाइए, हम बाद में…”
आदित्य ने तुरंत रोक दिया, “ऐसा कैसे? आज सब साथ बैठेंगे। कब मिलता है ऐसा मौका!”
आर्या ने भी हामी भरी, “हाँ, बैठो ना। सर्व करने को कह देंगे। आज साथ बैठकर ही अच्छा लगेगा।”
शालिनी जी ने पूजा की तरफ देखकर कहा, “पूजा, तू मेरे पास बैठ। कितने दिन हो गए, ढंग से बात ही नहीं हुई।”
“जी आंटी,” पूजा मुस्कुरा कर बैठ गई।
आर्या ने एक और लड़की को इशारा किया जो थोड़ी दूरी पर खड़ी थी—“रिया, तुम भी आओ। ऐसे अलग-थलग क्यों खड़ी हो?”
रिया झिझकते हुए आई और बैठ गई।
शालिनी जी ने रिया की तरफ ध्यान से देखा, “बेटा, तुम…?”
विवान ने तुरंत कहा, “आंटी, ये रिया है।”
“हैलो आंटी,” रिया ने धीमे से कहा।
आर्या ने मुस्कुराकर बताया, “रिया, विवान की फियॉन्सी है।”
“ओह!” शालिनी जी का चेहरा खिल उठा, “बहुत-बहुत बधाई। और विवान, तुझे भी।”
“थैंक यू,” विवान ने कहा।
राघव जी ने चुटकी ली, “तो तू शोरूम पर नहीं आया था? पता है, शादी तय हुई और तू खबर तक नहीं लेने पहुँचा।”
सब हँस पड़े। आदित्य ने मुँह बनाकर कहा, “पापा…”
शालिनी जी ने पूजा को देखते हुए प्यार से टोक दिया, “तू कुछ खाती-पीती है भी या नहीं? कितनी कमजोर हो गई है।”
पूजा ने सिर झुका लिया, “जी आंटी…”
आदित्य ने हँसते हुए कहा, “ये पूजा… मेरे दिमाग के अलावा कुछ नहीं खाती।”
“चुप कर,” पूजा ने नकली गुस्से में कहा।
राघव जी ने आदित्य की तरफ देखकर ठहाका लगाया, “तभी तो कमजोर है… क्योंकि तेरे पास दिमाग है ही कहाँ, खाली है।”
पूरा टेबल हँसी से गूंज उठा। आदित्य भी मुँह फुलाकर हँसने लगा।
खाना खत्म हुआ तो शालिनी जी ने संतोष से कहा, “आज का खाना बहुत टेस्टी था।”
आर्या ने मजाकिया अंदाज़ में कहा, “आज का खाना इन सबने बनाया है।”
विवान तुरंत बोला, “आंटी, आपको पनीर वाली सब्जी कैसी लगी?”
“लाजवाब,” शालिनी जी ने तारीफ की।
विवान ने गर्व से कहा, “वो मैंने बनाई थी।”
आर्या और पूजा ने दबे होंठों से एक-दूसरे को देखा, हँसी रोकते-रोकते आँखें भीगने लगीं।
राघव जी ने विवान की पीठ थपथपाई, “वाह! हाथ में सच में स्वाद है।”
धीरे-धीरे सब अपने-अपने काम में लग गए। कोई किचन की तरफ चला गया, कोई बिल देखने, कोई स्टाफ से बात करने। टेबल पर बस आर्या, आदित्य और उसके माता-पिता रह गए।
आर्या उठ ही रही थी कि शालिनी जी ने कहा, “आर्या, रुको। मुझे तुमसे बात करनी है।”
आर्या ठिठक गई। आदित्य ने भी उसकी तरफ देखा—उस नजर में एक अनकहा डर था, जैसे वह जानता हो कि यह बातचीत किस तरफ जाएगी।
आर्या वापस बैठ गई। “जी आंटी, बोलिए।”
शालिनी जी का स्वर बहुत नरम था, पर आँखों में चिंता साफ थी। “बेटा, तू मेरी बेटी जैसी है। इसलिए तुझ पर भरोसा भी ज्यादा है। जो पूछूं, सच बताना।”
आर्या ने एक पल आदित्य की तरफ देखा। आदित्य की नजर झुक गई।
“क्या हुआ आंटी?”
शालिनी जी ने धीमे-धीमे कहा, “मैंने आदित्य से शादी के लिए कितनी बार कहा, कितनी लड़कियों की फोटो दिखाई… पर हर बार उसका जवाब बस ‘ना’ रहा। मैंने ये भी कहा कि अगर कोई पसंद है तो बता दे, हम खुशी से रिश्ता तय कर देंगे… फिर भी ये टालता रहता है। तू इसकी सबसे अच्छी दोस्त है। तुझे कुछ पता होगा।”
आदित्य बीच में बोल पड़ा, “माँ, मुझे अभी शादी नहीं करनी बस।”
राघव जी ने तुरंत उसे डांटते हुए कहा, “चुप बैठ। अभी हम बात कर रहे हैं।”
शालिनी जी ने आर्या की तरफ देखा, “बेटा, सच बताना… क्या ये किसी लड़की से प्यार करता है? या कुछ हुआ है जो हमसे छिपा रहा है?”
आदित्य फिर बोला, “ऐसा कुछ नहीं हुआ—”
“बस,” राघव जी ने कड़क आवाज़ में कहा, “बेवजह की सफाई मत दे। कारण बता।”
आदित्य खामोश हो गया। उसके चेहरे पर वही जिद और वही दर्द—दोनों एक साथ थे।
आर्या ने बहुत संभलकर कहा, “आंटी… इस बारे में आदित्य ने मुझे सीधे कुछ नहीं बताया। लेकिन… मैं उससे बात करूंगी। मैं वादा करती हूँ।”
शालिनी जी की आँखें भर आईं। “तू बात कर लेना बेटा। हमारी तो ये सुनता ही नहीं।”
राघव जी ने आर्या के सिर पर हाथ रखा, “मैंने तुझे हमेशा बेटी माना है। एक पिता होने के नाते आज तुझ पर भरोसा कर रहा हूँ… इसे समझा देना।”
आर्या ने सिर हिला दिया, “मैं पूरी कोशिश करूंगी, अंकल।”
कुछ ही देर में राघव जी और शालिनी जी उठे, स्टाफ से प्यार से बातें कीं, और बाहर निकल गए। उनके जाते ही टेबल पर एक भारी चुप्पी गिर गई—जैसे अभी-अभी हंसी वाले कमरे में किसी ने दीया बुझा दिया हो।
आर्या ने आदित्य की तरफ देखा। “तू ये क्या कर रहा है, आदित्य?”
आदित्य ने नजरें नहीं उठाईं। बस उँगलियों से टेबल के किनारे को सहलाता रहा।
आर्या का स्वर थोड़ा सख्त हो गया, “जब तू तान्या से प्यार करता है… तो उन्हें बता क्यों नहीं देता? छुपा क्यों रहा है?”
आदित्य की पलकों में जैसे कुछ टूट गया। उसने गहरी सांस ली। “क्योंकि… तान्या ने मुझे ‘ना’ नहीं कहा… उसने मुझे डराया है, आर्या।”
आर्या चौंक गई। “डराया? क्या मतलब?”
आदित्य ने पहली बार सीधे उसकी आँखों में देखा। “उसकी मां ने कहा कि अगर मैं शादी की बात घर पर लाया… तो वे तान्या की शादी कहीं और तय कर देंगे। तान्या खुद भी डरती है। वो कहती है—तुम्हारे घर वाले बड़े हैं, पर मेरे घर वाले… बहुत सख्त हैं। और मैं… मैं मम्मी-पापा को दुख भी नहीं देना चाहता, और तान्या को खोना भी नहीं।”
आर्या ने धीरे से उसकी हथेली पर अपना हाथ रख दिया। “तो तू अकेले लड़ रहा है?”
आदित्य का गला भर आया। “मैं बस इतना चाहता था कि पहले सब ठीक हो जाए। सही समय आए, फिर बोल दूं।”
आर्या ने गहरी सांस ली। “सही समय कभी अपने-आप नहीं आता, आदित्य। उसे बनाना पड़ता है।”
आदित्य की आँखों में उम्मीद की चमक उभरी। “और कैसे?”
आर्या ने दृढ़ होकर कहा, “कल सुबह मैं तेरे साथ चलूंगी। पहले तान्या से मिलेंगे, उसके घर वालों से बात की जाएगी… और फिर शाम को तू अपने मम्मी-पापा से सच बोलेगा। लेकिन एक बात याद रखना—तू झूठ के सहारे रिश्ता नहीं बना सकता। अगर प्यार सच्चा है, तो सच भी बोलना पड़ेगा।”
आदित्य ने लंबी सांस छोड़ते हुए सिर हिलाया। “डर लगता है, आर्या।”
आर्या मुस्कुरा दी—वैसी मुस्कान, जिसमें दोस्ती का भरोसा था। “डर सबको लगता है। पर अकेले डरने से बेहतर है—साथ मिलकर सामना करना।”
आदित्य की आँखें भीग गईं। उसने बस इतना कहा, “थैंक यू…।”
और उसी पल, रेस्टोरेंट की लाइटें जैसे फिर से तेज हो गईं—क्योंकि किसी के भीतर बुझी हुई हिम्मत को, एक दोस्त ने वापस जला दिया था।
लेखिका : राधिका गुप्ता
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